Saturday, August 8, 2020

गाँधीजी के नेतृत्व में आज़ादी के लिये निर्णायक साबित हुआ -भारत छोड़ो आन्दोलन

 


भारत की आज़ादी के लिये सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से भारत छोड़ो आन्दोलन तक जो संघर्ष हुआ उसका लम्बा इतिहास है और इस संघर्ष गाथा में कई मुकाम ऐसे आये जब लगा कि बस अब देश सल्तनत -ए-बरतानिया के औपनिवेशिक साम्राज्य से आज़ाद होने को ही है. इस लम्बे और शहादत की गौरव गाथाओं से भरे स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के नेतृत्व में लड़ा गया -"भारत छोड़ो
आन्दोलन " आज़ादी के लिये सबसे निर्णायक और अंतिम (अल्टीमेट) लड़ाई थी . द्वितीय विश्वयुद्ध के समय 08 अगस्त 1942 को आरम्भ किया गया था -भारत छोड़ो आन्दोलन .इस आन्दोलन का लक्ष्य था भारत से ब्रिटिश साम्राज्य को समाप्त करना . यह आंदोलन महात्मा गाँधी द्वारा अखिलभारतीय कांग्रेस समिति के मुम्बई अधिवेशन में शुरू किया गया था.भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान विश्वविख्यात काकोरी काण्ड के ठीक सत्रह साल बाद 09 अगस्त 1942 को गाँधीजी के आह्वान पर समूचे देश में एक साथ यह भारत छोड़ो आंदोलन आरम्भ हुआ था. भारत को तुरन्त आजाद करने के लिये अंग्रेजी शासन के विरुद्ध यह एक बड़ा सविनय अवज्ञा आन्दोलन था.

भारत छोड़ो आन्दोलन की पृष्ठभूमि जिससे यह आन्दोलन अपरिहार्य हो गया

क्रिप्स प्रस्तावों को भारतीयों द्वारा नकारे जाने और क्रिप्स मिशन के वापस लौटने के बाद कांग्रेस कार्य समिति ने एक प्रस्ताव पारित कर अंग्रेज़ों को भारत छोड़ने के लिये कह दिया था .द्वितीय विश्व युद्ध की आड़ लेकर सरकार ने अपने आपको सख्त-से-सख्त कानूनों से सुरक्षित कर लिया था और शांतिपूर्ण गतिविधियों को भी प्रतिबंधित कर दिया था.स्थितियाँ अत्यंत विकट हो चुकी थीं और भारत के राष्ट्रीय नेतृत्व को भी यह पता था कि उस समय विद्रोह का नतीजा जनता के कठोर दमन के रूप में आएगा, परंतु फिर भी यह संघर्ष छेड़ा गया.इस संघर्ष के अपरिहार्य हो जाने के कारण थे - संवैधानिक गतिरोधों को हल करने में क्रिप्स मिशन असफल हो गया था और यह स्पष्ट हो गया था कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों के साथ किसी सम्मानजनक समझौते के लिये तैयार नहीं है  . युद्ध के कारण रोज़मर्रा की आवश्यक वस्तुओं के अभाव के चलते मूल्यों में बेतहाशा वृद्धि के कारण सरकार के प्रति जनता में तीव्र आक्रोश था. जापानी आक्रमण के भय से ब्रिटिश सरकार ने उड़ीसा, बंगाल व असम में दमनकारी भू-नीति का इस्तेमाल किया.दक्षिण-पूर्वी एशिया में ब्रिटेन की हार के कारण असंतोष व्यक्त करने की भारतीयों की इच्छाशक्ति जागृत हो गई .ब्रिटिश सत्ता में उनकी आस्था समाप्त हो गई और सत्ता के स्थायित्व के प्रति उनके मन में संदेह पैदा हो गया फलस्वरूप जनता डाकघरों और बैंकों से अपने रुपए निकालने लगी.बर्मा और मलाया को खाली करवाने के तरीकों से भी जनता में काफी क्षोभ व्याप्त था.भारतीयों को लगने लगा था कि अगर जापान ने आक्रमण किया तो अंग्रेज़ यहाँ भी इसी प्रकार विश्वासघात करेंगे.लोगों में निराशा फैल रही थी और यह आशंका पैदा हो गई थी कि यदि जापानी आक्रमण हुआ तो जनता हताशा के चलते प्रतिरोध ही न करे, अतः यह समय राष्ट्रीय नेताओं को एक बड़ा संघर्ष शुरू करने के लिये उचित लगा.भारत छोड़ो आंदोलन भारत के लिये एक युगांतरकारी आंदोलन था, क्योंकि इसने भारत की भावी राजनीति की आधारशिला रखी.“करो या मरो” नारे के साथ ग्वालिया टैंक मैदान से गाँधीजी ने अपने ऐतिहासिक भाषण में कहा कि- “जब भी सत्ता मिलेगी, भारत के लोगों को मिलेगी और तब जनता ही तय करेगी कि इसे किसके हाथों में सौंपा जाना है।” सही मायनों में भारत छोड़ो आंदोलन में ही आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व “हम भारत के लोगों” को प्राप्त हुआ ." भारत छोडो " का नारा युसुफ मेहर अली ने दिया था  युसूफ मेहरली भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के अग्रणी नेताओं में से एक थे.

