Saturday, July 4, 2020

भारत के नितिन मेनन बने एलीट पैनल के सबसे युवा अम्पायर

भारत के युवा अंपायर नितिन मेनन को इंग्लैंड के नाइजेल लोंग की जगह वर्ष 2020-21 सत्र के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के अंपायरों की एलीट पैनल में शामिल किया गया है. छत्तीस  साल के मेनन को सत्तावन प्रथम श्रेणी मैचों के अलावा तीन टेस्ट, चौबीस वनडे और सोलह टी ट्वंटी अंतरराष्ट्रीय मैचों में और चालीस आईपीएल मैचों में अंपायरिंग का अनुभव है। वह इस सूची में जगह बनाने वाले पूर्व कप्तान श्रीनिवास वेंकटराघवन और सुंदरम रवि के बाद तीसरे भारतीय है। रवि ने पिछले साल इस पैनल  से निवृत्ति ले ली थी. मेनन इस पैनल के सबसे युवा सदस्य बन गए हैं. ईसीसी के महाप्रबंधक (क्रिकेट) ज्योफ एलरडाइस (अध्यक्ष), पूर्व खिलाड़ी और कमेंटेटर संजय मांजरेकर और मैच रेफरियों रंजन मदुगले एवं डेविड बून की चयन समिति ने मेनन का चुनाव किया। मेनन इससे पहले अंपायरों के एमिरेट्स आईसीसी अंतरराष्ट्रीय पैनल का हिस्सा थे.

एलीट पैनल में अलीम डार, कुमार धर्मसेना, मरायस एरस्मस, क्रिस गैफनी, माइकल गॉग, रिचर्ड इलिंगवर्थ, रिचर्ड  केटलबोरो, ब्रूस ओक्सेनफोर्ड, पॉल रीफेल, रॉड टकर और जोएल विल्सन ने अपनी जगह बरकरार रखी है। कोविड-19 महामारी के कारण आईसीसी ने स्थानीय अंपायरों के इस्तेमाल की योजना बनाई है, जिससे मेनन अगले साल भारत में इंग्लैंड के खिलाफ पांच मैचों कीटेस्ट सीरीज में मैच अधिकारी की भूमिका निभा सकते है। आईसीसी अगर इस नियम को हटाती है तो वह अलगे साल ऑस्ट्रेलिया में एशेज सीरीज में भी अपायरिग करते दिख सकते है।

नितिन मेनन ने बतौर बल्लेबाज अपना कैरियर शुरू किया था.वे मध्यप्रदेश के लिए अंडर-सिक्सटीन , अंडर- नाइन्टीन , अंडर ट्वंटी , अंडर - ट्वंटी फाईव और दो लिस्ट-ए वनडे मैच खेल चुके हैं. वर्ष 2006 में बीसीसीआइ की अंपायरिंग परीक्षा थी और पिता के कहने पर परीक्षा दे दी .इसके बाद वर्ष 2007 से घरेलू मैचों के जरिए अंपायरिंग का सिलसिला ऐसा चला कि अब तक जारी है.नितिन के पिता नरेंद्र भी अंतरराष्ट्रीय अंपायर रहे है .वे दो टेस्ट मैचों में थर्ड अंपायर जबकि एक मैच में चौथे अंपायर रहे हैं.चार वनडे मैचों में मैदानी अंपायर भी रहे हैं.

अपने चयन पर नितिन मेनन ने कहा, ''एलीट पैनल में नाम होना मेरे लिए बहुत सम्मान और गर्व की बात है। दुनिया के प्रमुख अंपायरों और रेफरियों के साथ-साथ नियमित रूप से काम करने का मेरा हमेशा से सपना रहा है ".' मेनन पिछले 13 साल से अंपायरिंग कर रहे है .उन्होंने कहा, मेरी प्राथमिकता अंपायरिंग की बजाय देश के लिए खेलना थी, मैंने हालाँकि 22 साल की उम्र में खेलना छोड़ दिया था और 23 साल की उम्र में सीनियर अंपायर बन गया था.एक साथ खेलना और अंपायर करना संभव नहीं था इसलिए मैंने सिर्फ अंपायरिंग पर ध्यान देने का फैसला किया.

