Sunday, September 5, 2021

शिक्षक दिवस विशेष




शिक्षक की गौरवमयी भूमिका के पुनर्अविष्कार का अवसर देता है यह दिन

समाज में एक शिक्षक की भूमिका गौरवमयी और अप्रतिम होती है और इस भूमिका के पुनर्अविष्कार का अवसर देता है शिक्षक दिवस का यह राष्ट्रव्यापी आयोजन। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन देश के दूसरे राष्ट्रपति, महान दार्शनिक और शिक्षाविद् डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिवस के रुप में इसे मनाया जाता है। शिक्षा के क्षेत्र में डॉ. राधाकृष्णन ने जो अमूल्य योगदान दिया वह निश्चय ही अविस्मरणीय रहेगा। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे।यद्यपि वे एक जाने-माने विद्वान, शिक्षक, वक्ता, प्रशासक, राजनयिक, देशभक्त और शिक्षा शास्त्री थे, तथापि अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में अनेक उच्च पदों पर काम करते हुए भी शिक्षा के क्षेत्र में सतत योगदान करते रहे। उनकी मान्यता थी कि यदि सही तरीके से शिक्षा दी जाए तो समाज की अनेक बुराइयों को मिटाया जा सकता है। शिक्षा और शिक्षक के ऐसे भाष्यकार के जन्मदिवस को हम शिक्षक दिवस के रुप में मनाते हैं यह एक गौरव का विषय है। उनकी शिक्षा को लेकर सोच अत्यंत सुस्पष्ट थी। वे कहते थे शिक्षा का लक्ष्य है ज्ञान के प्रति समर्पण की भावना और निरंतर सीखते रहने की प्रवृत्ति, वह एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति को ज्ञान और कौशल दोनों प्रदान करती है तथा इनका जीवन में उपयोग करने का मार्ग प्रशस्त करती है।करुणा, प्रेम और श्रेष्ठ परम्पराओं का विकास भी शिक्षा के उद्देश्य हैं। वे कहते थे कि जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होता और शिक्षा को एक मिशन नहीं मानता तब तक अच्छी शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती।

शिक्षक दिवस पर देश शिक्षकों के अवदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हैं

देश में शिक्षक दिवस के आयोजन का लक्ष्य शिक्षकों के अमूल्य और अविस्मरणीय अवदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करना और समाज में उनकी महत्ता प्रतिपादित करना है. इस दिन केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा-"शिक्षक सम्मान समारोह" का भव्य और गरिमामय आयोजन होता है। सरकारी आयोजन से इतर समाजसेवी संस्थाएं भी अपने स्तर पर शिक्षक सम्मान समारोह का आयोजन करती हैं. शिक्षा और शिक्षक पर केन्द्रित व्याख्यानमाला का आयोजन भी इस दिन होता है। गत वर्ष भी कोरोना संक्रमण के बीच
वेबीनार के माध्यम से शिक्षक दिवस का आयोजन हुआ। शिक्षक दिवस के सार्वजनिक समारोह के साथ ही सोश्यल मीडिया पर भी उपयोगकर्ता अपने शिक्षकों को बधाई देते हैं और उनका सम्मान करते हैं। इस दिन शिक्षकों को बधाई पत्र ( ग्रीटिंग्स) देने और कोई गरिमामय उपहार देने की भी परम्परा है। शिक्षक दिवस पर शिक्षा के क्षेत्र में आ रहे बदलाव पर भी व्यापक विचार विमर्श होता है। पिछले दो वर्ष से पूरे देश में शिक्षक दिवस पर भारत सरकार द्वारा घोषित- "राष्ट्रीय शिक्षा नीति" पर वेबीनार और विडियो
कांन्फ्रेसिंग के माध्यम से व्यापक चर्चा भी हो रही है. मीडिया शिक्षा से जुड़े मुद्दों के अलावा राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय सम्मान पाने वाले शिक्षकों से बातचीत का प्रसारण करेंगे। कुछ सरकारें शिक्षकों के लिये कुछ लाभदायी घोषणाएँ भी कर सकती हैं। इस साल कर्नाटक के बाद मध्यप्रदेश देश का दूसरा राज्य है जहाँ नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू हुई है अतः इस शिक्षक दिवस पर मुख्य रुप से शिक्षा और शिक्षकों पर बात होगी।