 ब्रिटिश शासन के खिलाफ गाँधीजी का यह तीसरा सबसे बड़ा आन्दोलन था

क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ अपना तीसरा बड़ा आंदोलन छेड़ने का फ़ैसला लिया था.अखिलभारतीय काँग्रेस कमेटी के बम्बई अधिवेशन में इसे 08 अगस्त 1942 की शाम को बम्बई में -"अंग्रेजों भारत छोड़ो " का नाम दिया गया था. इस आन्दोलन की घोषणा के बाद ही गाँधीजी को फ़ौरन गिरफ़्तार कर लिया गया था.लेकिन देश भर के युवा कार्यकर्ता हड़तालों और तोड़फ़ोड़ की कार्रवाइयों के जरिए आंदोलन चलाते रहे.काँग्रेस में जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी सदस्य भूमिगत प्रतिरोधी गतिविधियों में सबसे ज्यादा सक्रिय थे .पश्चिम में सतारा और पूर्व में मेदिनीपुर जैसे कई जिलों में स्वतंत्र सरकार की स्थापना भी  कर दी गई थी.अंग्रेजों ने आंदोलन के प्रति काफ़ी सख्त रवैया अपनाया फ़िर भी इस विद्रोह को दबाने में सरकार को साल भर से ज्यादा समय लगा.यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का आखिरी  बड़ा आंदोलन था, जिसमें सभी भारतवासियों ने एक साथ बड़े स्तर पर भाग लिया था.कई जगह समानांतर सरकारें भी बनाई गईं, स्वतंत्रता सेनानी भूमिगत होकर भी लड़े.यह आंदोलन ऐसे समय में प्रारंभ किया गया जब द्वितीय विश्वयुद्ध
जारी था और औपनिवेशिक देशों के नागरिक स्वतंत्रता के प्रति जागरूक हो रहे थे और कई देशों में साम्राज्‍यवाद एवं उपनिवेशवाद के खिलाफ आंदोलन तेज़ होते जा रहे थे. ऐसे समय में भारत में ऐसे एक आन्दोलन ने देश की आज़ादी का मार्ग प्रशस्त किया.

इस आन्दोलन को " अगस्त क्राँति " के नाम से भी जाना जाता है

भारत छोड़ो आंदोलन को -"अगस्त क्रांति " के नाम से भी जाना जाता है.विश्व युद्ध में इंग्लैण्ड को बुरी तरह उलझता देख जैसे ही नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज को "दिल्ली चलो" का नारा दिया, 
गाँधीजी ने मौके की नजाकत को भाँपते हुए 08  अगस्त 1942  की रात में ही बम्बई से अँग्रेजों को "भारत छोड़ो" व भारतीयों को "करो या मरो" का आदेश जारी किया और सरकारी सुरक्षा में यरवदा पुणे स्थित आगा खान पैलेस में चले गये. इसी दिन अर्थात  09 अगस्त 1942 को लालबहादुर शास्त्री सरीखे एक छोटे से व्यक्ति ने इसे प्रचण्ड रूप दे दिया और 19 अगस्त, 1942  को शास्त्रीजी गिरफ्तार हो गये. इस आऩ्दोलन के सत्रह साल पहले 09 अगस्त 1925 को ब्रिटिश सरकार का तख्ता पलटने के उद्देश्य से रामप्रसाद'बिस्मिल' के नेतृत्व में हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ के दस जुझारू कार्यकर्ताओं ने काकोरी काण्ड किया था जिसकी यादगार ताजा रखने के लिये पूरे देश में प्रतिवर्ष 09 अगस्त को "काकोरी काण्ड स्मृति-दिवस" मनाने की परम्परा भगत सिंह ने प्रारम्भ कर दी थी और इस दिन बहुत बड़ी संख्या में नौजवान एकत्र होते थे गाँधीजी ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत 09 अगस्त 1942 का दिन चुना था.

आन्दोलन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने प्राणोत्सर्ग भी किया था

भारत छोड़ो आंदोलन , विश्व इतिहास में सबसे सशक्त जन आंदोलन के रुप में जाना जाता है जिसमें लाखों आम हिंदुस्तानी शामिल थे .इस आंदोलन ने युवाओं को बड़ी संख्या में अपनी ओर आकर्षित किया .यवा  अपने कॉलेज छोड़कर जेल का रास्ता अपनाने लगे. इस आन्दोलन से तत्कालीन ब्रिटिश सरकार घबरा गई और 09 अगस्त 1942 को दिन निकलने से पहले ही काँग्रेस वर्किंग कमेटी के सभी सदस्य गिरफ्तार हो चुके थे और काँग्रेस को गैरकानूनी संस्था घोषित कर दिया गया था.गाँधीजी के साथ भारत कोकिला सरोजिनी नायडू को यरवदा पुणे के आगा खान पैलेस में, डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद को पटना जेल व अन्य सभी सदस्यों को अहमदनगर के किले में नजरबन्द किया गया था .सरकारी आँकड़ों के अनुसार इस जनान्दोलन में 940 लोग मारे गये थे, 1630  घायल हुए थे और  18,000 डी.आई.आर. में नजरबन्द हुए तथा 60,229 लोग 
गिरफ्तार हुए थे. इस आन्दोलन को कुचलने के ये आँकड़े दिल्ली की सेण्ट्रल असेम्बली में ऑनरेबुल होम मेम्बर ने पेश किये थे.

