Saturday, June 5, 2021

विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: राजा दुबे

पर्यावरण संरक्षण आज भी विश्व की सर्वोच्च प्राथमिकता है


पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षण हेतु पूरे विश्व में प्रतिवर्ष
पाँच जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का निश्चय संयुक्त राष्ट्र ने पर्यावरण के प्रति वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक जागृति लाने के लिये वर्ष 1972 में किया था। इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पाँच से सोलह जून तक आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन में चर्चा के बाद प्रतिवर्ष 05 जून को- " विश्व पर्यावरण दिवस" मनाने का संकल्प लिया गया। पहला विश्व पर्यावरण दिवस 05 जून 1974 को ही विश्व में मनाया गया था। वैश्विक सहभागिता के लिये आरम्भ में मुख्य आयोजन संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय  न्यूयार्क में ही होता था। मगर वर्ष 1987 में इसके केंद्र को बदलते रहने का सुझाव सामने आया और उसके बाद से ही इसके आयोजन के लिए अलग अलग देशों को चुना जाता है। इस आयोजन में हर साल एक सौ तिरतालिस से अधिक देश हिस्सा लेते हैं और इसमें कई सरकारी, सामाजिक और व्यावसायिक संगठन, पर्यावरणविद् और विषय विशेषज्ञ पर्यावरण की सुरक्षा, समस्या आदि विषय पर बात करते हैं। पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से यह एक  महत्वपूर्ण दिन है इस दिन ही पूरा विश्व पर्यावरण संरक्षण के मार्ग में आने वाली चुनौतियों के समाधान की राह खोजता है। विश्व पर्यावरण दिवस जनसामान्य में  पर्यावरण के प्रति जागरुकता  बढ़ाने के लिये संयुक्त राष्ट्र द्वारा संचालित‌ दुनिया का सबसे बड़ा वार्षिक आयोजन है। इसका मुख्य उद्देश्य हमारी प्रकृति की रक्षा के लिए जागरूकता बढ़ाना और दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे  पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर नज़र रखना हैं।



पर्यावरण के घटक को समझने से ही पर्यावरण का संरक्षण सुगम होगा

पर्यावरण संरक्षण से पूर्व यह जानना जरुरी है कि पर्यावरण के घटक क्या हैं क्योंकि इसी से पर्यावरण का संरक्षण सुगम होगा। पर्यावरण के जैविक संघटकों में सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीड़े-मकोड़े, सभी जीव-जंतु और पेड़-पौधों के अलावा उनसे जुड़ी सारी जैव क्रियाएं और प्रक्रियाएं भी शामिल हैं। जबकि पर्यावरण के अजैविक संघटकों में निर्जीव तत्व और उनसे जुड़ी प्रक्रियाएं आती हैं, जैसे पर्वत, चट्टानें, नदी, हवा और जलवायु के तत्व इत्यादि होते हैं। सामान्य अर्थों में यह हमारे जीवन को प्रभावित करने वाले सभी जैविक और अजैविक तत्वों, तथ्यों, प्रक्रियाओं और घटनाओं से मिलकर बनी इकाई है। यह हमारे चारों ओर व्याप्त है और हमारे जीवन की प्रत्येक घटना इसी पर निर्भर करती और संपादित होती हैं। मनुष्यों द्वारा की जाने वाली समस्त क्रियाएं पर्यावरण को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। इस प्रकार किसी जीव और पर्यावरण के बीच का संबंध भी होता है, जो कि अन्योन्याश्रि‍त है। मानव हस्तक्षेप के आधार पर पर्यावरण को दो भागों में बाँटा जा सकता है, जिसमें पहला है प्राकृतिक या नैसर्गिक पर्यावरण और मानव निर्मित पर्यावरण। यह विभाजन प्राकृतिक प्रक्रियाओं और दशाओं में मानव हस्तक्षेप की मात्रा की अधिकता और न्यूनता के अनुसार है।पर्यावरणीय समस्याएं जैसे प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन इत्यादि मनुष्य को अपनी जीवनशैली के बारे में पुनर्विचार के लिये प्रेरित कर रही हैं और अब पर्यावरण संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन की आवश्यकता महत्वपूर्ण है। आज हमें सबसे ज्यादा जरूरत है पर्यावरण संकट के मुद्दे पर आम जनता और सुधी पाठकों को जागरूक करने की।

स्टॉकहोम पर्यावरण सम्मेलन और भारतीय प्रधानमंत्री का  सम्बोधन

पर्यावरण प्रदूषण की समस्या पर वर्ष 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्टॉकहोम (स्वीडन) में विश्व भर के देशों का पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया था। इसमें एक सौ उन्नीस देशों ने भाग लिया था और पहली बार पर्यावरण संरक्षण के परिप्रेक्ष्य में एक ही पृथ्वी का सिद्धांत मान्य किया गया था। इसी सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूनाइटेड नेशन्स इनवायरमेंट प्रोग्राम) बनाया गया था और प्रतिवर्ष  पाँच  जून को विश्व पर्यावरण दिवस आयोजित करके नागरिकों को प्रदूषण की समस्या से अवगत कराने का निश्चय किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाते हुए राजनीतिक चेतना जागृत करना और आम जनता को प्रेरित करना था। इस पर्यावरण सम्मेलन में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने "पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति एवं उसका विश्व के भविष्य पर प्रभाव" विषय पर व्याख्यान दिया था। पर्यावरण-सुरक्षा की दिशा में यह भारत का प्रारंभिक कदम था और  तभी से हम प्रति वर्ष पाँच जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते आ रहे हैं।

