Sunday, October 18, 2020

भानु अथैया ने दिलवाई, कास्ट्यूम डिजाइनिंग को वैश्विक पहचान - राजा दुबे

 


फिल्म एक बहुआयामी संरचना होती है और निर्माता, निर्देशक और लेखक की कल्पना से एक फुल लैंग्थ फिल्म बनने तक वह  लेखन, निर्देशन, निर्माण, सम्पादन, अभिनय, संगीत संयोजन, छायांकन और दीगर बीसियों विधा से गुजरती है. लेखन, फिल्मांकन और तकनीक के ट्रायपॉड पर खड़ी फिल्म एक समग्र प्रस्तुति के रुप में ही ध्यान खींचती है मगर कभी-कभी कोई तकनीशियन अपनी कला में इतनी ऊँचाइयों को छू लेता है कि उससे उस फिल्म ही नहीं उस विधा की प्रतिष्ठा भी बढ़ जाती है. ऐसी ही विधा है कास्ट्यूम डिजाइनिंग की जिसकी चर्चा में फिल्म समीक्षक प्राय: कँजूसी दिखाते हैं मगर  फिल्म -"गाँधी" में कास्ट्यूम
डिजाइनर भानु अथैया को आस्कर सम्मान से अलंकृत किया गया तो उससे उनकी मेधा को तो वैश्विक ख्याति और वैश्विक पहचान मिली ही कास्ट्यूम डिजाइनिंग जैसी अपेक्षाकृत कम चर्चित विधा को भी एक प्रतिष्ठित स्थान मिला. इस उपलब्धि का श्रेय निश्चित रुप से भानु अथैया और उनकी क्षमता को पहचानने वाले गाँधी फिल्म के निर्देशक रिचर्ड एटनबरो को जाता है.

भानु अथैया अपनी ऑस्कर ट्रॉफी को एकेडमी के दफ्तर में रखवाना चाहतीं थीं

भानु अथैया भारत की पहली ऑस्कर पुरस्कार विजेता हैं उनके बाद वर्ष 1992 में सिनेमा में जीवन पर्यंत योगदान के लिये सत्यजीत रे को, वर्ष 2009 में सर्वश्रेष्ठ संगीत के लिये एक.आर.रहमान, सर्वश्रेष्ठ गीत के लिये गुलजार और इसी वर्ष सर्वश्रेष्ठ साउण्ड मिक्सिंग के लिये रेसुल पोक्कुट्टी को ऑस्कर सम्मान  मिल चुका है इन पाँच ऑस्कर विजेताओं में से भानु अथैया संभवत:अकेली ऑस्कर सम्मान विजेता हैं जो सम्मानस्वरुप प्राप्त आस्कर ट्रॉफी की सुरक्षा को लेकर चिन्तित रहतीं थीं. वर्ष  2012 में भानु अथैया ने ऑस्कर ट्रॉफी को लौटाने की इच्छा जताई थी. वो चाहती थीं कि उनके जाने के बाद ऑस्कर ट्रॉफी को सुरक्षित स्थान पर रखा जाए. तब बीबीसी से बातचीत में भानू अथैया ने कहा था, "सबसे बड़ा सवाल ट्रॉफी की सुरक्षा का है, भारत में पहले कई अवॉर्ड गायब हुए है. मैने इतने सालों तक अवॉर्ड को इंजॉय किया है, चाहती हूँ कि वो आगे भी सुरक्षित रहे. उन्होंने कहा था, "मैं अक्सर ऑस्कर ऑफिस जाती हूँ, मैने देखा कि वहां कई लोगों ने अपने ट्रॉफी रखीं हैं. अमरीकी कॉस्ट्यूम डिजाइनर एडिथ हेड ने भी मरने से पहले अपने आठ ऑस्कर ट्रॉफियों को ऑस्कर ऑफिस में रखवाया था." नेटवर्क की पड़ताल तो बताती है वे अपनी ऑस्कर ट्रॉफी ऑस्कर कार्यालय को नहीं भेज पाईं थीं.