आन्दोलन के लिये दिया था गाँधीजी ने  एक मंत्र

भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित होने के बाद बम्बई के  गवालिया टैंक मैदान में गाँधीजी जी ने कहा कि -“ एक छोटा सा मंत्र है जो मैं आपको देता हूँ.इसे आप अपने ह्रदय में अंकित कर लें और अपनी हर सांस में उसे अभिव्यक्त करें। यह मंत्र है-“करो या मरो”। अपने इस प्रयास में हम या तो स्वतंत्रता प्राप्त करेंगे या फिर जान दे देंगे .”इस तरह भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ‘भारत  छोड़ो’ एवं ‘करो या मरो’ भारतीयों का नारा बन गया . यह आंदोलन स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये किये गये प्रयासों के अंतिम चरण को इंगित करता है। इसने गाँव से लेकर शहर तक ब्रिटिश सरकार को चुनौती दी .इससे भारतीय जनता के अंदर आत्मविश्वास बढ़ा और समानांतर सरकारों के गठन से जनता काफी उत्साहित हुई . इसमें महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और जनता ने नेतृत्व अपने हाथ में लिया जो राष्ट्रीय आंदोलन के परिपक्व चरण को सूचित करता है . इस आंदोलन के दौरान पहली बार राजाओं को जनता की संप्रभुता स्वीकार करने को कहा गया . 


राजा दुबे 

Thursday, August 6, 2020

एक युग का अवसान है इब्राहिम अल्काजी का जाना- राजा दुबे

भारतीय रंगमंच के शिखर पुरुष इब्राहिम अल्काजी का मंगलवार की शाम नई दिल्ली के एक निजी अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया .वह 95 वर्ष के थे और उनके परिवार में एक बेटा फैजल अल्काजी और बेटी अमाल अल्लाना है जो खुद मशहूर रंगकर्मी है. इब्राहिम अल्काजी का अवसान वस्तुत: एक युग का अवसान है. उनकी पहचान एक रंगकर्मी से बढ़कर एक संस्कृतिकर्मी और कला के पारखी सँग्राहक भी थे.



राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक एवं पद्मभूषण से सम्मानित इब्राहिम अल्काजी देश के गिने चुने रंगकर्मी में से थे जिन्होंने आजादी के बाद भारतीय रंगमंच को एक नयी दिशा दी. पुणे महाराष्ट्र में 18 अक्टूबर को जन्मे  अल्काजी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे और उनकी ख्याति केवल रंगकर्मी के रुप में ही नहीं बल्कि एक प्रख्यात फोटोग्राफर, चित्रकार और और कला वस्तुओं के अद्भुत संग्रहकर्ता के रुप में भी थी. धर्मवीर भारती के ,"अंधा युग ", मोहन राकेश के "आषाढ़ का एक दिन" और गिरीश कर्नाड के "तुगलक" जैसे नाटकों के यादगार निर्देशन के लिए नाटक जगत में मशहूर अल्काजी ने लंदन के रॉयल एकेडमी ऑफ लंदन से शिक्षा प्राप्त की थी.इससे पूर्व उन्होंने पुणे के सेंट विंसेंट हाई स्कूल तथा मुंबई के सेंट जेवियर कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की थी.वह अरबी अंग्रेजी मराठी और गुजराती भाषाओं के जानकार थे।

रंगकर्म के क्षेत्र में उनसे अधिक तो क्या उन जैसा जानकार भी  बिरला ही कोई था वे विश्व की सभी रंग परंपराओं से अवगत थे और उनके उदाहरण भी वही से आते थे . वे बराबर इस बात पर जोर देते थे कि आधुनिक समय में कला वह स्थान है जहाँ देश की सीमायें धुँधली हो जाती है और कला की कोई भी प्रगति किसी देश की प्रगति न होकर समूची मानवता की प्रगति होती है और इसीसे आधुनिक समय की माँग है कि एक अंतरराष्ट्रीय शैली विकसित हो जो एक ही समय में उतनी ही देशी हो जितना अंतराष्ट्रीय. यह बात अल्काजी ने वर्ष 1981 में कही थी जो इस बात को साबित करता है कि कला की सार्वभौमिकता का उनका विचार चार दशक पहले भी कितना प्रासंगिक था.

अल्काजी ने ओम शिवपुरी, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, विजय मेहता, मनोहर सिंह, उत्तरा बावरकर, रोहिणी हट्टंगड़ी जैसे कलाकारों को प्रशिक्षित किया था.आपको वर्ष 1962 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था और बाद में उन्हें अकादमी का सर्वोच्च सम्मान भी प्रदान किया गया था।

इब्राहिम अल्काजी   की मानसिक चेतना का गठन और  विस्तार सार्वभौमिक था जिसमें संकीर्णता की जगह नहीं थी. ऐसा उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से, प्रशिक्षण से एवं संगत से पता चलता है. वे अरबी मां बाप के संतान थे जिसके घर में सिर्फ़ अरबी ही बोलने का नियम था लेकिन जिनकी मां उर्दू, हिंदी, मराठी, गुजराती, पिता अरबी और टूटी फूटी हिंदुस्तानी जानते थे. बचपन और किशोरावस्था बंबई के विविधतापूर्ण सामाजिक सरंचना में गुजरा था और वे खुद स्वीकार करते थे कि उनके बनने में विभिन्न अस्मिताओं का योगदान रहा है.

उनके अवसान पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह कथन कि अल्काजी ने कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया था , उनके निधन से मुझे गहरा दुख हुआ है और मैं दुख की घड़ी में उनके परिजन के साथ हूँ ,ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे. यह व्यक्तव्य  बताता है कि वे देश के गणमान्य ही नहीं सर्वमान्य कलाकार थे.


