Sunday, April 11, 2021

राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस



सुरक्षित मातृत्व का अर्थ है एक समूची पीढ़ी को सुरक्षित करना


सुरक्षित मातृत्व से तात्पर्य गर्भवती महिलाओं की सुरक्षा से होता है और इसी परिप्रेक्ष्य में गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की उचित देखभाल और प्रसव सेे जुड़ी स्वास्थ्य सम्बन्धी जागरुकता फैलाने के उद्देश्य से देश में प्रतिवर्ष 11 अप्रैल को राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस मनाया जाता है । भारत सरकार ने 11 अप्रैल, 2003 को कस्तूरबा गांधी की जयंती पर यह दिवस घोषित किया था। केंद्र सरकार ने यह घोषणा महिलाओं के कल्याण के लिए कार्यरत " व्हाइट रिबन एलायंस फॉर सेफ मदरहुड" के अनुरोध पर की थी । एक गर्भवती महिला के निधन से ना केवल बच्चों के सिर से माँ का साया छिन जाता है अपितु एक पूरे परिवार की संरचना ही ध्वस्त हो जाती है । इसी एक आशंका से बचने के लिये देश में  गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की उचित देखभाल और प्रसव से जुड़ी सुविधाओं और सावधानियों के प्रति जागरुकता फैलाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस मनाया जाता है । राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की धर्मपत्नी कस्तूरबा गांधी की जन्मतिथि 11 अप्रेल को  राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस के रूप में मनाये जाने का निर्णय भारत सरकार ने लिया था । आधिकारिक तौर पर किसी एक तिथि को राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस घोषित करने वाला भारत  दुनिया का पहला देश है। इस दिन देश भर में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है ताकि गर्भवती महिलाओं के पोषण पर सही ध्यान दिया जा  सके।
 
प्रसव के दौरान प्रसूता की सुरक्षा से मातृ मृत्यु दर में आती है कमी 

माँ बनना प्रकृति का सबसे बड़ा वरदान माना जाता है लेकिन हमारे देश में आज भी यह जोखिम भरा और 
कुछ महिलाओं के लिए तो मृत्यु की आशंका भरा काम
हैं । भारत में हर साल जन्म देते समय तकरीबन पैंतालिस हजार महिलाएं प्रसव के दौरान अपनी जान गंवा देती हैं। देश में जन्म देते समय प्रति एक लाख महिलाओं में से 167 महिलाएं मौत के मुंह में चली जाती हैं। स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय के मुताबिक भारत में मातृ मृत्‍यु दर में तेजी से कमी आ रही है। यह कमी प्रसव के दौरान। प्रसूता को सुरक्षा प्रदान करने से आई है । वर्ष 2010-12 में मातृ मृत्यु दर 178,  वर्ष 2007-2009 में 212 जबकि वर्ष 2004-2006 में मातृ मृत्यु दर 254 रही। देश ने वर्ष 1990 से 2011-13 की अवधि में 47 प्रतिशत की वैश्विक उपलब्धि की तुलना में मातृ मृत्‍यु दर को 65 प्रतिशत से ज्‍यादा घटाने में सफलता हासिल की है जो एक उल्लेखनीय तथ्य है ।

मातृ मृत्यु की वजह पर सतत निगरानी और कारणों का विश्लेषण हो

अशिक्षा ,स्वास्थ्यकर आदतों ( हाईजेनिक हेबिट्स ) की  जानकारी की कमी, समुचित स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, कुपोषण, कच्ची उम्र में विवाह, बिना तैयारी के गर्भधारण आदि कुछ कारणों की वजह से माँ बनने का खूबसूरत अहसास कई महिलाओं के लिए जानलेवा और जोखिम भरा साबित होता है। कई मामलों में माँ या नवजात शिशु या दोनों की मौत हो जाती है। ज्यादातर मातृ मृत्यु की वजह बच्चे को जन्म देते वक्त अत्यधिक रक्तस्राव होता है। इसके अलावा इंफेक्शन, असुरक्षित गर्भपात या ब्लड प्रेशर भी अहम वजहें हैं। इन वजह पर सतत निगरानी और मातृ मृत्यु के कारणों का विश्लेषण भी बेहद जरुरी होता है । प्रसव के दौरान लगभग 30 प्रतिशत महिलाओं को आपात सहायता की आवश्यकता होती है। गर्भावस्था से जुड़ी दिक्कतों के बारे में सही जानकारी न होने तथा समय पर मेडिकल सुविधाओं के ना मिलने या फिर बिना डॉक्टर की मदद के प्रसव के कारण भी प्रसुताओं की मौत हो जाती है।  जच्चा और बच्चा की सेहत को लेकर आशा कार्यकर्ताओं का अहम् रोल होता है लेकिन इनकी कमी से कई महिलाएं प्रसव पूर्व न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रह जाती हैं। समस्त मातृ मौतों में से लगभग 10 प्रतिशत मौतें गर्भपात से संबंधित जटिलताओं के कारण होती हैं।
महिलाओं को प्रसव के दौरान बचाने की मुहिम के समक्ष कई चुनौतियाँ भी हैं। जिनमें किशोरियों को यौन शिक्षा और स्वच्छता, शारीरिक विकास के लिए सही पोषण, गर्भनिरोधक उपायों की आसानी से उपलब्धता और उनकी समुचित जानकारी प्रमुख हैं। इसके साथ ही पूरे देश में, खासकर ग्रामीण इलाकों में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों और चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराए बगैर भी इन लक्ष्य को पाना संभव नहीं है। राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस पर इन्हीं चुनोतियों पर गहन विमर्श किया जाता है ।