फिल्मों में कास्ट्यूम डिजाइनिंग के लिये रेकार्ड बुक में दर्ज है भानू अथैया का नाम

भारत की पहली ऑस्कर विजेता और सिनेमा जगत की जानी-मानी कॉस्ट्यूम डिजाइनर भानू अथैया का गत पन्द्रह अक्टूबर को 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया .वो ब्रेन ट्यूमर की वजह से बीते तीन सालों से बिस्तर पर थीं. पचास के दशक से भारतीय सिनेमा में सक्रिय भानू अथैया ने सौ से ज़्यादा फ़िल्मों के लिए कॉस्ट्यूम डिज़ाइन किए. ऑस्कर के अलावा उन्हें दो राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले हैं.वर्ष 1991 में फिल्म लेकिन के लिये और वर्ष 2002में फिल्म लगान के लिये . आमिर ख़ान की फ़िल्म-"लगान"और शाहरुख ख़ान की फ़िल्म-" स्वदेस " में उन्होंने आखिरी बार कॉस्ट्यूम डिज़ाइन किए थे.वर्ष 1956 से वर्ष 2004 तक फिल्मों में सक्रिय रही भानू अथैया का जन्म 28 अप्रैल 1928 को कोल्हापुर(महाराष्ट्र) में हुआ था. भानू किसी भी माहिर व्यक्ति की खुलकर प्रशंसा करतीं थीं. वे कहतीं थीं किफिल्मकार रिचर्ड  एटनबरो ने गाँधी फ़िल्म में भारत का वास्तविक चित्रण किया है गाँधी फ़िल्म में कॉस्ट्यूम डिज़ाइन करना मेरे लिये बहुत बड़ी चुनौती थी.सौ से भी अधिक फिल्मों में ड्रेस डिजाइन कर रिकार्ड बुक में अपना नाम दर्ज करा चुकी है .

राजा दुबे 

Friday, October 16, 2020

खाद्यान्न की महत्ता को पुनर्प्रतिष्ठापित करने के लिये मनाया जाता है विश्व खाद्य दिवस - राजा दुबे

 विश्व की समग्र आबादी में खाद्यान्न की महत्ता को पुनर्प्रतिष्ठापित करने और खाद्य सामग्री की बर्बादी को रोकने के लिये -" विश्व खाद्य दिवस " पर विशेष अभियान चलाये जाते हैं.विश्व की जनसंख्या में हो रही वृद्धि और खाद्य पदार्थों के सीमित भण्डार को देखते हुए अब खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने की ज़रूरत भी  महसूस की जा रही है. इसे ध्यान में रखते हुए ही संयुक्त राष्ट्र ने 16 अक्टूबर, 1945 को रोम में  " खाद्य एवं कृषि संगठन " ( फूड एण्ड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन) की स्थापना की थी. विश्व में व्याप्त भुखमरी के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने व इसके समापन के लिए वर्ष 1980 से प्रतिवर्ष 16 अक्टूबर को  विश्व खाद्य दिवस  का आयोजन शुरू किया था .विश्व समाज के संतुलित विकास के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य का सर्वांगीण विकास हो.विश्व में लोगों को संतुलित भोजन की इतनी मात्रा मिले कि वे कुपोषण के दायरे से बाहर निकल कर एक स्वस्थ जीवन जी सकें.लोगों को संतुलित भोजन मिल सके, इसके लिए आवश्यक है कि विश्व में खाद्यान्न का उत्पादन भी पर्याप्त मात्रा में हो. भारत में विश्व खाद्य दिवस पर भारतीय संस्कृति के अनुरुप खाद्य पदार्थ को दिव्य स्वरुप में स्वीकार किया जाता है और इस दिन खाद्यान्न के अनुशासित उपभोग और संरक्षण का संकल्प लिया जाता है. इस दिन खाद्यान्न सुरक्षा के पारम्परिक उपायों को अपनाने और नई पीढी को खाद्यान्न के दुरुपयोग को रोकने की सीख दी जाती है.