 राजा दुबे

त्रासदी का पुनर्स्मरण और एक संकल्प कि उसकी कभी पुनरावृत्ति न हो - राजा दुबे


द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान के हिरोशिमा तथा नागासाकी शहरों पर 6 और  9 अगस्त 1945 को हुए अमेरिका द्वारा किये गये परमाणु हमले से पूरी दुनिया दहल गई थी. इस एक भीषण सामरिक त्रासदी की प्रतिवर्ष विश्व के लगभग सभी देशों में वर्षगांठ मनाई जाती है और इस मौके पर जापान सहित  समूचा विश्व संवेदना व्यक्त करता है और विश्व समुदाय की आँखें नम हो जाती है .जापान के पीस मैमोरियल पार्क, हिरोशिमा में प्रतिवर्ष  6 अगस्त को हजारों लोग एकत्रित होते हैं और हिरोशिमा और नागासाकी हमले में मारे गए अपने प्रियजन को बड़े ही भारी मन से मार्मिक श्रद्धांजलि देते हैं. विश्व भर में इस हमले को बीसवीं सदी की सबसे बड़ी घटना बताते हुए दुख जताया जाता है.और इस त्रासदी का पुनर्स्मरण इस एक संकल्प के साथ के साथ किया जाता है कि ऐसी त्रासदी की कभी पुनरावृत्ति न हो. क्या वाकई उपनिवेशवादी ताकतें इस संकल्प को पूरा होने देंगी? जापान में 6 अगस्त को  हिरोशिमा दिवस को शांति दिवस के तौर पर मनाया जाता है. इस उम्मीद में यह आयोजन होता है कि दुनिया में अब कभी इन हथियारों का इस्तेमाल नहीं होगा. बीसवी सदी की इस सबसे  दर्दनाक घटना का अपराधी देश अमेरिका था, और उसके तत्कालीन राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने यह कहकर इस विनाशलीला का बचाव किया था कि मानव इतिहास के सबसे खूनी द्वितीय विश्व युद्ध को खत्म कराने के लिए ऐसा करना जरूरी था, जो उस कालखण्ड का सबसे शर्मनाक कथन था.

युद्ध की विभीषिका का चरम था हिरोशिमा पर परमाणु बम से हमला

प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में ंंभीषण संघर्ष मे लाखों लोग हताहत हुए और इन दो विश्वयुद्धों के बाद भी विभिन्न देशों के बीच जो द्विपक्षीय युद्ध हुए उसमें भी हज़ारों लोग मारे गये मगर द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका द्वारा जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम से किया गया हमला युद्ध की विभीषिका का चरम था.दो दिनों के अंतराल पर हुए इन हमलों से बसे बसाए दो शहर पूरी तरह नष्ट हो गए. हिरोशिमा पर हुए हमले में करीब डेढ़ लाख लोगों की मौत हुई थी जबकि नागासाकी पर हुए हमले में करीब अस्सी हज़ार लोग मारे गए थे. अमेरीका के इन दो हमलों ने द्वितीय विश्वयुद्ध की सूरत बदल कर रख दी थी.हमले के बाद जापान ने तुरंत युद्धविराम की घोषणा कर दी थी  अमेरीका द्वारा किए गए यह दोनों हमले ऐसी जगह किए गए थे जहाँ न तो कोई बड़ा सैन्य अड्डा था न वहाँ  कोई बड़ी सैन्य गतिविधि चल रही थी.यह इलाके पूरी तरह से रिहायशी थे.आँकड़ों के मुताबिक हिरोशिमा पर हुए परमाणु हमले में करीब साठ प्रतिशत लोगों की मौत तुरंत हो गई थी, जबकि करीब तीस प्रतिशत लोगों की मौत अगले एक माह के अंदर भयंकर जख्मों के बाद हुई। इसके अलावा करीब दस फीसदी लोग यहां पर मलबे में दबने और अन्य कारणों से मारे गए थे.इस हमले का सबसे दुखद पहलू यह था कि हमले के सोलह घंटे के बाद राष्ट्रपति ट्रूमैन ने जब घोषणा की, तब पहली बार जापान को पता लगा कि हिरोशिमा में हुआ क्या है? राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन के शब्द थे,  सोलह घंटे पहले एक अमेरिकी विमान ने हिरोशिमा पर एक परमाणु बम गिराया है.

हिरोशिमा की विभीषिका के बाद ही संयुक्त राष्ट्र अस्तित्व में आया था 

द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषका खास तौर पर जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर अमेरीका द्वारा हुए परमाणु हमले के बाद विश्व के कई राष्ट्रों द्वारा विश्वशान्ति स्थापित करने के आग्रह के परिप्रेक्ष्य में अमेरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति  फ्रैन्कलिन रूजवेल्ट ने अप्रैल 1945 को अमेरिका के सैन फ्रैंसिस्को में विश्व के नेताओं की एक बैठक बुलाई थी ,उनकी विश्वशान्ति की इस पहल से ही 24 अक्टूबर, 1945 को विश्व में शान्ति स्थापना की पहल करने वाली सबसे बड़ी और सर्वमान्य संस्था ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ (यू.एन.ओ.) जो अब केवल संयुक्त राष्ट्र के नाम से जानी जाती है उसकी स्थापना हुई थी.प्रारम्भ में केवल  इक्यावन  देशों ने ही संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर हस्ताक्षर किये थे.आज 193 देश इसके पूर्ण सदस्य हैं व दो देश संयुक्त राष्ट्र संघ (यू.एन.ओ.) के अवलोकन देश (ऑबजर्बर) हैं.संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के साथ ही हिरोशिमा पर परमाणु बम से हमले पर इण्टरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस , हेग के पूर्व उपाध्यक्ष न्यायमूर्ति सी.जी. वीरामंत्री, श्रीलंका जो दुनिया में प्रख्यात न्यायाविदों में गिने जाते हैं, उन्होंने भी विश्वशान्ति के लिये परमाणु निरस्त्रीकरण अभियान की अगुवाई की. उनका तर्क है कि परमाणु हथियार अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून व तमाम धर्मों के सिद्धांतों के खिलाफ है और बौद्ध, ईसाई, हिंदू या इस्लामी धर्मग्रंथों में भी जन-संहारक हथियारों का विरोध किया गया है.