कोरोना संक्रमण काल में भी गर्भवती महिलाओं को मिला संरक्षण

कोरोना संक्रमण काल में अवाँछित गर्भधारण के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई । इस स्थिति में प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान में हर महीने की नवीं तारीख को गर्भवती महिलाओं को प्रसव पूर्व चेकअप, मुफ्त जांचें औ दवा के साथ योजनाओं की जानकारी और इलाज मुहैया करवाने से बड़ा लाभ हुआ ।इतना ही नहीं  ज‍िन मह‍िलाओं को ड‍िलीवरी से पहले कोई समस्‍या आती है उन्‍हें पहले ही च‍िन्‍ह‍ित कर ल‍िया जाएगा इसल‍िए भी इस योजना की महत्‍व कोव‍िड के दौरान बढ़ गया । कोरोना संक्रमण काल मेंआर्थि‍क तंगी के दौरान लोगों के पास इलाज करवाने की क्षमता नहीं थी ऐसे में यह योजना मुफ्त इलाज मुहैया करवाने में सक्षम सिद्ध हुआ । इस समय अस्‍पतालों में कोरोना के मरीजों के चलते भीड़ है ऐसे में इस योजना के तहत अगर गर्भवती को रेफर करना पड़े तो वो सुव‍िधा भी म‍िल जाती है। कोरोना काल के बीते एक डेढ़ साल से परिवारों की आर्थिक स्‍थ‍ित‍ि बेहद खराब हालातों में है। गरीब और मध्‍यम वर्गीय पर‍िवार से आने वाले लोगों के ल‍िए इलाज का खर्च उठा पाना भी मुश्‍क‍िल है ऐसे में अगर सरकारी योजनाओं की जानकारी हो तो जरूरतमंदों को परेशान नहीं होना पड़ेगा। ऐसी ही एक योजना है प्रधानमंत्री सुरक्ष‍ित  मातृत्व अभियान। ये योजना गर्भवती मह‍िलाओं के ल‍िए बनाई गई है। कोव‍िड 19 के दौरान इसकी महत्‍वता और भी बढ़ गई है क्‍योंक‍ि इस अभ‍ियान के तहत प्रसव पूर्व देखभाल सुनिश्‍च‍ित की जाती है। अगर कोई महि‍ला ड‍िलीवरी से पहले क‍िसी बीमारी या खतरे का श‍िकार है तो उसे समय रहता च‍िन्‍ह‍ित कर ल‍िया जाता है। ये योजना साल 2016 में शुरू की गई थी पर इन द‍िनों इस योजना की जानकारी होनी जरूरी है ताक‍ि जो लोग प्राइवेट अस्‍पतालों के महंगे इलाज करवाने में सक्षम नहीं हैं वो योजना के तहत मुफ्त इलाज ले पाएं। 

प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान से देश में मातृ मृत्यु दर में कमी होगी

मातृ मृत्यु दर में कमी के लिये भारत सरकार ने  कई प्रभावी योजनाएं आरम्भ की है और प्रसूति के दौरान मौत को कम करने के लिए गंभीर प्रयास सुनिश्चित करने के निर्देश भी स्वास्थ्य प्रशासन को दिये हैं। इन योजनाओं ने न केवल समाज में जागरुकता फैला कर महिलाओं का सशक्तिकरण किया गया है बल्कि उनकी जरुरतों को लेकर भी समाज और देश को संवेदनशील बनाया गया है।इन योजनाओं मे प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान – सबसे प्रमुख है और इस अभियान से देश में मातृ मृत्यु दर में निश्चित रूप से कभी होगी  यह अभियान देश में तीन करोड़ से अधिक गर्भवती महिलाओं को प्रसव पूर्व देखभाल की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए शुरू किया गया है। इस अभियान के तहत लाभार्थियों को हर महीने की नवीं तारीख़ को प्रसव पूर्व देखभाल सेवाओं (जांच और दवाओं सहित) का न्यूनतम पैकेज प्रदान किया जाता है । यदि किसी माह में नवीं तारीख को रविवार या राजकीय अवकाश होने की स्थिति में अगले कार्यदिवस पर यह दिवस आयोजित किया जाता है । पिछले दिनों माननीय प्रधानमंत्रीजी ने मन की बात की एक कड़ी में प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के लक्ष्य और शुरूआत के उद्देश्य पर प्रकाश डाला तथा निजी क्षेत्र के स्त्री रोग विशेषज्ञों और चिकित्सकों से उनकी स्वैच्छिक सेवाएं देने की अपील की। इस कार्यक्रम की शुरुआत इस आधार पर की गयी है, कि भारत में हर एक गर्भवती महिला का चिकित्सा अधिकारी द्वारा परीक्षण एवं पीएमएसएमए के दौरान उचित तरीके से कम से कम एक बार जांच की जाए तथा इस अभियान का उचित पालन किया जाए, तो यह अभियान हमारे देश में होने वाली मातृ मृत्यु की संख्या को कम करने में महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भूमिका निभा सकता है । प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएमएसएमए) के तहत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय का उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और कवरेज में सुधार लाना है। इस संबंध में जागरूकता बढ़ाने के लिए समस्त संचार पैकेज के साथ पीएसएमए वेब पोर्टल और मोबाइल एप की भी शुरुआत की गई है।