वैश्विक स्तर पर ऐसे प्रयास हों कि भुखमरी से किसी को न जूझना पडे़

इस दिवस को मनाते हुए बत्तीस वर्ष हो चुके हैं, लेकिन दुनिया भर में भूखे पेट सोने वालों की संख्या में अभी भी अपेक्षित कमी नहीं आई है इस दिवस के आयोजन का लक्ष्य वैश्विक स्तर पर ऐसे प्रयास करने का है कि विश्व में भुखमरी की स्थिति में भारी गिरावट आये और विश्व के किसी भी हिस्से में साधनहीन और  विपन्न आबादी को भुखमरी से न जूझना पड़े.इस मामले में विकासशील या विकसित देशों में किसी तरह का कोई फ़र्क़ नहीं है. विश्व की आबादी वर्ष 2050 तक नौ अरब होने का अनुमान लगाया जा रहा है और इसमें क़रीब 80 फीसदी लोग विकासशील देशों में रहेंगे .ऐसे में किस तरह खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, यह एक बड़ा प्रश्न है. एक ओर तो ऐसे  सम्पन लोग हैं जो प्रतिदिन काफी पका हुआ भोजन फैंक देते हैं तो दूसरी ओर ऐसे विपन्न लोग हैं जिन्हें एक समय भी भरपेट भोजन नहीं मिलता है.खाद्यान्न की इसी असमान उपलब्धता और संवितरण की समस्या को देखते हुए 16 अक्टूबर' को हर साल " विश्व खाद्य दिवस " मनाने की घोषणा की गई थी. विश्व में खाद्यान्न के उत्पादन में बढ़ोतरी के बावजूद उसके असमान वितरण के कारण भुखमरी की समस्या का प्रसार हो रहा है.भारत में सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के कारण मिल-बाँट कर खाने और किसी को भी भूखा न रखने का जो जीवन दर्शन है उसका इस दिन व्यापक प्रचार किया जाता है. हमारे देश में सिक्ख सम्प्रदाय की -"लँगर“ परम्परा इसीका एक प्रचलित स्वरुप है.

खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के लिये भी इस एक अवसर पर विचार विमर्श होता है

विश्व खाद्य दिवस मनाये जाने का मुख्य उद्देश्य विश्व में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के लिये व्यापक विचार विमर्श
होता है. इसके लिए विकासशील देशों के मध्य तकनीकी एवं वित्तीय सहयोग बढ़ाने और विकसित देशों से आधुनिक तकनीकी मदद उपलब्ध कराने के भी प्रयास होते हैं. संयुक्त राष्ट्र और खाद्य एवम् कृषि संगठन के अनुसार विश्व में खाद्यान्न की कीमतों में जब गैर आनुपातिक बढ़ोतरी होती है और विश्व का एक बड़ा भू भाग खाद्यान्न संकट का सामना करता है तब विश्व खाद्य दिवस पर सभी प्रभावशाली देश इस संकट से उबरने की तजवीज़ भी करते हैं.जनांकिकी अनुमान के अनुसाार विश्व की आबादी वर्ष 2050 तक नौ अरब होने का अनुमान लगाया जा रहा है और इस बड़ी आबादी के लिये खाद्यान्न जरुरत भी व्यापक होगी. इस दिशा में विश्व खाद्य दिवस पर उत्पादन की मात्रा में बढ़ोतरी की तजवीज़ भी की जाती है. इसके साथ ही खाद्यान्न के असमान वितरण के कारणों का भी विश्लेषण किया जाता है. खाद्यान के उत्पादन में  मात्रिक ( कवांटिटेटव)  और गुणात्मक ( क्वलिटेटिव) बढ़ोत्तरी के लिये भी अनुसंधान पर भी इस दिन विमर्श होता है. विश्व के सकल खाद्यान उत्पादन की यदि हम बात करें तो वो उसे समुचित ही माना जायेगा मगर विभिन्न देशों की जरुरत के मुताबिक खाद्यान का असमान वितरण परेशानी का कारण है और विश्व खाद्य दिवस पर इस परेशानी का समाधान खोजने का यत्न भी किया जाता है.



कोरोना संक्रमण काल में खाद्य आपूर्ति के बड़े कदम 

कोरोना संक्रमण काल में खासकर लॉकडाउन में जब
देश के असंगठित कामगार और अपने मूल निवास से
बाहर काम करने गये कामगारों के वहाँ फँस गये थे तब उन्हें भुखमरी, बेरोजगारी और परिस्थितिजन्य पलायन के कठिन दौर से गुजरना पड़ा था ऐसे समय में सरकार, जनकल्याणकारी संस्थाओं और सामान्यजन ने अपनी क्षमता से बढ़कर काम किया.एक रोजगार-सर्वेक्ष केअनुसार,भारत के कुल कार्यबल का 80% से अधिक हिस्‍सा अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं, इनमें एक तिहाई कैज़ुअल मजदूर हैं.आरम्भ में लॉकडाउन के कड़े प्रावधानों के कारण इनको संकट का सामना करना पड़ा जल्दी ही केन्द्र सरकार ने इस वर्ग को जो जहाँ हैं वहीं उन्हें अनाज मुहैया करवाकर उन्हें भुखमरी से बचाया. इधर अधिकृत कॉरिडोर मिलने के पहले अपने कार्यस्थल से अपने मूल निवास जाने के लिये सड़कों पर जमा कामगारों को जनता ने खाद्यान और दीगर उपभोक्ता सामग्री मुहैया करवाई. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (नेशनल फुड सिक्यूरिटी एक्ट) के भारत में लागू होने के बाद से भारतीय जनसंख्या की दो- तिहाई आबादी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम) में शामिल होने का लाभ इस वर्ग को कुछ औपचारिकताओं से छूट देकर दिलवाया गया.इस मामले में केन्द्र और राज्य सरकारों ने विभिन्न प्रचलित योजनाओं और नये पैकेज में कोरोना काल के पीड़ितों को व्यापक खाद्यान्न सहायता दी है.
 

