Sunday, September 27, 2020

जब एक बेटी ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री को टोका- राजा दुबे

 हर वर्ष 27 सितम्बर को जब भी बेटी दिवस मनाया

जाता है मुझे यह वाक्या जरुर याद आ जाता है. बात है वर्ष 1993 की.विश्व बाल अधिकार दिवस अर्थात 20 नवम्बर 1993 को दूरदर्शन के भोपाल केन्द्र ने स्थानीय जवाहर बाल भवन के साथ मिलकर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री, दिग्विजयसिंह के साथ जवाहर बाल भवन के बच्चों के साथ एक बातचीत का कार्यक्रम प्रस्तुत किया था. इस कार्यक्रम में बच्चों के अधिकारों के संरक्षण पर राज्य के दायित्व पर मुख्यमंत्री को अपनी बात कहनी थी तो उपस्थित बच्चों को बच्चों के अधिकारों से सम्बन्धित सवाल मुख्यमंत्री से पूछने थे.

अपनी जनसम्पर्क विभाग की मूल सेवा से हटकर मैं उन दिनों राज्य के महिला बात विकास विभाग में
प्रतिनियुक्ति पर बच्चों की रुचियों के समग्र विकास के संस्थान जवाहर बाल भवन में संचालक था. दूरदर्शन के इस कार्यक्रम में मेरी भूमिका सह संयोजक की थी ( संयोजक तो मूलतः दूरदर्शन के प्रोग्राम प्रोड्यूसर ही थे  ) . कार्यक्रम में जवाहर बाल भवन के बच्चों के साथ मेरी बेटी दीप्ति दुबे भी एक प्रतिभागी थी. इस कार्यक्रम में दीप्ति ने मध्यप्रदेश के मन्दसौर जिले में
स्लेट पेन्सिल कारखानों में अपने अभिभावकों के साथ काम करने वाले बच्चों के - सिलकोसिस ( स्लेट पेन्सिल बनाते समय उड़ने वाली धूल से होने वाली टी. बी.सादृष्य एक बीमारी  ) से पीड़ित होने पर सरकार के कदम पर सवाल किया था. दिग्विजयसिंह ने सवाल सुनने के बाद कहा - " आपने यह बहुत अच्छा सवाल पूछा है, बेटा " . बस, इसी बेटा सम्बोधन
पर दीप्ति ने मुख्यमंत्री को तत्काल टोका - " मुझे बेटा
नहीं बेटी कहिये मुख्यमंत्रीजी, मुझे बेटी होने पर गर्व है " इस टोके जाने से मुख्यमंत्री हठात् चौंक गये मगर एक पल बाद ही दिग्विजयसिंह ने मुस्कराते हुए कहा - " आपने यह बहुत अच्छा सवाल किया है बेटी " और इस सम्बोधन के बाद  उन्होंने उस सवाल का जवाब दिया.

तब दीप्ति का कहा यह वाक्यांश कि मुझे बेटी होने  पर गर्व है, आज तक मेरी स्मृति में यथावत का है. तुम्हे ही नहीं, हमें भी तुम्हारे बैटी होने पर गर्व है.

राजा दुबे.

Saturday, September 26, 2020

चार भाषाओं के छ: गानों के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाले एस पी नहीं रहे - राजा दुबे

पार्श्वगायन में बहुभाषी गीतों के गायन की लम्बी परम्परा रही है मगर दक्षिण भारत के सुप्रसिद्ध, सुमधुर पार्श्वगायक एस. पी. बालासुब्रमण्यम संभवतः इस परम्परा के सबसे लोकप्रिय और सर्वमान्य गायक थे. उन्होंने सोलह भाषाओं मे चालीस हज़ार से अधिक गाने गाये. चार भाषाओं - तेलुगू, तमिल, कन्नड़ और हिंदी गानों के लिए छ: बार सर्वश्रेष्ठ गायक के तौर पर राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले वे देश के संभवत: एकमात्र पार्श्वगायक थे. एसपी बालासुब्रमण्यम का नाम सबसे ज्यादा फिल्मी गानों में आवाज देने के लिए गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी दर्ज है .भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2001 में पद्मश्री और वर्ष 2011 में पद्मभूषण नागरिक सम्मान से विभूषित किया गया था . 


