Monday, November 23, 2020

दिवाली पर बहुत याद आते हैं बाबूजी




पापा और नानाजी. तस्वीर पापा की शादी की 

आमतौर पर भारतीय परिवारों मेंं पिताजी को बाबूजी म्बोधित किया जाता है. हमारे परिवार में चूँकि मेरी मांँ, मामाजी, मौसीजी और मेरे पिताजी भी मेरे नानाजी को बाबूजी कहकर बुलाते थे, अत: हम सब भाई- बहन भी अपने नानाजी को बाबूजी कहकर बुलाते थे. बाबूजी का मुझपर अपार स्नेह था और मुन्ना कैसा है, मुन्ना ने कुछ खाया कि नहीं, मुन्ना को मत डाँटो और ऐसे ही बीसियों संवाद आज भी मेरे कानों में गूँजते हैं और उनके साथ बिताये एक- एक पल मेरी यादों के दृृृश्य पटल पर अंकित हैं. यूँ तो मुझे बाबूजी  कई बार कई सन्दर्भ में याद आते हैं मगर दिवाली पर मुझे उनकी बहुत याद आती है. आज मैं संख्या के रुप में तो यह नहीं बता सकता कि बाबूजी ने कितनी दिवाली हमारे साथ मनाई थी मगर ऐसा संभवत: दो दशक तक तो हुआ ही था कि बाबूजी  पास दिवाली पर आये थे और वो हर दिवाली पर हम सभी बच्चों और मेरी माँ (जिन्हें हम बाई कहते थे) के लिये कपड़े लाते थे. कपड़ों के अलावा फटाके, मिठाई और गुझिया के लिये मावा वे वहीं से लाते थे जहाँ हम होते थे.और हम जहाँ होते थे वो या तो गाँव होता था या फिर कस्बा. पिताजी केन्द्र एवम् न्यायपंचायत ( बाद में इन्हें जनपद पंचायत कहा गया ) में सचिव और बाई ग्रामसेविका थी, अत: पोस्टिंग तो गांँव-कस्बों मे होनी ही थी. मगर बाबूजी बड़े शहर उज्जैन से हमारे पास पानसेमल, सैलाना , आलोट सेन्थवा और बड़़वानी में आते थे.


बाबूजी हमारे लिये क्या लाते थे उसको लेकर हम बड़ी उत्सुकता दिखाते थे और जो कुछ बाबूजी लाते थे उसको पाकर खुश हो जाते थे मगर सच तो यह है कि हम बच्चों के मनोभाव फिल्म -"तकदीर" के उस गाने के माफिक होता था जिसमें एक बालिका अपने पिता के लिये गाती थी - "अच्छी-सी गुड़िया लाना. गुड़िया चाहे ना लाना, पप्पा जल्दी आ जाना" तो हम बच्चों की स्थिति भी उस बालिका जैसी ही थी हम बस यह चाहते थे कि बाबूजी दिवाली पर हमारे पास आयें. उनका हमारे साथ दिवाली मनाने का प्लान बहुत पहले बन जाता था. और वो जमाना चिट्ठियों का ही था अत: चिट्ठी से हमें खबर लग जाती थी कि बाबूजी किस दिन आयेंगे. बाबूजी का दीवाली पर हमारे पास आना यादगार घटना होती थी. वैसे तो हम बच्चों को हर बार दिवाली पर हमारे पास आना अच्छा लगता था मगर वर्ष 1962 की दीवाली तो इस सन्दर्भ में सबसे यादगार रही थी.इस साल हम बच्चे पहली बार साल भर बिना अपनी माँ के पिताजी के साथ रहे थे क्योंकि बाई ग्रामसेविका पद की ट्रेनिंग के लिये ग्वालियर जिले के आँतरी ट्रेनिंग सेन्टर में थी. दीवाली पर संभवत:  वे पानसेमल आ भी जाती मगर इस बीच चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया और बाई अपने
सेन्टर की दीगर प्रशिक्षार्थियोंं के साथ सीमा पर लड़ने वाले भारतीय जवानों के लिये पुलोवर (फुल स्लीव स्वेटर ) बुन रहीं थीं, वो भी छत्तीस घण्टे में एक स्वेटर बुनने की तेज़ गति से. तब हम इतने समझदार नहीं थे कि बाई के इस काम पर गर्व करते. हम तो जब बाबूजी दिवाली पर आये तो उनसे लिपट कर रोये थे और बाबूजी बता रहे थे कि इन्दु (बाई का नाम इन्दिरा था) तो सिपाहियों के लिये स्वेटर बुन रही है वो देश के लिये काम कर रही है. उस दिवाली पर बाबूजी का हमारे पास आना बहुत अच्छा लगा था. त्यौहारों पर बाई के न होने से पिताजी और बाबूजी यानी ससुर-जमाई का मिलकर खाना पकाना देखने लायक दृृृश्य होता था.हम बच्चे भी कुछ न कुछ काम कर ही लेते थे.