गर्भवती महिलाओं के लिये बनी गर्भावस्था सहायता योजना 

गर्भवती महिलाओं के लिए कुछ नई योजनाओं की घोषणा भी की गई, जिसमे गर्भावस्था सहायता योजना भी एक है । इस योजना की घोषणा प्रसूति मृत्यु दर में कमी लाने के प्रयास के रूप में प्रधानमंत्री द्वारा की गई थी। इस योजना के तहत 6,000 रुपये की वित्तीय सहायता गर्भवती महिलाओं को अस्पताल में प्रसव के बाद महिला के बैंक खाते में प्रदान की जाती है । इसी
प्रकार सरकार ने कामकाजी महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश को बारह सप्ताह से बढ़ाकर  छब्बीस सप्ताह कर दिया है जिससे औपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली करीब अट्ठारह लाख महिलाओं को  फायदा मिलेगा।  इस संबंध में प्रधानमंत्री ने कहा, दुनिया में शायद दो या तीन ही देश हैं, जो इस मामले में हम से आगे हैं। इस महत्वपूर्ण फैसले का मूल उद्देश्य नवजात शिशु की देखभाल इसप्रकार करना है कि वो भारत का भावी नागरिक हैं । जन्म के प्रारंभिक काल में यदि उसकी सही देखभाल हो, माँ का उसको भरपूर प्यार मिले, तब ये शिशु बड़े हो करके देश की अमानत बनेंगे।इसके अलावाा भी केंद्र सरकार ने महिला और बच्चों की सुरक्षा और विकास के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैैं और कई योजनाओं की शुरुआत भी की है । बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ , सुकन्या समृद्धि योजना,दीनदयाल अंत्योदय योजना, स्वच्छ भारत योजना के जरिए भी भारत सरकार ने महिलाओं के विकास के लिए न केवल कई प्रयास किए बल्कि समाज में भी इनसे संबंधित संवदेनशील मुद्दों के प्रति लोगों में जागरुकता लाने में भी सफल रही है । इससे समाज में महिलाओं के सम्मान के साथ-साथ उनके आत्मसम्मान में भी बढ़ोत्तरी हुई। साथ ही साथ बाल विवाह के खिलाफ मुहिम और महिला जनन स्वास्थ्य व गर्भाधान को लेकर जागरुकता का भी असर दिखना शुरू हो गया है। हाल के वर्षों में देश ने अनेक सूचकांकों के बारे में महत्वपूर्ण प्रगति की है और देश में नवजात शिशु मृत्यु दर (आईएमआर), मातृ मृत्यु दर (एमएमआर), कुल प्रजनन दर (टीएफआर) जैसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकेतकों में पर्याप्त प्रगति की है और देश में पांच मृत्यु दरों के अधीन विश्व की तुलना में तेजी से गिरावट आई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत में सरकार सुरक्षित मातृत्व के प्रति कितनी सचेष्ट हैं ।

राजा दुबे 

 

Thursday, April 1, 2021

हिन्दी रंगमंच दिवस पर याद आईं बंसी कौल की जेनुइन चिंताएं



3 अप्रैल को जब  हम हिन्दी रंगमंच दिवस मनाएंगे तब हिन्दी रंगकर्म के प्रबल पक्षधर और रंग विदूषक के प्रमुख बंसी कौल की यादें ताज़ा हो रहीं हैं ।

बंसी कौल आज़ हमारे बीच नहीं हैं मगर कोरोना काल में रंगकर्म की प्रासंगिकता का पुनर्आविष्कार करने वाले बंसी कौल के बोल आज भी हमारी स्मृतियों में यथावत हैं । 

बंसी कौल नेे कोरोना काल में लगातार युवा रंगकर्मियों से, देश के बुद्धिजीवियों से और सरकार से भी बड़े तल्ख अंदाज़ में तीखे सवाल किये थे । सवाल थे उन लाखों लाचार मजदूरों की पीड़ा के जो सिर पर गठरी और बगल में दुधमुंही संतानों को दबाए पैदल ही दूर घरों की ओर निकल आते थे । दूर भी इतना की हजार डेढ़ हजार और दो हजार किलोमीटर दूर । कोई हादसे में मारा जा रहा है, कोई थककर दम तोड़ रहा है । 

