Saturday, February 27, 2021

नर्मदा के किनारे भी है एक "राजघाट" जहाँ बारह फरवरी को मनता है गाँधीजी का श्राद्ध




नर्मदा के किनारे भी है एक "राजघाट" जहाँ बारह फरवरी को मनता है गाँधीजी का श्राद्ध

ऱाजघाट - देश की राजधानी दिल्ली में बना एक समाधि स्थल है जहाँ महानिर्वाण के पश्चात राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के देहाँश भस्म के रुप में संचित हैं। शान्ति की तलाश में विश्ववन्द्य बापू की पारलौकिक उपस्थिति की अनुभूति कराती यह समाधि करोड़ों देशवासियों के लिये एक तीर्थस्थल के सदृष्य है। मगर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की एक समाधि बड़वानी के किनारे नर्मदा नदी के किनारे राजघाट में  भी है। यह अनायास नहीं श्रद्धा की सायास परणिति थी कि नर्मदा नदी के तट पर जहाँ यह समाधि बनाई गई उसे भी "राजघाट" के नाम से जाना जाता है। इस समाधि के निर्माण का श्रेय पश्चिम निमाड़ (खरगोन) जिले के कस्बे बड़वानी में सक्रिय सर्वोदयी नेताओं की पहल को दिया जाता है ,सर्वोदयी नेता काशीनाथ त्रिवेदी इस समाधि के निर्माण के संयोजक ही नहीं प्रेरक भी थे। इस समाधि के निर्माण का संकल्प ईस्वी सन् उन्नीस सौ चौंसठ की बारह फरवरी को लिया गया था। समाधि स्थल के निर्माण का शुभारम्भ ईस्वी सन् उन्नीस सौ पैंसठ की चौदह जनवरी, मकर सँक्रान्ति के पर्व से हुआ था। जैसा कि सुविचारित था इसी वर्ष महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर तीस जनवरी को यहाँ भस्म कलश की स्थापना की गई और बारह फरवरी उन्नीस सौ पैंसठ को इस समाधि स्थल को लोकार्पित किया गया।

बा-बापू और महादेव भाई देसाई की भस्मियाँ  संचित हैं यहाँ

राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी, उनकी जीवनसंगिनी कस्तूरबा गाँधी और महात्मा गाँधी के सचिव रहे महादेव भाई देसाई के देहाँश के ऱुप में तीनों महमना के भस्मावशेष इस समाधि स्थल में संचित हैं। बा और बापू की भस्मियाँ तो देश में एकाधिक स्थान पर संचित हैं और कस्तूरबा गाँधी और महादेव भाई देसाई की भस्मियाँ भी पुणे के आगा खाँ महल में दो अलग-अलग समाधि के रुप में संचित हैं मगर एक साथ बा-बापू और उनके अनन्य सेवक महादेव भाई देसाई की भस्मियाँ केवल बड़वानी कस्बे के राजघाट में ही संचित हैं। सर्वोदय आन्दोलन के प्रणेता महात्मा गाँधी की इस समाधि स्थल का निर्माण महात्मा गाँधी के अवदान से नई पीढ़ी के पहचान की एक विनम्र कोशिश ही कही जायेगी।इस समाधि स्थल पर लगे शिलालेख में समाधि से जुड़े तिथिवार व्यौरे के अलावा एक सूक्ति भी लिखी है कि- "यह स्मारक हमें सत्य, प्रेम और करुणा की प्रेरणा दे"। यह सूक्ति हमें गाँधीवादी जीवन दर्शन के मूल तत्वों से साक्षात्कार तो करवाती ही है साथ ही हमें एक ऐसे जीवन -दर्शन को अपनाने की प्रेरणा देती है जो सत्य, प्रेम और करुणा से  अनुप्रेरित हो।

