Friday, August 12, 2016

आत्मग्लानि में डूबी मां

आपको आपके काम से कितना ही प्यार क्यों न हो सुबह पांच बजे उठकर, घर के काम करके, मैट्रो में एक घंटे खड़े रहकर यात्रा करना और सुबह सात बजे ऑफिस पहुंचा भारी ही लगेगा। ऐसे में जब घर से निकलते वक्त पीछे से आपकी सालभर की बेटी मम्मा-मम्मा की आवाज़ के साथ बिलख-बिलखकर रोए तो ऑफिस तक का ये सफर तनाव और आत्मग्लानि से भरा हुआ साबित होता हैं। बच्चा भले ही अगले पांच मिनिट में चुप हो जाए लेकिन, आप पूरे दिन उसका वो आंसू भरा चेहरा याद करते रह जाते हैं। अस्मि अब इस बात को समझ जाती हैं कि मम्मी ऑफिस जा रही हैं। वो उस दौरान मुझसे ऐसी चिपकी रहती हैं जैसे बंदरिया से उसका बच्चा। उसके मन में मेरे दूर जाने का डर कुछ ऐसा घर कर गया हैं कि वो मेरे घर पर रहने पर भी मेरे पीछे-पीछे ही चलती रहती हैं। किचन से लेकर बाथरूम तक वो मेरे साथ रहती हैं। मेरी मम्मी ने कभी नौकरी नहीं की। हमेशा वो मेरे लिए उपलब्ध रही। मैंने कभी मां से दूरी के इस दर्द को महसूस ही नहीं किया। "नौकरी", "अपनी ज़िंदगी", "जीवन का हिस्सा" और "वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा" जैसे जुमलों के बीच कई बार मैं खुद को आत्मग्लानि में डूबा हुआ पाती हूं। इस सबके बीच क्रिस्टीन आर्मस्ट्रॉन्ग जैसी एथलीट और एक मां के वीडियो देखकर मैं खुद को दिलासा देती रहती हूं। ऑफिस में काम कर रही मेरी जैसी मांओं से उनके अनुभव सुन-सुनकर खुद को समझाती रहती हूं। शायद सच में ये सब वक्त की बात हैं। बच्चे परिस्थितियों से खुद जितनी जल्दी निपटना सीख ले बेहतर होता हैं। ओशो के शब्दों में- हर किसी का अपना जीवन हैं। बच्चों से मोह और उन पर अधिकार जमाना जितनी जल्दी हो खत्म कर देना चाहिए। 

Saturday, January 23, 2016

बात को बोलने की कला...


फोन पर साथी सवारी- सुनो मैं तुम्हें वॉट्सएप कर दूंगा मेल आईडी उस पर तुम रिज़्यूमे भेज देना। सोमवार को इंटरव्यू हो जाएगा और तुम्हारी जॉब पक्की। चलो बाय।
फिर दूसरे को फोन करके- हां जी अंकल। बोल दिया है उसको मैंने। सोमवार को हो जाएगा इंटरव्यू उसका। कल मिलते है अंकल। अंकल मैं कह रहा था कि फोटो लेते आइएगा ना आप कल। बात तो हो रही है। लेकिन, फोटो देख लेते सब तो और अच्छा होता। हां हां अंकल... अरे उसकी नौकरी लग जाएगी आप उसकी टेंशन ना ले। लेकिन, अंकल मैं कह रहा था कि फोटो तो देख ही लेते सब। मम्मी को दिखा देता, पापा को भी देखना ही था। मतलब आप समझ रहे हैं ना अंकल। हे हे हे अंकल... आप भी। नौकरी की चिंता ना करे आप। बस मैं कह रहा था कि हम कल मिलते साथ बैठते। सारी बातें भी हो जाती। फोटो लाना मत भूलना अंकल। हैलो.. हैलो... हैलो...

बात अधूरी रह गई और मैट्रो मंडी हाउस के लिए टनल में घुस गई और नेटवर्क बाहर हवा में छूट गया। ये बातें मेरे पीछे खड़ा यात्री फोन पर कर रहा था। जब नेटवर्क गया और उसने हैलो.. हैलो.. बोलना शुरु किया तो उसकी आवाज़ में अजीब-सी मजबूरी मुझे महसूस हुई। मैंने पलटकर देखा तो वो मुझे शादी की उम्र के हिसाब से कुछ बड़ा लगा। आवाज़ की मजबूरी उसके चेहरे पर भी नज़र आने लगी। लड़की की तस्वीर देखने के लिए वो इतना अधीर था कि उसके लिए वो उन अंकल के रिश्तेदार की नौकरी तक लगवाने के लिए मान गया। नौकरी के एवज में वो बस उस लड़की की तस्वीर देखना चाह रहा था।

बात को घुमाना और असल बात को बातों-बातों में बोल जाना एक कला है। आज का मैट्रो ज्ञान।

Friday, March 13, 2015

माँ होना....