डॉ.राधाकृष्णन को अपने शिक्षक होने पर सर्वाधिक गर्व था

भारत के एक विलक्षण राजनेता, आदर्श शिक्षक और देश के राष्ट्रपति डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिवस को राष्ट्रीय शिक्षक दिवस मनाने का महत्वपूर्ण निर्णय वर्ष 1962 में उनके राष्ट्रपति बनने के बाद लिया गया था। एक बार उनके कुछ विद्यार्थियों और मित्रों ने उनसे उनके जन्मदिन को समारोहपूर्वक मनाने की बात कही। इसके जवाब में उन्‍होंने कहा था कि- "मेरा जन्मदिन अलग से मनाने के बजाय अगर उस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए तो मुझे अत्यंत गर्व महसूस होगा क्योंकि मुझे सबसे ज्यादा गौरव  की अनुभूति अपने शिक्षक होने पर है। "उनकी इसी इच्छा को सम्मान देने के लिये ही देश प्रतिवर्ष सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पाँच सितम्बर को देश में शिक्षक दिवस के रुप में मनाता है। संयुक्त राष्ट्र की शैक्षिक गतिविधियों से जुड़ी इकाई- यूनेस्को" ने वर्ष 1994 से प्रतिवर्ष पाँच अक्टूबर को- "अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस" मनाने का निर्णय लिया था। शिक्षकों के प्रति सहयोग को बढ़ावा देने और भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए शिक्षकों के महत्व के प्रति जागरूकता लाने के उद्देश्य से इसकी शुरुआत की गई थी. मगर भारत में पाँच सितम्बर को ही राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षक दिवस मनाते हैं। विश्व के विभिन्न देश अलग-अलग तारीख़ों में शिक्षक दिवस को मानते हैं। कुछ देशों में इस दिन अवकाश रहता है तो कहीं-कहीं यह कामकाजी दिन ही रहता है.

दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक से राष्ट्रपति तक की उपलब्धियाँ जुड़ी है राधाकृष्णन के साथ

राधाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु के तिरूतनी ग्राम में, जो तत्कालीन मद्रास से लगभग 64 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, 5 सितम्बर 1888 को हुआ था. राधाकृष्णन का बाल्यकाल तिरूतनी एवं तिरुपति जैसे धार्मिक स्थलों पर ही व्यतीत हुआ. उन्होंने प्रथम आठ वर्ष तिरूतनी में ही गुजारे. यद्यपि उनके पिता पुराने विचारों के थे और उनमें धार्मिक भावनाएँ भी थीं, इसके बावजूद उन्होंने राधाकृष्णन को क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, तिरूपति में वर्ष 1896-1900 के मध्य विद्याध्ययन के लिये भेजा, फिर अगले 4 वर्ष (1900 से 1904) की उनकी शिक्षा वेल्लूर में हुई. इसके बाद उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास में शिक्षा प्राप्त की. वह बचपन से ही मेधावी थे. उन्होंने बचपन में ही स्वामी विवेकानन्द और अन्य महान विचारकों  के विचारों का अध्ययन किया. उन्होंने वर्ष 1902 में मैट्रिक स्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की और उन्हें छात्रवृत्ति भी प्राप्त हुई. इसके बाद उन्होंने वर्ष 1904 में कला संकाय परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की. उन्हें मनोविज्ञान, इतिहास और गणित विषय में विशेष योग्यता की टिप्पणी भी उच्च प्राप्तांकों के कारण मिली. इसके अलावा क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास ने उन्हें छात्रवृत्ति भी दी. दर्शनशास्त्र में एमए करने के पश्चात् 1918 में वे मैसूर महाविद्यालय में दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक नियुक्त हुए बाद में उसी कॉलेज में वे प्राध्यापक भी रहे. डॉ राधाकृष्णन ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से विश्व को भारतीय दर्शन शास्त्र से परिचित कराया. आज़ाद भारत की संविधान सभा के राधाकृष्णन एकमात्र गैर राजनैतिक सदस्य थे. बाद में आपको सोवियत संघ में विशिष्ट राजदूत बनाया गया. वर्ष 1952 में सोवियत संघ से आने के बाद डॉ राधाकृष्णन देश के पहले उपराष्ट्रपति बने और वर्ष 1962 में वे भारत के राष्ट्रपति चुने गए. उन दिनों राष्ट्रपति का वेतन दस हजार रुपए मासिक था लेकिन प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद मात्र ढाई हजार रुपए ही लेते थे और शेष राशि प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय राहत कोष में जमा करा देते थे. डॉ राधाकृष्णन ने डॉ राजेन्द्र प्रसाद की इस गौरवशाली परंपरा को जारी रखा. देश के सर्वोच्च पद पर पहुँचकर भी वे सादगी भरा जीवन बिताते रहे.