और तीन साल पहले जब भारत को विश्व पर्यावरण दिवस की मेजबानी मिली

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तीन साल पहले अपने लोकप्रिय रेडियो- टीवी कार्यक्रम- "मन की बात" में यह कहा था कि वर्ष 2018 में विश्व पर्यावरण दिवस की मेजबानी भारत को मिलना जलवायु परिवर्तन संबंधी मुद्दों पर भारत की नेतृत्व क्षमता को विश्व समुदाय द्वारा स्वीकार करने का स्पष्ट संदेश है। इस दौरान उन्होंने देशवासियों से प्लास्टिक के प्रयोग को नकारने की भीअपील भी की थी। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर भारत की मेजबानी में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय समारोह में प्रधानमंत्री मोदी नेे भारत द्वारा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में किये जा रहे कार्यों से विश्व समुदाय को भी अवगत भी कराया था।

पर्यावरण संरक्षण के  विभिन्न पक्षों को परिभाषित करते हैं तयशुदा लक्ष्य

विश्व पर्यावरण दिवस पर प्रतिवर्ष एक लक्ष्य का निर्धारण
संयुक्त राष्ट्र संगठन द्वारा किया जाता है इसे- "थीम ऑफ दी ईयर" कहा जाता है । वर्ष 2021 में विश्व पर्यावरण दिवस की थीम है- "सब मिलकर फिर से कल्पना करें, फिर से बनाएँ फिर से पुनर्स्थापित करें", इस लक्ष्य का मंतव्य पर्यावरण प्रदूषण से मुक्त विश्व के निर्माण , ऐसे विश्व की कल्पना करना और ऐसे विश्व को पुनर्स्थापित करना है। वर्ष 2021 में विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन पाकिस्तान में हुआ जिसमें इस लक्ष्य को लेकर गंभीर विचार विमर्श हुआ। वस्तुत: विश्व पर्यावरण दिवस पर तय की गई थीम उस लक्ष्य को पारिभाषित करती है जो पर्यावरण संरक्षण के लिए तय किये जाते हैं। विश्व पर्यावरण दिवस की पिछले दस सालों की थीम की यदि हम बात करें तो वर्ष 2020 की थीम थी- जैव विविधता का जश्न मनाएं, वर्ष 2019 की थीम थी- वायु प्रदूषण को हराओ, वर्ष 2018 की थीम थी- प्लास्टिक प्रदूषण को हराओ, वर्ष 2017 की थीम थी- लोगों को प्रकृति से जोड़ना- शहर में और जमीन पर, ध्रुवों से भूमध्य रेखा तक और वर्ष 2016 की थीम थी- जीवन के लिए जँगली हो जाओ अर्थात् जँगल को सर्वांग स्वरुप को अपनाओ। इसी परिप्रेक्ष्य में वर्ष  2015 की थीम थी एक विश्व, एक पर्यावरण, वर्ष 2014 की थीम थी पर्यावरण की दृष्टि से छोटे द्वीप विकसित राज्य होते है और अपनी आवाज उठाओ, ना कि समुद्र स्तर। वर्ष 2013 की थीम थी- सोचो, खाओ, बचाओ और नारा था अपने फूडप्रिंट को घटाओ, वर्ष 2012 की थीम थी- हरित अर्थव्यवस्था क्यों इसने आपको शामिल किया है? वर्ष  2011 की थीम थी- जंगल: प्रकृति आपकी सेवा में और वर्ष 2010 की थीम थी- बहुत सारी प्रजाति,  एक ग्रह, और  एक भविष्य।