बॉलीवुड के इसी सुरीले और लोकप्रिय गायक एस.पी बालासुब्रमण्यम का 25 सितम्बर 2020 को कोरोना वायरस से संक्रमित होने के कारण निधन हो गया चौहत्तर साल के एस. पी बालासुब्रह्मण्यम ने हिंदी फिल्मों की गायकी में अपनी एक अलग पहचान स्थापित की थी. वर्ष 1989 में सलमान खान-भाग्यश्री अभिनित फिल्म - मैंने प्यार किया " में सलमान खान पर  फिल्माये गये सभी गानों को एसपी ने ही स्वर दिया था. उसके बाद उन्होंने सलमान खान के कैरियर के शुरुआती दिनों के सभी गाने गाये और कई सालों तक उन्हें सलमान खान की आवाज के तौर पर भी जाना जाता रहा. एस. पी. बालासुब्रह्मण्यम ने कई हिंदी फिल्मों में संजय दत्त और कमल हासन जैसे शीर्षस्थ अभिनेताओं  के लिए भी अपनी आवाज दी.



एस.पी. बाल सब्रमण्यम का पूरा नाम श्रीपति पण्डित  आराध्युल बालसुब्रमण्यम था, उन्हें लोगएस.पी.बी. अथवा बालू के नाम से भी पुकारते थे.आँध्रप्रदेश के चित्तूर जिले के एक छोटे-से गाँव कोनेटम्मपेटी में 04 जून 1946 को जन्मे एस.पी. एक बहुभाषी पार्श्वगायक के साथ अभिनेता, फिल्म निर्माता और फिल्म निदेशक भी थे. उन्होंने अपने पाँच दशक लम्बे कैरियर में चालीस से भी अधिक फिल्मों का निर्देशन भी किया. एस. पी. बालसुब्रमण्यम की आवाज एक अलग खनक लिये हुए थी और उनकी आवाज को लेकर यदि कोई तुलनात्मक टिप्पणी होती थी वो दक्षिण के ही उनके समकालीन पार्श्वगायक येसुदास से. एस.पी.ने पार्श्वगायक  के रुप मे   छ: राष्ट्रीय पुरस्कार मिले थे जबकि येसुदास को उनसे दो ज्यादा आठ राष्ट्रीय पुरस्कार मिले थे मगर एसपी को चार भाषाओं में पार्श्वगायन के लिये ये पुरस्कार मिले थे जो उन्हें येसुदास से आगे रखता है.

राजा दुबे 

Friday, September 18, 2020

विद्वता की राह में विचारधारा की बाधा से जूझते रहे डॉ.प्रभाकर श्रोत्रिय- राजा दुबे

 


डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय का हिन्दी आलोचना साहित्य के क्षेत्र में बड़ा अवदान रहा है और वे एक विलक्षण आलोचक और उत्कृष्ट सम्पादक के रुप में वे हमेशा याद किये जायेंगे . उनका लम्बी बीमारी के बाद अठहत्तर वर्ष की उम्र में गत 16 सितम्बर को दिल्ली में निधन हो गया. उनका निधन हिन्दी साहित्य के लिये एक बड़ी क्षति है. विद्वता का जहाँ तक सवाल है वे अपने फन के उस्ताद थे, मगर वैचारिक प्रतिबद्धता के उनके आग्रह उनकी विद्वता की राह में बाधा बने और वे ताज़िन्दगी इसी द्वंद्व से जूझते रहे. सुप्रसिद्ध साहित्यकार नरेश मेहता की परम्परा के संवाहक प्रभाकर श्रोत्रिय अपने समकालीन वामपंथी लेखकों से वैचारिक स्तर पर कई बार टकराये मगर अपने लेखन की श्रेष्ठता के बूते पर वे अंगद के पैर के माफिक जमे रहे. श्रोत्रिय साहित्य की विचारधारा के आधार पर खेमेबंदी से प्रसन्न नहीं थे मगर वे साहित्यकार की तटस्थता को लेकर आग्रही भी नहीं थे.


डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय को साहित्यिक जगत में एक प्रखर सम्पादक के रूप में जाना जाता है. अलग-अलग कालखण्ड  में अक्षरा, वागर्थ, साक्षात्कार , समकालीन भारतीय साहित्य और नया ज्ञानोदय जैसी लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं के सम्पादन का श्रेय भी उन्हें प्राप्त था. ऐसा माना जाता है कि यदि वे पहल करते तो इतनी साहित्यिक पत्रिकाओं के सम्पादन का कीर्तिमान भी किसी बुक ऑफ रिकार्ड्स में दर्ज हो जाता. वैचारिक मतभेद के बावजूद कई भारतीय लेखकों से उनकी अंतरंगता होने की वजह उनकी सज्जनता और ईमानदारी रही है.एक प्रखर
 आलोचक, लेखक, और साहित्यकार के रुप मे़ं  यह उनकी सबसे बड़ी खूबी रही है और तमाम लोगों को साथ जोड़कर काम करने की बेजोड़ उनकी कार्यशैली रही है, जो हिंदी के संपादकों में अक्सर देखी नहीं जाती।