क्या होता है  एलीट अम्पायर पैनल? 

आईसीसी का एलीट अम्पायर पैनल आईसीसी द्वारा समूचे विश्व में होने वाले अधिकृत टेस्ट मैचों और एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैचों में अम्पायरिंग के लिये अम्पायरों को नियुक्त करता है. यह पैनल पहली बार अप्रेल 2002 में गठित  किया गया था ताकि विश्व क्रिकेट में अम्पायरिंग के स्तर में अपेक्षित सुधार किया जाता सके.इस पैनल के गठन के बाद अब टेस्ट मैचों में दोनों मैदानी अम्पायर और एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैचों में एक मैदानी अम्पायर तटस्थहोगा.इसके
पहले तक टेस्ट मैचों में एक अम्पायर ही तटस्थ होता था जबकि क्षेत्र एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैचों में दोनों अम्पायर स्थानीय होते थे.अब विश्व में होने वाली सभी क्रिकेट प्रतियोगिताओं में  एलीटअम्पायर की सुविधा उपलब्ध करवाई जातीं हैं जो विश्व के सर्वश्रेष्ठ अम्पायर माने जाते हैं. एलीट अम्पायर के रुप में चयन के लिये अभ्यर्थी का चयन करते समय यह मापदण्ड रखा जाता है कि वह अम्पायर प्रतिवर्ष कम से कम पाँच टेस्ट मैच और पन्द्रह एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैचों में अम्पायरिंग कर चुका हो. आईसीसी की अम्पायर चयन  समिति प्रतिवर्ष एलीट पैनल के लिये अम्पायर चुनती है.

राजा दुबे

Thursday, July 2, 2020

डॉ.पल्लवी तिवारी को प्रतिष्ठापूर्ण स्टेम टू डी स्कालर्स अवार्ड दिया गया

मध्यप्रदेश के इन्दौर शहर की रहने वाली डॉ.पल्‍लवी तिवारी को ब्रेन ट्यूमर के इलाज ़ में उनके शोध के लिये डेढ़ लाख डॉलर के स्टेम टू डी स्‍कॉलर्स अवार्ड के लिए चुना गया है .पल्लवी तिवारी अमेरिका में प्रतिष्ठित केस वेस्टर्न रिजर्व यूनिवर्सिटी, क्लीवलैंड में बायोमेडिकल इंजीनियरिंग विभाग में सहायक प्रोफ़ेसर है.इस अवार्ड को जॉनसन एण्‍ड जॉनसन स्टेम टू डी स्‍कॉलर्स अवार्ड के नाम से जाना जाता हैं डॉ. पल्‍लवी तिवारी को डेढ़ लाख अमेरिकी डॉलर यानी भारतीय मुद्रा में करीब सवा करोड़ रुपए की पुरस्कार निधि प्रदान की जायेगी. उन्हें तीन साल तक के लिये परामर्शदाता की भूमिका भी सौंपी गई है. इस अवधि में वे अवार्ड प्रदाता संस्था को परामर्श भी देंगी.यह अवार्ड उस युवा महिला को दिया जाता है, जिसने तयशुदा संवर्ग में संबंधित विषय में शोध से जुड़ा विशिष्ट योगदान दिया हो.डॉ. पल्‍लवी तिवारी को अमेरिकी सरकार (स्टेट ऑफ हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव) द्वारा ब्रेन ट्यूमर में उनकी रिसर्च के लिए पहले भी विशेष सराहना मिल चुकी है. यह अवार्ड पाँच संवर्ग में दिया जाता है, पल्लवी को यह अवार्ड प्रोद्योगिकी संवर्ग में दिया गया है.प्रोद्यौगिकी के अलाावा यह अवार्ड खगोल विज्ञान,अभियांत्रिकी, गणित ,अभिकल्पना और विनिर्माण के क्षेत्र में ं उल्लेखनीय कार्य के लिये दिया जाता है. इस अवार्ड को पाने के लिए दुनिया भर के तमाम विश्‍वविद्यालयों से जुड़ी 541 युवा महिलाओं ने आवेदन किया था.ज्‍यूरी ने डॉ. पल्‍लवी तिवारी को प्रौद्योगिकी श्रेणी में ब्रेन ट्यूमर की महत्वपूर्ण नैदानिक समस्याओं को दूर करने के लिए किए गए अत्याधुनिक अनुसंधान के लिए चुना है. डॉ. पल्‍लवी ने अपने अत्‍याधुनिक अनुसंधान में कम्प्यूटेशनल इमेजिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग जैसे महत्‍वपूर्ण विषयों को शामिल किया था.