कोरोना काल में ऑडिटोरियम के उपयोग की अनुमति न मिलने के सवाल पर भी बंसी कौल ने एक राह सुझाई । उन्होंनेे कहा कि मुमकिन है कि मैं सड़कों पर मेकैनिकल प्रॉप्स ( रंगकर्म के कुछ जरुरी यांत्रिक संसाधन) के साथ एक यात्रा निकालूँ, जिसे मैं प्रोसेशनल थिएटर यानी नुक्कड़ नाटक कहूँ । जिसे लोग खिड़कियों से देखें । किसी कॉलोनी या सोसाइटी में ऐसा नाटक करूं जिसे लोग बालकनी से देखे और अब समय आ गया है कि स्मारकों में और बिल्डिंग की छतों पर भी फिर से नाटक के बारे में सोचा जाए ।

देश के शीर्ष, चिंतनशील रंगकर्मियों में शामिल स्वर्गीय बंसी कौल ने कोरोना काल में हिन्दी रंगमंच से जुडा एक बुनियादी सवाल भी उठाया था कि थिएटर का क्या होगा ? आज़ सवाल यह नहीं है  अपितु सवाल यह होना चाहिए कि थिएटर या कलाएँ समाज के लिए जो कुछ कर रही थीं, उसका क्या होगा? 

बंसी कौल दिल्ली के द्वारका स्थित अपने फ्लैट से ही गंभीर रुप से बीमार होने के बावजूद फेसबुक लाइव के अलग-अलग प्लेटफॉर्मों पर रंगकर्मियों खासकर युवाओं से सीधा संवाद कर रहे थे और इस प्रकार उन्होंने कोरोना काल में हिन्दी रंगमंच के दायित्व को एक दिशा दी ।

उन्होंने भोपाल की अपनी नाट्य संस्था रंग विदूषक के नए-पुराने रंगकर्मियों से प्रवासी मजदूरों की बेहाली पर कविताएं लिखवाईं जिसकी एक रचना बनाकर संगीतबद्ध किया जाएगा । उन्हें पता है कि ये कोई महान रचनाएं नहीं हैं लेकिन एक संवेदनशील कलाकार के नाते आपको अपने आसपास की ऐसी त्रासदियों के बारे सोचना पड़ेगा, दिमाग पर जोर डालना पड़ेगा. नहीं तो आप काहे के कलाकार ?

सच तो यह है कि कुछ बिरले ही रंगकर्मी इस देश में हुए हैं अथवा हैं जो रंगकर्म को एक सामाजिक दायित्व ,एक जीवन शैली और एक नैतिक अनुष्ठान मानते हैं और स्वर्गीय बंसी कौल भी उन्हीं में से एक थे । आज़ जबकि कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर से देश फिर उन्हीं विषम स्थितियों के  कगार पर है आप बहुत याद आ रहें हैं बंसी कौलजी ।


राजा दुबे

Saturday, February 27, 2021

नर्मदा के किनारे भी है एक "राजघाट" जहाँ बारह फरवरी को मनता है गाँधीजी का श्राद्ध




नर्मदा के किनारे भी है एक "राजघाट" जहाँ बारह फरवरी को मनता है गाँधीजी का श्राद्ध

ऱाजघाट - देश की राजधानी दिल्ली में बना एक समाधि स्थल है जहाँ महानिर्वाण के पश्चात राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के देहाँश भस्म के रुप में संचित हैं। शान्ति की तलाश में विश्ववन्द्य बापू की पारलौकिक उपस्थिति की अनुभूति कराती यह समाधि करोड़ों देशवासियों के लिये एक तीर्थस्थल के सदृष्य है। मगर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की एक समाधि बड़वानी के किनारे नर्मदा नदी के किनारे राजघाट में  भी है। यह अनायास नहीं श्रद्धा की सायास परणिति थी कि नर्मदा नदी के तट पर जहाँ यह समाधि बनाई गई उसे भी "राजघाट" के नाम से जाना जाता है। इस समाधि के निर्माण का श्रेय पश्चिम निमाड़ (खरगोन) जिले के कस्बे बड़वानी में सक्रिय सर्वोदयी नेताओं की पहल को दिया जाता है ,सर्वोदयी नेता काशीनाथ त्रिवेदी इस समाधि के निर्माण के संयोजक ही नहीं प्रेरक भी थे। इस समाधि के निर्माण का संकल्प ईस्वी सन् उन्नीस सौ चौंसठ की बारह फरवरी को लिया गया था। समाधि स्थल के निर्माण का शुभारम्भ ईस्वी सन् उन्नीस सौ पैंसठ की चौदह जनवरी, मकर सँक्रान्ति के पर्व से हुआ था। जैसा कि सुविचारित था इसी वर्ष महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर तीस जनवरी को यहाँ भस्म कलश की स्थापना की गई और बारह फरवरी उन्नीस सौ पैंसठ को इस समाधि स्थल को लोकार्पित किया गया।