मध्यप्रदेश के जावरा में 19 दिसम्बर  1938 को जन्मे डॉ. श्रोत्रिय ने उज्जैन में उच्च शिक्षा प्राप्त की और हिन्दी में पीएडी तथा डीलिट करने के बाद वे भोपाल के हमीदिया कॉलेज में प्राध्यापक नियुक्त हो गए थे.वे मध्यप्रदेश साहित्य परिषद की पत्रिका- " साक्षात्कार "  के संपादक भी रहे. भोपाल से ही निकलने वाली पत्रिका "अक्षरा " का भी संपादन किया . उसके बाद वे कोलकाता से भारतीय भाषा परिषद की पत्रिका "वागर्थ" के भी संपादक रहे. इसके बाद उन्होंने नया ज्ञानोदय के सम्पादन का दायित्व भी संभाला. पिछले कुछ वर्षों से वे साहित्य अकादमी की पत्रिका "समकालीन भारतीय साहित्य" का  सम्पादन भी कर रहे थे. वे सेवानिवृत्त होकर स्वतंत्र लेखन से जुड़ गये थे.
साहित्य की लगभग सभी विधाओं में उन्होंने लेखन किया. आलोचना, निबंध और नाटक के क्षेत्र में इनका योगदान उल्लेखनीय माना गया. उन्होंने आलोचना विधा में प्रसाद का साहित्य : प्रेमतात्विक दृष्टि कविता की तीसरी आंख, संवा ,कालयात्री है कविता सहित ग्यारह किताबें. हिन्दी: दशा और दिशा, सौन्दर्य का तात्पर्य ,समय का विवेक और समय समाज साहित्य जैसी निबंध की चार पुस्तकें भी लिखीं. उनके लिखे नाटक इला, सांच कहूं तो और फिर से जहाँपनाह भी चर्चित रहे.उन्होने हिन्दी कविता की प्रगतिशील भूमिका और सूरदास: भक्ति कविता का उत्सव जैसी आधा दर्जन से भी अधिक पुस्तकों का सम्पादन भी किया.

राजा दुबे 

Thursday, September 17, 2020

विद्वता के बावजूद सहज रहना कपिलाजी की सबसे बड़ी खूबी थी - राजा दुबे

विलक्षण और बहुआयामी प्रतिभा की धनी कपिला वात्स्यायन अपनी  प्रकाण्ड विद्वता के बावजूद अत्यंत हज और आभामण्डल के कथित प्रदर्शन से निस्पृह रहतीं थीं. विद्वता के बावजूद सहज रहना उनकी सबसे बड़ी खूबी थी. भारत भवन, भोपाल और अखिल भारतीय कालिदास समारोह, उज्जैन के कई कार्यक्रमों में जब विषय की दुरुहता से श्रोता असहजता का अनुभव करते तो वे कुछ ऐसे प्रसंग जिसमें हास्य का पुट हो उससे व्याख्यान की दुरुहता को सहज श्रव्य बना देतीं थीं. कई बार आमने-सामने की चर्चा के सत्र में कुछ प्रश्नकर्ता उनकी विद्वता से असहज होकर घबराहट महसूस करते तो कपिलाजी बिना झुंझलाहट के उस प्रश्नकर्ता की घबराहट दूर करने में ऐसे वाक्यों के साथ मदद करतीं थीं कि - "तो आप यह जानना चाहते हैं" या "आपका मतलब यह है" कहकर उसका मनोबल बढ़ातीं थीं. अपनी इस प्रवृत्ति के बारे में उनका यह कथन भी गौरतलब है. वे कहतीं थीं- "आपका ज्ञान तो सर्वथा ज्ञेय है उसे आभामंडल से अज्ञेय क्यों बनाना?" इसके बाद एक स्मित मुस्कान उनके चेहरे पर होती थी.