कोविड-19 महामारी के परिप्रेक्ष्य में पर्यावरण के बदलाव पर भी विचार हो

पहले भी जब-जब इस प्रकार की भयानक महामारियां आई हैं, तब-तब पर्यावरण ने सकारात्मक करवट ली है।  कोविड-19 महामारी के परिप्रेक्ष्य में पर्यावरण में आ रहे इस बदलाव पर भी विचार होना चाहिए। कोरोना संक्रमण काल में प्रकृति का यह बदला हुआ रुप मानवीय जीवन के लिए भले ही क्षणिक राहत वाला हो, परंतु जब संक्रमण का खतरा पूरी तरह खत्म हो जाएगा, तब क्या पर्यावरण की यही स्थिति बरकरार रह पाएगी? यह एक बड़ा सवाल विश्व के सामने आयेगा। जब सभी देशों के लिए विकास की रफ्तार को तेज करना न केवल आवश्यक होगा, बल्कि मजबूरी भी होगी, तब क्या ऐसे कदम उठाए जाएंगे जो प्रकृति को बिना क्षति पहुंचाए सतत विकास की ओर अग्रसर हो सकेंगे। यह सवाल इस विश्व पर्यावरण दिवस पर स्वाभाविक रुप से उठाया गया। वर्तमान स्थिति को प्रकृति की ओर से दी हुई चेतावनी समझनी चाहिए जो मनुष्य की जीवन शैली और विकास प्रक्रिया के तौर-तरीकों को बदलने का अवसर प्रदान करती है। महामारी के बाद आर्थिक विकास की रफ्तार को बढ़ावा देने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का बड़े पैमाने पर अमर्यादित दोहन भी किया जाता है। ऐसे में कोरोना महामारी से उत्पन्न अल्पकालिक पर्यावरणीय सुधार से बहुत अधिक खुश होने की जरूरत नहीं है, बल्कि मानव, प्रकृति और आर्थिक विकास के अंतर्संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने की आवश्यकता है। एक और विचारणीय मुद्दा यह भी है कि संकट के इस दौर में मनुष्य के अति- भौतिकवाद, उत्पादनवाद और उपभोगवाद को विकास का पर्याय मान लेने की मानसिकता पर भी मंथन होना चाहिए। आधुनिकता की चकाचौंध से लोगों में व्यक्तिवाद और सुखवाद की प्रवृत्ति बढ़ी है। मानवीय उत्थान के लिए तो ये चीजें अच्छी लगती हैं, लेकिन नई-नई वैज्ञानिक तकनीकों द्वारा पारिस्थितिकी तंत्र को नियंत्रित करने की मनोवृत्ति ने पर्यावरणीय विसंगति को जन्म दिया है उस पर भी गौर किया जाना चाहिए।

महत्वपूर्ण है भारत में पारित पर्यावरण संरक्षण अधिनियम

पर्यावरण संरक्षण को कानूनी तौर पर मजबूती प्रदान करने के लिए भारतीय संसद ने 19 नवंबर 1986 को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम पारित किया था। इस अधिनियम के अन्तर्गत पर्यावरण में जल, वायु, भूमि- इन तीनों से संबंधित कारक तथा मानव, पौधों, सूक्ष्म जीव, अन्य जीवित पदार्थ आदि को शामिल किया गया था। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के कई महत्त्वपूर्ण बिंदु हैं जैसे- पर्यावरण की गुणवत्ता के संरक्षण हेतु सभी आवश्यक क़दम उठाना ,पर्यावरण प्रदूषण के निवारण, नियंत्रण और उपशमन हेतु राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम की व्यापक  योजना बनाना और उसे क्रियान्वित करना, पर्यावरण की गुणवत्ता के मानक निर्धारित करना और पर्यावरण सुरक्षा से संबंधित अधिनियमों के अंतर्गत राज्य-सरकारों, अधिकारियों और संबंधितों के काम में समन्वय स्थापित करना। अधिनियम में ऐसे क्षेत्रों का परिसीमन करना भी शामिल हैं जहाँ किसी भी उद्योग की स्थापना अथवा औद्योगिक गतिविधियां संचालित न की जा सकें। उक्त-अधिनियम का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कठोर दण्ड का प्रावधान भी है।

एक वैश्विक सर्वेक्षण से साबित होता है अर्थ नहीं पर्यावरण प्रेमी हैं भारतीय

दुनिया में सबसे तेज़ीी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारत हरित अर्थव्यवस्था बनने का प्रयास कर रहा है। नए सर्वेक्षण में खुलासा हुआ है कि भारतीय लोग आर्थिक वृद्धि पर पर्यावरण रक्षा को मामूली रूप से प्राथमिकता देते हैं। अमेरिका की प्रमुख सर्वेक्षण एजेंसी ‘गैलप’ ने अपने ताजा सर्वेक्षण में कहा कि ज़्यादातर आबादी अर्थव्यवस्था से ज़्यादा पर्यावरण पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं। सर्वेक्षण करने वाली स्वैच्छिक संस्था गैलप की मानें तो भारत ने वैश्विक भूभाग पर हरित क्षेत्र को बढ़ाने के उल्लेखनीय प्रयास किए हैं। इसकी एक बानगी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली है, जहाँ हाल के वर्षो में हरित क्षेत्र में वृद्धि दर्ज की गई है। दिल्ली का लगभग 20 फीसदी हिस्सा वनों से ढका हुआ है। सरकार ने अगले कुछ सालों में इसे बढ़ाकर पच्चीस  फीसदी करने का लक्ष्य रखा है।

राजा दुबे 


 

Monday, May 24, 2021

स्मृति शेष: सुंदरलाल बहुगुणा

 

बहुगुणा का महाप्रयाण भी एक संदेश है कि पर्यावरण बचेगा तो जीवन बचेगा
तस्वीर सौजन्य: सतीश आचार्य


एक महान व्यक्ति का आचार, व्यवहार और आचरण तो
उनके जीवन मूल्यों को परिलक्षित करता ही है उनका
अवसान भी एक जीवंत संदेश होता है। सुप्रसिद्ध
पर्यावरणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा का शुक्रवार, 21 मई
को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, ऋषिकेश में
कोरोना संक्रमण से निधन हो गया। बहुगुणा के इस महाप्रयाण में भी यह संदेश अन्तर्निहित रहा कि कोरोना महामारी ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि यदि पर्यावरण सुरक्षित है तो ही जीवन सुरक्षित रहेगा। उनका अवसान एक बड़ी क्षति है। प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी ने अपने ट्विट में लिखा है कि सुंदरलाल बहुगुणा का निधन हमारे देश के लिए एक बड़ी क्षति है। उन्होंने प्रकृति के साथ सद्भाव में रहने के हमारे सदियों पुराने लोकाचार को प्रकट किया। उनकी सादगी और करुणा की भावना को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। मेरे विचार उनके परिवार और कई प्रशंसकों के साथ हैं। पर्यावरण के संरक्षण के लियेे  उनका अवदान एक महान उपलब्धि है ।