सेवक हो तो महादेव भाई देसाई जैसा 

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के पच्चीस साल तक सचिव रहे महादेव भाई देसाई के बारे में उस समय के सभी प्रबुद्धजन और महात्मा गाँधी के सम्पर्क में आने वाले सभी लोग एक स्वर में यही कहते थे कि- "सेवक हो तो महादेव भाई देसाई जैसा"। महादेव भाई देसाई बापू के सचिव ही नहीं उनके परिवार के एक सदस्य भी थे। गुजरात में सूरत के पास एक छोटे-से गाँव सरस में जन्मे महादेव भाई देसाई ने ईस्वी सन् उन्नीस सौ सत्रह (अब से ठीक एक सौ चार साल पहले) महात्मा गाँधी के सचिव के रुप में काम करना आरम्भ किया था और ईस्वी सन् उन्नीस सौ बयालिस में जब पुणें के आगा खाँ महल में दिल का दौरा पड़ने पर उनका निधन हुआ तब भी वे महात्मा गाँधी और कस्तूरबा गाँधी के साथ ही थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और राष्ट्रवादी लेखक महादेव भाई देसाई एक कुशल सम्पादक भी थे। उन्होंने सन् उन्नीस सौ इक्कीस में आँग्ल भाषाई अखबार "इण्डिपेन्डेन्ट" का सम्पादन आरम्भ किया। महादेव भाई ने बापू के अखबार- "हरिजन" और कुछ सालों तक "नवजीवन" का सम्पादन भी किया।

गाँधी समाधि का संरक्षण कर राज्य सरकार ने अपना वादा निभाया

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने "नमामि देवी नर्मदे" 
नर्मदा  सेवा यात्रा के दौरान और बड़वानी के प्रवास में  मीडिया को आश्वस्त किया था कि सिंगाजी महाराज और बाजीराव पेशवा  की समाधि के समान ही राजघाट स्थित गाँधीजी की समाधि को भी संरक्षित किया जायेगा। यह तीनों समाधि स्थल नर्मदा नदी पर बने बाँधों से डूब में आ  रहे थे। राजघाट स्थित गाँधीजी की समाधि के संरक्षण का वादा राज्य सरकार ने निभाया और समाधि जब सरदार सरोवर का जलस्तर बढ़ने पर डूब में आई तो सरकार ने संरक्षित देहाँश को नई समाधि बनाकर वहाँ प्रतिष्ठापित किया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तो जब भी बड़वानी जाते हैं इस समाधि पर अंकित यंग इंडिया अखबार के छ: अक्टूबर उन्नीस सौ इक्कीस के गाँधीजी के उस सम्बोधन को जिसमें  जरुरतों को नियंत्रित करने की बात कही थी उसे जरुर पढ़ते हैं। वे कहते हैं आज सौ साल बाद भी यह बात उतनी ही प्रासंगिक है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस समाधि स्थल को श्रद्धा और आस्था का केन्द्र मानते हैं।

हर साल समाधि स्थल पर लगता है बारह फरवरी को सर्वोदयी मेला 

राजघाट पर बनी इस समाधि के निर्माण के पीछे सुप्रसिद्ध गाँघीवादी एवम् सर्वोदयी विचारक एवम् मध्यभारत सरकार मेें शिक्षा मंंत्री रह चुके काशीनाथ त्रिवेदी की भूमिका सबसे प्रमुख रही है। श्री त्रिवेदी जब तक जीवित रहे ए हर वर्ष महात्मा गाँधी की पुण्यतिथि पर पदयात्रा का आयोजन करते थे। यह  पदयात्रा ग्यारह फरवरी को समाधि स्थल पर पँहुचती थी। बारह फरवरी को गाँधीजी का श्राद्ध होता है । सभी पदयात्री उपवास रखते हैं और सर्वोदय मेले का आयोजन किया जाता है। पहले पदयात्रा समाधि स्थल से समाधि स्थल तक होती थी। इन दिनों यह पदयात्रा धार जिले के ग्राम टवलाई स्थित सर्वोदय ग्राम भारती केन्द्र से आरम्भ होती है। राजघाट में पहले बनी समाधि के डूब क्षेत्र में आने से नये स्थान पर बनी समाधि पर अब भी 12 फरवरी को महात्मा गाँधीजी के श्राद्ध पर लगने वाले मेले में हज़ारों श्रद्धालु भाग लेते हैं और अब निवाली स्थित कस्तूरबा गाँघी बालिका विद्यालय की बालिकाएं भी यहाँ आतीं हैं। इस दिन बड़वानी जिले में स्थानीय अवकाश रहता है।
 