दिवाली पर बाबूजी के हमारे पास आने और उन्हें रिसीव करने का भी अपना एक आनन्द होता था. जब पिताजी की पोस्टिंग रतलाम जिले के आलोट में थी या फिर सैलाना में बस उन सालों में बाबूजी ट्रेन से दिवाली पर हमारे पास आते थे वरना ज़्यादातर तो वे बस से ही हमारे पास आते थे. वैसे भी पश्चिम निमाड़ (खरगोन) जिले में तब पानसेमल, सेन्धवा और बड़वानी ट्रेन रुट से नहीं जुड़ेथे, वैसे तब क्या? अब तक इस इलाके में ट्रेन कहाँ है बस से आने वाले बाबूजी के इंतज़ार में हम यानी मैं और पिताजी दो-दो घण्टे बस स्टैंड पर खड़े रहते थे.जब हम सैलाना (रतलाम) में थे. हम सैलाना के उस रियासतकालीन द्वार के पास खड़े उज्जैन से आने वाली बस का इंतजार कर रहे थे. पास ही एक स्कूल थी जहाँ गेदरिंग (वार्षिक स्नेह सम्मेलन) चल रहा था.उन दिनों हमारे मामाजी भी हमारे साथ रहते थे. वो उस दिन गेदरिंग में एक रिकॉर्ड डाँस कर रहे थे. मैंने जिद की तो पिताजी मुझे स्कूल ले गये थे. वहाँ मामाजी जिस गीत पर एक्शन कर रहे थे वो गीत आज भी मुझे याद है. वो गीत था फिल्म  का - "सिर जो तेरा चकराये .. ", जॉनीवाकर पर यह गाना फिल्माया था. हम जब लौटकर आये तो बस आती दिखी और बाबूजी एक बड़ा -सा झोला लिये उतरे.पिताजी ने बताया कि पास ही स्कूल में शिब्बू (यह मामाजी के घर का नाम था उनका नाम तो ध्रुवनारायण शुक्ल था) का प्रोग्राम चल रहा है, क्या आप देखेंगे? बाबूजी बोले नहीं बहुत थक गया हूँ. उसके बाद मैंने पिताजी का  हाथ जोड़कर बाबूजी का हाथ थाम लिया. बाबूजी बता रहे थे दिवाली के कारण ट्रेन में बड़ी भीड़ थी. नामली से बस पकड़ी तब राहत मिली. बाबूजी हमारे घर आते तब बाई पहले उन्हें चाय देती थी फिर दिवाली के लिये तैयार नमकीन देती थी फिर बाबूजी के पसन्द का खाना बनता. दीवाली पर बाबूजी के साथ बिताये वे दिन इतनी तेजी से गुजरते जैसे फ्रंटियर एक्सप्रेस गुजरती है.

बाबूजी के बस से आने का एक और किस्सा बड़वानी से जुड़ा है. उज्जैन से बड़वानी के लिये तब को सीधी बस नहीं थी. उज्जैन से पहले  इन्दौर आना पड़ता था. वहाँ से बड़वानी आने को बस मिलती थी. बस से इन्दौर से बड़वानी आने के दो रास्ते थे. एक प्रचलित और शार्टेस्ट रुट था व्यायाम ठीकरी-दवाना और एक दूसरा रुट था व्यायाम ठीकरी-दवाना जुलवानिया. पहले रुट का फासला था 150  किलोमीटर जबकि दूसरा रुट का फासला था 170 किलोमीटर का. बीस किलोमीटर का अतिरिक्त सफर यानी समय भी ज्यादा किराया भी ज्यादा दोनों ही रुट पर इन्दौर से बड़वानी को बस चलती थी. यह जरुर है कि व्यायाम रवाना उस समय पाँच बस चलतीं थीं और व्हाया जुलवानिया एक बस. बीस किलोमीटर ज्यादा का सफर यानी यात्रा में ज्यादा समय और किराया भी ज्यादा. फिर कौन उस बस से इन्दौर से बड़वानी आता था. मेरे मित्र के बड़े भाई जो राज्य सड़क परिवहन निगम में बड़वानी और जुलवानिया में स्टैंड इंचार्ज रहे उनका जवाब था इन्दौर-बड़वानी व्हाया जुलवानिया तो डाक गाड़ी है जो बेहद रुक-रुककर चलती है क्योंकि हर बड़े शहर में एक व्यक्ति डाकघर तक एक थैला लेकर जाता है. इस बस से इन्दौर से जुलवानिया तक और जुलवानिया से बड़वानी तक और इन दो रुट के बीच के स्टेशन की सवारियां ही मिलती है. इस सारे किस्से को बयान करने के पीछे सबब यह बताना है कि बाबूजी मगर इसी बस से आते थे. इन्दौर से बड़वानी का सफर जो पाँच घण्टे का है उसे बाबूजी अधिक किराया देकर साढ़े आठ घण्टे में तय करते थे. ऐसा करने के बाबूजी के तर्क थे कि इस बस से आराम से आते हैं. न टायलेट से भागकर आने की जल्दी, न चाय जल्दी पीने का तमाशा. बहरहाल हमें उनके देर से आने का कोई उम्र नहीं होता था. हम तो उनके आने मात्र से खुश हो जाते थे.