क्या है स्टेम टु डी स्कालर्स अवार्ड

जॉनसन एण्ड जॉनसन सँस्थान विज्ञान, प्रोद्यौगिकी, गणित, अभियांत्रिकी, विनिर्माण और डिजाइनिंग के क्षेत्रों में शोधरत प्रतिभाशाली वरिष्ठ महिला व्याख्याताओं और सहायक प्राध्यापकों को यह स्टेम टू डी स्कालर्स अवार्ड प्रदान करता है.अवार्ड विजेता को 1,50,000 डॉलर की सम्मान निधि के अलावा जॉनसन एण्ड जॉनसन की ओर से तीन साल की मेंटरशिप ( परामर्शदाता की भूमिका) भी सौंपी जाती है. यह मेंटरशिप क्लीनिकल ट्रायल्स , ऑरीगामी प्रेरित रॉबोटिक्स, प्लेनेटरी सिस्टम, हॉस्पिटल लाइटिंग्स और ब्रेन ट्यूमर व बाउल डिसीज़ के उपचार में अग्रणी अनुसंधान के लिये प्रदान की जाती है.इन क्षेत्रों में जॉनसन एण्ड जॉनसन ने - स्टेम टू डी स्कॉलर्स अवार्ड और मेंटरशिप की स्थापना जून 2017 में की थी. इस अवार्ड का उद्देश्य इन क्षेत्रों में कार्यरत युवा मेधावी महिला अनुसंधानकर्ताओं को उच्चस्तरीय अनुसंधान के लिये प्रेरित करना , अनुसंधान के प्रवाह को गतिमान बनाये रखना और इन प्रतिभाओ को अपने कैरियर की जटिल अवस्था में  प्रायोजित करना है. डॉ.पल्लवी तिवारी को जॉनसन एण्ड जॉनसन का तीसरा स्टेम टू डी स्कालर्स अवार्ड प्रोद्यौगिकी  संवर्ग में ब्रेन ट्यूमर के उपचार में उत्कृष्ठ अनुसंधान के लिये दिया गया हैपल्लवी तिवारी ,केस वेस्टर्न रिज़र्व यूनिवर्सिटी मेंबायोमेडीकल इंजीनियरिंग विभाग में सहायक प्राध्यापक हैं और कम्प्यूटेशनल इमेजिंग, आर्टीफिसयल इंटेलिजेंस और ब्रेन ट्यूमर के उपचार में सबसे जटिल क्लिनिकल समस्याओं को सम्बोधित कुछ मशीन लर्निंग के क्षेत्र में उच्च अनुसंधान की अगुवाई कर रहीं हैं.