राजा दुबे

Saturday, February 13, 2021

रेडियो की महती भूमिका को रेखांकित करता है - विश्व रेडियो दिवस



13 फरवरी को प्रतिवर्ष पूरी दुनिया में विश्व रेडियो दिवस मनाया जाता है। विश्व रेडियो दिवस पहली बार वर्ष  2012 में मनाया गया था। एक सामुदायिक श्रव्य माध्यम के रुप में रेडियो की निर्विवाद रुप में एक महत्वपूर्ण भूमिका हमेशा से रही है। शिक्षा के प्रसार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक बहस में रेडियो की भूमिका को रेखांकित करने के लिए ही- "यूनेस्को" (संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) द्वारा पहली बार वर्ष 2012 में 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाया गया था। फरवरी की 13 तारीख को ही विश्व रेडियो दिवस के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि 13 फरवरी सन् 1946 को ही रेडियो संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अपने रेडियो प्रसारण की शुरुआत की गई थी। अगर रेडियो की पहुंच की बात की जाए तो ये पूरी दुनिया की 95 प्रतिशत जनसंख्या तक इसकी पहुंच है।  रेडियो की पहुंच दूर-दराज के समुदायों और छोटे-छोटे समूहों तक कम लागत पर पहुंचाने वाला संचार का सबसे सस्ता और सुगम साधन है। आरम्भ में बड़़े आकार के लकड़ी के कैबिनेट में संयोजित होने से रेडियो की संवहन क्षमता कम थी मगर सतत अनुसंधान के बाद जब रेडियो का अवतरण -"ट्रांजिस्टर" के स्वरुप में हुआ तो प्लास्टिक के आसानी से लाने ले जाने वाले स्वरुप के कारण रेडियो की पँहुच और भी व्यापक हुईऔर रेडियो की घर-घर पहुंच, विस्तारित होकर हाथ- हाथ तक पहुंच गई है जो एक बड़ी सार्वकालिक प्रोद्यौगिकी उपलब्धि मानी जाती है ।

भारत में रेडियो का हमेशा से गौरवशाली इतिहास रहा है 

वर्ष 1936 में भारत में सरकारी ‘इम्पीरियल रेडियो ऑफ इंडिया’ की शुरुआत हुई थी। देश के आजाद होने के बाद यह प्रसारण -"ऑल इंडिया रेडियो" के नाम से जाना गया  जिसे- "आकाशवाणी" भी कहते हैं। देश में वर्ष 1947 में आज़ादी के बाद आकाशवाणी के पास छह रेडियो स्टेशन थे और उसकी पहुंच ग्यारह प्रतिशत आबादी तक ही थी। वर्तमान समय में इसी आकाशवाणी के पास 223 रेडियो स्टेशन हैं और उसकी पहुंच लगभग 99.1 फीसदी भारतीयों तक है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने वर्ष 2002 में शिक्षण संस्थाओं को कैंपस रेडियो स्टेशन खोलने की अनुमति दी थी और 16 नवम्बर 2006 को  स्वयंसेवी संस्थाओं को रेडियो स्टेशन खोलने की इजाजत संयुक्त प्रजातांत्रिक गठबंधन सरकार द्वारा दे दी गई थी। जैसा कि देशवासी जानते हैं देश को वर्ष 1947 में जब 15 अगस्त को आजादी मिली तो उस ऐतिहासिक खबर को भी लोगोंं ने रेडियो पर ही सुनी थी। एक सशक्त श्रव्य माध्यम के रुप में रेडियो का महत्व टेलीविजन के प्रसार के बावजूद यथावत है। सूचना और मनोरंजन के साथ ही शिक्षा के प्रसार का भी यह एक सशक्त माध्यम है और रेडियो केन्द्र का दस्तावेजीकरण का प्रभाग इतना प्रभावी और सम्पूर्ण
है कि देश का सामाजिक,  सांस्कृतिक और राजनैतिक
इतिहास आजतक रेडियो केंन्द्र के "आर्काइव" में संरक्षित है। देश की विरासत को लेखबद्ध और स्वरबद्ध करने में रेडियो की अहम् भूूमिका रही है ।