मोबाइल के इस जमाने में एक गेजेट होता है जिसे पॉवर बैंक कहते हैं बाबूजी हमारे लिये वैसे ही पॉवर बैंक के मानिन्द थे. दिवाली पर बाबूजी नहीं सच पूछो तो संस्कार के शिक्षक हमारे यहाँ आते थे. उन्होंने सुबह उठकर सभी बड़ों के पैर पढ़ना सिखाया बिस्तर की सलवटें ठीक करना. सुबह उठने के बाद और रात सोने के पहले ईश्वर आराधना और साँप सहित सभी विषैले जन्तुओं से रक्षा के आस्तिक मुनि का स्मरण और पता नहीं कितने कायदे हमें सिखाये. दीवाली पर सावधानी से फटाके फोड़ने और फुलझड़ी के जलने के बाद गर्म तार को एक जगह सुरक्षित रखने की उनकी दी गई सीख आज हम अपने बच्चों और नाती पोतों को सिखा रहें हैं. बाबूजी हमें ही नहीं आस पास फटाके छोड़ने वाले बच्चों को टोकते थे.मुझे याद है उन्होंने सामने रहने वाले सोनी परिवार के एक बच्चे को हाथ में अनार जलाने को मना किया था. ऐसा कहने के दूसरे ही दिन पास के मोहल्ले में एक युवक  हाथ में अनार बर्स्ट होने से जल गया था. बाबूजी का गुस्सा भी बड़ा तेज था. उज्जैन में एक टैक्सटाईल मिल में इलेक्ट्रिशियन की नौकरी करने वाले बाबूजी ने सबसे पहले बाम्बे यानी आज़ की मुम्बई जो तब सौराष्ट्र में था वहाँ बाम्बे पोलिस में सिपाही की नौकरी की थी जिससे पुलिसिया रौब उनके स्वभाव का हिस्सा था. बड़वानी में दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा पर निरीह पशुओं पर जलते हिंगोट ( एक फल को सुखाकर उसमें छेद कर बारुद भरकर बनाये जाने वाला फटाका जो जलाकर फैंका जाता था) फैंकने वाले लड़कों को बाबूजी ने ऐसा लताड़ा कि वो भाग गये. सच भी था हिंगोट से पशुओं को  जलने और घाव होने का खतराथा. बाद में बढ़ती उम्र के दबाव में बाबूजी दीवाली पर नहीं आ पाते थे, मगर उनके आने के यादगार पल हम सबके जेहन में बसे हैं, बसे रहेंगे.

राजा दुबे. 
 

Sunday, November 15, 2020

कोरोना काल में भी अपार धन से सजा रतलाम का महालक्ष्मी मंदिर- राजा दुबे



 रतलाम के माणिक चौक में महालक्ष्मी का एक मंदिर ऐसा भी है जहां सोने-चाँदी और रत्नजड़ित बहुमूल्य गहने और नकद धनराशि महालक्ष्मी और मंदिर के गर्भगृह को सजाने के लिये भक्तों द्वारा धनतेरस के दिन दी जाती है। महालक्ष्मी मंदिर में सालों से गहने और नगद राशि चढ़ाने की परंपरा रही है। इस भेंट को बकायदा रजिस्टर में नाम व फोटो के साथ नोट भी किया जाता है। इसके बाद रिकॉर्ड के आधार पर भक्तों को सबकुछ प्रसादी के रूप में लौटा दिया जाता है। 


नकद धनराशि के अलावा सोना-चांदी, हीरे-मोती से सजावट के लिए देशभर में अपनी पहचान रखने वाले रतलाम के महालक्ष्मी मंदिर में सजावट के लिए धन आना शुरू हो गया है। शहर के माणिकचौक स्थित प्रसिद्ध श्री महालक्ष्मी मंदिर को इस मर्तबा भी नकदी राशि व आभूषणों से सजाया गया है। मां के दरबार में राशि चढ़ाने वालों को टोकन दिया जा रहा है। शहर सहित अन्य शहरों से भी यहां भक्त पहुंच कर राशि दे रहे हैं। नकदी राशि, आभूषण सहित अन्य कीमती सामग्री से मां लक्ष्मी का श्रृंगार किया गया है और इस श्रृंगार के दर्शन धनतेरस से दीवाली तक भक्त कर पाये। इसके बाद प्रसादी के रूप में जिन-जिन भक्तों ने अपनी कीमती सामग्री यहां दी वे वापस लेना शुरू कर दी।

इस बार कोरोना महामारी के चलते हर साल के मुकाबले हीरे, जेवरात, सोने-चांदी के आभूषण कम आने की उम्मीद है फिर भी नकदी राशि लेकर भक्त पहुंचे।  शहर सहित, बडोदरा, इंदौर, पेटलावद, सारंगी, जावरा सहित अन्य शहरों से आए भक्तजन ने नकदी राशि जमा कराने के साथ ही टोकन हासिल किया है। मंदिर परिसर को नोटों की वंदनवार से सजाया गया। धनतेरस के एक दिन पहले कुबेर के धन से मां का श्रृंगार किया गया। अगले दिन  सुबह महाआरती के साथ ही भक्तों के दर्शन लिए मां के पट खोले गये जो दिवाली तक खुले रहे और भाईदूज से सामग्री लौटाने की शुरुआत की गयी। 