माँ बनना इस वक्त मुझे दुनिया का सबसे मुश्किल काम लग रहा है। पढ़ाई-लिखाई, बिना किसी आधार या सहारे के अचानक दिल्ली आना और नौकरी के लिए जूझना, रिक्शे के पैसे बचाने के लिए लंबी-लंबी दूरी पैदल नापना, बस में धक्के खाना, भुवन से शादी करने का फैसला अकेले लेना, मम्मी-पापा का गुस्सा झेलना, यहाँ तक की गर्भावस्था के पूरे नौ महीने मैट्रो में अधिकतर खड़े होकर ऑफिस जाना... सबकुछ, इस वक्त मुझे बच्चों का खेल मालूम हो रहा है। नौ महीने एक कोख में बंद बच्चा जब अचानक बाहर निकलता है तो उसे इस दुनिया को समझने में अच्छा खासा समय लग जाता है। लेकिन, नई-नई माँ बनी लड़की की समझ या कहे कि नासमझी भी बच्चे से कम नहीं होती। पूरे नौ महीने लगे थे ये समझने में कि गर्भवती होना क्या होता है। क्या खाना होता है, क्या पीना होता है, कैसे रहना होता है। और, जैसे ही इसे मैंने डी-कोड किया वैसे ही एक दिन अचानक दर्द हुआ और लेबर रूम के बेड पर डॉक्टरों की टीम ने अस्मि को धपाक से मेरे ऊपर पटक दिया। दर्द से भरे हुए शरीर के साथ अचानक ही माँ होने की बड़ी-सी ज़िम्मेदारी मेरी गोद में आ गई। शुरुआती तीन-चार दिन तो ये समझने में लग गए कि मेरे पास लेटी ये बच्ची मेरी ही है किसी भाभी, दीदी या मौसी कि नहीं जो अभी इसे मेरे खिला लेने और मन बहला लेने के बाद लेकर चली जाएगी। शरीर के दर्द के साथ बच्चे को पालने के दौरान वात्सल्य जैसा कोई भाव मेरे मन में नहीं आ पा रहा था। मेरे आसपास मौजूद हर व्यक्ति के चेहरे पर मुझे वो नज़र आ रहा था। लेकिन, मैं अपनी पीड़ा और इसके होने के बीच फंसी हुई थी। आज दो महीने से हम दोनों एक साथ है। दिन हो या रात हम दोनों का साथ अटूट है। हम दोनों अब एक दूसरे को समझने लगे है। वो ये जान गई है कि यही है मेरी माँ जिसके साथ मैं दो नहीं ग्यारह महीने से जुड़ी हुई हूं... और, मैं भी अब वात्सल्य का असल अर्थ समझने लगी हूँ। इसके रोने, बीमार होने पर जब आंख से आंसू बहते है तो कई बार लगता है कि मैं कुछ ज़्यादा ही भावुक हो रही हूँ। लेकिन, सच में अब धीरे-धीरे मैं माँ बन रही हूँ। 28 दिसम्बर को मैंने बस इसे जन्म दिया था। माँ तो मैं अब धीरे-धीरे रोज़ाना थोड़ी-थोड़ी बन रही हूँ।

Wednesday, December 10, 2014

सर्द रात...