भारत सहित नौ देशों के पास है परमाणु आयुध, जो चिन्ता का विषय है 

हिरोशिमा नागासाकी पर परमाणु बम से हमले के बाद भी विश्व में परमाणु हथियारों की जमा करने की स्थिति चिन्ताजनक है.स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार वर्तमान में विश्व के नौ देशों ने ऐसे परमाणु हथियार विकसित कर लिए हैं जिनसे मिनटों में यह दुनिया खत्म हो जाए.यह नौ देश हैं- अमेरिका  (7,300),  रूस  (8,000), ब्रिटेन (225), फ्रांस (300), चीन (250), भारत (110), पाकिस्तान (120), इजरायल (80) और  उत्तरी कोरिया (60) . इन 9 देशों के पास कुल मिलाकर 16,445 परमाणु हथियार हैं.बेशक स्टार्ट समझौते के तहत रूस और अमेरीका ने अपने भंडार घटाए हैं, मगर तैयार परमाणु हथियारों का 93 फीस सदी हिस्सा आज भी इन दो देशों के पास है यह भी चिन्ता का विषय है.

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भारत के प्रधानमंत्री ने हिरोशिमा
दिवस पर हिंसामुक्त विश्व का आव्हान किया

हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराये जाने को मानवता के खिलाफ एक जघन्य अपराध निरुपित करते हुए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह त्रासद घटना युद्ध की भयावहता की याद दिलाती है. उन्होंने हिंसा मुक्त विश्व के निर्माण पर जोर दिया और जापान के प्रधानमंत्री शिंझो आबे ने भी इस भावना को साझा किया.मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि मानवता की समस्याओं के समाधान शांति और प्रगति में निहित हैं.उन्होंने कहा, ‘‘हिरोशिमा में मारे जाने वाले सभी लोगों को मेरी श्रद्धांजलि। बम गिराये जाने की घटना हमें युद्ध की भयावहता और मानवता पर उसके असर की याद दिलाती है.उन्होंने कहा, ‘‘मानवता की समस्याओं के समाधान शांति और प्रगति में निहित हैं. आइए, एक शांतिपूर्ण और हिंसा से मुक्त दुनिया के निर्माण के लिए कंधे से कंधा मिलाकर चलें.’’जापानी प्रधानमंत्री आबे ने ट्वीट किया, ‘‘प्रधानमंत्री मोदी, आपके सुविचारित संदेश के लिए मेरी ओर से हार्दिक धन्यवाद. मैं हिरोशिमा के लिए भारत की जनता की एकजुटता की गहराई से सराहना करता हूं. आइए, दुनिया में शांति के लिए मिलकर काम करते रहें.’’ 

 विश्वशान्ति के लिये गाँधी दर्शन आज भी प्रासंगिक है

भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का भी मानना था कि जब तक विश्व में हिरोशिमा जैसे परमाणु हमले का खतरा रहेगा विश्वशांति का सपना कभी पूरा नहीं हो पायेगा.महात्मा गाँधी यह भी मानते थे कि विश्व में वास्तविक शांति लाने के लिए बच्चे ही सबसे सशक्त माध्यम हैं। उनका कहना था कि ‘‘यदि हम इस विश्व को वास्तविक शान्ति की सीख देना चाहते हैं और यदि हम युद्ध के विरूद्ध वास्तविक युद्ध छेड़ना चाहते हैं, तो इसकी शुरूआत हमें बच्चों से करनी होगी।’’ यदि महात्मा गाँधी इस युग में जीते होते तो वह हमारे विश्व को गरीबी, अशिक्षा, आतंक, एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र को परमाणु शस्त्रों के प्रयोग की धमकियों तथा विश्व के ढाई अरब बच्चों के सुरक्षित भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए जुझ रहे होते। महात्मा गाँधी के जन्मदिवस 2 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में सारे विश्व में मनाया जाता है और आज जब हम हिरोशिमा दिवस के माध्यम से युद्ध की विभीषिका की बात कर रहें हैं महात्मा गाँधी का दर्शन सर्वथा प्रासंगिक है. अमेरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी 27 मई 2016 को जापान की ऐतिहासिक यात्रा की थी. यात्रा 
के दौरान उन्होंने हिरोशिमा परमाणु हमले के पीड़ितों को जापान के हिरोशिमा में स्थित पीस मैमोरियल पार्क में जाकर श्रद्धांजलि दी थी.हिरोशिमा में दुनिया के पहले परमाणु हमले के करीब इकहत्तर साल बाद पहली बार किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने उस स्थल का दौरा किया इस दौरान ओबामा ने कहा कि इकहत्तर साल पहले आसमान से मौत गिरी थी और दुनिया बदल गई थी. थी.ओबामा के बयानों में हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम हमलों के लिए दुख और पछतावा साफ दिखा मगर उसे नाकाफी बताया गया.

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने जापान के हिरोशिमा, नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम की त्रासदी पर - " हिरोशिमा की पीड़ा " नामक कविता लिखी थी.गौरतलब है कि अटलबिहारी वाजपेयी के निधन के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने उनकी कविताओं  को पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए निर्देश दिए थे . सुप्रसिद्ध कवि अज्ञेय की कविता-" हिरोशिमा " भी चर्चित रही है.