भक्तों की आस्था है कि यहां नोट-आभूषण रखने से सालभर घर में बरकत रहती है। खास बात यह कि देते और लेते समय कोई हिसाब-किताब नहीं होता। लोगों की आस्था और विश्वास सिर्फ एक टोकन के भरोसे है। पहले यहां टोकन सिस्टम नहीं होता था। टोकन के बाद पिछले साल से पासपोर्ट फोटो भी लेना शुरू कर दिया ताकि प्रसादी के रूप में लौटाई जाने वाली राशि व अन्य कीमती सामग्री में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी नहीं हो पाए। मंदिर के पुजारी ने बताया कि धनतेरस की पूर्वसंध्या को शाम 5 बजे तक नकदी राशि, आभूषण सहित अन्य कीमती सामग्री मां के दरबार में चढ़ाने के लिए भक्तों से ली जाती है। इसके बाद मंदिर का दरबार सजाया जाएगा। जो अगले दिन भक्तों के दर्शन के लिए खोला जाता है । 

कोरोना संक्रमण को देखते हुए धनतेरस से दीवाली तक भक्तों का मंदिर में प्रवेश निषेध रहा। मंदिर के बाहर तख्त भी लगा दिया गया था। यहां से भक्त महालक्ष्मी के दर्शन कर पाये। जहां वाहनों की पार्किंग की गयी वहां बैरिकेट लगाकर महिला व पुरूष अलग लाइनें लगाकर दर्शन करवाये गये । परंपरा में कोई बदलाव नहीं किया गया। कुबेर पोटली नहीं बांटी गयी।


राजा दुबे

Thursday, November 12, 2020

निमोनिया और कोरोना के घातक गठजोड़ से जूझ रहा है विश्व- राजा दुबे



इस वर्ष जब 12 नवम्बर को हम विश्व निमोनिया दिवस मना रहे हैं तब कोरोना संक्रमण काल मे कोरोना के साथ निमोनिया के घातक गठजोड़ से एक नये खतरे से विश्व को जूझना पड़ रहा है. मध्यप्रदेश के गज़रा राजा चिकित्सा महाविद्यालय, ग्वालियर के प्राध्यापक डॉ.अजयपाल सिंह के अनुसार मौसम बदलने के साथ कोरोना संक्रमण घातक होता जा रहा है। खासतौर से उन लोगों के लिए जिन्हें डायबिटीज के साथ दिल की बीमारी या अन्य कोई गंभीर बीमारी भी है. ऐसे मरीजों को वायरलजनित निमोनिया के साथ कोरोना संक्रमण हुआ तो उनकी हालत बिगड़ने की संभावना ज्यादा है. कोरोना संक्रमण के साथ वायरलजनित निमाेनिया होना काफी घातक है, इसलिए डायबिटीज और हार्ट के मरीज को यदि खांसी के साथ-साथ सांस लेने में तकलीफ महसूस हो तो उसे तुरंत विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए. समय रहते अगर निमोनिया का पता चल जाता है, तो उसका इलाज कर रोगी को पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है. दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि कोरोना वायरस या कोविड -उन्नीस अनजान कारणों से निमोनिया जैसी बीमारी के साथ ही सामने आया है बाद में पता चला कि इस बीमारी का कारण सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम कोरोना वायरस - टू या सार्स कोरोना वायरस - टू है. इसमें शुरुआत में हल्की सर्दी-जुकाम जैसे लक्षण होते हैं. इस सच्चाई के सामने आते ही वैश्विक पैमाने पर इस घातक गठजोड़ के प्रति ऐहतियात वापरा जा रहा है मगर विशेषज्ञों के अनुसार
इस खतरे को कम करके नहीं आँका जाना चाहिए.



वैश्विक गठबंधन की  प्रभावी पहल पर आरम्भ हुआ था- "विश्व निमोनिया दिवस"