कुपोषण से मुक्ति के लिये भी इस दिन संकल्प लिया जाता है 

विश्व खाद्य दिवस पर विश्व से भुखमरी की समाप्ति के साथ ही कुपोषण से मुक्ति का भी संकल्प भी लिया जाता है. विकासशील और अविकसित देशों में कुपोषण की समस्या कुछ ज्यादा है और इसी परिप्रेक्ष्य में भारत में पिछले वर्ष सितम्बर 2019 को -" राष्ट्रीय पोषण माह " के रुप में मनाया गया था.इस आयोजन का उद्देश्य महिलाओं और बच्चों को कुपोषण से मुक्ति और एक स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय पोषण अभियान के बारे में लोगों के बीच जागरूकता फैलाना था.भारत में मृत्यु और विकलांगता के प्रमुख कारणों में कुपोषण एक मुख्य कारण है और खाद्य और कृषि संगठन के अनुसार भारत में कुल जनसंख्या के साढ़े चौदह प्रतिशत अर्थात्  लगभग 194 मिलियन लोग अल्पपोषित है भारत में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा नीति आयोग द्वारा संयुक्त रूप से वर्ष 2017-2018 में राष्ट्रीय पोषण अभियान शुरू किया था.इस मिशन का लक्ष्य कुपोषण और जन्म के समय बच्चों का वज़न कम होने संबंधी समस्याओं को प्रत्येक वर्ष 2 प्रतिशत तक कम करना है.इसके साथ ही कुपोषण के उन्मूलन से संबंधित सभी मौजूदा योजनाओं एवं कार्यक्रमों को एकजुट कर एक बेहतर और समन्वित मंच प्रदान करना है. इससे देश में कुपोषण की समस्या से छुटकारा पाया जा सकेगा. दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि कुपोषण से सर्वाधिक प्रभावित बच्चे ही होते हैं.





सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये कृषि को सर्वोच्च प्रथमिकता दी जा रही है

वर्ष 2015 में विश्व में विकास के जो डेढ़ दशक के जो
सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्यों की रीति-नीति बनाई गई थी वोवर्ष 2000 से वर्ष 2015 तक के लिये थी इन लक्ष्यों की प्राप्ति में भी कृषि को प्राथमिक लक्ष्यों में रखा गया था.अब जबकि विश्व के अन्य देशों के साथ ही भारत में भी सतत विकास लक्ष्य -2030 (सस्टेनेबल डेवलपमेन्ट गोल्स - 2030 ) के अनुसार विकास की योजनाएँ बनाईं गईं हैं उसमें भी कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है. भारत सहित सभी विकासशील देश इस बात को महसूस करते हैं कि यदि सतत विकास लक्ष्य -2030 को प्राप्त करना है तो कृषि पर ही फोकस करने की जरुरत होगी. इसके लिये देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य के माध्यम से किसानों की क्षमता बढ़ाने की ज़रूरत होगी.कृषि क्षेत्र में अधिक निवेश, कृषि के लिये अनिवार्य अधोसंरचना के विकास यथा - कोल्ड स्टोरेज (प्रशीतन गृहों) के निर्माण, कृषि उपज मंडियों ं तक सड़कों के निर्माण और राष्ट्रीय कृषि बाज़ार और कृषि उपज मंडियों के बीच सतत सम्पर्क स्थापित करने के प्रयत्न होंगे. कृषि क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिये कोल्ड स्टोरेज और सप्लाई चैन में निवेश बढ़ाने के लिये निजी कम्पनियों को भी आगे लाना होगा.सतत विकास लक्ष्यों की इन प्राथमिकता के लक्ष्यों को हांसिल करने के लिये वस्तुत: सार्वजनिक क्षेत्रों और निजी क्षेत्रों दोनों को समन्वित
प्रयास करने होंगे तभी वांछित लक्ष्य प्राप्त होंगे.