बा-बापू और महादेव भाई देसाई की भस्मियाँ  संचित हैं यहाँ

राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी, उनकी जीवनसंगिनी कस्तूरबा गाँधी और महात्मा गाँधी के सचिव रहे महादेव भाई देसाई के देहाँश के ऱुप में तीनों महमना के भस्मावशेष इस समाधि स्थल में संचित हैं। बा और बापू की भस्मियाँ तो देश में एकाधिक स्थान पर संचित हैं और कस्तूरबा गाँधी और महादेव भाई देसाई की भस्मियाँ भी पुणे के आगा खाँ महल में दो अलग-अलग समाधि के रुप में संचित हैं मगर एक साथ बा-बापू और उनके अनन्य सेवक महादेव भाई देसाई की भस्मियाँ केवल बड़वानी कस्बे के राजघाट में ही संचित हैं। सर्वोदय आन्दोलन के प्रणेता महात्मा गाँधी की इस समाधि स्थल का निर्माण महात्मा गाँधी के अवदान से नई पीढ़ी के पहचान की एक विनम्र कोशिश ही कही जायेगी।इस समाधि स्थल पर लगे शिलालेख में समाधि से जुड़े तिथिवार व्यौरे के अलावा एक सूक्ति भी लिखी है कि- "यह स्मारक हमें सत्य, प्रेम और करुणा की प्रेरणा दे"। यह सूक्ति हमें गाँधीवादी जीवन दर्शन के मूल तत्वों से साक्षात्कार तो करवाती ही है साथ ही हमें एक ऐसे जीवन -दर्शन को अपनाने की प्रेरणा देती है जो सत्य, प्रेम और करुणा से  अनुप्रेरित हो।

सेवक हो तो महादेव भाई देसाई जैसा 

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के पच्चीस साल तक सचिव रहे महादेव भाई देसाई के बारे में उस समय के सभी प्रबुद्धजन और महात्मा गाँधी के सम्पर्क में आने वाले सभी लोग एक स्वर में यही कहते थे कि- "सेवक हो तो महादेव भाई देसाई जैसा"। महादेव भाई देसाई बापू के सचिव ही नहीं उनके परिवार के एक सदस्य भी थे। गुजरात में सूरत के पास एक छोटे-से गाँव सरस में जन्मे महादेव भाई देसाई ने ईस्वी सन् उन्नीस सौ सत्रह (अब से ठीक एक सौ चार साल पहले) महात्मा गाँधी के सचिव के रुप में काम करना आरम्भ किया था और ईस्वी सन् उन्नीस सौ बयालिस में जब पुणें के आगा खाँ महल में दिल का दौरा पड़ने पर उनका निधन हुआ तब भी वे महात्मा गाँधी और कस्तूरबा गाँधी के साथ ही थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और राष्ट्रवादी लेखक महादेव भाई देसाई एक कुशल सम्पादक भी थे। उन्होंने सन् उन्नीस सौ इक्कीस में आँग्ल भाषाई अखबार "इण्डिपेन्डेन्ट" का सम्पादन आरम्भ किया। महादेव भाई ने बापू के अखबार- "हरिजन" और कुछ सालों तक "नवजीवन" का सम्पादन भी किया।

गाँधी समाधि का संरक्षण कर राज्य सरकार ने अपना वादा निभाया

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने "नमामि देवी नर्मदे" 
नर्मदा  सेवा यात्रा के दौरान और बड़वानी के प्रवास में  मीडिया को आश्वस्त किया था कि सिंगाजी महाराज और बाजीराव पेशवा  की समाधि के समान ही राजघाट स्थित गाँधीजी की समाधि को भी संरक्षित किया जायेगा। यह तीनों समाधि स्थल नर्मदा नदी पर बने बाँधों से डूब में आ  रहे थे। राजघाट स्थित गाँधीजी की समाधि के संरक्षण का वादा राज्य सरकार ने निभाया और समाधि जब सरदार सरोवर का जलस्तर बढ़ने पर डूब में आई तो सरकार ने संरक्षित देहाँश को नई समाधि बनाकर वहाँ प्रतिष्ठापित किया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तो जब भी बड़वानी जाते हैं इस समाधि पर अंकित यंग इंडिया अखबार के छ: अक्टूबर उन्नीस सौ इक्कीस के गाँधीजी के उस सम्बोधन को जिसमें  जरुरतों को नियंत्रित करने की बात कही थी उसे जरुर पढ़ते हैं। वे कहते हैं आज सौ साल बाद भी यह बात उतनी ही प्रासंगिक है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस समाधि स्थल को श्रद्धा और आस्था का केन्द्र मानते हैं।