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के सच्चे अनुयायी और वारिस थे बहुगुणा 

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के सिद्धांतों पर चलने वाले सुंदरलाल बहुगुणा ने सत्तर के दशक में पर्यावरण सुरक्षा को लेकर एक अभियान चलाया था जिसने पूरे देश में अपना एक व्यापक असर छोड़ा। इसी दौरान शुरू हुआ- "चिपको आंदोलन" भी इनकी प्रेरणा से ही शुरू किया गया था। हिमालय के गढ़वाल इलाके में  पेड़ों की कटाई के विरोध में शांतिपूर्ण ढंग से चलाये गये चिपको आन्दोलन का चरम मार्च 1974 में सतह पर आया जब वृ‌क्षों की कटाई के विरोध में स्थानीय महिलाएं पेड़ों से चिपक कर खड़ी हो गईं, दुनिया ने इसे चिपको आंदोलन के नाम से जाना। सुन्दर लाल बहुगुणा ने इस आन्दोलन के माध्यम से विश्व को यह संदेश दिया कि पर्यावरण को बचाने के लिये प्रार्णोत्सर्ग के चरम तक के लिये तैयार रहना चाहिए। इसी आन्दोलन के बाद बहुगुणा को वृक्ष मित्र कहा जाने लगा। हिमालय के रक्षक के नाम से भी पहचाने जाने वाले सुंदरलाल बहुगुणा का जन्म उत्तराखंड के टिहरी के पास एक गांव सिल्यारा में 09 जनवरी 1927 को हुआ था. अपने जीवनकाल में उन्होंने कई आन्दोलनों की अगुवाई की, फिर चाहे वो शुरुआत में छुआछूत का मुद्दा हो या फिर बाद में महिलाओं के हक में आवाज़ उठाना हो। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के अनुयायी बहुगुणा की वर्ष 1949 में मीराबेन व ठक्कर बाप्पा से मुलाकात हुई। बहुगुणा ने दलित विद्यार्थियों की आवासीय समस्या के समाधान के लिये "ठक्कर बप्पा छात्रवासों" की स्थापना भी की। इन दोनों के सानिध्य में ही उनका समाज सुधार का सफर शुरू हुआ। 

दलितों को समाज में सभी नागरिक अधिकार दिलाने को वे सदैव सचेष्ट रहे

मन्दिरों में दलितों को प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए उन्होंने प्रदर्शन व धरना देना शुरू किया। इस बड़े
काम के लिये बहुगुणा ने वर्ष 1971 में गुजरात के खेड़ा
शहर में दलितों के मन्दिर प्रवेश को लेकर वर्ष 1971 में सोलह दिनों का अनशन भी किया था। समाज के लोगों के लिए काम करने हेतु बहुगुणा ने वर्ष 1956 में शादी होने के बाद राजनीतिक जीवन से संन्यास लेने का निर्णय लिया और अपनी पत्नी विमला नौटियाल के सहयोग से बहुगुणा ने पर्वतीय नवजीवन मण्डल की स्थापना की पर्वतीय नवजीवन 
मण्डल के माध्यम से ही आपने टिहरी में नशा मुक्ति अभियान भी चलाया। दलितों को वे सभी अधिकार मिले जो देश के अन्य नागरिकों को मिलते हैं इस दिशा में वे ताज़िन्दगी सचेष्ट रहे। वे चाहते थे दलित शिक्षित हों जिससे उन्हें नागरिक अधिकार पाने की उत्कंठा जागे और इसके लिये उन्हे किसी मसीहा या अधिकारों की लड़ाई लड़ने वालों की जरुरत न हो।
वे दलितों में भी खासतौर पर दलित कन्याओं की शिक्षा
के हामी थे ताकि वे रूढ़िवादी समाज में अपनी हक की
लड़ाई लड़ सकें। एक पर्यावरणविद के साथ-साथ वे एक समाज सुधारक भी थे।