राजा दुबे 


Friday, October 9, 2020

मानसिक स्वास्थ्य के प्रति आम भारतीय हद दरजे तक लापरवाह है - राजा दुबे

 



एक प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्र ने चर्चित उपन्यासकार चेतन भगत को उद्धृत करते हुए यह  लिखा है कि - 

"भारत को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील बनाना, सुशांत सिंह राजपूत को एक बेहतर श्रद्धांजलि होगी". इस उद्धरण से दो बातें सामने आती हैं - पहली, यह कि सुशांत सिंह राजपूत परिस्थिजन्य दबाव में मानसिक रुप से अस्वस्थ थे और कमोबेश अवसाद में भी थे जिससे उन्होंने आत्महत्या की (अभी विधिक तौर पर इसे प्रमाणित होना है) और दूसरी यह कि भारत अभी मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील नहीं है. सुशांतसिंह के अवसान के कारणों में यदि हम मानसिक अस्वस्थता और अवसाद को फिलवक्त दरकिनार भी कर दें तब भी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर देश में संवेदनशीलता का अभाव है और मानसिक अस्वस्थता के प्रति आम भारतीय हद दरजे तक लापरवाह हैं. यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी की ज्यादातर लोग किसी भी प्रकार की मानसिक अस्वस्थता को अस्वस्थता मानते ही नहीं हैं. और तो और किसी को यदि मानसिक अस्वस्थता के लिये जाँच का कहा जाये तो वो प्रति पश्न करता है कि - "क्या मैं पागल हूँ?"

कोरोना संक्रमण के समय देश में मानसिक अस्वस्थता
विशेष तौर पर अवसाद के प्रकरण बढ़ने की बात की गई मगर आँकड़ों के भाष्य यदि इस ओर संकेत भी करें कि कोरोना संक्रमण काल मे दुनिया में और साथ ही भारत में भी कई लोग अवसादग्रस्त हो रहे हैं फिर भी इसे अंतिम सत्य मानने की भूल नहीं करना चाहिए क्योंकि कोरोना संक्रमण के दौर में कमज़कम भारत में तो कोरोना संक्रमण या लॉकडाउन की स्थितियां  न तो अवसाद की , न दीगर मानसिक अस्वस्थता की या फिर आत्महत्या की ठोस और इकलौती वज़ह साबित हो रही है. भारतीय समाज की साँस्कृतिक पृष्ठभूमि इतनी सुदृढ़ है कि यहाँ संतोषपूर्ण जीवन जीने की अभ्यस्त जनता के बीच मानसिक अस्वस्थता की घुसपैठ बड़ी कठिन होती है. विश्वास न हो तो भारत में कोरोना को लेकर सोश्यल मीडिया में कटाक्ष और हास-परिहास किया गया उस पर गौर कर लेना चाहिए. इस सबके बावजूद भौतिक सम्पन्नता की चाहत, महत्वाकांक्षाओं के अलभ्य  लक्ष्यों और विलासितापूर्ण जीवन जीने की चाहके चलते मानसिक अस्वस्थता अब देश और समाज में उभर रही है जो चिंता का सबब है.

हमारे जीवन शैली से जुड़े इस बोध-वाक्य में कि -
"पहला सुख निरोगी काया" में रोगहीनता के इस आदर्श में मानसिक रोग शामिल हैं या नहीं इसका कोई  प्रमाण तो नहीं है मगर हमारे देश और समाज में निरोगी होने से तात्पर्य पूर्णत; अर्थात् शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रुप से स्वस्थ्य होना है. सामाजिक स्वास्थ्य को पोषण आहार-तत्व सम्बन्धी विज्ञान से जोड़कर देखा जाता है.यह एक नई विचारधारा है, जिसका जन्म मूलत: शरीर विज्ञान तथा रसायन विज्ञान से हुआ है. आहार तत्वों द्वारा मनुष्य के शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन एवं विश्लेषण इसका मुख्य विषय है.दूसरे शब्दों में शरीर आहार सम्बन्धी सभी प्रक्रियाओं का नाम ही पोषण है. हमारे देश में ध्यान, योग और आध्यात्म तीन ऐसे कारक हैं जो हमें मानसिक अस्वस्थता से बचाते हैं. भारतीयों के इन रुझान को ही मानसिक अस्वस्थता के खिलाफ एक कवच माना जाता है. इसी प्रकार संयुक्त परिवार की व्यवस्था भी हमें मानसिक अस्वस्थता से बचाने मेंसहायक होते हैं.इन साँस्कृतिक अनुकूलताओं से भी भारत में मानसिक अस्वस्थता कम है.