यूनेस्को को श्रेय प्राप्त है इस एक उपयोगी और प्रेरक आयोजन का 

यूनेस्को यानी  संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक और संगठन को विश्व रेडियो दिवस के आयोजन का श्रेय प्राप्त है क्योंकि यूनेस्को ही प्रतिवर्ष  विभिन्न ब्रॉडकास्टर्स, संस्थाओं एवं समुदायों के साथ मिलकर विश्व भर में इसका आयोजन करता है। इस दिवस को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किया जाता है जिसमे रेडियो को सूचना और संचार के माध्यम के अतिरिक्त इसका दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा के प्रसार मे भी इसके महत्व को  बताया जाता है। यूनेस्को ने 3 नवम्बर 2011 को यूनेस्को के 36 वर्ष पूरे होने पर 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाये जाने की घोषणा की थी। पहला विश्व रेडियो दिवस वर्ष 2012 में 13 फरवरी को मनाया गया था।इसका आयोजन संयुक्त राज्य अमेरिका में वर्ष 1946 में पहले ब्रॉडकास्ट को भी याद करते हुए किया जाता है। विश्व में रेडियो प्रसारण के विस्तार को संयुक्त राष्ट्र संघ अभिवयक्ति के सशक्त माध्यम के रुप में भी देखता है और इस माध्यम  से हम विश्वशांति के संदेश को भी सहजता से विश्व के इस कोने से उस कोने तक पलक झपकते पँहुचा सकते हैं । सूचनाओं के संवहन में भी रेडियो की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और सूचनाओं की विश्वसनीयता पर यदि प्रधिकृत सरकारें निगरानी रखें तो समूचे विश्व को सूचना क्रांति से लाभान्वित किया जा सकता है। यूनेस्को ने इस दिशा में कई राष्ट्रों को खासकर तीसरी दुनिया के देशों को अपने में प्रसारण की अधोसंरचना के विकास सम्बन्धी सहायता भी प्रदान की  है।


कोरोना काल में बंद  "रंगोली" को मिली विविध भारती से सहायता

"रंगोली" भारतीय फिल्मी गीतों की एक लोकप्रिय टेलीविजन श्रृंखला है जो प्रति रविवार सुबह दूरदर्शन की
राष्ट्रीय प्रसारण सेवा पर प्रसारित होती है। विज्ञापनों के
समय को शामिल कर साठ मिनट के इस कार्यक्रम का
प्रसारण पहली बार वर्ष 1988 में हुआ था और वर्ष 1990 के दशक से इसे व्यापक रूप से देखा गया। यह भारत के बाहर भी लोकप्रिय है, विशेष रूप से मध्य पूर्व या संयुक्त राज्य अमेरिका जैसी जगहों पर, जिनमें बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग रहते हैं। इस कार्यक्रम को सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्रियों हेमामालिनी, शर्मिला टैगोर, सारा खान और टीवी आर्टिस्ट श्वेता तिवारी व स्वरा भास्कर ने प्रस्तुत किया। वर्ष 2020 में कोरोना संक्रमण के कारण इस कार्यक्रम का प्रसारण भी बाधित हुआ जबकि दर्शकों द्वारा इसके पुनर्प्रसारण की माँग बढ़ी। ऐसे समय जब एंकर के साथ कार्यक्रम के निजी निर्माताओं ने श्रृँखला को जारी रखने में असमर्थता जताई तब इस लोकप्रिय श्रृँखला को जारी रखने के लिये विविध भारती का सहयोग काम आया और विविध भारती के मुम्बई केन्द्र से इसका प्रसारण आरम्भ हुआ। विविध भारती के जाने माने उद्घोषकों की जोड़ी रेणु चतुर्वेदी और रमाकांत ने इस श्रृँखला की एंकरिंग की। इन दिनों रेणु चतुर्वेदी के साथ हीरामन ठाकुर एँकरिंग कर रहें और टीवी की इस लोकप्रिय श्रृँखला को रेडियो का सहारा काम आ रहा है और विविध भारती के सहयोग से इस श्रृँखला की लोकप्रियता परवान चढ़ रही हैं ।