विश्व निमोनिया दिवस, विश्व के अधिकांश देशों मेें 12 नवम्बर को मनाया जाता है. विश्व निमोनिया दिवस की प्रभावी पहल वर्ष 2009 में बच्चों में निमोनिया के रोकथाम के लिये एक वैश्विक गठबंधन ने की थी. वर्ष 2009 में, निमोनिया से हर साल 1.2 मिलियन अर्थात् बारह लाख बच्चों की मृत्यु एक बड़ा हादसा था और इसे रोकने कै लिये ही वैश्विक संगठन ने यह प्रभावी पहल की थी. वर्ष 2013 में, विश्व स्वास्थ्य संगठ ( वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन) और संयुक्त राष्ट्र की बच्चों की हित रक्षा के लिये गठित संस्था यूनीसेफ (यूनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रेन फण्ड) ने निमोनिया और डायरिया की रोकथाम और नियंत्रण के लिए एकीकृत वैश्विक कार्ययोजना जारी की थी, यह योजना 2025 तक हर देश में प्रति एक हज़ार जीवित जन्मों में से तीन से कम बाल निमोनिया से होने वाली मौतों का लक्ष्य निर्धारित करती है. चाइल्ड न्यूमोनिया के खिलाफ वैश्विक गठबंधन सरकारी, गैरसरकारी, अंतर्राष्ट्रीय, समुदाय-आधारित संगठन, अनुसंधान और शैक्षणिक संस्थानों, बुनियादी तौर पर जन स्वास्थ्य के लिये समर्पित संस्थाओं और व्यक्तियों का प्रभावी समूह है. निमोनिया से बचाव, रोकथाम और उपचार के लिए सरकार, सामान्यजन और समाजसेवी संगठनों की सक्रिय भागीदारी और अतिरिक्त संसाधनों की जरुरत होती है जिससे निमोनिया जैसे रोगों का वैश्विकस्तर पर मुकाबला किया जा सकें. 

निमोनिया चिकित्सा विज्ञान के लिये हमेशा एक बड़ी चुनौती रही है

न्यूमोनिया (जिसे बोलचाल में निमोनिया भी कहते है) एक जानलेवा बीमारी है. इसकी विश्वव्यापी उपस्थिति चिकित्सा विज्ञान के लिये हमेशा एक बड़ी चुनौती रही है. उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार विश्व में निमोनिया से प्रतिवर्ष लगभग चार सौ पचास मिलियन अर्थात् पैंतालिस करोड़ आबादी प्रभावित होती है जो कि विश्व की जनसंख्या का सात प्रतिशत है और इसके कारण प्रतिवर्ष लगभग चार मिलियन अर्थात चालीस लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है. इसी भयावह स्थिति के कारण उन्नीसवीं शताब्दी के चिकित्सा विज्ञानी ओस्लर द्वारा निमोनिया को "मौत बांटने वाले मुखिया" कहा गया था. बीसवीं शताब्दी में एंटीबायोटिक उपचार और टीकों के आने से बचने वाले लोगों की संख्या यद्यपि बेहतर हुई है बावजूद इसके विकासशील देशों में, बुज़ुर्गों, युवा उम्र के लोगों और जटिल रोगियों में निमोनिया अभी मृत्यु का प्रमुख कारण बना हुआ है.
निमोनिया की संभावना को बढ़ाने वाली परिस्थितियों और जोखिम कारकों में धूम्रपान, प्रतिरक्षा की कमी तथा मद्यपान की लत, गंभीर प्रतिरोधी फेफड़ा रोग, गंभीर गुर्दा रोग और यकृत रोग शामिल होते  हैं. अम्लता-दबाने वाली दवाओं जैसे प्रोटॉन-पम्प इन्हिलेटर्स या एच-टू ब्लॉकर्स का उपयोग निमोनिया के बढ़ते जोखिम के अहम् कारण हैं. उम्र का अधिक होना भी निमोनिया के होने को बढ़ावा देता है. विश्व
निमोनिया दिवस पर इन्हीं चुनौतियों का सामना करने
के चिकित्सकीय उपायों पर चर्चा होती है.

फैंफड़ों  में सूजन का एक जानलेवा संक्रामक रोग है निमोनिया

फुफ्फुस शोथ अथवा फुफ्फुस प्रदाह (निमोनिया) फेफड़े में सूजन वाली एक परिस्थिति है—जो प्राथमिक रूप से अल्वियोली (कूपिका) कहे जाने वाले बेहद सूक्ष्म वायु कूपों को प्रभावित करती है. यह मुख्य रूप से विषाणु या जीवाणु और कतिपय सूक्ष्मजीवों, कुछ दवाओं और अन्य परिस्थितियों जैसे स्वप्रतिरक्षित रोगों से संक्रमण द्वारा होती है. निमोनिया के आम लक्षणों में खांसी, सीने का दर्द, बुखार और सांस लेने में कठिनाई शामिल है. नैदानिक उपकरणों  यथा एक्स-रे और बलगम का कल्चर से निमोनिया का निदान किया जाता है. निमोनिया का उपचार, अंतर्निहित कारणों पर निर्भर करते हैं. प्रकल्पित बैक्टीरियाजनित निमोनिया का उपचार प्रतिजैविक द्वारा किया जाता है. यदि निमोनिया गंभीर हो तो प्रभावित व्यक्ति को आम तौर पर अस्पताल में भर्ती किया जाता है.निमोनिया मुख्य रूप से बैक्टीरिया या वायरस द्वारा और कभी-कभी फफूंद और परजीवियों द्वारा होता है चिकित्सा विज्ञान ने हालाँकि संक्रामक एजेंटों के सौ से अधिक उपभेदों की पहचान की  है लेकिन अधिकांश मामलों के लिये इनमें केवल कुछ ही जिम्मेदार  होते हैं.वायरस व बैक्टीरिया के मिश्रित कारण वाले संक्रमण बच्चों के संक्रमणों के मामलों में पैंतालिस प्रतिशत  तक और वयस्कों में पन्द्रह प्रतिशत मामलों में ही जिम्मेदार होते हैं समय पर निमोनिया की पहचान से निमोनिया का सफल उपचार सम्भव होता है.