राजशाही के खिलाफ भी बहुगुणा ने आज़ादी के पहले लड़ाई लड़ी थी 

अपने शिक्षणकाल में ही सुन्दरलाल बहुगुणा टिहरी की
राजशाही के खिलाफ लामबंद हो गये थे। टिहरी राजशाही के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे श्रीदेव सुमन से वे छिप छिपकर मिलते थे। एक बार श्रीदेव सुमन ने उन्हें कोर्ट में दिया गया अपना एक बयान दिया। बहुगुणा ने यह बयान दिल्ली भेज दिया। मीडिया ने इस बयान को हाथों-हाथ लिया और वो अखबारों में छप गया। यह खबर लगते ही बहुगुणा को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। अस्वस्थ्य होने से जब वे रिहा किये गये तो वे लाहौर चले गये। वर्ष 1947 में जब वे टिहरी लौटे तो राजशाही के खिलाफ जनविद्रोह अपने चरम पर था। अपने भी प्रजामण्डल में शामिल होकर राजशाही के खिलाफ निर्णायक लड़ाई में भाग लिया और अंततः 
जनवरी 1948 में टिहरी को राजशाही से मुक्ति मिली और यह सूचना जब बहुगुणा ने महात्मा गाँधी को दी तो उन्होने बहुगुणा की पीठ थपथपाते हुए कहा था तुमने तो मेरी अहिंसा को हिमालय पर उतार दिया। वर्ष 1971 के नवम्बर माह में तत्कालीन उत्तरप्रदेश सरकार ने जब टिहरी में शराब की दुकान खोली तो वे अपनी पत्नी और मण्डल के साथियों के साथ विरोध में धरने पर बैठे और तब सबने समवेत स्वरों में गढ़वाली कवि घनश्याम सैलानी का नशामुक्ति गीत गाया था। पुलिस ने उन्हें, उनकी पत्नी विमला और बेटे प्रदीप के साथ सभी आन्दोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया। अंततः सरकार को यह दुकान बंद कर टिहरी-गढ़वाल में नशाबंदी घोषित करना पड़ी थी।

सम्मान और पुरस्कार से हटकर वे जनसमर्थन को सच्चा सम्मान मानते थे

वर्ष 1981 से लेकर 2001 तक दो दशक में उन्हे अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। वे सम्मान और पुरस्कार को बड़े सहज भाव से गृहण करते थे। सम्मान और पुरस्कार से हटकर वे जनसमर्थन को। सच्चा सम्मान मानते थे।पर्यावरण के क्षेत्र में बहुमूल्य काम करने के लिए  वर्ष 1981 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा था। किंतु उन्होंने यह पुरस्कार लेने से मना कर दिया। उनका कहना था कि जब तक पेड़ कटते रहेंगे, तब तक मैं इस पुरस्कार को स्वीकार नहीं कर सकता। वर्ष 1985 में उन्हें रचनात्मक कार्यों के जमनालाल बजाज पुरस्कार , वर्ष 1987 में  चिपको 
आन्दोलन के लिये राइट लाईवलीहुड पुरस्कार,वर्ष 1987 में ही शेर ए कश्मीर और सरस्वती पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 1989 में भारतीय प्रोद्यौगिकी संस्थान रुड़की ने आपको सामाजिक विज्ञान के लिये डॉक्टर की मानद उपाधि से सम्मानित किया। वर्ष 1998 में पहल सम्मान, वर्ष 1999 में गाँधी सेवा सम्मान, वर्ष 2000 में पार्लियामेंट्री फोरम का सत्यपाल मित्तल अवॉर्ड और वर्ष 2001 में आपको दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया।

उनके अवसान से विश्व ने एक सच्चा पर्यावरण हितैषी को दिया है

सिर्फ देश ही नहींअपितु समूची दुनिया में प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के सबसे बड़े प्रतीक में शामिल सुंदरलाल बहुगुणा ने वर्ष 1972 में चिपको आंदोलन के माध्यम से देश-दुनिया को वनों के संरक्षण के लिए प्रेरित किया। परिणामस्वरूप चिपको आंदोलन की गूँज समूची दुनिया में सुनाई पड़ी। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी बहुगुणा का नदियों, वनों व प्रकृति से बेहद गहरा जुड़ाव था। वह पारिस्थितिकी को सबसे बड़ी आर्थिकी मानते थे। यही वजह भी है कि वह उत्तराखंड में बिजली की जरूरत पूरी करने के लिए छोटी-छोटी परियोजनाओं के पक्षधर थे। इसीलिए वह टिहरी बांध जैसी बड़ी परियोजनाओं के पक्षधर नहीं थे। इसे लेकर उन्होंने वृहद आंदोलन  शुरू कर पर्यावरण संरक्षण की अलख जगाई थी। उनके अवसान से विश्व ने एक सच्चा पर्यावरण हितैषी को दिया है।

राजा दुबे 

Friday, May 21, 2021

जैव विविधता का संरक्षण हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है

 