यूनेस्को से आरम्भ की है "रेडियो उत्सव" की परम्परा 

विश्व रेडियो दिवस को विशिष्ट आयोजन बनाने के लिए यूनेस्को ने एक और अभिनव प्रयास -"रेडियो उत्सव" मनाने के रुप में आरम्भ किया। नई दिल्ली में यूनेस्को हाउस में भारत का पहला रेडियो उत्सव गत 13 फरवरी 2018 को आयोजित किया गया था। यह संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के साथ साझेदारी में रेडियो और टेलीविज़न में महिलाओं के अंतर्राष्ट्रीय संघ (आई.ए.डब्ल्यू.आर.टी.) द्वारा आयोजित किया गया था। रेडियो उत्सव के आयोजन का उद्देश्य रेडियो प्रसारण से जुड़े पेशेवरों,  कार्यक्रम प्रसारणकर्ताओं (ब्रॉडकास्टर्स) और अन्य  डिजिटल ऑडियो प्रोग्रामर को एक साथ एक मंच पर लाने का है। इसमें विशेषज्ञों की पैनल चर्चा, प्रदर्शनी का आयोजन और लाइव प्रदर्शनों की चर्चा शामिल की जाती है। विश्व रेडियो दिवस 2018 का विषय था -"रेडियो और खेल प्रसारण " पहले रेडियो उत्सव में सामाजिक परिवर्तन के लिए एक मंच के रूप में खेल की क्षमता की जांच और खेल प्रसारण को और भी रोचक और प्रतिस्पर्धी बनाने पर व्यापक चर्चा की गई थी। इस रेडियो उत्सव में प्रसारण के दोनों स्वरुप टेलीकॉस्टिंग और ब्रॉडकास्टिंग में अपनाई जा रही नई प्रोद्यौगीकियों पर विमर्श किया गया। रेडियो उत्सव में प्रसारण की तकनीक ही नहीं प्रसारण की जा रही सामग्री पर भी गंभीर विमर्श किया जाता है। पहले रेडियो उत्सव की इस सफलता से उत्साहित यूनेस्को ने इस श्रृँखला को आगे भी जारी रखने का निश्चय किया।

विश्व रेडियो दिवस पर होता है प्रसारण में महिलाओं की स्थिति पर विमर्श 

बदलते वक्त के साथ प्रसारण जगत में महिला पेशेवरों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है और अध्ययन
बताते हैं कि महिलाएं इस क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। प्रसारण के प्रतिष्ठापूर्ण पेशे से जुड़ीं इन पेशेवर महिलाओं ने वर्ष 1949 में रेडियो और टेलीविजन पर प्रसारण से जुड़ी महिलाओं का एक संगठन  आई.ए.डब्ल्यू. आर.टी.( इण्टरनेशनल एसोसिएशन ऑफ वूमेन इन रेडियो एण्ड टेलीविजन) बनाया।
इस एक वैश्विक संगठन के सहयोग से अब प्रतिवर्ष विश्व रेडियो दिवस पर प्रसारण में महिलाओं की स्थिति पर भी व्यापक विमर्श होता है। आई.ए.डब्ल्यू. आर.टी . का मिशन महिलाओं के विचारों और मूल्यों को सुनिश्चित करने की पहल को मजबूत करना और मीडिया में प्रोग्रामिंग में महिलाओं की भूमिका को सुनिश्चित करना है। यह संगठन संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक और सामाजिक परिषद (ईसीओएसओसी) के साथ परामर्श की भूमिका का निर्वाह करता है। यह संगठन विश्व रेडियो दिवस पर  सम्मेलनों  और कार्यान्वयन परियोजनाओं का आयोजन करता है और प्रसारण से जुड़ी विभिन्न  गतिविधियों को चलाता है, और मीडिया संगठनों के साथ सहयोग करता है। यह अंतरराष्ट्रीय बोर्ड द्वारा प्रबंधित है, जो कई स्थानीय आयोजन और सहायक गतिविधियों के लिए धन की पहल की देखरेख भी करता है।यह संगठन विश्व रेडियो दिवस पर महिला पेशेवरों की स्थिति की समीक्षा भी करता है ।