स्वास्थ्य की देखभाल हेतु मानसिक स्वस्थता अत्यंत आवश्यक है। मानसिक स्वास्थ्य का आशय भावनात्मक मानसिक तथा सामाजिक रुप से स्वस्थ्य होना है. मानसिक स्वास्थ्य ही मनुष्य के सोचने, समझने, महसूस करने और कार्य करने की क्षमता को प्रभावित करता है .मानसिक विकार में अवसाद सबसे प्रमुख है और यह कई सामाजिक समस्याओं जैसे- बेरोज़गारी, गरीबी और नशाखोरी का कारण बनती है.मानसिक रोगों के विभिन्न प्रकारों के तहत अल्जाइमर रोग, डिमेंशिया, चिंता, ऑटिज़्म, डिस्लेक्सिया, डिप्रेशन, नशे की लत, कमज़ोर याददाश्त, भूलने की बीमारी एवं भ्रम आदि आते हैं .इसके लक्षण भावनाओं, विचारों और व्यवहार को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं .उदास महसूस करना, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी, दोस्तों और अन्य गतिविधियों से अलग होना, थकान एवं निद्रा की समस्या आदि इसके लक्षणों के अंतर्गत आते हैं.मानसिक रूप से अस्वस्थ होने के कई कारण होते हैं जिनमें से प्रमुख कारण आनुवंशिक प्रभाव,  गर्भावस्था संबंधी पहलू, मस्तिष्क में रासायनिक असंतुलन, मनोवैज्ञानिक कारण, पारिवारिक विवाद,  मानसिक आघात और सामाजिक कारण. कई बार आर्थिक एवं नैतिक पहलू भी इन कारकों केआविर्भाव का कारण होते हैं.

आज देश में मानसिक अस्वस्थता के बुनियादी कारणों 
पर पुनर्विचार कर इस संकट से बचने की रणनीति तैयार करने की अहम् जरुरत है और इस समस्या से निपटने का समाधान भी हमारे साँस्कृतिक ढाँचे मे ही तलाशना होगा.

राजा दुबे

Tuesday, October 6, 2020

देश के सर्वांगीण विकास का प्रभावी माध्यम होती है डाक सेवा - राजा दुबे

सम्पर्क, संप्रेषण और सूचना के प्रवाह का सशक्त माध्यम होती किसी भी देश की डाक सेवा. एक स्वायत्त और संप्रभुतासम्पन्न शासन  द्वारा संधारित डाक-व्यवस्था उस देश के सर्वांगीण विकास का एक प्रभावी माध्यम होती है. विभिन्न देशों में अलग- अलग स्वरुप में विद्यमान डाक-संगठन अपनी अहम् भूमिका का बखूबी निर्वाह कर रहें हैं. इसी भिन्न-भिन्न डाक-संगठनों के महती अवदान को मान्यता देने और उनकी सेवाओं की सराहना के लिये विश्व के अधिकांश देशों में - " विश्व डाक दिवस " मनाया जाता है. विश्व डाक दिवस, स्विटज़रलैंड के बर्न में वर्ष 1874 ईस्वी में यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन (यूपीयू) की स्थापना की याद में मनाया जाता है. भारत 01 जुलाई, 1876  को यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य बना था. इस सदस्यता को लेने वाला भारत एशिया का पहला देश था. वर्ष 1874 में  हेनरिक वॉन स्टेपहान जो कि उत्तर जर्मन परिसंघ के एक वरिष्ठ डाक अधिकारी थे ने एक अंतरराष्ट्रीय डाक यूनियन के लिए एक योजना तैयार की. उनके सुझाव के आधार पर, स्विस सरकार ने 15 सितंबर 1874 को बर्न में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें बाईस राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था .बर्न की संधि, 1874 में हस्ताक्षरित की गयी. इस संधि ने पत्रों के आदान प्रदान के लिए एक एकल पोस्टल क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय डाक सेवाओं और नियमों को व्यवस्थित करने में सफलता प्राप्त की.उसी वर्ष 9 अक्तूबर को विश्व डाक दिवस की शुरुआत की गई वर्ष 1947 में, यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन , संयुक्त राष्ट्र की एक विशिष्ट एजेंसी बन गई. 