निमोनिया के खतरनाक प्रकार के विरुद्ध दस साल पहले बन गया था टीका 

दुनिया में निमोनिया से सबसे ज़्यादा पाँच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत हो जाती है और इसी अनपेक्षित को टालने के लिये ठीक दस साल पहले 12 दिसम्बर 2010 को निकारागुआ में  निमोनिया से लड़ने के लिए एक नये टीके को  लाँच किया गया था. इस टीके से निमोनिया के एक सबसे ख़तरनाक माने जानेवाले प्रकार, न्यूमॉकॉकल से लड़ने में आसानी हुई. न्यूमॉकॉकल निमोनिया का एक जानलेवा प्रकार है. इस प्रकार से मेनिंजाइटिस यानि दिमागी बुख़ार और निमोनिया जैसी बीमारी होती है.पूरी दुनिया में पाँच साल से कम उम्र के अधिकाशं बच्चों की मौत के लिए निमोनिया का ये प्रकार ज़िम्मेदार माना जाता है. वर्ष 2011 से दुनिया के चालीस विकासशील देशों में इस टीके की बिक्री शुरू की गई. इसीप्रकार हेमोफिलस इन्फ्लुएंज़ा और स्ट्रेप्टोकॉकस निमोनिया के विरुद्ध टीकाकरण के अच्छे साक्ष्य उपलब्ध है. स्ट्रेप्टोकॉकस निमोनिया के विरुद्ध बच्चों को टीकाकरण प्रदान करने से वयस्कों में इसके संक्रमण में कमी आयी है, क्योंकि कई सारे वयस्क इस संक्रमण को बच्चों से ग्रहण करते है. एक स्ट्रेप्टोकॉकस निमोनिया टीका वयस्कों के लिये उपलब्ध है और इसको हमलावर निमोनिया रोग के जोखिम को कम करता पाया गया है. अन्य वे टीके जिनमें निमोनिया के विरुद्ध रक्षा प्रदान करने की क्षमता है, उनमें परट्यूसिस, वेरिसेला और चेचक के टीके भी शामिल हैं। दीगर संक्रामक रोगों के समान निमोनिया के रोकथाम मेंं भी टीकाकरण की महत्वपूर्ण भूमिका है.

निमोनिया से  बचाव के लिये ऐहतियात जरुरी है 

निमोनिया जानलेवा बीमारी जरुर है मगर हल्के निमोनिया को घर में आराम, एंटीबायोटिक दवाओं और बहुत से तरल पदार्थों के साथ इलाज किया जा सकता है. यदि मामला गंभीर है तो किसी व्यक्ति को अस्पताल उपचार की आवश्यकता हो सकती है. बचपन में निमोनिया से बचाव के लिए टीकाकरण कराया जाना चाहिए. टीकाकरण के अलावा, डॉक्टर पांच महीनों के लिए विशेष स्तनपान का सुझाव देते हैं, पौष्टिक आहार, एक अच्छी स्वच्छता बनाए रखने और स्वस्थ जीवन शैली निमोनिया को रोक सकते हैं. न्यूमोकोकल टीके जो स्ट्रेटोकोकस न्यूमोनिया नामक बैक्टीरिया के खिलाफ इस्तेमाल किये जाते हैं, उनका उपयोग निमोनिया के कुछ मामलों को विफल कर सकता है.निमोनिया आसानी से रोका जा सकता है और उपचार योग्य भी है, इसके बावजूद पांच साल से कम उम्र के बच्चों में होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में से यह एक है. टीके और अन्य निवारक प्रयास निमोनिया बीमारी के बोझ को कम कर रहे हैं, फिर भी बहुत अधिक काम करने की आवश्यकता है.गरीब समुदायों में रहने वालों को निमोनिया का सबसे अधिक खतरा है. निमोनिया बच्चों और परिवारों को हर जगह प्रभावित करता है, लेकिन दक्षिण एशिया (जिसमें भारत भी शामिल है) और उप-सहारा अफ्रीका में इसका प्रकोप ज्यादा है.विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि प्रत्येक बच्चा, चाहे वे जहाँ भी पैदा हुआ हो, वह जीवनरक्षक टीकों और दवाओं तक पहुँच का हकदार है अत: विश्व निमोनिया दिवस पर एक- एक बच्चा टीकाकृत हो यह सुनिश्चित करना जरुरी है.

राजा दुबे. 