विश्व में मानव मात्र की भलाई की बुनियाद शिक्षा पर ही  रखी जाती है

डॉ.राधाकृष्णन समूचे विश्व को एक विद्यालय मानते थे। उनका मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है और विश्व में मानव मात्र की भलाई की बुनियाद शिक्षा पर ही रखी जा सकती है, अत: विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबन्धन करना चाहिए. ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय में दिये अपने भाषण में डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था- "मानव को एक होना चाहिए, मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति तभी सम्भव है जब देशों की नीतियों का आधार पूरे विश्व में शान्ति की स्थापना का प्रयत्न हो। "डॉ राधाकृष्णन अपनी बुद्धि से परिपूर्ण व्याख्याओं, आनन्ददायी अभिव्यक्तियों और हल्की गुदगुदाने वाली कहानियों से छात्रों को मन्त्रमुग्ध कर देते थे। उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारने की प्रेरणा वह अपने छात्रों को भी देते थे। शिक्षकों के बारे में डॉ राधाकृष्णन का मानना था कि समाज और देश की विभिन्न बुराइयों को शिक्षा के द्वारा ही सही तरीके से हल किया जा सकता है। शिक्षक  ही एक सभ्य और प्रगतिशील समाज की नींव रखता है। उनके समर्पित काम और छात्रों को प्रबुद्ध नागरिक बनाने के लिए उनके अथक प्रयास प्रशंसनीय हैंं. डॉ राधाकृष्णन की इच्छा थी कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होना चाहिए और शिक्षकों, छात्रों और शिक्षा पद्धति के बीच एक मजबूत संबंध विकसित होना चाहिए। कुल मिलाकर वे पूरी शिक्षा प्रणाली में बदलाव चाहते थे, उनके अनुसार शिक्षकों को विद्यार्थियों का स्नेह और सम्मान प्राप्त करने के लिए आदेश नहीं देना चाहिए बल्कि उन्हें इसके योग्य बनना चाहिए।
इस शिक्षक दिवस पर डॉ.राधाकृष्णन की यह एक सीख भी यदि हम ले पाये कि - "शिक्षक उन्हीं लोगों को बनाया जाना चाहिए जो सबसे अधिक बुद्धिमान हो तो भी यह एक बड़ी पहल होगी। "शिक्षक को मात्र अच्छी तरह अध्यापन करके ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए , उसे अपने छात्रों का स्नेह और आदर भी अर्जित करना चाहिए। हर शिक्षक को यह याद रखना चाहिए कि उन्हें सम्मान शिक्षक होने भर से नहीं मिलता, उसे अर्जित करना पड़ता है." यदि शिक्षक यह ध्यान रखेंगे तो वे सच्चे अर्थों में राष्ट्र निर्माता शिक्षक की परिकल्पना को साकार कर सकेंगे।


 

Thursday, August 19, 2021

पंचायती राज का सपना: राजा दुबे



जनजातीय अँचल की यात्रा से गढ़ा था सशक्त पंचायत राज का सपना

वर्ष 1984 में इंदिरा गाँधी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या के बाद जिस औचक तरीके से देश की सत्ता राजीव गाँधी के  हाथ आई थी तब वे राजनीतिक गुणा-भाग से ज्यादा वाकिफ नहीं थे और सच तो यह है कि वे सत्ता में  लगभग छः साल तक रहने के बाद भी न तो राजनैतिक गुणा-भाग और न ही सियासी जोड़-तोड़ से वाकिफ़ हो पाये मगर देश की भलाई के लिए वे क्या कर सकते हैं इसका इलहाम उन्हें था। प्रधानमंत्री के रुप में अपने पहले और एकमात्र कार्यकाल में उन्होंने दूरसंचार क्रांति और कम्प्यूटर क्रांति के माध्यम से देश को सूचना प्रौद्योगिकी की मुख्यधारा से जोड़ा, मतदान की उम्र सीमा इक्कीस वर्ष से घटाकर अट्ठारह साल कर चुनाव में युवाओं की सहभागिता बढ़ाई और हर जिले में राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए ग्रामीण क्षेत्र में एक आदर्श  सहशिक्षा आवासीय केन्द्र के रुप में नवोदय विद्यालय खोला । मगर इन सबसे अहम् निर्णय था देश मेंं सत्ता के विकेंद्रीकरण के लिए त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के सशक्तिकरण और ग्राम स्वराज का एक आदर्श प्रारुप बनाने का। उनकी हत्या के बाद उनके उत्तराधिकारी प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने पंचायत राज एवम् ग्राम स्वराज (संशोधन) अधिनियम के लिए संविधान में तिहत्तरवें और चौहत्तरवें संविधान संशोधन के माध्यम से राजीव गाँधी का यह सपना साकार किया। राजीव गाँधी ने बतौर प्रधानमंत्री अपनी सहधर्मिणी सोनिया गाँधी के साथ देश के जनजातीय अँचलों का व्यापक दौरा किया और इन अँचलों के गाँव- गाँव जाकर पंचायतों के हाल-अहवाल का जायजा लिया। सच तो यह है कि जनजातीय अँचल की इन्हीं यात्राओं में उन्होंने सशक्त पंचायती राज का सपना गढ़ा।