भारत में भी सम्मानित हो चुकीं हैं पल्लवी

पल्लवी को जनवरी 2016 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा भारत की सौ मेधावी महिलाओं के रुप में भी सम्मानित किया जा चुका है." बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ " अभियान की पहली सालगिरह पर मेधावी माँ की मेधावी बेटी संवर्ग में पल्लवी को अपनी माँ डॉ. स्वाति तिवारी, जो हिन्दी की एक प्रतिष्ठित लेखिका हैं के साथ कैंसर के उपचार के क्षेत्र में उल्लेखनीय अनुसंधान के लिये सम्मानित किया गया  गया था.वहीं, अमेरिका में फोर्टी अंडर फोर्टी ( चालीस साल से कम उम्र की चालीस प्रतिभा ओं) में भी चयनित किया जा चुका है. डॉ .पल्‍लवी तिवारी को अमेरिका के रक्षा मंत्रालय द्वारा भी युवा इन्वेस्टिगेटर अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है.

राजा दुबे

Wednesday, July 1, 2020

डॉक्टर्स सदैव प्रणम्य रहे हैं कोरोना संक्रमण ने उन्हें पूज्य बनाया

समूचे विश्व में जिन पेशों को प्रतिष्ठापूर्ण और सम्मान्य माना जाता है उनमें डॉक्टर्स का पेशा अग्रगण्य है.विश्व में कोरोना संक्रमण के समय तो डॉक्टर्स कोरोना योद्धा के रुप में अपनी सबसे अहम पहचान बना चुके हैं. डॉक्टर्स ने अपने काम से ये दर्जा हासिल किया है. चिकित्सा के क्षेत्र में डॉक्टर्स ने गहन शोध से कई  बीमारियों की रोकधाम और उनके उपचार के स्तुत्य प्रयास किये हैं.डॉक्टर्स के समर्पण, कार्य के प्रति निष्ठा, ईमानदारी, लगन और उनके सेवाभाव  को सम्मान देने के लिए और उनके अवदान की सराहना और उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के लिये प्रतिवर्ष 01 जुलाई को समूचे विश्व में डॉक्टर्स डे मनाया जाता है.  केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ  हर्षवर्धन ने तो पिछले दिनों एक वेबीनार में कहा कि कोरोना संक्रमण पर नियंत्रण की तो हम बिना चिकित्सकों के अवदान के कल्पना भी नहीं कर सकते हैं , सच तो यह है कि चिकित्सक तो हमारे देश में सदैव प्रणम्य रहे हैं मगर कोरोना संक्रमण के नियंत्रण में उनकी अभूतपूर्व भूमिका ने उन्हें पूज्य बना दिया है.अपनी जान को जोखम में डालकर कोरोना पीड़ितों को बचाने में सन्नद्ध डॉक्टर्स सही मायनों में कोरोना योद्धा है.

भारत रत्न डॉ. बिधानचन्द्र रॉय की स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिये मनाते हैं- डॉक्टर्स डे

भारत में डॉक्टर्स डे की शुरुआत वर्ष 1991 मे भारत सरकार द्वारा की गई थी . तब से हर साल जुलाई की पहली तारीख राष्ट्रीय डॉक्टर्स डे के रूप में पहचानी जाती है . इस दिन को पूरे भारत में महान चिकित्सक और पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री डॉ.बिधानचन्द्र रॉय का सम्मान करने एवं उन्हें श्रद्धाँजलि देने के लिए सुनिश्चित किया गया.डॉ बिधानचंद्र रॉय का जन्म  01 जुलाई 1882 को बिहार के पटना शहर में हुआ था, और इसी दिन 80 साल बाद इनकी मृत्यु हो गई. उन्होंने कलकत्ता से अपना मेडिकल स्नातक का कोर्स पूरा करने के पश्चात वर्ष 1911 में आपने लंदन में एम.आर.सी.पी.और एफ.आर.सी.पी .डिग्री हासिल की और भारत वापस आकर उसी वर्ष उन्होंने भारत में एक चिकित्सक के रूप में अपना मेडिकल कैरियर शुरू किया.वे देश के एक प्रसिद्ध चिकित्सक और प्रसिद्ध शिक्षाविद के साथ- साथ स्वतंत्रता सेनानी भी थे उन्होंने महात्मा गाँधी के द्वारा किये गये आंदोलनों में हिस्सा लिया था और उनके द्वारा किये गये अनशन में उनकी देखभाल भी की . आजादी के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के नेता बने और फिर बाद में वे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने. उन्हें वर्ष 1961 में भारत रत्न पुरस्कार से नवाजा गया था. इसके अलवा इनकी मृत्यु के बाद वर्ष 1976 में इन्हें याद करने के लिए डॉ बी सी रॉय राष्ट्रीय पुरस्कार की स्थापना भी की गई. यह पुरस्कार उन्हें सम्मान और  श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए था. अतः ऐसे महान व्यक्तित्व को सम्मान देने और याद करने के लिए ही डॉक्टर्स डे की शुरुआत की गई.      

