Thursday, November 13, 2008

अपन तो थोड़े बेन्डे थोड़े एबलान्दें हैं...


शीर्षक शायद कुछ लोगों को अजीब लगे। क्योंकि इसमें लिखे शब्द विशुद्ध रूप से मालवा और निमाड़ अंचल में बोले जानेवाले है। जब से दिल्ली आई पहली बार ऐसा हुआ है कि ऑफ़ीस से मुझे 10 दिन की छुट्टी मिली हो। दीवाली पर घर गई तो देवउठनी ग्यारस (एकादशी) के दिन वापसी हुई। इस बीच भोपाल, इन्दौर और देवास घूमना हुआ। वापस उसी जगह लौटकर लगा कि सब कुछ वैसा ही है, बस मैं ही बदल गई हूँ। अब मैं "में" को "मैं" बोलने लगी हूँ। पेदल की जगह पैदल चलने लगी हूँ। और, इन्दोर की जगह इन्दौर जाने लगी हूँ। शीर्षक में लिखे ये दोनों शब्द इसी प्रवास दौरान मेरे कानों में पड़े। बेन्डा शब्द का अर्थ होता है एक ऐसा इंसान जो ऊल जलूल काम करें। बातों पर जिसकी प्रतिक्रियाएं अजीब हो। एबलान्दा शब्द भी इसी से मिलता-जुलता है। ये भी किसी ऐसे ही बन्दे को कहा जाता है जो उल्टी-सीधी हरकतें करता हो। थोड़ा-सा पगला हो। ये शब्द मैंने देवास से लौटते वक़्त ट्रेन में सुने। कुछ अंकलजी लोगों का जत्था उस अप-डाऊन ट्रेन में आकर बैठा और बातचीत शुरु हुई। इसी बीच उनकी बातों में ये शब्द जुड़ा कि यार उसकी बात मत करो, वो तो एक नंबर का एबलान्दा है। यानी कि अब सिर्फ़ एबलान्दा नहीं नंबर एक दो तीन के एबलान्दें भी होते हैं। दुर्गंध के लिए बास शब्द। किसी लल्लू के लिए गेला शब्द और मोटे के लिए जाड़ा। ये सभी उस अंचल की बोली के शब्द है। अफसोस ये कि मुझे न तो मालवी आती है, न निमाड़ी। बस इतना है कि कोई बोल रहा हो तो समझ जाती हूँ। भोपाल जाकर महज भाषा का ही सुख नहीं मिला वहाँ की आरामदायक ज़िदंगी का भी मैंने जमकर मज़ा लिया। देखा कि 9 बजे ऑफ़ीस पहुंचना हो तो पौने नौ पर निकला जाता है। बस में हमेशा सीट खाली ही मिलती है। जगह कितनी भी दूर क्यों न हो 20 मिनिट में पहुंचा जा सकता हैं। ऐसा नहीं कि ये मुझे ये मालूम न हो। लेकिन, दिल्ली के ट्रैफ़िक जाम, लम्बे रास्तों और धक्कों ने सब कुछ स्मृति से मिटा-सा दिया था। बस में वही आंदों जांदों। पापा के साथ फिर लंबे रास्ते पैदल ही तय करना। मम्मी का दिन भर गाय को ढूंढना रोटी देने के लिए। न्यू-मार्केट का वही हनुमान मंदिर, वही टॉप-एन-टाउन, वही चना ज़ोर गर्म। कॉलेज के पास की वही बैठक जो इस बार खाली पड़ी थी। वही हकीम भाई के हाथ की कट कॉफ़ी। सब वैसा ही था। 2 साल बाद भी हकीम भाई को मैं याद थी। मुझे देखते ही वो वैसे ही मुस्कुरा दिए जैसे कि 2 साल पहले मुस्कुराते थे। मैंने पूछा याद हूँ मैं या नहीं... हंसकर वो बोले - हां जी बिल्कुल। अपनी पीजी की पढ़ाई के दौरान ही मैंने ठेले पर कॉफ़ी पीना सीखा था। साथ ही कही-भी बैठ जाना, मस्ती मारना भी। इन शॉर्ट आवारागर्दी सीखी थी। और इस सब में मेरी साथी थी अमीता। जो उस वक़्त भी मेरे साथ कट कॉफ़ी पीती थी और इस बार भी वो मेरे साथ थी। अंतर बस इतना था कि इसबार हकीम भाई ने हमसे पैसे नहीं लिए। बोले कि इतने दिनों बाद आप आई है वही हमें उच्छा लगा। मैं बस मुस्कुरा कर रह गई।


इस बार कटी इत्मीनान की ये छुट्टियाँ कई दिनों तक याद रहेगी। कम-से-कम तब तक जब तक कि अगली ऐसी छुट्टियाँ फिर वही अपने बेन्डे और एबलान्दें लोगों के बीच न बीता आऊंगी।

6 comments:

विष्णु बैरागी said...

वो तो पढ के ही लग गया कि आपको मालवी निमाडी नी आती हे । बेन्‍डा का मतलब हे - पागल ओर एबलान्‍दा का मतलब है - कुटिल, दुष्‍ट, खल ।
ऐसेई लिखते रेना । पढ के अच्‍छा लगता हे ।

Bhuwan said...

बेहतरीन आलेख. पढ़ कर पुराने दिनों की याद आ गयी. क्या दिन थे...हकीम भाई की चाय समोसे..हबीबगंज स्टेशन पर रात के दो बजे मस्ती ...भारत भवन और रबिन्द्र भवन में नाटक...
भोपाल की याद दिलाने के लिए शुक्रिया

Dipti said...

सही मतलब बताने के लिए धन्यवाद। अब से याद रखूंगी।

Udan Tashtari said...

बहुत दिनों बात फिर से इन्दोरी (इन्दौरी नहीं :))भाषा गूँजी कान में/...आनन्द आ गया पढ़कर.

Unknown said...

वही नवंबर की बीमारी। नोस्टेली। नाक बहती है और उस पहले रूमाल की याद आती है।

sarita argarey said...

दीप्ति जी ,
आपके एबलान्दा शब्द ने पोस्ट पढने के लिए मजबूर कर दिया । मल्हारगंज और मालवा मिल में बिताई गर्मियों की छुट्टियों की यादें ताज़ा हो गईं । ए की दो मात्राओं की बजाय एक के इस्तेमाल के चलते बचपन में भोपाली दोस्त अक्सर खिल्ली उडाते थे । सब कुछ याद दिला दिया इस पोस्ट ने । यादों के गलियारे में घुमाने का शुक्रिया ।