वर्ष 1985 की इसी यात्रा श्रृँखला मेंं जब राजीव गाँधी और सोनिया गाँधी मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ अँचल और पश्चिमी मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के आदिवासी गांवों में गये तो आदिवासियों से चर्चा कर और उस क्षेत्र के आदिवासी गाँव में आदिवासी परिवार के साथ ही रात्रि विश्राम कर और उनके साथ उन्हीं के घर में बना खाना खाकर उन्होंने उनकी समस्याओं और उनकी क्षमता को पहचाना। झाबुआ जिले के प्रवास में देवीगढ़, कट्ठीवाड़ा सहित कई गाँवों में गये। राजीव गाँधी ने यह  यात्रा जनजातीय अँचल के सुदूरतम गाँवों तक पहुंचने के लिये हेलीकॉप्टर से की थी और यात्रा की योजना बनाने वालों से कहा था कि हैलीपेड उस आदिवासी गाँव के पंचायत भवन के पास बनाएं जिससे वे पैदल पंचायत भवन पहुँचकर सरपंच और गाँव वालों से मिल सकें।

इस प्रवास मेंआलीराजपुर अनुविभाग के जिन पाँच गाँवों में राजीव-सोनिया को जाना था उनका क्रम तय था। पहले गाँव में तो उनका हेलीकॉप्टर तय स्थान पर उतरा मगर फिर दूसरे और तीसरे गाँव को छोड़कर चौथे गाँव कट्ठीवाड़ा में पहुँच गया। वहाँ हैलीपेड भी था पंचायत भवन भी था, पंचायत भवन में एक कुर्सी पर सरपंच भी बैठे थे। जिला प्रशासन के कुछ अधिकारी भी थे मगर चूँकि प्रधानमंत्री को अभी उस गांव नहीं आना था अतः जिला प्रशासन की भी दो नम्बर की टीम यानी डीएसपी, तहसीलदार और जिला सहकारी बैंक के प्रबंधक वहां मौजूद थे। हेलीपेड से उतरकर राजीव गाँधी, सोनिया गाँधी और प्रदेश के मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा पंचायत भवन आये। सरपंच अपनी कुर्सी पर बैठे थे। राजीव और सोनिया जब थोड़ा झुककर पंचायत भवन में घुसे तो मौजूद अधिकारियों ने सरपंच को कहा दिल्ली से बड़े बाबा आये हैं, खड़े हो जा।सरपंच टस से मस नहीं हुआ। दूसरी बार अधिकारियों ने जब सरपंच को उठाना चाहा तो वे चिढ़कर बोले-"हूँ नीं उठूंगा, म्हने कलेक्टर सा'ब बोल्या है"।इस बार राजीव गाँधी ने टोका- "बैठे रहने दीजिए उन्हें इस कुर्सी पर, यह सरपंच की कुर्सी है और वे सरपंच हैं- "ही हेज राइट टू सिट ऑन दैट चेयर"। इसके बाद राजीव गाँधी ने सरपंच से देर तक बात की और वे इस बात से हैरान भी हुए कि केन्द्र सरकार की योजनाओं का पैसा जो पंचायतों को भेजा जाता है वो पूरी तरह से उन तक नहीं पहुंचता है। इसके बाद ही उन्होंने विभिन्न योजनाओं को पैसा सीधे पंचायतों को भेजने के प्रावधान की बात की। अपने कार्यकाल में पंचायती राज और ग्राम स्वराज का जो सपना राजीव गाँधी ने देखा था वो सपना वस्तुत: जनजातीय अँचल की इन्हीं यात्राओं में गढ़ा गया था। आज जो पंचायतों को हम इतना सशक्त देख रहें हैं वो राजीव गाँधी की ही परिकल्पना थी। इसी प्रवास में देवीगढ़ की आमसभा में उन्होंने कहा था कि गाँथीजी ने जो हर गाँव को गणतंत्र कहा था वह ग्राम स्वराज ही तो था और हमारे पंचायती राज के यही  निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधि देश में मजबूत पंचायत राज और ग्राम स्वराज का सपना सच करेंगे। 

राजा दुबे

Thursday, August 12, 2021

अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस

 