डॉक्टर्स की भूमिका पर गँभीर विमर्श ही डॉक्टर्स डे का महत्वपूर्ण उद्देश्य है 

एक नागरिक और  एक स्वस्थ व्यक्ति के रुप में अपने परिवार, अपने समाज, अपने देश और मानवमात्र के लिये अपनी सार्थक भूमिका निभाने के लिये हर व्यक्ति को स्वस्थ रहना होता है और उसके स्वस्थ रहने की इस जरुरत को पूरा करने में उस व्यक्ति के जीवन में एक डॉक्टर अहम भूमिका निभाता है. जहाँ एक ओर लोगों के लिए डॉक्टर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, वहीं दूसरी ओर डॉक्टर्स भी अपने मरीजों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समूची गंभीरता के साथ पूरा करते हैं. ऐसे में उनका सम्मान हमारे लिए गर्व की बात होनी चाहिए. इसी उद्देश्य से भारत सरकार ने डॉक्टर्स के सम्मान के लिये एक दिन मुकर्रर किया जो.डॉक्टर्स की भूमिका के प्रति एक जागरूकता अभियान के रूप में शुरू किया गया.यह एक वार्षिक उत्सव है जो आम लोगों को डॉक्टर्स की भूमिका, महत्व एवं उनके द्वारा की गई अनमोल देखभाल के बारे में जागरूक होने में मदद करता है. डॉक्टर्स के अवदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का यह वार्षिक उत्सव सभी डॉक्टर्स के लिए प्रोत्साहन का दिन होता है. यह जागरूकता अभियान सभी डॉक्टर्स को उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के प्रति जिम्मेदारी के निर्वहन के प्रति सचेत भी करता है और जीवन रक्षा के ध्येय के प्रति समर्पण की प्रेरणा देता है.यह दिन उनके प्यार, स्नेह और रोगियों की अनमोल देखभाल के प्रति उनके समर्पण भाव के लिए धन्यवाद देने का  दिन  होता है. इसलिए इस दिन को एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है.      



कोरोना पर केन्द्रित है इस वर्ष की थीम

वर्ष 2020 में डॉक्टर्स डे की थीम है -"कोरोना वायरस से आपको बचाते समय उच्च जोखिम में होते हैं डॉक्टर्स फिर भी वो कोरोना संक्रमण की मृत्यु दर को   कम करने में जुटे हैं " वस्तुत: कोरोना संक्रमण पर नियंत्रण के  दौरान कैसे डॉक्टर अपनी जान पर खेलकर मरीजों की देखभाल कर रहे हैं, उन्हें ठीक कर रहे हैं यह गौरव की बात है अत: हम सबको उनका अभिनन्दन करते हुए उन्हें शुभकामनाएँ देना चाहिए . कोरोना काल में जिस तरह डॉक्टर्स मरीजों के लिए हर संभव कोशिश कर रहे उसके परिप्रेक्ष्य में यह दिन खास है और स्वयम्  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्विटर पर एक वीडियो में  डॉक्टर्स को धन्यवाद दिया है उन्होंने कहा है कि भारत डॉक्टर्स और मेडिकल स्टाफ को सलाम करता है जो कोरोना से जंग में सबसे आगे हैं।