हमारे जीवन में जैव-विविधता का काफी महत्व है। हमें विश्व में एक ऐसे पर्यावरण परिदृृृश्य का निर्माण करना है जो जैव-विविधता में समृद्ध, टिकाऊ और आर्थिक गतिविधियों के लिए हमें अवसर प्रदान कर सकें। जैव-विविधता के घटने से प्राकृतिक आपदा जैसे बाढ़, सूखा और तूफान आदि आने का खतरा और अधिक बढ़ जाता है अत: हमारे लिए जैव-विविधता का संरक्षण बहुत जरूरी है। इसी सन्दर्भ में समूचे विश्व के पर्यावरणविद् और निर्वाचित सरकारें यह स्वीकार करतीं हैं कि जैव  विविधता का संरक्षण हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। लाखों विशिष्ट जैविक प्रजातियों के रूप में पृथ्वी पर जीवन उपस्थित है और हमारा जीवन प्रकृति  का अनुपम उपहार है। अत: पेड़-पौधे, अनेक प्रकार के जीव-जंतु, मिट्टी, हवा, पानी, महासागर-पठार, समुद्र-नदियां आदि प्रकृति की इन सभी देन का हमें संरक्षण करना चाहिए, क्योंकि यही हमारे अस्तित्व एवं  विकास का आधार है। प्राकृतिक एवं पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में जैव-विविधता के महत्व को देखते हुए ही जैव-विविधता दिवस को अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। प्रतिवर्ष 22 मई को अंतरराष्ट्रीय जैव-विविधता दिवस मनाया जाता है। इसे - "विश्व जैव-विविधता संरक्षण दिवस " भी कहते हैं। इसका प्रारंभ संयुक्त राष्ट्र ने किया था। नैरोबी में 29 दिसंबर 1992 को हुए जैव-विविधता सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया था, किंतु कई देशों द्वारा व्यावहारिक कठिनाइयां जाहिर करने के कारण वर्ष 2003 में इस दिन को 29 दिसम्बर के स्थान पर 22 मई को  मनाने का निर्णय लिया गया। इस आयोजन का लक्ष्य विशेष तौर पर वनों की सुरक्षा, संस्कृति, जीवन के कला, शिल्प,  संगीत, वस्त्र-भोजन, औषधीय पौधों का महत्व आदि को प्रदर्शित करना और जैव-विविधताके महत्व एवं उसके नष्ट अथवा कम होने से आसन्न खतरों के बारे में जागरूक करना था।  


जैव विविधता संसाधन वो स्तम्भ हैं जिन पर सभ्यता का निर्माण होता है

जैविक विविधता (जिसे जैव विविधता के नाम से भी जानते हैं) को अक्सर पौधों, जानवरों और सूक्ष्मजीवों की विस्तृत विविधता के संदर्भ में समझा जाता है, लेकिन इसमें प्रत्येक प्रजाति के भीतर आनुवंशिक अंतर भी शामिल हैं। जैविक विविधता संसाधन वो स्तम्भ हैं, जिन पर हम सभ्यताओं का निर्माण करते हैं। मछली विश्व में लगभग तीन बिलियन लोगों को बीस प्रतिशत पशु प्रोटीन प्रदान करती है। ऐसे ही अस्सी प्रतिशत से अधिक मानव आहार पौधों द्वारा प्रदान किया जाता है। इसके अलावा विकासशील देशों के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अस्सी प्रतिशत लोग स्वास्थ्य की पारम्परिक देखभाल के लिए पारम्परिक औषधीय पौधों पर आधारित दवाओं पर निर्भर होते हैं। इसी से जैव विविधता के नुकसान से हमारे जीवन के स्वास्थ्य सहित विभिन्न पहलुओं पर खतरा बना रहता है प्रकृति और मानव जीवन के बीच एक स्थायी संबंध है. हम अपने भोजन और स्वास्थ्य के लिए स्वस्थ, विविध प्राकृतिक प्रणालियों पर निर्भर हैं. इसलिए, कई जैव विविधता मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। सच तो यह है कि प्रकृति ने हमें सब  कुछ दिया है, प्रकृति से लाभ तो लेते हैं  लेकिन ज्यादातर हम इसे ग्राण्टेड यानी यह तो प्रकृति को हमें देना ही था वाले भाव से लेते हैं। यदि हम मानव जीवन को बचाना चाहते हैं तो उसके लिए हमें प्रकृति को बचाना होगा। यह एक तात्कालिक आवश्यकता है। इसी से जैव विविधता दिवस का यह दिन प्रकृति को धन्यवाद देने के लिए भी मनाया जाता है।

विविध आयोजन के माध्यम से इस दिन का महत्व रेखांकित होता है 

इस दिन, पूरी दुनिया में, लोगों को जैव विविधता के महत्व को और हमारे  भविष्य के लिए यह क्या भूमिका निभाता है, को समझाने के लिए विभिन्न आयोजन किए जाते हैं। वस्तुत इस दिन विभिन्न आयोजन के माध्यम से इस दिन के महत्व को रेखांकित किया जाता है। जैविक विविधता पर कन्वेंशन का सचिवालय हर साल उन समारोहों का आयोजन करता है जो संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का हिस्सा बनते हैं. कई राष्ट्रीय सरकारें और गैर-सरकारी संगठन भी समारोहों में भाग लेते हैं। इस दिन कई प्रकार की गतिविधियाँ होती है। जैसेे इस दिन जैव विविधता और पर्यावरण पर विभिन्न पुस्तिकाओं और अन्य शैक्षिक संसाधनों का स्थानीय भाषाओं में अनुवाद किया जाता हैै। स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, समाचार पत्रों, रेडियो और टेलीविजन के माध्यम से जैव विविधता पर बहुत सारी जानकारी प्रसारित और प्रचारित की जाती है। पर्यावरण के मुद्दों पर भी फिल्में दिखाई जाती हैं और छात्रों, पेशेवरों और आम जनता के लिए भी प्रदर्शनियों और सेमिनारों का आयोजन किया जाता है। कई ऐसेे कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं जो लुप्तप्राय प्रजातियों या आवासों को संरक्षित करने के तरीके पर ध्यान केंद्रित करते हैं। कई स्थानों पर पेड़ और अन्य पौधे लगाना जो भूमि कटाव को रोकने में मदद करते हैं। स्थानीय पर्यावरण के मुद्दों पर भाषण होते हैं, बच्चों और युवाओं के लिए तस्वीरें लेने या वार्षिक थीम पर केंद्रित कलाकृति बनाने की प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं। कोरोना संक्रमण के कारण पिछले दो वर्ष से यह सभी आयोजन ऑनलाइन हो रहें हैं और इस वर्ष भी यह सभी आयोजन ऑनलाइन ही होंगे ।