युवाओं की दक्षता, ऊर्जा और वैचारिक मेधा की पहचान जरुरी है

विश्व के सर्वांगीण विकास में युवाओं के अवदान को रेखांकित करने के लिये संयुक्त राष्ट्र की पहल पर प्रतिवर्ष 12 अगस्त को अन्तर्राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। इस आयोजन का मंतव्य सदस्य देशों का ध्यान युवाओं से जुड़े मुद्दों, उनकी समस्याओं और विश्व के विकास में उनके अवदान के आकलन पर केन्द्रित करना होता है। मौजूदा स्थिति में विश्व के सर्वांगीण विकास और विश्व शान्ति के लक्ष्य की प्राप्ति के लिये युवाओं की दक्षता, ऊर्जा और वैचारिक मेधा की पहचान बेहद जरूरी है और अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस इसी पहचान को सम्भव बनाता है। वर्ष 2000 में पहली बार संयुक्त राष्ट्र की अगुवाई में अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस का आयोजन किया गया था। इस आयोजन की आरम्भिक रुपरेखा वर्ष 1985 में ही बन गई थी जब संयुक्त राष्ट्र  के एक प्रस्ताव के द्वारा वर्ष 1985 को अंतर्राष्ट्रीय युवा वर्ष के रुप में मनाया गया था। अंतर्ष्ट्रीय युवा दिवस के लिए विचार वर्ष 1991 में संयुक्त राष्ट्र के विश्व युवा मंच के पहले सत्र के लिए ऑस्ट्रिया के वियना में इकट्ठा हुए युवाओं द्वारा प्रस्तावित किया गया था। मंच ने सिफारिश की कि अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस घोषित किया जाए। अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस का आयोजन प्रचार के उद्देश्यों और संयुक्त राष्ट्र युवा कोष के लिए धन एकत्र करने के लिए भी किया गया था। किसी भी देश का युवा उस देश के विकास का सशक्त आधार होता है लेकिन जब यही युवा अपनी सामाजिक और राजनैतिक जिम्मेदारियों को भुलाकर विलासिता के कार्यों में अपना समय नष्ट करता है, तब देश बर्बादी की ओर अग्रसर होने लगता है। इसी कर्तव्यविमुख युवा को सर्वांगीण विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के यत्न का उपक्रम इस दिन किया जाता है। 

युवा आबादी ही किसी भी देश की वास्तविक ताकत और बुनियाद है

किसी भी देश की वास्तविक ताकत का अंदाज़ा उसके युवाओं की संख्या पर निर्भर करता है, युवा वस्तुत: किसी भी देश की बुनियाद होते हैं। राजनीति से लेकर व्यापार तक सब कुछ निर्भर करता है कि, उसको चलाने वाले वरिष्ठजन कैसे है? जब वरिष्ठजन के साथ युवाओं का जोश मिल जाता है तो फिर किसी भी क्षेत्र में कामयाबी हासिल की जा सकती है। इस लिए सरकारें अपने देश के युवाओं पर बहुत ध्यान देती है, उनकी पढ़ाई लिखाई खेल कूद उनके प्रशिक्षण पर अपने सकल घरेलू उत्पाद  का एक बड़ा हिस्सा खर्च करती हैं। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था वहाँ की राजनीति व्यापार आदि में युवाओं की भागीदारी सुन्निश्चित करने और उनको बेहतर अवसर प्रदान करने के लिए एक मंच और दिन की ज़रूरत को महसूस कर ही बारहअगस्त को  अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस  मनाया जाता है।संयुक्त राष्ट्र पन्द्रह से पच्चीस साल की उम्र की आबादी को युवा की श्रेणी में रखता है। इस उम्र की आबादी से दुनिया की आबादी का छठवाँ हिस्सा बनता है, इसमें पुरूष और महिला दोनों को शामिल किया जाता है। भारत में लगभग पैंसठ प्रतिशत आबादी युवाओ की श्रेणी में आती हैं, इस लिहाज से भारत विश्व का सबसे युवा देश है और इस श्रेणी की तेज़ी से वृद्धि हो रही है भारत में।