सोश्यल मीडिया के मंच पर भी हुआ समाचार सुनने का मुकम्मल इंतज़ाम 

आज जबकि रेडियो और दूरदर्शन के प्रसारण को जनसाधारण भी अपने एण्ड्रॉयड मोबाइल पर आसानी से देख सुन सकते हैं ऐसे में सोश्यल मीडिया के मंच पर समाचार भी प्रस्तुत करने का पहला और अभिनव 
प्रयास आकाशवाणी के भोपाल केन्द्र ने किया। वर्ष
2018 में विश्व रेडियो दिवस के मौके पर 13 फरवरी 2018 को आकाशवाणी भोपाल के समाचार प्रभाग ने अपने रीजनल बुलेटिन को सोश्यल मीडिया के मंच पर प्रस्तुत करना शुरू किया। अब श्रोता भोपाल से प्रसारित होने वाले क्षेत्रीय समाचार बुलेटिन फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप और यू-ट्यूब पर भी सुन सकते हैं। देश में ऐसा पहली बार हुआ है, जब आकाशवाणी के बुलेटिन नियमित सोशल मीडिया पर सुने जा सकते हैं। इसके अलावा दिल्ली से प्रसारित होने वाले राष्ट्रीय समाचार के लिए विशेष मोबाइल ऐप - "न्यूज ऑन एयर" भी गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध है। भोपाल से प्रसारित होने वाले प्रादेशिक समाचार फेसबुक, ट्विटर और यू-ट्यूब पर - आर एन यू भोपाल ( rnubhopal ) सर्च करके सुने जा सकते है  और  www.airbhopalnews.blogspot पर भी न्यूज़ स्क्रिप्ट पढ़ी जा सकती है। सोशल मीडिया पर बुलेटिन को लॉन्च करने में अहम रोल निभाने वाले आकाशवाणी के संपादक समीर वर्मा का कहना है कि वक्त के साथ बदलाव जरूरी है, इस दौर में जब युवा पीढ़ी सोशल मीडिया पर ज्यादा वक्त बिताती है ऐसे में उन तक आकाशवाणी की सच्ची और सटीक खबरें पहुंचाने के लिए यह पहल जरूरी थी। 
 
 राजा दुबे 
 

Sunday, February 7, 2021

शब्द-दर-शब्द राष्ट्रीयता को पिरोकर गीतमाला बनाते थे कवि प्रदीप

 शब्द-दर-शब्द राष्ट्रीयता को पिरोकर गीतमाला बनाते थे कवि प्रदीप


देशभक्ति के सम्भवत : सबसे प्रसिद्ध गीत -"ऐ मेरे वतन के लोगों .." के लिखने वाले कवि प्रदीप राष्ट्र प्रेम, उच्चतम जीवन मूल्यों और मानवता के विलक्षण प्रणेता थे। कवि प्रदीप ने वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान शहीद हुए सैनिकों को श्रद्धांजलि स्वरूप यह गीत लिखा था और इस प्रसंग को कि लता मंगेशकर द्वारा गाए इस गीत का तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की उपस्थिति में 26 जनवरी 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान से सीधा प्रसारण किया गया और गीत सुनकर जवाहरलाल नेहरू की आंखें भर आईं थीं, हर कोई जानता है और यह प्रसंग अब इतिहास बन गया है।