राजा दुबे 

Sunday, August 2, 2020

बारिश, रोडवेज की बस और बड़वानी तक का "सफर"- राजा दुबे

उम्र के इस मुकाम पर जब सत्तरवें साल में दो माह पहले ही कदम रख चुका हूँ, याददाश्त दिन ब दिन साथ छोड़ रही है, लगता है बची-खुची ही सही यादों को समेट लिया जाये. यह बात उन दिनों की है जब मैं काम धन्धे की तलाश में घर से बाहर हुआ करता था. राखी पर बहन के पास होने की इच्छा के वशीभूत तब बाहर से घर आने को निकलता तो हर बार रोडवेज की कारपोरेशन की बस से सफर सुखद नहीं होता था.और कई बार यह उर्दू का -" सफ़र" ,अंग्रेजी के -"सफर" में तब्दील हो जाता था. अपने इंतहाँ गर्म मौसम और मीठे पपीते के लिये ख्यात रियासतकालीन विरासत को समेटे बड़वानी कस्बा तब राजस्व अनुविभाग का मुख्यालय था और पिता के केंन्द्र एवम् न्याय पंचायत में पास के एक कस्बे पाटी में सचिव होने और माँ के पास के ही गाँव भीलवाड़ा में ग्रामसेविका होने से परिवार उन दिनों बड़वानी में ही रहता था. मै बडवानी कॉलेज से इकानामिक्स में एम.ए. करने के बाद वर्ष 1973 की शुरुआत में ही नौकरी की तलाश में पहले खरगोन कॉलेज में कामर्स का एडहॉक लैक्चरर  हो गया था, वहाँ से दो-ढाई महीने बाद ही केन्द्र सरकार की हॉफ ए मिलियन जॉब योजना के तहत साँख्यिकी सहायक पद के लिये चयनित होकर इन्दौर मे प्रशिक्षणरत था. मेरी छोटी बहन मँजू उन दिनों बड़वानी कॉलेज से ही बी.ए. कर रही थी और छोटा भाई मनीष स्कूल में पढ़ता था.

तब इन्दौर से बड़वानी सड़क मार्ग से और वह भी मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम की बस से ही जाया जा सकता था. तब निमाड़ के इस इलाके में रेल परिवहन नहीं था , और आज़ भी नहीं है. राखी के एक दिन पहले अपनी ट्रेनिंग क्लास के बाद मैं शाम चार बजे अपनी अटैची के साथ इन्दौर के सरवटे बस स्टैंड पहुँच गया था . बस स्टैंड पर जाते ही यह बुरी खबर सुनने को मिली कि नर्मदा नदी में बाढ़ के कारण ए्बी रोड पर  खलघाट का पुल डूब गया है और इस वजह से सभी बस सेवाएँ कैंसल कर दी गई हैं. इन्दौर से बड़वानी तक तब महू,  धामनोद, खलघाट, दवाना और अँजड़ होते हुए बड़वानी जाते थे. निराश होकर में वहीं एक बैंच पर बैठ गया. चार से छ: बजे तक मैं दो चाय पी चुका था और कब तक मैं वहीं बैठा रहूँगा तय नहीं था. बड़वानी जाने वाले लोगों का अनुमान में टिकट खिड़की नम्बर एक पर तफ्तीश करने वालों की संख्या से लगा रहा था. कुछ देर बाद हम कथित बाढ़ पीड़ित (मैं इस विशेषण पर हँसा था क्योंकि यह टैग बड़वानी जाने वाले हमारे एक सहयात्री राजाराम वास्कले ने दिया था) परेशानी का समाधान करने में जुट गये.रात नौ बजे तक बड़वानी जाने वाले सहयात्रियों की संख्या तीस हो गई थी.

हमारे साथ एक पत्रकारनुमा खोजी सहयात्री भी था जिसने यह खबर दी कि बस का ड्रायवर बड़वानी का है और बस स्टैंड का सुपरवाइजर यदि इजाजत दे तो वह बड़वानी व्हाॉया राजघाट बस लेकर जा सकता है.मगर क्या सुपरवाइजर इसके लिये तैयार होगा? तब एक हमारा सहयात्री जो पुलिस मे काँस्टेबल था उसने कहा ग्यारह बजे टी.आई. सा'ब आयेंगे उनसे पूछते हैं, शायद वो हमारी मदद कर पाये. उम्मीद की एक नहीं दो-दो किरणों की चमक ने हमें आल्हादित कर दिया था.बारिश हो नहीं रही थी, बादल छाये थे और उमस भारी थी .सरवटे के पँखे  इतने छत से लगे हुए थे कि हवा के नीचे आने में - इट टेक्स टाईम. काँस्टेबल जो यूनीफार्म में था वो तो पसीने से तरबतर था  मगर कुछ देर पहले जब मैंने छुट्टी पर जाते समय यूनीफार्म पहनने वाला सवाल किया था तो उन्होंने बताया था कि इससे टिकट नहीं लगता है. हम सब बेसब्री से जिन टी.आई. सा'ब का इंतज़ार कर रहे थे वो ठीक ग्यारह बजे आये और अपने वायदे के पक्के हेड सा'ब उनसे मिले सारी बात पुलिसिया अंदाज़ में तफसील से बताई. टी.आई. ने उन्हें पास आने को कहा और उनके कान में कुछ बात कही. हेडकाँस्टेबल
ने जब वो बात हमें बताई तो हम पहले चौंके और फिर खुश भी हुए. तय यह था कि स्टैंड सुपरवाइजर जैसे ही बस स्टैंड पर आयेगा, टीआई सा'ब हमें इशारा करेंगे और हम लोग नारेबाज़ी करने लगेंगे. सवाल नारों का था सो यह काम मैंने अपने सिर लिया.