युवा दिवस का आयोजन युवाओं को विकास की मुख्यधारा से जोड़ता है

अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस पर देश विदेश में कई कार्यक्रम होते हैं, जिसमें वहाँ की सरकारें और गैर सरकारी संस्थाएं हिस्सा लेती हैं। जहां विचार विमर्श किया जाता है कि कैसे युवाओं को सर्वांगीण विकास की  मुख्यधारा से जोड़ा जाए, और उनकी सकारात्मक शक्ति का उपयोग समाज और राष्ट्र के निर्माण में किया जाए। यहाँ युवाओ की शिक्षा रोजगार से जुड़े मुद्दे मुख्य रूप से चर्चा का विषय होते हैं, अन्य गतिविधियों जैसे खेल, संगीत, नृत्य, लेखन आदि में जिन युवाओं ने अपना मुकाम बनाया है, उनको प्रोत्साहित और सम्मानित किया जाता है। ताकि वो और अच्छा करें, और उनको देखने वाले उनसे प्रेरित होकर अपना योगदान समाज को दे सकें । युवा दिवस के दिन स्कूल व कॉलेजों में विशेष आयोजन किये जाते हैं एवम् किशोर व युवाओं  को खेल, सेमीनार, निबंध-लेखन के लिये प्रतियोगिता, प्रस्तुतीकरण, योगासन, सम्मेलन, गायन, संगीत, व्याख्यान , परेड आदि के द्वारा सभी स्कूल, कॉलेज में युवाओं के द्वारा राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है । कोरोना संक्रमण के कारण पिछले दो वर्ष से बचाव के अनुशासन के कारण युवा दिवस के सभी आय़ोजन वास्तविक स्वरूप ( एक्चुअली) न होकर आभासी स्वरुप ( वर्चुअली) हो रहें हैं । युवा दिवस पर कई देशों में पूर्व में घोषित राष्ट्रीय युवा नीतियों की समीक्षा भी की जाती  है और उसमें युवा कल्याण के कुछ नवाचारों को भी जोड़ा जाता है। युवाओं को आगे
बढ़ने में सहायता देने वाले नये प्रकल्प भी इसी दिन
स्वीकृत किये जाते हैं ।


कोरोना संक्रमण से वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा प्रभावित हुई युवा आबादी

कोरोना वायरस के वैश्विक संक्रमण से विश्व के लगभग सभी देशों की वित्तीय संरचना ध्वस्त हुई है और उसका
सर्वाधिक दुष्परिणाम युवाओं को ही भुगतना पड़ रहा है ।
सबसे चिंताजनक स्थिति भारत जैसे विकासशील देशों में
देखने को मिली जहाँ सकल घरेलू उत्पाद-ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्शन के पूर्वानुमान नकारात्मक वृद्धि दर की ओर चले गए । विकासशील  देश पर बेरोज़गारी की भयंकर मार पड़ रही है और  ग़रीबी उन्मूलन की दिशा में हुई प्रगति के भी उलटी गति पकड़ने का डर है ।विकासशील देशों के युवा वस्तुत: तिहरी चुनौती का सामना कर रहे हैं- उन्हें नियोजन के क्षेत्र की बदहाली  के कारण बेरोज़गारी से जूझना पड़ रहा है, तो शिक्षा व्यवस्था में व्यवधान से पढ़ाई छोड़ने का दबाव भी बढ़ गया है और डिजिटल फ़ासले के कारण आने वाली मुश्किलें भी इन देश के युवा झेल रहे हैं। परीक्षा में लगातार विलम्ब के चलते, उन्हें न तो डिग्रियां मिल पा रही हैं और न ही वो नौकरी की तलाश के लिए स्वतंत्र हो पा रहे हैं ।इन स्थितियों के कारण ही विकासशील दे अन्य देशों और संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर इन युवाओं की दिक्कतों पर विमर्श कर सकते हैं। 


विकासशील देश इस दिन करते है युवाओं के प्रवासन पर गँभीर विमर्श

आज विश्व की बहुसंख्य युवा आबादी बिलासिता और सुख-सुविधा को देखते हुए अपनी देश की जमीन को छोड़कर दूसरी जगह आजीविका के लिए जा रहे हैं, जिससे उन  राष्ट्रों के निर्माण खासतौर पर वित्तीय स्वावलम्बन में दिक्कतें आ रही हैं। युवा किसी भी राष्ट्र की शक्ति होते हैं और विशेषकर भारत जैसे विकासशील राष्ट्र की ऊर्जा तो युवाओं में ही निहित है। ऐसे में अगर युवाओं का भारी संख्या में प्रवासन होता है तो इससे न केवल उस राष्ट्र की अक्षमता प्रदर्शित होती है, जो अपने नौजवानों को अपने ही देश में समुचित रोजगार नहीं दे पाती है अपितु युवाओं के ऐसे प्रवासन से देश के विकास का सशक्त आधार ही समाप्त हो जाता है। प्रवासन की इस समस्या को विश्व के कई राष्ट्राध्यक्ष अब गंभीरता से नहीं लेते हैं क्योंकि आर्थिक उदारीकरण और ग्लोबल विलेज़ के बाद प्रवासन अब प्रतिभा पलायन यानी ब्रेन ड्रेन नहीं रहा है और युवा भी अपनी क्षमता के आधार पर पैकेज के लिए देश से बाहर जाने में संकोच नहीं करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस पर इस प्रवासन पर विकासशील देश विमर्श तो करते हैं मगर इसमें स्वदेश वापसी नहीं ही संरक्षण का मुद्दा होता है ।  