ऑफिस में काम करते-करते कब नौ बज गए उसे मालूम भी ना पड़ा। कम्प्यूटर से आंखें हटकर जैसे ही खिड़की की ओर गई वो चौंक गई।
अरे बाप रे... आज तो बहुत देर हो गई। घर पहुंचते-पहुंचते तो ग्यारह बज जाएंगे। वो भी तब जब समय पर ऑटो मिल जाए तब। काम की हड़बड़ी में वो ऑफिस कैब के लिए मेल करना भी भूल गई थी। और, रात नौ बजे एच आर से किचकिच करना उसके बस में नहीं था।
उसने फटाफट अपना काम समेटना शुरु किया। सोचा कि देर तो हो ही रही है। एक कॉफी और पी ली जाएं।
उसने आवाज़ लगाई- महेशजी, एक कॉफी।
महेशजी दौड़ते हुए कॉफी ले आए। बड़े प्यार से टेबल पर रखी और चिंता जताते हुए वो बोले- इतनी देर तक मत रुका कीजिए। खासकर जाड़े के इन दिनों में।
जिस बात को लेकर संशय में थी महेशजी ने उसे ही छेड़ दिया था। वो दिल्ली की इस सर्द रात में अकेले घर जाने के अपने इस डर को दबाए रखने की कोशिश में बस हल्का-सा मुस्कुरा दी। सिस्टम बंद करके, सारी फाइलें समेटकर जब वो ऑफिस से निकल रही थी तब तक घड़ी में सवा नौ बज चुके थे। ऑफिस मेन सड़क से कुछ दूरी पर था। सो, उतना रास्ता तो चलकर जाना मजबूरी थी। मेन सड़क पर पहुंचते ही उसने ऑटो की खोज शुरु कर दी।
वो मन ही मन सोचने लगी- सात बजे इसी सड़क पर कितने ऑटोवाले मिल जाते है। एक को हाथ दो तो चार आ जाते हैं। और, अभी देखो एक भी नहीं मिल रहा हैं।
तभी एक ऑटो सामने से निकला। उसने हाथ दिया लेकिन, वो रुका नहीं। इसी इंतज़ार और रोका-रोकी में साढ़े नौ हो गए। उसके दिल की धड़कन इतनी तेज़ थी कि वो क्या आसपास खड़ा कोई भी उसे सुन ले। चेहरे से घबराहट को हटाने की नाकाम कोशिश के साथ वो फिर ऑटो का इंतज़ार करने लगी। तभी उसे एक ऑटो आता दिखा। उसने हाथ, जैसे ही वो रुका। वो झट से उसमें बैठ गई।
ऑटोवाला बोला- अरे मैडम ये तो बताओ जाना कहाँ हैं?
वो बोली- भैया मयूर विहार फेस वन।
ऑटोवाला बोला- अरे वो तो मेरे लिए उल्टा पड़ जाएगा। नहीं मैं नहीं जाता।
वो बोली- क्या भैया नाइट चार्ज भी ले लेना। अब चलो... रोज़ का है ये तो आप लोगों का।
ऑटोवाला ने कुछ बड़बड़ाते हुए ऑटो स्टार्ट किया।
दिल्ली में ठंड कुछ बढ़ी हुई-सी महसूस हुई उसे। उसने बैग से शॉल निकाल ली। वो सोचने लगी कि कैसा ये शहर है साढ़े नौ बजे ही सुनसान हो जाती है सड़कें। हमारे इंदौर में तो इस वक्त हम अकेले ही काले घोड़े तक पानी-बताशे खाने चले जाते थे। कितने लोग मिल जाते थे पहचान के। सच में जितना बड़ा शहर, उतना तंग उसका व्यवहार।
तब भी ऑटोवाले का फोन बज उठा। उसने हाँ-ना में कुछ बात की। ऑटो को किसी दूसरी सड़क पर ही मोड़ लिया। वो अचानक से घबरा गई।
ज़ोर से चिल्लाई- कहाँ जा रहे हो... कहाँ ले जा रहे हो...
ऑटोवाला कुछ नहीं बोला।
वो फिर चिल्लाई- लगाऊं क्या 100 नबंर पर फोन। रोको ऑटो...
ऑटोवाले दनदानाते हुए ऑटो को एक बस्ती में घुसा दिया। और, अंधेरी-सी एक गली में एक घर के सामने रुक गया।
पीछे बैठे हुए उसका चेहरा अबतक पीला हो चुका था। जैसे ही ऑटो रुका वो कूदकर बाहर निकली। वो कुछ बोले उसके पहले ऑटोवाला उस घर में घुसा और बस दो पल में ही बाहर आ गया।
बोला- बैठा मैडम जल्दी।
उसकी हालत ऐसी थी कि वो चाहकर भी कुछ बोल ना पाई और, चुपचाप ऑटो में बैठ गई। उसके मन में दिल्ली में लड़कियों के साथ होनेवाली सारी घटनाएं घूमने लगी। मम्मी की हिदायतें, दोस्तों की सलाह सबकुछ कानों में गूंज रही थी। उसका आत्मविश्वास जैसे उस बस्ती की तंग और अंधेरी गलियों में खोता जा रहा था। सर्द हवा ने उसके चेहरे के साथ पूरे शरीर को सुन्न कर दिया था।
तब ही अचानक ऑटो झटके से रुका। ऑटोवाले ने पलटकर उसकी ओर देखा और पूछा- मैडम आ गए। अब कौन से ब्लॉक में ले जाऊं।
वो हड़बड़ाकर बोली- डी ब्लॉक।
घर के आगे जब ऑटो रुका तो एक मशीन की तरह वो उससे उतर गई। उसने पांच सौ का नोट उसे थमा दिया। ऑटोवाले ने अपने पैसे काटे और बाक़ी के लौटा दिए। उसने देखा कि उसने नाइट चार्ज नहीं काटा है।
वो बोली- भैया नाइट का नहीं लिया।
ऑटोवाला बोला- नहीं मैडम। आपका मेरी वजह से देर हो गई। असल में मेरी बच्ची बीमार है उसी के लिए मैं दवा लेकर घर जा रहा था। आपको अकेले खड़ा देखा तो रुक गया। सोचा आप मेरी ओर ही रहती होगी तो ले जाउंगा। बीवी का फोन आ गया था रास्ते में दवा की सख्त ज़रुरत थी। सो मैंने बिना बताएं ही ऑटो घर की ओर मोड़ लिया था। माफ़ किजिएगा मैडम मेरी वजह से आपको देर हो गई।
इतना बोलकर उसने ऑटो घुमाया और वो चला गया....