Tuesday, November 10, 2020

विश्वशांति की कामना और विकास के संकल्प के साथ मनाते है यह दिवस- राजा दुबे



विश्वशांति की कामना और विश्व के समग्र विकास के संकल्प के साथ समूचा विश्व प्रतिवर्ष दस नवम्बर को
-"विश्व विज्ञान दिवस" मनाता है. इस दिवस को मनाने का उद्देश्य समाज में विज्ञान की भूमिका को रेखांकित करना और इसके द्वारा जनसामान्य के जीवन में विज्ञान के प्रभाव को प्रदर्शित करना है.विश्व विज्ञान दिवस के आयोजन की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक,वैज्ञानिक और साँस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) द्वारा की गई थी.शांति एवं विकास कार्यों में विज्ञान के योगदान को पारिभाषित करने और इस सन्दर्भ में विज्ञान के महत्व को दर्शाने के लिये इस दिन गंभीर विचार-विमर्श होता है.वर्ष 1999 में हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में दस नवम्बर को संयुक्त रूप से अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान परिषद और यूनेस्को द्वारा विज्ञान पर विश्व सम्मेलन का आयोजन किया गया था विश्व विज्ञान दिवस उसी सम्मेलन के अनुसरण में मनाया जाता है.यूनेस्को द्वारा इस दिवस की स्थापना वर्ष 2001 में की गई थी और वर्ष 2002 से प्रतिवर्ष विश्व के लगभग सभी देशों में विज्ञान के लाभों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए इसे  मनाया जाता है. विश्व में विज्ञान के माध्यम से मानव जाति के कल्याण का सूत्रपात किये जाने के लिये यह यूनेस्को का एक अनूठा प्रयास था जिसे विश्व के लगभग सभी देशों का समर्थन मिला. इस दिन विज्ञान के सृजनात्मक पक्ष को अपनाने का संकल्प लिया जाता है जिससे मानव जाति के कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो.

सतत विकास में विज्ञान की भूमिका की पड़ताल की कोशिश होती है इस दिन

विश्व विज्ञान दिवस विश्व के शांतिपूर्णऔर सतत विकास में विज्ञान की भूमिका की गहन पड़ताल का दिन भी होता है. इस दिन समाज के कल्याण के लिए विज्ञान के उपयोग के लिए प्रतिबद्धता को भी दोहराया जाता है. इस समय विज्ञान के समक्ष जो चुनौतियाँ हैं उनकी ओर ध्यान आकर्षित करना और विश्व में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास में योगदान पर चर्चा करना भी होता है.इस दिवस के आयोजन का एक बड़ा उद्देश्य विश्व में सामान्य नागरिकों तक विज्ञान के विकास की जानकारी पहुंचाना भी है जिससे वे रोजमर्रा की जिंदगी में विज्ञान के महत्व को समझ सकें.हम जिस पृथ्वी पर रहते हैं उसकी भी हमें सीमित जानकारी है. विश्व विज्ञान दिवस हमें पृथ्वी की समझ को व्यापक बनाने और सतत विकास के लिये वैज्ञानिकों की अहम्  भूमिका पर भी इस दिन विमर्श किया जाता है..वस्तुत: सतत विकास की अवधारणा बिना विज्ञान के सम्भव ही नहीं ं है. असल में ं विश्वशांति और सतत वैश्विक विकास अन्योन्याश्रित
लक्ष्य है और विज्ञान के माध्यम से इन दोनों लक्ष्यों को पाना ही आज़ के समय की सबसे प्रमुख जरुरत है और विश्व विज्ञान दिवस पर इसी प्रक्रिया पर गहन विचार विमर्श होता है. विज्ञान एक अध्येय विषय के रुप में जितना जरुरी है उससे ज्यादा जरूरी है जन सामान्य में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास. विश्व विज्ञान दिवस पर इसी वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास पर बात होती है.

विज्ञान के महत्व और दैनिक जीवन में उसकी उपयोगिता रेखांकित होती है इस दिन

विश्व विज्ञान दिवस पर विज्ञान के महत्व और दैनिक जीवन में इसकी उपयोगिता को रेखांकित किया जाता है . इस आयोजन का लक्ष्य समाज और विज्ञान के बीच की दूरी मिटाने और वैज्ञानिक आविष्कारों के महत्व को स्थापित करना है. समूचे विश्व में इस दिन को शासकीय और गैर-शासकीय संस्थाएँ, वैज्ञानिक शोध संगठन, व्यावसायिक संघ, मीडिया, स्थानीय स्वशासी संस्थाएं यथा नगर निगम - नगरपालिकाएँ, विज्ञान के शिक्षक और सभी विद्यालय  इस दिन को पूरे उत्साह के साथ मनाते हैं. यह दिन हर वर्ष हमें 
हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में सम्पन्न विश्व विज्ञान सम्मेलन में दो दस्तावेजों में से एक में घोषित उद्देश्य, विज्ञान संबंधी घोषणा और वैज्ञानिक ज्ञान के उपयोग, को प्राप्त करने तथा सम्मेलन की वैज्ञानिक कार्यसूची में शामिल संस्तुतियों का एक ढाँचा (फ्रेमवर्क) बनाने का अवसर देता है .यूनेस्को हर वर्ष विश्व विज्ञान दिवस पर एक रपट प्रकाशित करता है . विज्ञान को लोकप्रियता दिलाने और विभिन्न समसामयिक समस्याओं जैसे - प्रबंधन, ताजा पानी और जैविक विविधता की सुरक्षा जैसे विषयों पर बात करने के लिए यूनेस्को द्वारा एक त्रैमासिक पत्रिका- "अ वर्ल्ड ऑफ साइंस "भी प्रकाशित की जाती है. यूनेस्को का
यह प्रयास इस मामले में भी सराहनीय है कि इससे
विज्ञान की जनप्रियता को बढ़ाने की राह  खुलती है  
यूनेस्को की यह पहल  जनप्रियता को एक नया आयाम देती है.