डाक सेेवाओं के महत्व और उपयोगिता पर केन्द्रित होते हैं -"डाक दिवस" के आयोजन

विश्व डाक दिवस का मूल उद्देश्य लोगों के बीच पोस्टल सेवा के बारे में प्रचार प्रसार करना है और उसके महत्व को प्रतिपादित करना है. साथ ही लोगों के जीवन और राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक विकास में इसके योगदान के बारे में बताना है. इस दिवस पर डाक सेवा में नवाचारों की भी चर्चा होती है.मानव कल्याण के लिये डाक सेवाओं की उपादेयता पर भी इस दिन चर्चा होती है. प्रोद्यौगिकी में बदलाव के बाद
डाक विभाग मौजूदा संरचना मे परिवर्तन कर अपनी उपयोगिता कैसे प्रमाणित कर सकती है इस पर भी चर्चा की जाती है. इस साल कोरोना संक्रमण के कारण सेमीनार के स्थान पर वेबीनार के आयोजन होंगे और  वर्चुअल मोड पर ही यह दिवस मनेगा. इस दिवस के आयोजन में विविध देशों से प्रतिनिधि भाग लेते हैं. इस आयोजन में अन्तराष्ट्रीय स्तर पर लोगों को जागरूक करने और इसकी महत्ता के बारे में बताने के लिए विविध कार्यक्रमों और गतिविधियों का आयोजन किया जाता है. प्रति वर्ष 150 से अधिक राष्ट्रों द्वारा विभिन्न तरीकों से विश्व डाक दिवस मनाया जाता है. यद्यपि कई देशों में इस दिन को एक छुट्टी के रुप में मनाया जाता है. कुछ देशों में इस दिन नए डाक उत्पादों और सेवाओं को प्रस्तुत किया जाता है. यहां तक ​​कि इस दिवस के अवसर पर पोस्ट विभाग में कार्यरत कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिये पुरस्कृत भी किया जाता है. 

भारत में दो सौ चौपन साल पहले कोलकाता में खुला था पहला डाकघर

भारतीय डाक विभाग की स्थापना वर्ष 1766 में हुई थी और तत्कालीन वायसराय वारेन हेस्टिंग्स ने वर्ष 1774 में कोलकाता में दो सौ चौपन साल पहले प्रथम डाकघर स्थापित किया था.आज देश में डाक विभाग डेढ़ लाख से अधिक पोस्ट ऑफिस का संचालन कर रहा है.जिनमें से 89.87% पोस्ट ऑफिस ग्रामीण क्षेत्रों में है तथा औसतन प्रति 21.23 वर्ग किलोमीटर में यह लगभग 8,086 जनसंख्या को अपनी सेवाएं प्रदान कर रहें हैं.भारत में एक विभाग के रुप में डाक विभागीय की स्थापना 01 अक्तूबर, 1854 को हुई थी.भारतीय डाक विभाग हर साल  09 से 14 अक्टूबर के बीच विश्व डाक सप्ताह मनाता है   देश में त्वरित डाक सेवा की अत्याधुनिक प्रणाली स्पीड पोस्ट का आरंभ वर्ष 1986 में हुआ था जबकि देश में पैसों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक नाममात्र के कमीशन पर पहुँचाने वाली विश्वसनीय मनीऑर्डर सेवा का आरम्भ वर्ष 1980 में हुआ था. इसीप्रकार भारतीय सीमा के बाहर दक्षिण गंगोत्री, अंटार्किटा में वर्ष  1983 पहला डाकघर बना था.संप्रेषण के अन्य माध्यमों के आने से भले ही डाक की प्रासंगिकता कम हो गई हो, लेकिन कुछ मायने में अभी भी इसकी प्रासंगिकता बरकरार है. दुनियाभर में पोस्ट ऑफिस से संबंधित इन आंकड़ों से हम इसे और अधिक स्पष्ट रूप से समझ सकते हैं. डाक विभाग से अभी भी 82 फीसदी वैश्विक आबादी को होम डिलीवरी का फायदा मिलता हैऔर  एक डाक कर्मचारी 1,258 औसत आबादी को सेवा मुहैया कराता हैै , जो इस सेवा की व्यापकता को दर्शाता है.

कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन में भारतीय डाक ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