यह व्यवस्था की विडम्बना ही कही जाएगी कि इस गीत की रायल्टी को लेकर कवि प्रदीप को कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी थी। प्रदीपजी ने इस गीत के राजस्व को युद्ध में शहीद सैन्य अधिकारियों की विधवा के लिये बनाये गये कोष में जमा करने की अपील की थी। मुंबई उच्च न्यायालय ने 25 अगस्त 2005 को संगीत कंपनी एचएमवी को इस कोष में अग्रिम रूप से दस लाख रुपये जमा करने का आदेश देकर कवि प्रदीप के सपने को साकार किया था। अपने लेखन को इन्हीं चुनिंदा विषयों राष्ट्रप्रेम, उच्चतम जीवन मूल्य और मानवता तक सीमित रखने वाले कवि प्रदीप राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत गीतों केअप्रतिम रचियता थे और शब्द-दर-शब्द राष्ट्रीयता की भावना को पिरोकर उसकी गीतमाला बनाने वाले वाले कवि प्रदीप एक उत्कृष्ट लेखक होने के साथ एक अच्छे पार्श्वगायक भी थे। देश प्रेम के गीत लिखने का जज़्बा प्रदीप जी में उन्हीं दिनों से था जब वे बतौर छात्र इलाहाबाद में पढ़ते थे. 

कवि प्रदीप का मूल नाम रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी था। उनका जन्म मध्यप्रदेश  के उज्जैन जिले के बड़नगर कस्बे में हुआ था । कवि प्रदीप की पहचान 1940 में रिलीज हुई फिल्म " बंधन " से बनी। हालांकि वर्ष 1943 की गोल्डन जुबली फिल्म किस्मत के गीत - "दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है " ने उन्हें देशभक्ति गीत के रचनाकारों में अग्रगण्य बना दिया। तब ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ्तारी के आदेश भी  दिए थे और कवि प्रदीप को भूमिगत होना पड़ा था।

पांच दशक लम्बे अपने कैरियर में कवि प्रदीप ने इकहत्तर फिल्मों के लिए सत्रह सौ गीत लिखे। उनके देशभक्ति गीतों में फिल्म बंधन में -" चल चल रे नौजवान ", फिल्म जागृति मे " आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं ", " दे दी हमें आजादी बिना खडग ढाल " और फिल्म जय संतोषी मां  में " यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ मत पूछो कहाँ-कहाँ " काफी लोकप्रिय हुए थे । इन गीतों को उन्होंने फिल्म के लिए स्वयम् गाया भी था।आपने हिंदी फ़िल्मों के लिये कई यादगार गीत लिखे। भारत सरकार ने उन्हें सन 1997-98 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया था। कवि प्रदीप के सम्‍मान में मध्‍यप्रदेश सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग ने कवि प्रदीप राष्‍ट्रीय सम्‍मान की स्‍थापना वर्ष 2013 में  की । 

वरिष्ठ पत्रकार जयप्रकाश चौकसे कवि प्रदीप के सरल व्यक्तित्व के कायल हैं वे उन्हें याद करते हुए वे कहते हैं, -" उन्होंने साहित्य का बहुत ज्यादा अध्ययन नहीं किया था, वो जन्मजात कवि थे और उन्हें मैं देशी ठाठ का स्थानीय कवि कहूंगा, यही उनका असली परिचय है ।वे सादगी भरा जीवन जीते थे । किसी राजनीतिक विचारधारा को नहीं मानते थे । बौद्धिकता का जामा उनकी लेखनी पर नहीं था, जो सोचते थे वही लिखते थे, सरल थे, सहज थे और यही उनकी ख़ासियत थी । "

अपने कॉलेज के दिनों में कवि प्रदीप इलाहाबाद में आनंद भवन के काफी नज़दीक रहते थे । वहीं जवाहरलाल नेहरु का घर था जहाँ वो कई राजनीतिक बैठकों में शामिल हुए । इन सब से वो काफी प्रभावित हुए और उन्हें महसूस हुआ कि वो भी देश के लिए कुछ करें । कवि प्रदीप ने एक बार कहा था ,- ‘ मैंने अपना स्नातक  पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद अध्यापन का कोर्स करने के बारे में विचार किया था लेकिन भाग्य ने मेरे लिए कुछ और हीं सोचा हुआ था । मुझे बंबई में एक कवि सम्मेलन में बुलाया गया । वहीं बम्बई टॉकीज के मालिक हिमांशु राय ने प्रदीप को कंगन  फिल्म के लिए साइन किया और उन्हें दो सौ रुपए प्रतिमाह  का ऑफर दिया था , बाकी सब तो अब इतिहास है ।"