खाद्य प्रणाली के परिवर्तन पर केन्द्रित होगी इस वर्ष की थीम

इस वर्ष के अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस की थीम रखी गईं  है- "ट्रांसफॉर्मिंग फूड सिस्टम: यूथ इनोवेशन फॉर ह्यूमन एंड प्लैनेटरी हेल्थ”। खाद्य प्रणालियों के परिवर्तन के इस मुद्दे का उद्देश्य इस बात पर प्रकाश डालना है कि इस तरह के वैश्विक प्रयास की सफलता युवा लोगों की सार्थक भागीदारी के बिना हासिल नहीं की जा सकती है। इसके माध्यम से, हम स्वीकार करते हैं कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि हमारी आहार व्यवस्था रुपांतरित हो उसके लिए एक ऐसा समावेशी समर्थन तंत्र बेहद आवश्यक है जिसमें युवा भाग लेते रहें और वैश्विक स्तर पर ऐसी व्यवस्था के लिए व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से प्रयत्न जारी रखें। यह भी मानता है कि खाद्य प्रणालियों के परिवर्तन में जैव विविधता को एकीकृत करना महत्वपूर्ण है। जनसंख्या बढ़ती रहती है, और अगले 30 वर्षों में इसके 2 अरब तक बढ़ने की संभावना है। यह माना जाता है कि केवल अधिक मात्रा में अधिक स्थायी रूप से भोजन का उत्पादन करने से मानवमात्र की भलाई सुनिश्चित नहीं होगी। गरीबी में ऊपर उठने, सामाजिक समावेशन, स्वास्थ्य देखभाल, जैव विविधता संरक्षण, और जलवायु परिवर्तन शमन सहित अन्य महत्वपूर्ण चुनौतियां भी हैं। युवा शिक्षा, प्रतिबद्धता, विकास और उद्यमशीलता के समाधान के माध्यम से, इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस पर युवाओं को इस क्षेत्र के नवाचार को उच्चस्तरीय खाद्य प्रणाली पर विमर्श के लिए होने वाले शिखर सम्मेलन में प्रस्तुत करने का अवसर भी मिलेगा ।इस वर्ष, संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन और बच्चों और युवाओं के लिए प्रमुख समूह के सहयोग से डीईएसए द्वारा अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाएगा। वर्ष 2019 में बदलती शिक्षा , वर्ष  2018 मे युवाओं के लिए सुरक्षित स्थान , वर्ष 2017 में शांति की कायमी में युओं की भूमिका , वर्ष  2016 में वर्ष  2030 का लक्ष्य है गरीबी उन्मूलन और सतत उपभोग और उत्पादन का उच्चांक प्राप्त करना ,वर्ष 2015 की थीम थी युवा और मानसिक स्वास्थ्य। इस प्रकार हर वर्ष एक नये सन्दर्भ में युवाओं की भूमिका की पड़ताल होती  रहती है। 

इस दिन कुछ युवाओं को सम्मानित भी किया जाता है

अन्तर्राष्ट्रीय युवा दिवस मनाने का एक उद्देश्य सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्रों में सोद्देश्य भागीदारी और आविष्कार करने वाले युवा को सम्मानित करना भी है। वैश्विक परिवर्तन जहाँ अनेक उपलब्धियां सुविधाएं और चमत्कार लेकर आ रहे है वहीं युवा वर्ग के लिए तीव्र गति से भागने की क्षमता की चुनौती भी है, ताकि युवा वर्ग इतना क्षमतावान हो कि वह तेजी से हो रहे परिवर्तन को समझ सके, उसे अपना सके और नई खोज नई तकनीकों की जानकारी प्राप्त कर अपनी कार्यशैली को परिवर्तित कर सके। आज के युवा वर्ग को विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्धा में शामिल होना आवश्यक हो गया है।यह प्रतिस्पर्धा एक और समाज को सुख शांति तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत है, और दूसरी तरफ चिंता, निराशा, व्यसन और बेलगाम उपद्रव की ओर आगे बढ़ा रही है, इसलिए ऐसे कार्यक्रम आयोजित कर युवाओं को सकारात्मकता के के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। 

राजा दुबे

  


Friday, August 6, 2021

मदर ऑफ डोगरी के रुप में पहचानी जाती थीं पद्मा सचदेवः राजा दुबे



यह सवाल कहीं आप मेरी परीक्षा के लिए तो नहीं पूछ रहें हैं?