बहुआयामी आयोजन के साथ मनाया जाता है डॉक्टर्स डे

डॉक्टर्स के अमूल्य योगदान से परिचित होने और
उनके अवदान के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिये विभिन्न
व्यक्ति और संगठन इस दिन कई आयोजन करते हैं
मुख्य रुप से  सरकारी और निजी स्वास्थ्य संगठनों में कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं. इसे विशेष रूप से उत्तरी कोलकाता एवं उत्तर – पूर्वी कोलकाता सामाजिक एवं कल्याण संगठनों और रोटरी क्लब द्वारा मनाया जाता है .डॉक्टर्स डे पर हर साल यहाँ भव्य आयोजन होता है. इस दिन चिकित्सा पेशे से जुड़े विभिन्न पहलुओं जैसे स्वास्थ्य जाँच, इलाज, रोकथाम, रोग का उचित उपचार आदि मुद्दों  पर व्यापक  चर्चा और गहन विमर्श करने से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं.इस दिन स्वास्थ्य की देखभाल करने वाले  संगठनों द्वारा कई स्वास्थ्य केन्द्रों और सार्वजनिक स्थानों पर आम जनता के लिए कुछ चिकित्सा जाँच शिविर आयोजित किये जाते हैं, जो बिलकुल मुफ्त होते हैं.इसके अलावा इस दिन गरीबों एवं वरिष्ठ नागरिकों के बीच स्वास्थ्य की स्थिति, स्वास्थ्य को लेकर जरुरी विमर्श, स्वास्थ्य के लिये पोषण से जुड़ी सलाह पुरानी बीमारियों के  प्रति जागरूकता का आकलन करने के लिए जनरल स्क्रीनिंग टेस्ट शिविर भी आयोजित किये जाते हैं. हर किसी के जीवन में डॉक्टर्स की महत्वपूर्ण भूमिकाओं के बारे में जागरूक करने के लिए मुफ्त में ब्लड टेस्ट, रैंडम शुगर टेस्ट, ईसीजी, ईईजी, ब्लड प्रेशर चेकअप आदि गतिविधियों का आयोजन किया जाता है. युवा छात्रों को डेडीकेटेड मेडिकल प्रोफेशन की तरफ प्रोत्साहित करने के लिए स्कूलों और कॉलेजों के स्तर पर कुछ गतिविधियाँ आयोजित की जाती है, मेडिकल टॉपिक्स पर चर्चा, क्विज प्रतियोगिता, खेल गतिविधियाँ, मेडिकल प्रोफेशन को मजबूत और अधिक जिम्मेदार बनाने के लिए नई और प्रभावी शैक्षिक रणनीतियाँ लागू करना एवं क्रिएटिव ज्ञान के लिए छात्रों को वैज्ञानिक उपकरण का लाभ पहुँचाने की बात भी की जाती है.हर साल जुलाई की 01 तारीख को अधिकतर मरीज अपने डॉक्टर्स को धन्यवाद करते हुए उन्हें ग्रीटिंग कार्ड्स, प्रशंसा कार्ड, ई कार्ड्स, फूलों के गुलदस्ते, मेल के माध्यम से ग्रीटिंग मैसेज आदि देते हैं. स्वास्थ्य केन्द्रों, अस्पतालों, नर्सिंग होम या डॉक्टर्स द्वारा घरों पर विशेष मीटिंग, पार्टी एवं डिनर का आयोजन किया जाता है, ताकि मेडिकल प्रोफेशन के लिए डॉक्टर्स के दिन और उनके योगदान के महत्व को याद किया जा सके. इस तरह से इस विशेष दिन को अलग – अलग तरह के आयोजन कर मनाया जाता है.