नारा बना - "बड़वानी बस भेजो, बड़वानी बस भेजो" और आगे - "खलघाट पर पानी है तो राजघाट से भेजो". नारे इंक्लाब जिन्दाबाद  जैसे आसान नहीं थे.खैर दस पन्द्रह मिनट बाद जब स्टैंड सुपरवाइजर का स्कूटर पोर्च में रुका तो एक हेल्परनुमा लड़के ने उसे सा'ब के हाथ से लेकर साईड में पार्क किया. टीआई सा'ब के इशारे के साथ ही हम सब जो अब चालीस से ज्यादा हो गये थे. बस भेजो, बस भेजो का नारा लगाने लगे.  शुरू में कुछ लोग धीरे धीरे नारे लगा रहे थे मगर स्टैंड सुपरवाइजर के कमरे में जाते समय टीआई सा'ब जो दोनों हाथ ऊपर कर इशारा किया तो हमारा उत्साह बढ़ा और हम जोर-जोर से नारे लगाने लगे. मुझे याद है सुप्रसिद्ध कथाकार प्रेमचन्द ने अपनी एक कहानी में लिखा था कि भय और उत्साह का तेज़ी से संचरण होता है और हम सब उत्साह से भरे थे और हमारे स्वर तेज़ होते जा रहे थे. आखिरकार टीआई, स्टैंड सुपरवाइजर के साथ हमारे पास आये. टीआई सा'ब नकली गुस्से के साथ बोले -" बंद करो यह नारेबाजी, सुपरवाइजरजी ने बंदोबस्त कर दिया है.साढ़े बारह बजे बस व्हॉया राजघाट जयेगी. फिर सुपरवाइजर सा'ब ने अपने साथ आये कंडक्टरनुमा  व्यक्ति को कहा खिड़की नम्बर एक से  टिकट काटो, जाओ सब लाईन में लगो. हम सबने टीआई और सुपरवाइजर के  जय-जयकार के नारे लगाये और नर्मदे हर के नारे लगाने लगे.

तकरीबन एक बजे बस चली और सुबह सात बजे जब दिन हो चला था, तब हमारी बस राजघाट पुल को पार कर रही थी और इस पुल से भी पानी ज्यादा नीचे नहीं था. फिर हम सबने एक दूसरे को देखा और नर्मदे हर का जयकारा लगाया.मैं जब घर पहुँचा तो सब बेहद खुश थे और मेरी आँखें भी नम थीं, और मेरे आगे वो चेहरे बारी-बारी से आ रहे थे - जिन्होंने इस सफर को सफल बनाया. और वो राखी आज भी भुलाये नहीं भूलती है.

राजा दुबे

Friday, July 31, 2020

फिल्मों मे " कोरियोग्राफी " को अहम स्थान दिलवाया था सरोज खान ने

बॉलीवुड की मशहूर कोरियोग्राफर सरोज खान का इकहत्तर साल की उम्र में गत 03 जुलाई 2020 को मुम्बई में निधन हो गया. उनके अवसान के साथ ही फिल्मजगत ने एक ऐसी शख्सियत को खो दिया जिसने फिल्मों मे कोरियोग्राफी को एक अहम् स्थान दिलवाया और फिल्म में कोरियोग्राफर्स की भूमिका को नये सिरे से पारिभाषित कर कोरियोग्राफर को एक मुकम्मल स्धान दिलवाया.किसी भी पेशे में अपने अस्तित्व की लड़ाई तो हर पेशेवर लड़ लेता है मगर वो व्यक्ति जो अपने पेशे, अपने कैरियर से जुड़े साथियों की पेशे से जुड़ी समस्याओं के समाधान और उनकी लड़ाई में कँधे से कँधा भिड़ाकर जुटता है वो सच्चे अर्थों में एक मसीहा होता है और कोरियोग्राफर सरोज खान एक ऐसी ही मसीहा थीं. उन्हेंअपने जीवन की आखिरी सांस तक साथी कोरियोग्राफर्स की चिंता थी .यही कारण है कि वह सिने डांसर्स एसोसिएशन (सीडीए) में फूट डालने की चाहत रखने वालों से जूझती रहतीं थीं .सरोज खान नेअपने एक साक्षात्कार में कहा था कि कुछ लोग सीडीए को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, जो नहीं होना चाहिए.मैं जब 10 बरस की थी, तब इस एसोसिएशन को ज्वाइन किया था.यह एसोसिएशन वस्तुत: नये और संभावनाशील  कोरियोग्राफर को अवसर दिलवाने और उनके संरक्षण के लिये काम करता है और सरोज खान उसे हित सरक्षण की भूमिका में बनाया रखना चाहती थीं.