महान विदुषी और विलक्षण प्रतिभा की धनी कपिला
वात्स्यायन का अवसान कला, साहित्य और संस्कृति क्षेत्र की एक बड़ी क्षति है .प्रख्यात संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने उन्हें स्मरण करते हुए बड़ी सटीक टिप्पणी की है कि बहुआयामी प्रतिभा की धनी कपिलाजी ने एक साथ समान अधिकार के साथ  सहित्य, कला और संस्कृति के संवर्धन तथा विकास के लिए ऐतिहासिक कार्य किया.वह अपने आप में एक संस्था थीं और कला से जुड़ी कई संस्थाओं का उन्होंने निर्माण किया तथा कलाकारों के बीच संवाद कायम करने में उन्होंने एक सेतु का काम किया.

उनका काम ही उनकी पहचान थी और वे हिंदी के यशस्वी दिवंगत साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' की पत्नी होने के बावजूद अपनी एक अलहदा पहचान कायम करने में सफल रहीं थीं. संगीत नृत्य और कला की महान विदुषी कपिला वात्स्यायन की शिक्षा दीक्षा दिल्ली  बनारस हिंदू विश्वविद्यालय औरअमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय में हुई . आपका जन्म 25 दिसम्बर 1928 को में हुआ था,आप राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रसिद्ध लेखिका
सत्यवती मलिक की पुत्री थीं.

संगीत नाटक अकादमी फेलो रह चुकीं कपिलाजी   प्रख्यात नर्तक शम्भू महाराज और प्रख्यात इतिहासकार वासुदेव शरण अग्रवाल की शिष्या रहीं. वर्ष  2006 में राज्यसभा के लिए मनोनीत सदस्य नियुक्त की गई थीं और लाभ के पद के विवाद के कारण उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता त्याग दी थी मगर उसके बाद वह  फिर एक बार राज्यसभा की सदस्य मनोनीत की गई थीं.श्रीमती वात्स्यायन राष्ट्रीय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की संस्थापक सचिव थी और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की आजीवन ट्रस्टी भी. उन्होंने भारतीय नाट्यशास्त्र और भारतीय पारंपरिक कला पर गंभीर और विद्वतापूर्ण पुस्तकें  लिखी.वह देश में भारतीय कलाशास्त्र की आधिकारिक विद्वान मानी जाती थीं.कपिला के भाई केशव मलिक जाने-माने अंग्रेजी के कवि और कला समीक्षक थे .श्रीमती वात्स्यायन साठ के दशक में शिक्षा विभाग में सचिव पद पर भी कार्यरत थीं.

दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व छात्र डॉ. कपिला वात्स्यायन ने अपना करियर शिक्षण व्यवसाय से शुरू किया, लेकिन उनके व्यापक ज्ञान और अनुभव को देखते हुए उन्हें शिक्षा और संस्कृति मंत्रालय में ले लिया गया .जिस समय शिक्षा की सुविधाएं प्रारंभिक स्तर पर थीं, उस समय डॉ. वात्स्यायन ने शिक्षा सुविधाओं के विस्तार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। डॉ. वात्स्यायन को डॉ. एस. राधाकृष्णन, डॉ. जाकिर हुसैन, पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ. केएल श्रीमाली, प्रो. वीकेआरवी राव, डॉ. सी. डी. देशमुख, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, डॉ. कर्ण सिंह और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तथा राजीव गांधी जैसी महान् हस्तियों के साथ काम करने का मौका मिला.

भारतीय शास्त्रीय नृत्य, वास्तुकला, इतिहास और कला की प्रख्यात विदुषी कपिला वात्स्यायन का दिल्ली स्थित उनके आवास पर बुधवार को निधन हो गया. वह 91 वर्ष की थीं.उन्होंने भारतीय नृत्य कला के मूर्त और अमूर्त को जोड़ने की कोशिश की. उन्होंने नृत्य की विभिन्न मुद्राओं का ज्यामितीय और गणितीय अध्ययन किया और कई लेख लिखे, जिन्हें कला जगत की धरोहर समझा जाता है। उन्होंने कला पर 20 किताबें लिखीं, जिनमें कुछ हैं, द स्क्वैयर एंड द सर्कल ऑफ़ इंडियन आर्ट्स, भारत : द नाट्य शास्त्र, डान्स इन इंडियन पेंटिग, क्लासिकल इंडियन डान्स इन लिट्रेचर एंड आर्ट्स और ट्रांसमिशन्स एंड ट्रांसफ़ॉर्मेशन्स लर्निंग थ्रू द आर्ट्स इन एशिया. उन्होंने जयदेव की कविताओं पर पी एचडी की थी और गीत गोविंद पर शोध किया था.

राजा दुबे