इस वर्ष वीडियो काँन्फ्रेंसिंग वेबीनार और वर्च्युअल बैठकें ही होंगी

कोरोना वायरस महामारी के कारण इस बार देश के अलग अलग हिस्सों में सेमिनार, सभा, समारोह आदि का आयोजन नहीं किया जाएगा। डॉक्टरों द्वारा हर स्तर पर की जा रही कोशिशों के लिए उनका सम्मान करना जरुरी है अत:डॉक्टरों की हौसलाअफजाई के लिए इस साल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग द्वारा राज्य-स्तरीय वेबिनार और वर्चुअल बैठकें आयोजित की जाएंगी। इस बीच जनप्रतिनिधि और विशेष शख्सियत उन अस्पतालों में जाकर डॉक्टर्स का अभिनन्दन करेंगी. कुछ वेबीनार कोरोना के उपचार के लिये बनने वाली दवाओं और निर्माणाधीन वैक्सीन पर भी होंगी. इस दिन कोरोना संक्रमण के नियंत्रण में लगे डॉक्टर्स की प्रेरक कथाएँ भी मीडिया पर जारी की जायेंगी. इस दिन कोरोना संक्रमण पर नियंत्रण में डॉक्टर्स की महत्वपूर्ण भूमिका की सराहना भी की जायेगी.

राजा दुबे

Friday, June 26, 2020

सावधान ! आगे रास्ता बंद है बनाम एक लैग स्पिनर की त्रासदी

हम-आप जब भी किसी सफर पर निकलते हैं तो एकाधिक बार ऐसा होता है कि सड़क पर इस प्रकार का बैनर नज़र आता है कि - "सावधान ! आगे रास्ता बंद हैं " और तब हममें से अधिकांश मन मसोस कर ठिठकते हैं और या तो वापस लौट आते हैं या फिर दायें-बायें कच्चे रास्ते पर उतर जाते हैं .भारतीय क्रिकेट जगत के बेहद हुनरमंद लैग स्पिनर राजिंदर गोयल के क्रिकेट करियर में भी ऐसा ही हुआ. अपने अच्छे ही नहीं उत्कृष्ट प्रदर्शन के बूते ही वो क्रिकेट के करियर में नई ऊँचाइयों को छूने की क्षमता रखते थे मगर जब वे परिदृश्य में थे तब भारतीय क्रिकेट टीम में बतौर लेग स्पिनर बिशनसिंह बेदी अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन के बूते शिखर पर थे. वर्ष 1966 से वर्ष 1979 तक तेरह साल लम्बे करियर में उन्होंने कई लैग स्पिनर को भारतीय क्रिकेट टीम में प्रवेश को बाधित किया और राजिंदर गोयल भी उनमें से एक थे.टेस्ट क्रिकेट के लिये रास्ता बंद होने पर राजिंदर ने अपना दो पहिया वाहन को (यहाँ यह बताना जरुरी है कि राजिंदर हमेशा स्कूटर ही चलाते थे) रणजी मैचेस के कच्चे रास्ते पर उतार दिया अपने समय की सुप्रसिद्ध साप्ताहिक पत्रिका-धर्मयुग के खेल पृष्ठ पर खेल समीक्षक अरविंद लवकरे ने उनकी इस त्रासदी पर एक इन्टरव्यू मे़  बड़ी सटीक टिप्पणी की थी कि-"राजिंदर को अवसर नहीं मिला यह कहने के स्थान पर यह कहना बेहतर होगा कि टेस्ट टीम में उनके चयन की तो गुँजाइश ही नहीं थी ".