हर साल समाधि स्थल पर लगता है बारह फरवरी को सर्वोदयी मेला 

राजघाट पर बनी इस समाधि के निर्माण के पीछे सुप्रसिद्ध गाँघीवादी एवम् सर्वोदयी विचारक एवम् मध्यभारत सरकार मेें शिक्षा मंंत्री रह चुके काशीनाथ त्रिवेदी की भूमिका सबसे प्रमुख रही है। श्री त्रिवेदी जब तक जीवित रहे ए हर वर्ष महात्मा गाँधी की पुण्यतिथि पर पदयात्रा का आयोजन करते थे। यह  पदयात्रा ग्यारह फरवरी को समाधि स्थल पर पँहुचती थी। बारह फरवरी को गाँधीजी का श्राद्ध होता है । सभी पदयात्री उपवास रखते हैं और सर्वोदय मेले का आयोजन किया जाता है। पहले पदयात्रा समाधि स्थल से समाधि स्थल तक होती थी। इन दिनों यह पदयात्रा धार जिले के ग्राम टवलाई स्थित सर्वोदय ग्राम भारती केन्द्र से आरम्भ होती है। राजघाट में पहले बनी समाधि के डूब क्षेत्र में आने से नये स्थान पर बनी समाधि पर अब भी 12 फरवरी को महात्मा गाँधीजी के श्राद्ध पर लगने वाले मेले में हज़ारों श्रद्धालु भाग लेते हैं और अब निवाली स्थित कस्तूरबा गाँघी बालिका विद्यालय की बालिकाएं भी यहाँ आतीं हैं। इस दिन बड़वानी जिले में स्थानीय अवकाश रहता है।
 
राजा दुबे

Saturday, February 13, 2021

रेडियो की महती भूमिका को रेखांकित करता है - विश्व रेडियो दिवस



13 फरवरी को प्रतिवर्ष पूरी दुनिया में विश्व रेडियो दिवस मनाया जाता है। विश्व रेडियो दिवस पहली बार वर्ष  2012 में मनाया गया था। एक सामुदायिक श्रव्य माध्यम के रुप में रेडियो की निर्विवाद रुप में एक महत्वपूर्ण भूमिका हमेशा से रही है। शिक्षा के प्रसार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक बहस में रेडियो की भूमिका को रेखांकित करने के लिए ही- "यूनेस्को" (संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) द्वारा पहली बार वर्ष 2012 में 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाया गया था। फरवरी की 13 तारीख को ही विश्व रेडियो दिवस के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि 13 फरवरी सन् 1946 को ही रेडियो संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अपने रेडियो प्रसारण की शुरुआत की गई थी। अगर रेडियो की पहुंच की बात की जाए तो ये पूरी दुनिया की 95 प्रतिशत जनसंख्या तक इसकी पहुंच है।  रेडियो की पहुंच दूर-दराज के समुदायों और छोटे-छोटे समूहों तक कम लागत पर पहुंचाने वाला संचार का सबसे सस्ता और सुगम साधन है। आरम्भ में बड़़े आकार के लकड़ी के कैबिनेट में संयोजित होने से रेडियो की संवहन क्षमता कम थी मगर सतत अनुसंधान के बाद जब रेडियो का अवतरण -"ट्रांजिस्टर" के स्वरुप में हुआ तो प्लास्टिक के आसानी से लाने ले जाने वाले स्वरुप के कारण रेडियो की पँहुच और भी व्यापक हुईऔर रेडियो की घर-घर पहुंच, विस्तारित होकर हाथ- हाथ तक पहुंच गई है जो एक बड़ी सार्वकालिक प्रोद्यौगिकी उपलब्धि मानी जाती है ।

भारत में रेडियो का हमेशा से गौरवशाली इतिहास रहा है 

वर्ष 1936 में भारत में सरकारी ‘इम्पीरियल रेडियो ऑफ इंडिया’ की शुरुआत हुई थी। देश के आजाद होने के बाद यह प्रसारण -"ऑल इंडिया रेडियो" के नाम से जाना गया  जिसे- "आकाशवाणी" भी कहते हैं। देश में वर्ष 1947 में आज़ादी के बाद आकाशवाणी के पास छह रेडियो स्टेशन थे और उसकी पहुंच ग्यारह प्रतिशत आबादी तक ही थी। वर्तमान समय में इसी आकाशवाणी के पास 223 रेडियो स्टेशन हैं और उसकी पहुंच लगभग 99.1 फीसदी भारतीयों तक है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने वर्ष 2002 में शिक्षण संस्थाओं को कैंपस रेडियो स्टेशन खोलने की अनुमति दी थी और 16 नवम्बर 2006 को  स्वयंसेवी संस्थाओं को रेडियो स्टेशन खोलने की इजाजत संयुक्त प्रजातांत्रिक गठबंधन सरकार द्वारा दे दी गई थी। जैसा कि देशवासी जानते हैं देश को वर्ष 1947 में जब 15 अगस्त को आजादी मिली तो उस ऐतिहासिक खबर को भी लोगोंं ने रेडियो पर ही सुनी थी। एक सशक्त श्रव्य माध्यम के रुप में रेडियो का महत्व टेलीविजन के प्रसार के बावजूद यथावत है। सूचना और मनोरंजन के साथ ही शिक्षा के प्रसार का भी यह एक सशक्त माध्यम है और रेडियो केन्द्र का दस्तावेजीकरण का प्रभाग इतना प्रभावी और सम्पूर्ण
है कि देश का सामाजिक,  सांस्कृतिक और राजनैतिक
इतिहास आजतक रेडियो केंन्द्र के "आर्काइव" में संरक्षित है। देश की विरासत को लेखबद्ध और स्वरबद्ध करने में रेडियो की अहम् भूूमिका रही है ।