जैव विविधता से इंसानी रिश्ता अटूट भी है, अभेद्य भी

पर्यावरण से जुड़े विषयों पर लिखने वाले विषयों के
लब्धप्रतिष्ठित लेखक पंकज रामेन्दु ने जैव विविधता और इंसानी रिश्ते को लेकर बड़ी प्रभावी टिप्पणी की है। वे
कहते हैं जैव विविधता को हम एक बिल्डिंग ब्लॉक की तरह समझ सकते हैं, जिसमें हर एक ब्लॉक दूसरे को संभाले हुए रहता है। अगर किसी भी एक ब्लॉक को हटाया जाए, तो पूरी इमारत धराशायी हो जाती है । जैव विविधता भी ठीक इसी तरह धरती और पानी के जीवन का आधार होती है ।यह धऱती के हर प्राणी, हवा, पानी, भोजन सब पर असर डालती है।  इसी की बदौलत दवा से लेकर प्राकृतिक तौर पर रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता, मौसम बदलाव पर नियंत्रण, सब कुछ होता है। जैव विविधता धऱती पर पूरे जीवन तंत्र को रचने वाले एक जाल की तरह है, जिससे एक तत्व भी निकाला गया, तो पूरे तंत्र पर इसका बुरा असर पड़ता है। जैव विविधता का इंसानी रिश्ता अटूट भी है अभेद्य भी। कोविड-19 के लिए जिम्‍मेदार भी हम इंसान ही हैं। जैव विविधता की अनदेखी वह वजह है जिससे  कोविड-19 जैसी महामारी फैली। जब हमने जैव विविधता को नष्ट करना शुरू किया तभी से हमने उस तंत्र को समाप्त करना शुरू कर दिया, जो स्वास्थ्य तंत्र के लिए मददगार होता है। अब भी समय है कि हम जैव विविधता से इंसानी रिश्ते के भाष्य को समझें। पंकज बताते हैं कि वरिष्ठ लेखक अभय मिश्र के साथ जब उन्होंने - "दर दर गंगे" किताब के लिए गंगा नदी की यात्रा की तब उन्हें पता चला कि  जैव विविधता का संरक्षण किसी भी नदी के जीवन को बचाने के लिये कितना जरूरी होता है? 

कोरोना महामारी के समय जैव विविधता की जरुरत प्रतिपादित हुई

महात्मा गांधी ने कहा था कि पृथ्वी हर मनुष्य की जरूरत को पूरा कर सकती है परंतु पृथ्वी मनुष्य के लालच को पूरा नहीं कर सकती है। आज हमें इस सीख को अपनाने को संदेश दे रहा है। कोरोना वायरस के संकट ने मनुष्य को उसके विकास के पुनर्मूल्यांकन के दोराहे पर खड़ा कर दिया है। आज हमें विकास के नए मापदंड अपनाने होंगे। कोरोना के बाद नई दुनिया का विकास पर्यावरण संरक्षण के साथ हो, जिससे वन्य प्राणियों के पर्यावास पर विशेष ध्यान दिया जा सके। खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत आने वाले पशु-पक्षियों में संक्रमण न फैले, इसके लिए उनके रखरखाव संबंधी नए कानून बनें एवं जो कानून मौजूद हैं उनका कड़ाई से पालन हो जिससे फ्लू और वायरसजन्य अन्य बीमारियों को रोका जा सके। हमें अपनी आहार शैली बदलने की सख्त जरूरत है। हमें यह तय करना होगा कि हम क्या खा सकते हैं और क्या नहीं? सच तो यह है कि कोरोना महामारी के दुष्काल में जव विविधता की न सिर्फ जरुरत प्रतिपादित हुई अपितु इसकी अपरिहार्यता भी सामने आई। नदी एवम् पर्यावरण विषयों पर साधिकार लिखने वाले डॉ. वैंकटेश दत्ता मानते हैं कि कोरोना संक्रमण काल प्रकृति को फिर से खुशहाल और समृद्ध करने का समय हैं। इस महामारी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और समाज को हिला दिया है। प्रकृति रीसेट बटन दबा रही है। वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं भारी गिरावट की स्थिति में हैं। सामूहिक विकास और समृद्धि को परिभाषित करने का यह  सही समय है, जो पारिस्थितिक सम्पन्नता के संदर्भ में मापी जा सके न कि बढ़ती आय के स्तर के रूप में। इस समय हमें जैैैव विविधता के महत्व और किसी भी बड़े संकट के समय इसकी उपस्थिति के मायने की जरुरत को समझना होगा तभी हम प्रकृति और और जीवन को बचा सकेंगे।