कोरोना संक्रमण काल में विज्ञान का एक नया और पुरअसर प्रारुप नज़र आया

कोरोना संक्रमण काल में विज्ञान के नये और पुरअसर
प्रारुप पर भी  हाल ही में चर्चा-परिचर्चा श्रृंखला (डिस्कोर्स सीरिज़) में एक प्रभावी टिप्पणी की गई. केन्द्र सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ( डिपार्टमेंट ऑफ साईन्स एण्ड टेक्नोलॉजी) की स्थापना के पचास वर्ष होने पर आयोजित इस परिचर्चा में - " महामारी के इतर पहलू " ( द अदर साइड ऑफ़ पैनडैमिक) पर चर्चा करते हुए विभाग के सचिव आशुतोष शर्मा ने बताया कि कोविड-19 महामारी काल में घर से बाहर निकलते समय हम इससे क्या सीख लें रहे हैं, इसे समझना जरूरी है .इसके अलावा, अब हमारे सामने कई चुनौतियाँ भी हैं. जब हम चुनौतियों की बात करते हैं तो हमारे सामने नए अवसर भी आते हैं.और ऐसे अवसर विज्ञान से जुड़े हुए अलग-अलग क्षेत्रों में हमारी बेहतरी की मिसाल बन सकते हैंऔर  इस संक्रमण काल से हमने काफी कुछ सीखा है और हम आगे भी विज्ञान के नए और पुरअसर प्रारूप देखने में भी सक्षम होंगे.महामारी से बहुत कुछ सीखने की बात भी इस अवसर पर कही
गई यह भी कहा कि  आगे चलकर विज्ञान के जो नए प्रारूप सामने आयेंगे वे बेहद प्रभावी होंगे . यह भी कहा गया कि साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी के लिए 'इनोवेशन चेन' (नवोन्मेष श्रृंखला) की जरूरत होती है  जिसमें इनोवेशन ईको-सिस्टम ( नवोन्मेष पारिस्थितिक तंत्र) के कई आयाम शामिल होते  है .विज्ञान को भविष्य के लिए तैयार रहने के साथ-साथ अलग-अलग क्षेत्रों को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के साथ बढ़ाने की कोशिश भी करनी होगी.



विज्ञान दिवस , सामाजिक सरोकार में विज्ञान की भूमिका का पुनर्आविष्कार करता है

विश्व के सतत विकास के साथ-साथ सर्वांगीण विकास  की बहुआयामी यात्रा तक विज्ञान ने सामाजिक सरोकारों में भी अपनी भूमिका बखूबी निभाई है  . विज्ञान ने भौगोलिक दूरियों को नगण्य करके व्यापार और विकास के व्यापक स्वरूप को आकार दिया है. सूचना प्रौद्योगिकी की सहायता से आज अलग- अलग उपमहाद्वीप के बीच मजबूत आर्थिक और व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित किए जा चुके हैं .सतत परिवर्तन की इस यात्रा में, विज्ञान ने सोशल मीडिया के द्वारा लोगों को जोड़कर पारिवारिक और सामाजिक निकटता को सहजता से बढ़ा दिया हैआज लगभग हर रोज ही जिस महिला सशक्तिकरण की बात हम करते हैं, उसको अनेक सुरक्षा उपकरणों के साथ महिलाओं के लिए सहूलियत और सुलभता भरे वातावरण का निर्माण करने में भी विज्ञान ने अपना योगदान दे कर शांति के प्रति हमारी कटिबद्धता को रेखांकित किया है.विज्ञान के मौजूदा अत्याधुनिक स्वरुप ने सूचना प्रौद्योगिकी के एक नये युग की शुरूआत की है जिसमे ओपन हार्टसर्जरीऔर स्टेम सेल थेरेपी ने चिकित्सकीय विज्ञान के क्षेत्र अभूतपूर्व उपलब्धियाँ हासिल की हैं तो मनोरंजन के क्षेत्र को टीवी, रेडियो, इंटरनेट और वीडियो गेम्स जैसे अनेक आविष्कार विज्ञान से ही प्राप्त हुए हैं. इन सबसे विज्ञान की सामाजिक सरोकार के प्रति जो प्रतिबद्धता बढ़ी उससे भी विज्ञान की सतत विकास के संवाहक वाली भूमिका सुस्पष्ट हुई है.

राजा दुबे