एक शहर रोहतक के मोह में फँसा  क्रिकेटर

हरियाणा के नरवाना कस्बे में 20 सितम्बर 1942 को
जन्मे राजिंदर गोयल का पालन-पोषण रोहतक में हुआ. राजिंदर गोयल के पिता भारतीय रेलवे में सहायक स्टेशन मास्टर थे. वर्ष 1957  में उन्हें क्रिकेट में उस वक्त सफलता मिली जब ऑल इंडिया  स्कूल टूर्नामेंट  के फायनल मुकाबले में उत्तरी क्षेत्र की ओर से खेलते हुए उन्होंने चार विकेट लेकर पश्चिमी क्षेत्र को हराया  यहीं से वे क्रिकेट प्रेमियों की नजर में आ गये. उन्हें प्रतियोगिता में बेहतरीन गेंदबाज का खिताब दिया गया। वे अपनी सफलता का श्रेय जिंदगी भर अपने  कोच कृष्ण दयाल को देते रहे। उन्होंने दक्षिणी पंजाब टीम के साथ खेलकर अपने कैरियर की शुरुआत की और वर्ष 1963 में वे पंजाब से दिल्ली लौटे. अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद क्रिकेट में अपनी दक्षता के बूते स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में रोहतक में ही नौकरी मिल गई और उन्हें रोहतक से इतना मोह था कि वे सेवानिवृत्ति तक पदोन्नति के सभी अवसरों को छोड़कर  रोहतक में ही रहे.

रणजी ट्रॉफी मैचों में छ: सौ से अधिक विकेट 

राजिंदर ने पटियाला, दक्षिण पंजाब , दिल्ली और हरियाणा टीम की ओर से मैच खेले. अपने चौबीस साल के क्रिकेट करियर में उन्होंने 157 प्रथम श्रेणी के मैच खेले जिसमें उन्होंने 750 विकेट लिये और 123 रणजी ट्रॉफी मैच में उन्होंने 640 विकेट लिये जो एक कीर्तिमान है. पचपन रन देकर आठ विकेट लेना उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है. राजिंदर गोयल को क्रिकेट के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियों के लिये -  "कर्नल सी.के.नायडू लाईफ टाइम अवार्ड " भी दिया
जा चुका है.अपनी बेहतरीन फिरकी गेंदबाजी के कारण उन्होने अपने समय के सभी दिग्गज बल्लेबाज को प्रभावित किया. लिटिल मास्टर सुनील गावस्कर के अनुसार वे गोयल की घूमती गेंद से डरते थे. हरियाणा की ओर से खेलने वाले राजिंदर अपनी ही टीम के धाकड़ बल्लेबाज अशोक मल्होत्रा को जब नेट प्रैक्टिस करवाते थे तो कहते थे कि अशोक तुम तो मेरी बॉल को छू भी नहीं पाओगे.

यूँ जिसका टेस्ट मैच में खेलना
 
वर्ष 1974-75 में जब वेस्ट इंडीज की क्रिकेट टीम भारतीय दौरे पर आई थी तब बेंगलूरु में खेले जाने वाले टेस्ट मैच से बिशनसिंह बेदी को  एक इन्टरव्यू में आपत्तिजनक टिप्पणी के कारण अनुशासनात्मक कार्रवाई के तहत टीम से हटा दिया गया था। उनकी जगह राजिंदर का टीम में चुनाव किया गया. ऐसे में उनका टेस्ट टीम में पदार्पण पक्का माना जा रहा था मगर अफसोस  टीम प्रबंधन ने आखिरी क्षण में फैसला बदलते हुए गोयल की जगह दो ऑफ स्पिनरों प्रसन्ना और वेंकटराघवन को टीम में खिलाने का फैसला कर लिया और वे टेस्ट खिलाड़ी बनते-बनते रह गये.राजिंदर गोयल को टेस्ट टीम का हिस्सा नहीं बन पाने का कभी कोई मलाल नहीं रहा। वे इस धारणा से कतई इत्तेफाक नहीं रखते कि बेदी की वजह से वे टेस्ट मैच  नहीं खेल पाए। वे हमेशा कहते रहे बिशन सिंह बेदी बहुत बड़े खिलाड़ी थे और अपनी इसी बेहतरी की वजह से वे टेस्ट मैच खेल पाए.एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, 'मैं गलत वक्त में पैदा हुए शायद इसलिए टेस्ट मैच नहीं खेल पाया. राजिंदर गोयल का अवसान एक बेहतर खिलाड़ी और उससे भी कहीं आगे एक बेहतर इंसान का अवसान है.

राजा दुबे