यूनेस्को को श्रेय प्राप्त है इस एक उपयोगी और प्रेरक आयोजन का 

यूनेस्को यानी  संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक और संगठन को विश्व रेडियो दिवस के आयोजन का श्रेय प्राप्त है क्योंकि यूनेस्को ही प्रतिवर्ष  विभिन्न ब्रॉडकास्टर्स, संस्थाओं एवं समुदायों के साथ मिलकर विश्व भर में इसका आयोजन करता है। इस दिवस को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किया जाता है जिसमे रेडियो को सूचना और संचार के माध्यम के अतिरिक्त इसका दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा के प्रसार मे भी इसके महत्व को  बताया जाता है। यूनेस्को ने 3 नवम्बर 2011 को यूनेस्को के 36 वर्ष पूरे होने पर 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाये जाने की घोषणा की थी। पहला विश्व रेडियो दिवस वर्ष 2012 में 13 फरवरी को मनाया गया था।इसका आयोजन संयुक्त राज्य अमेरिका में वर्ष 1946 में पहले ब्रॉडकास्ट को भी याद करते हुए किया जाता है। विश्व में रेडियो प्रसारण के विस्तार को संयुक्त राष्ट्र संघ अभिवयक्ति के सशक्त माध्यम के रुप में भी देखता है और इस माध्यम  से हम विश्वशांति के संदेश को भी सहजता से विश्व के इस कोने से उस कोने तक पलक झपकते पँहुचा सकते हैं । सूचनाओं के संवहन में भी रेडियो की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और सूचनाओं की विश्वसनीयता पर यदि प्रधिकृत सरकारें निगरानी रखें तो समूचे विश्व को सूचना क्रांति से लाभान्वित किया जा सकता है। यूनेस्को ने इस दिशा में कई राष्ट्रों को खासकर तीसरी दुनिया के देशों को अपने में प्रसारण की अधोसंरचना के विकास सम्बन्धी सहायता भी प्रदान की  है।


कोरोना काल में बंद  "रंगोली" को मिली विविध भारती से सहायता

"रंगोली" भारतीय फिल्मी गीतों की एक लोकप्रिय टेलीविजन श्रृंखला है जो प्रति रविवार सुबह दूरदर्शन की
राष्ट्रीय प्रसारण सेवा पर प्रसारित होती है। विज्ञापनों के
समय को शामिल कर साठ मिनट के इस कार्यक्रम का
प्रसारण पहली बार वर्ष 1988 में हुआ था और वर्ष 1990 के दशक से इसे व्यापक रूप से देखा गया। यह भारत के बाहर भी लोकप्रिय है, विशेष रूप से मध्य पूर्व या संयुक्त राज्य अमेरिका जैसी जगहों पर, जिनमें बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग रहते हैं। इस कार्यक्रम को सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्रियों हेमामालिनी, शर्मिला टैगोर, सारा खान और टीवी आर्टिस्ट श्वेता तिवारी व स्वरा भास्कर ने प्रस्तुत किया। वर्ष 2020 में कोरोना संक्रमण के कारण इस कार्यक्रम का प्रसारण भी बाधित हुआ जबकि दर्शकों द्वारा इसके पुनर्प्रसारण की माँग बढ़ी। ऐसे समय जब एंकर के साथ कार्यक्रम के निजी निर्माताओं ने श्रृँखला को जारी रखने में असमर्थता जताई तब इस लोकप्रिय श्रृँखला को जारी रखने के लिये विविध भारती का सहयोग काम आया और विविध भारती के मुम्बई केन्द्र से इसका प्रसारण आरम्भ हुआ। विविध भारती के जाने माने उद्घोषकों की जोड़ी रेणु चतुर्वेदी और रमाकांत ने इस श्रृँखला की एंकरिंग की। इन दिनों रेणु चतुर्वेदी के साथ हीरामन ठाकुर एँकरिंग कर रहें और टीवी की इस लोकप्रिय श्रृँखला को रेडियो का सहारा काम आ रहा है और विविध भारती के सहयोग से इस श्रृँखला की लोकप्रियता परवान चढ़ रही हैं ।

यूनेस्को से आरम्भ की है "रेडियो उत्सव" की परम्परा 

विश्व रेडियो दिवस को विशिष्ट आयोजन बनाने के लिए यूनेस्को ने एक और अभिनव प्रयास -"रेडियो उत्सव" मनाने के रुप में आरम्भ किया। नई दिल्ली में यूनेस्को हाउस में भारत का पहला रेडियो उत्सव गत 13 फरवरी 2018 को आयोजित किया गया था। यह संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के साथ साझेदारी में रेडियो और टेलीविज़न में महिलाओं के अंतर्राष्ट्रीय संघ (आई.ए.डब्ल्यू.आर.टी.) द्वारा आयोजित किया गया था। रेडियो उत्सव के आयोजन का उद्देश्य रेडियो प्रसारण से जुड़े पेशेवरों,  कार्यक्रम प्रसारणकर्ताओं (ब्रॉडकास्टर्स) और अन्य  डिजिटल ऑडियो प्रोग्रामर को एक साथ एक मंच पर लाने का है। इसमें विशेषज्ञों की पैनल चर्चा, प्रदर्शनी का आयोजन और लाइव प्रदर्शनों की चर्चा शामिल की जाती है। विश्व रेडियो दिवस 2018 का विषय था -"रेडियो और खेल प्रसारण " पहले रेडियो उत्सव में सामाजिक परिवर्तन के लिए एक मंच के रूप में खेल की क्षमता की जांच और खेल प्रसारण को और भी रोचक और प्रतिस्पर्धी बनाने पर व्यापक चर्चा की गई थी। इस रेडियो उत्सव में प्रसारण के दोनों स्वरुप टेलीकॉस्टिंग और ब्रॉडकास्टिंग में अपनाई जा रही नई प्रोद्यौगीकियों पर विमर्श किया गया। रेडियो उत्सव में प्रसारण की तकनीक ही नहीं प्रसारण की जा रही सामग्री पर भी गंभीर विमर्श किया जाता है। पहले रेडियो उत्सव की इस सफलता से उत्साहित यूनेस्को ने इस श्रृँखला को आगे भी जारी रखने का निश्चय किया।