जैव-विविधता और उससे जुड़े विषयों पर इस दिन चर्चा होती है

जैव-विविधता "जैविक" और "विविधता" दो शब्दों से उत्पन्न हुआ है। यह सभी प्रकार के जीवन को संदर्भित करता है जो पृथ्वी पर पाए जाते हैं जैसे पौधों, जानवरों, कवक और सूक्ष्म जीवों. इसके अलावा, यह उन समुदायों को भी संदर्भित करता है जो वे बनाते हैं और जिन आवासों में वे रहते हैंं। हम कह सकते हैं कि जैव विविधता एक दूसरे के साथ और बाकी पर्यावरणों के साथ जीवन रूपों और उनके परस्पर संबंधों का संयोजन है जिसने पृथ्वी को मनुष्यों के लिए एक अद्वितीय निवास स्थान बना दिया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जैव विविधता हमारे जीवन को बनाए रखने वाली बड़ी संख्या में सामान और सेवाएं प्रदान करती है। विश्व जैव विविधता दिवस पर हम जैव विविधता से जुड़े इन्हीं विषयों पर चर्चा करते हैं ।तकनीकी प्रगति के बावजूद दुनिया में पूरा समुदाय हमारे स्वास्थ्य, पानी, भोजन, दवा, कपड़े, ईंधन इत्यादि के लिए पूरी तरह से स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भर है और इसी संदर्भ में वर्ष 2020 में जैव विविधता दिवस पर -"प्रकृति ही हमारी
समस्याओं का समाधान है" विषय पर चर्चा की गई थी। इनके अलावा पिछले कुछ वर्षों में इस दिन जिन विषयों पर चर्चा हुई उनमें पुनश्च हम बेहतर बनें , हमारी जैव-विविधता- हमारा भोजन- हमारा स्वास्थ्य , जैव विविधता के लियेे समर्पित वन, जैव विविधता और गरीबी उन्मूलन-सतत विकास के लिये चुनौतियां, जैव-विविधता सभी के लिये खाद्य,जल और स्वास्थ्य, जैव विविधता हमारी बदलती दुनिया के लिये जीवन बीमा, शुष्क भूमि में जैव विविधता की रक्षा और जैव विविधता और कृषि तथा जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों पर भी गत सालों में इस दिन चर्चा हुई। इस साल भी आईये ऐसे ही किसी प्रासंगिक विषय पर चर्चा करें।

राजा दुबे 

Thursday, May 6, 2021

व्यंग्य: मानस में मिली छूट सेे मुदित सरकार



तुलसीदास के रामचरित मानस में ऐसी बीसियों लाईनें हैं जो जनजीवन के बारे में कई सीख देती हैं, कई खुलासेें करती है। मानस में ही एक प्रसंग में तुलसीदास ने लिखा है- "धीरज, धर्म, मित्र और नारी, आपातकाल परखियो चारि"। इस लाइन में बड़े साफतौर पर कहा गया है कि आपातकाल में जिन चार लोगों की परीक्षा होती है वो धीरज, धर्म, मित्र और नारी ही है। जब से मानस में हुये इस खुलासे की जानकारी खास कारिन्दे ने सरकार को दी है सरकार मुदित है। सरकार वैसे कभी भी, किसी भी बात पर मुदित हो सकती है। मगर पिछले दिनों देश में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के कारण बनी आपात् स्थिति को लेकर सरकार को जिम्मेदार ठहराने की बात हो रही थी तभी से सरकार चिंतित थी और इन लाइनों के हाथ लगने के बाद सरकार निश्चिंत है।


मानस के हवाले से जिम्मेदारी से मिली इस छूट को लेकर जैसे ही कारिन्दे ने जानकारी दी सरकार कारिन्दे का मुंह मोतियों से भर देना चाहती थी मगर कारिन्दे के मुंहचढ़े मास्क ने सरकार का हाथ थाम लिया। सरकार तो इस छूट पर जश्न भी मनाना चाहती थी मगर ऐन मौके पर कोरोना से बचाव के अनुशासन से जश्न अटक गया।मुदित सरकार इस छूट के लिये तुलसीदास के लिये कुछ करना चाहतीं हैं मगर  सरकार को बड़े अफसोस के साथ बताया गया कि तुलसीदास तो लगभग चार सौ  साल पहले ही निर्वाण को प्राप्त हो गये हैं। इधर सरकार के एक खासुलखास अधिकारी ने तो तुलसीदास को मरणोपरांत सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न देने की फाईल भी चलवा दी। वो अधिकारी सरकार को और मुदित करना चाहता था। हर अधिकारी के ऊपर  एक अधिकारी और होता है और इसने भारतरत्न वाली बात पर फटकार लगाते हुए कहा कि सरकार के भी कुछ नियम  होते हैं और वो फाईल रोक दी गई।

मुदित सरकार इससे आगे भी और मुदित होना चाहती है
और इसी सिलसिले मैं उसने मानस अध्ययन और शोध केन्द्र (सियासी प्रखण्ड) भी बना दिया है। इसमें उस कारिन्दे के समान ही बीसियों जुगाड़ू विद्वान भी लगा दिये हैं। वे सभी मानस की एक-एक चौपाई खँगालकर ऐसे अंश और प्रसंग छाँट रहे हैं जो सरकार को मुदित कर सकें। उम्मीद है ऐसा जल्दी ही होगा और मुदित सरकार सच्ची सरकार के नाम से जानी जायेगी

राजा दुबे