Friday, May 15, 2020

मज़दूर का पसीना




मज़दूर का पसीना बहता है तो कल-कारखाने चलते हैं...

मज़दूर का पसीना बहता है तो ऊंची-ऊंची इमारतें बुलंद होती हैं...

मज़दूर का पसीना बहता है तो खेत-खलिहानों में फसलें लहलहाती हैं...

मज़दूर का पसीना बहता है तो चमचमाते एक्सप्रेस-वे तैयार होते हैं...

लेकिन आज मज़दूरों का पसीना ही नहीं आंसू भी बह रहे हैं...

आज मज़दूरों के आंसू ही नहीं ख़ून भी बह रहा है...

रोज़गार खो चुके मज़दूर अपने घर जाने के लिए तरस रहे हैं...

कई-कई दिनों के भूखे-प्यासे चलते चले जा रहे हैं...

डंडे खाकर

लात सहकर

गाली सुन कर

बस चलते जा रहे हैं...

सरकार से भरोसा उठ रहा है

सिस्टम से भरोसा उठ रहा है

किसी एलान का, किसी आश्वासन का, किसी दावे का

अब असर नहीं हो रहा

इन्हें अब किसी तरह घर जाना है...

बस से... ट्रक से... साइकिल से या फिर पैदल

भुवन वेणु

Thursday, May 14, 2020

दर्दभरा संघर्ष





ना रोज़गार रहा

ना छत रही

ना घर लौटने का ज़रिया मिला

बस एक सड़क है

जो घर की तरफ जाती है

कोई सिर पर सामान लादे

कोई गोद में बच्चा थामे

कोई चप्पल पहनें

तो कोई नंगे पांव

चले जा रहे हैं लोग

बेतहाशा

बेबस

कभी जिन सड़कों को बनाने में अपना पसीना बहाया था

आज उन हज़ारों मील लंबी सड़कों को उन्हीं मज़दूरों के पैरों ने नाप डाला है...

कभी घर-बार छोड़ कर रोजी-रोटी के लिए हज़ारों मील दूर आए थे...

महानगरों में आसमान छूती इमारतों को खड़ा किया...

ना जाने कितने लोगों का आशियाना तैयार किया...

कल-कारखानों में पसीना बहाया...

खेत-खलिहानों में फसलें उगाई...

लेकिन जब बुरा वक़्त आया तो सबने मुंह मोड़ लिया...

काम-धंधे बंद हुए तो छत भी छिन गई

दाने-दाने को मोहताज होने की नौबत आ गई

फिर एक ही आसरा दिखा...

अपनी मिट्टी

अपना घर

घर पहुंचने की इसी आस में लाखों-लाख मज़दूर चल पड़े

जिसे जो साधन मिला उससे निकल गया

और जिसे कुछ नहीं मिला वो पैदल ही निकल पड़ा

लेकिन मज़दूरों की नियति ही संघर्ष है

उनका ये पलायन भी संघर्ष है... दर्दभरा संघर्ष


भुवन वेणु

Tuesday, May 8, 2018

अनोखी मैं...


अव्वल तो मैं सौ प्रतिशत लेफ्ट हेंडर हूं। दुनिया की उस दस प्रतिशत आबादी का हिस्सा जो ताउम्र राइट हेंडर के लिए बनी चीज़ों का इस्तेमाल करने के लिए बाध्य रहते हैं। भारत में पैदा हुई हूं सो पूजापाठ के दौरान बचपन से बातें सुनती आई हूं। कितना ही किसी को समझा लो कि मेरा उल्टा हाथ ही सीधा है मजाल है जो कोई बात समझ जाएं। इसके बाद मैं टंग टाई। यानीकि जीभ तालु से चिपकी। उच्चारण में इसके चलते कई दोष और कई परेशानियां अलग। कई बार मज़ाक का विषय बन जाती हूं। आखिर कितनों को आप समझा सकते हैं कि जीभ का चिपका रहना क्या होता है। मेरा अनोखापन यहीं तक समित नहीं। मैं मॉर्टन्स टो वाली भी हूं। यानि मेरे पैर की उंगली अंगूठे से बड़ी है। जूते का माप अंगूठे की लंबाई से तय होता है। लेकिन, मेरे पैर का माप उंगली तय करती है। मतलब हमेशा एक साइज़ बड़े जूते। कोई फैंसी चप्पल या जूते नहीं। कई बार अफसोस हुआ लड़कियों के सुन्दर फुटवियर देख लेकिन कोई ऑप्शन नहीं। बड़े पैरों में एक साइज़ और बड़े जूतों का भी अनगिनत बार मज़ाक बना। सोचा समझाऊं कि ये मॉर्टन्स टो है। फिर लगा गोली मारो ये नहीं समझेंगे। मैं ही बस समझ गई कि अनोखी हूं मैं....

Saturday, April 21, 2018

कौन-सा समाज

वो कौन है जिन्हें फर्क पड़ रहा है। मेरी कॉलोनी में, जहां एक घर एक करोड़ का है। रहनेवाले एमएनसी में काम करते हैं, जिनके बच्चे इंटरनेशनल स्कूलों में पढ़ने जाते हैं। सम्मानितों की इस बस्ती में भरी दोपहरी में मेरे घर के सामने आदमी पेंट खोलकर खड़ा हो गया। उसकी विक्षिप्तता उस दिन वो मुझे दिखाना चाह रहा था। मैं चिल्लाई, किया हंगामा तो भागा वो सरपट पेंट पकड़कर। लेकिन, क्या किसी बच्ची को ये समझ आ भी पाएगा? वो उसकी मंशा समझ भी पाएगी? किसी को देखकर भी क्या ठीक से कुछ बता पाएगी? छोड़ो उस बच्ची को जो अगर मैं घर नहीं किसी सड़क किनारे अकेली खड़ी होती तो ऐसे ही उसे डरा पाती क्या? इतनी हिम्मत दिखा पाती क्या?सोच रही हूं तब से क्या नहीं सुनी होगी उसने खबरें? नहीं पढ़ा होगा अखबार? नहीं होगी कोई बच्ची उसके घर में?? आखिर क्यों उसे फर्क नहीं पड़ता है???

दीप्ति