विश्व रेडियो दिवस पर होता है प्रसारण में महिलाओं की स्थिति पर विमर्श 

बदलते वक्त के साथ प्रसारण जगत में महिला पेशेवरों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है और अध्ययन
बताते हैं कि महिलाएं इस क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। प्रसारण के प्रतिष्ठापूर्ण पेशे से जुड़ीं इन पेशेवर महिलाओं ने वर्ष 1949 में रेडियो और टेलीविजन पर प्रसारण से जुड़ी महिलाओं का एक संगठन  आई.ए.डब्ल्यू. आर.टी.( इण्टरनेशनल एसोसिएशन ऑफ वूमेन इन रेडियो एण्ड टेलीविजन) बनाया।
इस एक वैश्विक संगठन के सहयोग से अब प्रतिवर्ष विश्व रेडियो दिवस पर प्रसारण में महिलाओं की स्थिति पर भी व्यापक विमर्श होता है। आई.ए.डब्ल्यू. आर.टी . का मिशन महिलाओं के विचारों और मूल्यों को सुनिश्चित करने की पहल को मजबूत करना और मीडिया में प्रोग्रामिंग में महिलाओं की भूमिका को सुनिश्चित करना है। यह संगठन संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक और सामाजिक परिषद (ईसीओएसओसी) के साथ परामर्श की भूमिका का निर्वाह करता है। यह संगठन विश्व रेडियो दिवस पर  सम्मेलनों  और कार्यान्वयन परियोजनाओं का आयोजन करता है और प्रसारण से जुड़ी विभिन्न  गतिविधियों को चलाता है, और मीडिया संगठनों के साथ सहयोग करता है। यह अंतरराष्ट्रीय बोर्ड द्वारा प्रबंधित है, जो कई स्थानीय आयोजन और सहायक गतिविधियों के लिए धन की पहल की देखरेख भी करता है।यह संगठन विश्व रेडियो दिवस पर महिला पेशेवरों की स्थिति की समीक्षा भी करता है ।

सोश्यल मीडिया के मंच पर भी हुआ समाचार सुनने का मुकम्मल इंतज़ाम 

आज जबकि रेडियो और दूरदर्शन के प्रसारण को जनसाधारण भी अपने एण्ड्रॉयड मोबाइल पर आसानी से देख सुन सकते हैं ऐसे में सोश्यल मीडिया के मंच पर समाचार भी प्रस्तुत करने का पहला और अभिनव 
प्रयास आकाशवाणी के भोपाल केन्द्र ने किया। वर्ष
2018 में विश्व रेडियो दिवस के मौके पर 13 फरवरी 2018 को आकाशवाणी भोपाल के समाचार प्रभाग ने अपने रीजनल बुलेटिन को सोश्यल मीडिया के मंच पर प्रस्तुत करना शुरू किया। अब श्रोता भोपाल से प्रसारित होने वाले क्षेत्रीय समाचार बुलेटिन फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप और यू-ट्यूब पर भी सुन सकते हैं। देश में ऐसा पहली बार हुआ है, जब आकाशवाणी के बुलेटिन नियमित सोशल मीडिया पर सुने जा सकते हैं। इसके अलावा दिल्ली से प्रसारित होने वाले राष्ट्रीय समाचार के लिए विशेष मोबाइल ऐप - "न्यूज ऑन एयर" भी गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध है। भोपाल से प्रसारित होने वाले प्रादेशिक समाचार फेसबुक, ट्विटर और यू-ट्यूब पर - आर एन यू भोपाल ( rnubhopal ) सर्च करके सुने जा सकते है  और  www.airbhopalnews.blogspot पर भी न्यूज़ स्क्रिप्ट पढ़ी जा सकती है। सोशल मीडिया पर बुलेटिन को लॉन्च करने में अहम रोल निभाने वाले आकाशवाणी के संपादक समीर वर्मा का कहना है कि वक्त के साथ बदलाव जरूरी है, इस दौर में जब युवा पीढ़ी सोशल मीडिया पर ज्यादा वक्त बिताती है ऐसे में उन तक आकाशवाणी की सच्ची और सटीक खबरें पहुंचाने के लिए यह पहल जरूरी थी। 
 
 राजा दुबे