Saturday, September 6, 2008

आज देखा 20 साल पुरानी सलाम बॉम्बे का एक सुखद अंत...

आज पहली बार लगा कि फ़िल्मी दुनिया से भी ज़्यादा आश्चर्यचकित होती है असल ज़िंदगी। पिछले 10 दिनों से सलाम ज़िंदगी पर कुछ लिखना चाह रही थी। फिल्म 20 साल की हो गई है और विश्व सिनेमा में भारत को खड़ा करती है। लेकिन, आज अपनी आंखों से असल ज़िंदगी की सलाम बॉम्बे देखकर आ रही हूँ। सलाम बॉम्बे का कृष्णा मेरे सामने था और वो रे-बेन का चश्मा पहने था। वो घर से भागा तो था, सड़कों पर सोया था, लेकिन आज वो एक मशहूर फोटो ग्राफर है। कृष्णा आज विक्की है। असल ज़िंदगी की सलाम बॉम्बे का अंत सुखद था...


सलाम बॉम्बे का कृष्णा याद है? 10 या 12 साल का वो कृष्णा आज 30 या 32 साल का हो गया होगा। सलाम बॉम्बे को बने 20 साल हो गए। 1988 में बनीं ये फ़िल्म आज तक मुझे फिल्मी दुनिया की एक माइल स्टोन ही लगती थी। लेकिन, आज जाना कि सलाम बॉम्बे के आगे भी कुछ है। मीरा नायर ने कई बेहतरीन फ़िल्में बनाई हैं, लेकिन मीरा नायर ये नाम सुनते ही दिमाग में आती है - सलाम बॉम्बे। कई राष्ट्रीय और अतंर्राष्ट्रीय इनाम अपनी झोली में डाल चुकी इस फ़िल्म को आज याद करने की वजह सिर्फ़ इसके 20 साल पूरे होना नहीं है। क्योंकि, आज मैं मिली एक और कृष्णा से... मैं मिली विक्की रॉय से। विक्की 10 साल का था जब वो पश्चिम बंगाल के एक छोटे से शहर से भागकर दिल्ली आ गया था। बात सलाम बॉम्बे और विक्की की बात एक साथ इसलिए क्योंकि, दिल्ली आने के बाद विक्की को सलाम बालक ट्रस्ट ने सहारा दिया। सलाम बालक ट्रस्ट जोकि 1989 में मीरा नायर और उनकी माँ ने स्थापित किया। सलाम बॉम्बे से हुए लाभ के पैसों से बना एक ऐसा ट्रस्ट जहाँ 20 साल पुरानी यादें ताज़ा हो सकती हैं। कृष्णा, मंजू, चिलम सब यहाँ मिल जाएंगे। कोई घर से भागा हैं, तो किसी का घर ही नहीं हैं। विक्की से बातचीत के दौरान उसने कहाँ कि, मैं घर से स्कूल और स्कूल से घर की ज़िंदगी से बोर हो गया था और कुछ करना चाहता था। घर से भागा और फिर दिल्ली आ गया। दिल्ली में रेल्वे स्टेशन के बाहर कचरा बीना, ढाबे पर खाना बनाया, पानी बेचा और सड़कों पर सोया। विक्की की ये बातें सुनकर 20 साल पुराना कृष्णा दिखाई देने लगा। लेकिन, कहानी यहीं से बदलती है। कृष्णा का अंत एक हत्यारे के रूप में हुआ। कृष्णा मुम्बई की तंग और ज़ुर्म की गलियों में खो गया। लेकिन, विक्की को मिला सलाम बालक ट्रस्ट जिसने उसे गंदगी से उठाया और आज विक्की एक फ़ोटो ग्राफ़र है। लंदन और पेरिस में उसकी एक्ज़िबिशन लगती है। 21 साल का विक्की 6 महीने के लिए न्यूयार्क जा रहा है। लेकिन, फिर याद आता है कृष्णा। कहाँ होता वो आज, कैसा होता वो आज...
विक्की से मैंने पूछा घर से भागे डरे नहीं? बोला कुछ करना था तो घर से निकला था। यहाँ आकर दिल्ली के फुटपाथों पर गालियाँ खाकर सीखा कि ज़िंदगी क्या होती है। आज विक्की किसी को घर से भागने की सलाह नहीं देता है। कहता है – मैं ख़ुशनसीब हूँ। सब नहीं होते हैं। विक्की से इस पूरी बातचीत के दौरान सलाम बॉम्बे मेरे सामने घूमती रही। सलाम बॉम्बे अब कम से कम मेरे लिए एक फिल्म नहीं, एक ज़िंदगी है। फिल्म को अक्टूबर 2008 में 20 साल हो जाएगें। इस बार सिर्फ़ फ़िल्म देखने का अनुरोध नहीं है। साथ में ये भी कहूंगी, कि अगर हो सकें तो किसी एक कृष्णा को बचाइए... हो सके तो उसे विक्की बनने में मदद कीजिए...

3 comments:

tulika singh said...

ummed par duniya kayam hai..... jindagi ko jine ki hasrat hi har insan se kuch naya karvati hai .... shayd vicky ki bhi yahi hasrat thi .... salam bombay ko tulika salam karti hai jaha aisa aisa pratibha logo ki parvarish hui hai...... acha article tha dipti

Amit said...

मैंने सलाम बॉम्बे नहीं देखी है, सिर्फ़ एनडीटीवी वाल सलाम ज़िंदगी के कुछ एपीसोड देखे हैं। शुक्रिया.......सलाम बॉम्बे दिखाने और एक हर्टटचिंग रियल स्टोरी सुनाने के लिए। अफसोस है.... मैं क्यों घर से नहीं भागा...

फिल्म के बारे में सुनकर लगता है कि मीरा ने अच्छी फ़िल्म बनाई है और उससे भी अच्छा काम किया है सलाम बालक ट्रस्ट बनाकर....सलाम मीरा....!

Parvez Sagar said...

Dipti, Humesha ki tarah sadha hua lekh.... ye hi huner aap ki pahchan ban jata hai. rahi baat Salam bomby ke sukhad Ant ki to sunkar taslli mili ki chalo kuchh to achcha hua. Ummide hai Aap Aise hi Aage badhti Rahengi.

Shubhkamnaoo sahit

Parvez sagar.