सरोज खान ने कोरियोग्राफी का बाकायदा शिक्षण - प्रशिक्षण लिया था 

सरोज खान का जन्म 22 नवंबर 1948 में निर्मला नागपाल के रूप में हुआ था .तीन साल की उम्र में ही उन्होंने बाल कलाकार के रुप में काम करना शुरू कर दिया था.फिल्मों के उस समय के मशहूर कोरियोग्राफर बी.सोहनलाल की शागिर्दी में उन्होंने नृत्य निर्देशन की आरम्भिक शिक्षा गृहण की बाद में उन्होंने खुद नृत्य निर्देशन के कैरियर का आग़ाज किया. पहले असिस्टेंट कोरियोग्राफर के रुप में और बाद में एक स्वतंत्र कोरियोग्राफर के रुप में वर्ष 1974 में फिल्म "गीता मेरा नाम" की कोरियोग्राफी की थी.हालाँकि, उन्हें ख्याति प्रप्त करने के लिये कई साल इन्तज़ार करना पड़ा  लेकिन एक बार जब उनकीप्रतिभा का जादू चला तो फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा, सुप्रसिद्ध अभिनेत्री श्रीदेवी के साथ वर्ष 1987 में मिस्टर इंडिया में - " हवा हवाई " और वर्ष 1989 में चाँदनी फिल्म के गाने -" मेरे हाथों में नौ-नौ चूड़ियाँ "की कोरियोग्राफी से  उन्हें ख्याति मिली.बाद में माधुरी दीक्षित के साथ, वर्ष 1988 में तेजाब फिल्म के गाने - "एक दो तीन.. ", वर्ष 1990 में थानेदार फिल्म में -" तम्मा तम्मा लोगे.. " औ वर्ष 1992 में बेटा फिल्म में गाने -"धक् धक् करने लगा.. " की बेहतरीन कोरियोग्राफी की और एक नया ट्रैंड कायम किया.इन गानों की कोरियोग्राफी के बाद सरोज खान का नाम बॉलीवुड के सफलतम कोरियोग्राफरों में आ गया.वर्ष 2013 में सरोज खान ने फिर एक बार माधुरी दीक्षित के लिये फिल्म -  " गुलाबी गैंग " में कोरियोग्राफी की थी. 

तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाने वाली बिरली कोरियोग्राफर थीं सरोज खान

सरोज खान को कोरियोग्राफी के लिये अपने लम्बे कैरियर में अनेक पुरस्कार मिले.बेस्ट कोरियोग्राफी के लिये उन्हें तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले.ऐसा सम्मान पाने वाली सरोज खान संभवतः पहली नृत्य निर्देशक थीं. उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार वर्ष 2002 में फिल्म-" देवदास "के लिये, वर्ष 2006 में एक तमिल फिल्म -"श्रृँगारम् "के लिये और वर्ष 2007 में फिल्म -"जब वी मेट "के लिये मिला. इसीप्रकार उन्हें बेस्ट कोरियोग्राफी के लिये आठ बार फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिले. वर्ष 1989 में फिल्म-"तेजाब" के लिये, वर्ष 1990 में फिल्म -"चालबाज" के लिये, वर्ष 1991 में -"सैलाब" , वर्ष 1993 में -"बेटा" , वर्ष 1994 में -"खलनायक " , वर्ष 2000 में फिल्म- "हम दिल दे चुके सनम" के लिये, वर्ष 2003 में - फिल्म -"देवदास " के लिये और वर्ष 2008 मे -" गुरु " फिल्म के लिये उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार मिले.

छोटे परदे पर भी सरोज खान की उपस्थिति आकर्षण का केंद्र होती थी
फिल्मों से इतर टीवी पर यानी छोटे परदे पर भी सरोज खान की उपस्थिति आकर्षण का केंद्र होती थी. सरोज खान ने डाँस के टीवी शो में ज़ज के रुप में भी प्रतिष्ठा अर्जित की. वर्ष 2005 में स्टार वन के रियलिटी टीवी डाँस शो -"नच बलिये" में वो तीन जज़ेस की पैनल में शामिल थीं.वे इसी डाँस शो के दूसरे सीज़न में भी जज़ थीं. पिछले दिनों सोनी इंटरटेनमेंट टेलीविजन (इंडिया) के एक टीवी शो " उस्तादों के उस्ताद ' में भी जज़ थीं. एन. डी.टी.वी.इमेजिन पर आपने वर्ष 2008 में नृत्य शिक्षण का कार्यक्रम - " नच ले वे विद सरोज खान " भी प्रस्तुत किया था.और आपने कुछ और टीवी शो जैसे - बूगी-बूगी और झलक दिखला जा भी प्रस्तुत किया था. वर्ष 2012 में  भारत सरकार के फिल्म प्रभाग ने निधी तुली के निर्देशन में उनके अवदान पर एक फिल्म भी बनाई थी.

सरोज खान नृत्य निर्देशन की कला में दीक्षित ही नहीं, प्रवीण भी थीं

सरोज खान बतौर कोरियोग्राफर इतनी परिपूर्ण थीं कि  वे अपने कलाकारों खासतौर पर अभिनेत्रियों से उसी परिपूर्णता की अपेक्षा करती थीं.दरअसल सरोज खान नृत्य निर्देशन की कला में दीक्षित ही नहीं प्रवीण भी थीं.वो अक्सर फिल्म की अभिनेत्रियों से कहतीं थीं कि लगन, अभ्यास और एकाग्रता से कोई भी अच्छा नृत्य कर सकता है.अक्षयकुमार ने अपने शोक संदेश में इसी बात की पुष्टि करते हुए यह  बात कही है कि महान कोरियोग्राफर सरोज खान ने नृत्य को लगभग आसान और सहज -सुलभ बना दिया था और बकौल मास्टरजी ( सरोज खान को बॉलीवुड के सभी सितारे इसी नाम से पुकारते थे ) ज़रा-सी भी दिली इच्छा हो तो कोई भी नृत्य कर सकता है - जी हाँ एवरी बडी केन डाँस.  यही संभवतः सरोज खान का भी
अल्टीमेट संदेश था.

  राजा दुबे