खुशमिजाज और बातचीत में खुलकर बोलने वाली प्रख्यात लेखिका पद्मा सचदेव मध्यप्रदेश सरकार द्वारा साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय अवदान के कारण राष्ट्रीय कबीर सम्मान प्राप्त करने जब भोपाल आईं तो एक प्रेस कान्फ्रेंस में एक पत्रकार ने उनसे पूछा आपको कबीर सम्मान से अलंकृत किया जा रहा है, क्या आपने कबीर को पढ़ा है? उससे सवाल से हतप्रभ पद्माजी कुछ समय चुप रहीं। फिर वो आहिस्ता से बोलीं यह सवाल कहीं आप मेरी परीक्षा के लिए तो नहीं पूछ रहें हैं? मेरा मानना है कि इस देश के हर लेखक ने किसी और को चाहे पढ़ा हो या नहीं, कबीर को जरुर पढ़ा  है। मेरा जहाँ तक सवाल है मैंने कबीर को पढ़ने के पहले कई बार सुना है। आकाशवाणी की नौकरी में मैं खाली समय में आर्काइव से निकाल कर कुमार गन्धर्व सा'ब के कबीर के निर्गुणी पद सुना करती थी। और जैसा कि कुमार गन्धर्व के कमोबेश सभी प्रशंसक पसंद करते हैं‌ मुझे भी उनका गाया कबीर का यह पद- "उड़ जायेगा हँस अकेला, गुरु दर्शन का मेला..." बेहद पसंद है। वो रेडियो की नौकरी के अपने साथियों से कहतीं भी थीं कि मेरे अवसान पर यदि- "रिमेम्बरिंग पद्मा सचदेव" कार्यक्रम बनाएं तो
उसका शीर्षक यही दीजिएगा- "उड़ जायेगा हँस अकेला...."। पता नहीं ऐसा हुआ या नहीं मगर एक और हँस उड़ गया और धवल हँसों की पाँत में एक खाली स्थान बन गया। 

भाषाई विमान पर दमकता हिन्दी का सूर्य अस्त हो गया

पद्मा सचदेव के अवसान से भाषाई साहित्य के वितान पर दमकता हिन्दी का एक सूर्य अस्त हो गया।एक भारतीय कवयित्री और उपन्यासकार के रुप में स्थापित पद्माजी डोगरी भाषा की पहली आधुनिक कवयित्री थीं। वे हिन्दी में भी समान अधिकार के साथ लिखतीं थीं। पद्माजी एक लब्ध प्रतिष्ठित रचनाकार थीं और उनके कविता संग्रह- "मेरी कविता, मेरे गीत" के लिए उन्हें वर्ष 1971 में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ था, वर्ष 2001 में आपको भारत सरकार के नागरिक सम्मान पद्मश्री से और वर्ष 2007-08 में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा साहित्य में उल्लेखनीय अवदान के लिए राष्ट्रीय कबीर सम्मान प्रदान किया गया था। पद्माजी को जो कुछ उल्लेखनीय सम्मान मिले उनमें सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार, हिन्दी अकादमी पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिन्दी अकादमी सौहार्द पुरस्कार, राजा राममोहन राय पुरस्कार, जोशुआ पुरस्‍कार और अनुवाद पुरस्‍कार शामिल हैं।


 मदर ऑफ डोगरी के रुप में  
पहचानी जाती थीं पद्मा सचदेव

"मदर ऑफ डोगरी" के रुप में अपनी पहचान बनाने वाली पद्मा सचदेव ने सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका लता मंगेशकर के डोगरी भाषा के पहले म्यूजिक एलबम को भी कम्पोज़ किया था। इस एलबम के कुछ गीतों जैसे- "भला शापिया डोरिया.." और "तून मला तून..." तो आज़ भी लोगों की जुबान पर हैं।पद्माजी के पहले कविता संग्रह- "मेरी कविता मेरे गीत" की प्रस्तावना में लिखा है कि पद्मा की कविता पढ़ने के बाद मुझे लगा कि मुझे अपनी कलम फेंक देनी चाहिए- पद्मा जो लिखती है वह वास्तव में सच्ची कविता है। डोगरी लौकगीतों और लोककथाओं से अनुप्रेरित होकर पद्माजी ने डोगरी में लिखना आरम्भ किया। उनकी पहली कविता वर्ष 1955 में एक स्थानीय अखबार में छपी थी। वर्ष 1969 में आपका पहला कविता संग्रह- "मेरी कविता मेरे गीत" प्रकाशित हुआ। केवल डोगरी ही नहीं हिन्दी और संस्कृत में भी आप समान अधिकार के साथ लिखती थीं। आपने कविता के अलावा हिन्दी में लघुकथाएं और उपन्यास भी लिखे। दो हिन्दी फिल्मों प्रेम पर्वत और आँखिन देखी के लिए अपने गीत भी लिखे। आप एक दक्ष लेखिका के साथ मेधावी अनुवादक भी थीं। आपने उर्दू, मराठी और उडिया में लिखी कई रचनाओं का हिन्दी और डोगरी में अनुवाद किया। आपको साहित्य अकादमी का अनुवाद सम्मान भी प्रदान किया गया था।

राजा दुबे