"विश्व डाक दिवस" पर यदि हम भारतीय डाक विभाग की भूमिका का पुनर्स्मरण करें तो हम पायेंगे कि इस विभाग जिसे इन दिनों हम "भारतीय डाक" यानी इंडिया पोस्ट के नाम से जानते हैं, वर्ष 2020 में कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन के कठिन दिनों में आमजन की सहायता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. ई-मेल, व्हाट्सऐप और अन्य ऑनलाइन माध्यमों के प्रचलन के कारण एक समय सम्पर्क का मुख्य आधार रहे डाकघरों को जहाँ पलक झपकते अप्रासंगिक बना दिया था वहीं कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन के समय यही-" भारतीय डाक " की सेवाएं देश में विशेष रुप से ग्रामीण और दुर्गम इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए बड़ी मददगार साबित हुईं है ,बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि कोरोना महामारी ने इन डाकघरों को एक बार फिर प्रासंगिक बना दिया है. डाकियों ने इस दौरान देश भर में एक हजार करोड़ से ज्यादा नकद की होम डिलीवरी की है. यह रकम लॉकडाउन के दौरान डाकघर बचत खातों में हुए छांछठ हजार करोड़ रुपयों के नियमित लेन-देन के अतिरिक्त थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी उपलब्धि के कारण बीते महीने रेडियो पर अपने कार्यक्रम -"मन की बात" में लॉकडाउन के दौरान नकदी, आवश्यक वस्तुओं और चिकित्सा उपकरणों की सप्लाई बहाल रखने में डाक विभाग की भूमिका की खुलकर सहाहना की थी, जो विभाग के सहायता कार्य की अहम् ताईद थी.

डाक विभाग ने त्वरित सहायता की कारगर और पुरअसर जुगत की

कोरोना की वजह से जारी देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान बैंक तो खुले थे लेकिन कूरियर सेवाओं और परिवहन के तमाम साधनों के बंद होने की वजह से आम लोगों को खासकर दूर-दराज के इलाके के लोगों के लिए पैसे निकालने के लिए बैंकों तक पहुँचना या अपने प्रियजन तक पैसे या जरूरी सामान भेजना असंभव हो गया था. ऐसे में केंद्रीय संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इंडिया पोस्ट से संकट के इस दौर में कुछ नई तरकीब निकालने की अपील की और विभाग ने त्वरित सहायता की कारगर और पुरअसर जुगत की. विभाग ने अपने वाहनों के जरिए एक नेशनल रोड ट्रांसपोर्ट नेटवर्क विकसित किया.विभाग ने पाँच सौ किलोमीटर के दायरे में बाईस लंबे रूट तय किए गए जो देश के पिचहत्तर शहरों को जोड़ते थे. इसके जरिए जरूरी सामानों और नकदी के अलावा चिकित्सा उपकरणों की भी होम डिलीवरी की गई. खासकर नकदी की होम डिलीवरी ने कई पेंशनभोगी लोगों को भारी राहत पहुंचाई है.बयासी  वर्षीय पेंशनभोगी सुब्रत बागची कहते हैं -" लॉकडाउन के ऐलान के बाद मेरी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि मैं अपने पेंशन की रकम नहीं निकाल सकूंगा ".लेकिन पोस्टमास्टर को एक फोन करते ही अगले दिन घर पर पेंशन की रकम मिल गई. पेंशन ही मेरी रोजी-रोटी का जरिया है और संकट के इस दौर में डाकघर ने जो बेहद अहम् भूमिका निभाई है वो अतुलनीय है.

बदलती तकनीक में आज भी समय से हमकदम है डाक सेवा

बदलते हुए तकनीकी दौर में दुनियाभर की डाक व्यवस्थाओं ने मौजूदा सेवाओं में सुधार करते हुए खुद को नई तकनीकी सेवाओं के साथ जोड़ा है और डाक, पार्सल, पत्रों को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए एक्सप्रेस सेवाएं शुरू की हैं. डाकघरों द्वारा मुहैया कराई जाने वाली वित्तीय सेवाओं को भी आधुनिक तकनीक से जोड़ा गया है. नई तकनीक आधारित सेवाओं की शुरुआत तकरीबन बीस वर्ष पहले की गई और उसके बाद से इन सेवाओं का और तकनीकी विकास किया गया. साथ ही इस दौरान ऑनलाइन पोस्टल लेन-देन पर भी लोगों का भरोसा बढ़ा है. यूपीयू के एक अध्ययन में यह पाया गया है कि दुनियाभर में इस समय पचपन से भी ज्यादा विभिन्न प्रकार की पोस्टल ई-सेवाएं उपलब्ध हैं .भारतीय डाक विभाग ने सतहत्तर फीसदी ऑनलाइन सेवाएं दे रखी हैं, जबकि एक सौ सतहत्तर  पोस्ट वित्तीय सेवाएं मुहैया करवाता है और पाँच दिन के मानक समय के अंदर  83.62  फीसदी अंतरराष्ट्रीय डाक सामग्री बांटी जाती है.इन तथ्यों से यह स्पष्ट है कि बदलती तकनीक में आज़ भी समय से हमकदम है डाक सेवा. विश्व में विभिन्न देशों की तुलना में भी भारतीय डाक सेवा अधिक सक्षम और प्रभावी है.

राजा दुबे