उन्होंनेे अपने प्रारंभिक जीवन से ही कविता लेखन और उसका पाठ करना शुरू कर दिया था ।वे कहते थे उस समय कई लोग लिखते थे इसलिए मैं बेहद उत्साहित था मैं जो कहता था उसे सुनने वाले पसंद करते थे ।लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद प्रदीप राष्ट्रवादी आंदोलन से जुड़ गए. वो कवि सम्मेलन में जाया करते थे जहां प्रदीप ने अपना उपनाम का इस्तेमाल करना शुरू किया । देशभक्ति गीतों के शिखर पुरुष कवि प्रदीप ने
राष्ट्रीयता की अलख जगाने का ऐसा दुष्कर कार्य उस समय किया जब देश की सत्ता पर विदेशी आक्रांता
काबिज़ थे । 


राजा दुबे

Sunday, January 10, 2021

उम्र एक कम सौ और जज़्बा युवाओं को भी मात देने वाला




 जी हाँ, इन्दौर की सोहिनी देवी शर्मा की उम्र निन्यानवे वर्ष है मगर उनका सिलाई से जुड़ा पेशेवर और शौकिया जज़्बा देखकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं। राजस्थान के सीकर शहर की रहने वाली सोहिनी देवी सत्तर साल पहले शादी होकर इन्दौर आईं थीं। वे ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थीं अत: खुद को व्यस्त रखने और अपने को किसी सकारात्मक काम से जोड़े रखने के लिये उन्होंने सिलाई- कढाई के अपने शौक में मन रमाना शुरू किया। पहले घर परिवार के सदस्यों के पैंट-शर्ट, फ्राक और अन्य कपड़े सीना आरम्भ किया उसके बाद तो वे कपड़े के हाथी, घोड़े, बटुए, स्वेटर, पोटली और बैग भी बनाने लगीं। घर के लिये भी और दीगर लोगों के लिये भी। उनके इस उत्साह को देखते हुए उनके भाइयों ने उन्हें पैरों से चलाई जाने वाली सिलाई मशीन दिलवा दी जिससे सोहिनी देवी दोगुने उत्साह से सिलाई-कढ़ाई का काम करने लगीं और इन सात दशक में आपने नई-नई डिजाइन के कपड़े और घरेलू उपयोग में आने वाली हजारों सुन्दर और कलात्मक चीजें तैयार की। सोहिनी देवी की पोती मोनिका शेठ जो खुद एक चित्रकार हैं वे बताती हैं कि शहर में कोई भी चित्र प्रदर्शनी लगे वे चाहतीं हैं कि उन्हें वो दिखायें ताकि वे वहां प्रदर्शित चित्रों से कुछ नई डिजाइन सीखकर कुछ नया कर सकूं। दादी जब भी ऐसी प्रदर्शनी देखकर आतीं तुरन्त नये डिजाइन के कुछ अलग ढंग के कपड़े  बनाने की कोशिश करतीं। मोनिका बताती हैं कि उन्होंने दादी से कई बार कहा कि अब हम आपको यह पैरों से चलने वाली मशीन के स्थान पर‌ इलेक्ट्रॉनिक सिलाई मशीीन दिलवा देते हैं मगर वे मना कर देती हैं कि वे पैरोंं से मशीन चलाकर और पाारम्परिक सिलाई का काम करके खुश हैं। इन सात दशक में  कई डिजाइनर कपड़े वो बना चुकीं हैं। सोहिनी देवी का यह जज़्बा देखते ही बनता है और विस्मय इस बात का भी है कि उनकी स्मरणशक्ति अभी भी ठीक ठाक हैैं, और तो और उनकी देखने सुनने की क्षमता बेहतर है।


 राजा दुबे