Saturday, April 21, 2018

कौन-सा समाज

वो कौन है जिन्हें फर्क पड़ रहा है। मेरी कॉलोनी में, जहां एक घर एक करोड़ का है। रहनेवाले एमएनसी में काम करते हैं, जिनके बच्चे इंटरनेशनल स्कूलों में पढ़ने जाते हैं। सम्मानितों की इस बस्ती में भरी दोपहरी में मेरे घर के सामने आदमी पेंट खोलकर खड़ा हो गया। उसकी विक्षिप्तता उस दिन वो मुझे दिखाना चाह रहा था। मैं चिल्लाई, किया हंगामा तो भागा वो सरपट पेंट पकड़कर। लेकिन, क्या किसी बच्ची को ये समझ आ भी पाएगा? वो उसकी मंशा समझ भी पाएगी? किसी को देखकर भी क्या ठीक से कुछ बता पाएगी? छोड़ो उस बच्ची को जो अगर मैं घर नहीं किसी सड़क किनारे अकेली खड़ी होती तो ऐसे ही उसे डरा पाती क्या? इतनी हिम्मत दिखा पाती क्या?सोच रही हूं तब से क्या नहीं सुनी होगी उसने खबरें? नहीं पढ़ा होगा अखबार? नहीं होगी कोई बच्ची उसके घर में?? आखिर क्यों उसे फर्क नहीं पड़ता है???

दीप्ति

Friday, April 20, 2018

मां-बाप होना




माता-पिता होना आसान नहीं। बच्चे के साथ पैदा होनेवाली हर परिस्थिति नई होती है, लगभग अप्रत्याशित होती है और हम उसके लिए तैयार नहीं होते हैं। काम, रिश्तों और अपनी पसंद-नापसंद के बीच झूलते हुए, कभी-कभी पिसते हुए भी अपने मन और तन से बने उस बच्चे की खुशियों और जिद में खुद को आसानी से देख लेते हैं हम। कई बार अचानक से महसूस होता है कि अरे मैं तो बिल्कुल ऐसी ही हूं या फिर मैं भी तो ऐसा ही कुछ करना चाह रही थी। बच्चे की इच्छाओं और जरुरतों को समझ पाना भले ही मुश्किल ना हो लेकिन, पूरा कर पाना मुश्किल काम होता है। शायद इसलिए क्योंकि हमारी ईच्छाएं भी लगभग वैसी ही तो होती हैं। बस अंतर इतना है कि वक्त के साथ हम उन्हें मारना सीख जाते हैं। ऐसे में कई बार मन होता है कि अपने मम्मी-पापा के पास जाउं और कहूं कि आपने मेरे लिए जो किया वो सही और गलत के पैमाने से बहुत ऊपर की चीज़ है। धीरे-धीरे ही सही मैं समझ पा रही हूं वो सब कुछ आपने कभी अनुभव किया होगा। कुछ बातों के अफसोस ताउम्र बने रहते हैं लेकिन, उसके लिए जिम्मेदार शायद कोई नहीं होता।

दीप्ति 

Friday, April 13, 2018

कभी कभी मैं खुद को समझ नहीं पाती हूं


कभी कभी मैं खुद को समझ नहीं पाती हूं। जानती हूं किसी की नीयत का भरोसा नहीं, ना ही मुझे कराटे आता है। फिर भी रोज़ाना निकल जाती हूं काम पर। सड़कों पर अकेले चलती हूं, रात 11 बजे की मैट्रो पकड़ती हूं कभी, तो कभी कैब शेयरिंग में निकल जाती हूं अकेले ही। ऑफिस, घर, बाज़ार, रास्ते भर सुनकर अनसुना करती हूं  कई बातों को। घर में भी तो कितने ही ऐसे मर्द हैं जो कहने तो रिश्तेदार है लेकिन जानती हूं उनकी नज़रों के इशारों को फिर भी सबके साथ मिल जुलकर रह लेती हूं। ये जीवन जीना है, कुछ करना है, बेहतर बनना है, ना जाने किस मुगालतें में जीती हूं। कभी कभी मैं खुद को भी समझ नहीं पाती हूं।

दीप्ति

Monday, August 21, 2017

डूबती ज़िंदगी

कुछ कपड़े हैं...

कुछ अनाज बचाया है...

इस गठरी में भी कुछ छुपाया है..

देखा तो नज़र आए

थोड़े चावल...थोड़ा सत्तू...चूड़ा है थोड़ा

  नमक और चीनी भी है... लेकिन धीरे-धीरे घुल रही है


  एक कांधे पर बिटिया बैठी है...

  दूसरे पर सामान लदा है

  हाथ में गाय की रस्सी पकड़ी है

  पत्नी की गोद में बेटा है

  पानी सीने से ऊपर आ गया है

  जो खेत थे वो दरिया हो गए

  जो घर था वो उफनाई नदी साथ ले गई

  वो नींबू का झाड़...

  वो अमरूद का पेड़

  वो लौकी की लत्तर

  वो साग वो पत्तर

फिर ले गई अपने साथ

बार-बार नज़रें पीछे घूम जाती हैं

पानी में डूबे पैर ठिठकने लगते हैं..

ज़हन में उमड़े सैलाब में

मन बार-बार लौटने को बोल रहा है

लेकिन जाना तो है...

बच्चों के लिए, परिवार के लिए.. ख़ुद के लिए...

और उन सपनों के लिए
जो इस सैलाब को पार करते समय दिल में उमड़-घुमड़ रहे हैं

कि महीने दो महीने में फिर लौटूंगा..

जोड़ूंगा उस नीड़ को

फिर खेतों से अनाज उगाउंगा...

इस बार घर थोड़ा ऊंचा रहेगा..

क्योंकि बाढ़ तो नियति है...

जिसमें ज़िंदगी डूबती है.. उतरती है

-भुवन वेणु