Wednesday, October 5, 2016

दिमागी बच्चा चोर

पापा की बेटी 
हम एक अजीब से अविश्वास के माहौल में जी रहे हैं। हर किसी को शक की नज़र से देखते हैं। हर कोई हमें गलत ही लगता हैं। खासकर पुरुषों के प्रति तो ये अविश्वास और बढ़ जाता हैं। आजकल अस्मि मेरे और भुवन के मर्जिंग ऑफिस टाइम में मेरे साथ ऑफिस में रहती हैं। सुबह लगभग साढ़े छः बजे से लेकर नौ बजे तक। सुबह पांच बजे मैं उसे उठाकर साढ़े पांच बजे तक तैयार कर देती हूं। ऐसे में सुबह नौ बजे भुवन के साथ जब भी वो मैट्रो से घर जा रही होती हैं तो ज्यादातर वो सो ही जाती हैं। आज भी ऐसा ही हुआ।
दस बजे जब मैंने भुवन से ये पूछने के लिए कि वो घर पहुंचा या नहीं जब फोन किया तो मुझे उसकी आवाज़ में एक उदासी महसूस हुई। मैंने पूछा तो उसने बताया कि मैट्रो में एक सहयात्री उसे बड़ी देर तक घूर घूरकर देखता रहा। उसकी निगाहों से स्पष्ट था कि वो ये सोच रहा था कि भुवन सोई हुई अस्मि को चुराकर कहीं ले जा रहा हैं। आखिर में उस आदमी ने भुवन से पूछ भी लिया कि क्या बच्ची की तबीयत खराब हैं। हालांकि वो पूछना यहीं चाह रहा था कि क्या ये बच्ची उसी की हैं??? ये सुनकर मुझे हंसी आई और फिर मैंने भुवन से कहा कि उसे घर ले आते साथ में और जब अस्मि जागकर तुम्हारे नाम की माला जपना शुरु करती तो उसे सुना देते।
लेकिन, असलियत ये है कि ये सचमुच एक दुखी कर देनेवाली बात हैं। फेसबुक पर हम ऐसे कई फोटो देख चुके हैं जिसमें लोग केवल शक के आधार पर किसी को भी बच्चा चोर बता देते हैं। बच्चों की चोरी और तस्करी माना की गंभीर समस्या हैं लेकिन, इसका अर्थ ये भी तो नहीं कि हम हर किसी को शक की निगाह से ही देखते रहे। ऐसे शक सामान्यतः लोग बच्चे और उसके अभिभावक के रंग के आधार पर करते हैं। मतलब कि अगर पिता या मां सांवली हुई और बच्चा गोरा चिट्टा तो मतलब कि ये मां या बाप नहीं बल्कि चोर हैं।
इसके साथ ही अधिकांश लोगों के दिमाग में ये बात भी भीतर तक धंसी हुई हैं कि इतना छोटा बच्चा तो केवल मां के साथ ही घर में या बाहर अकेला रह सकता हैं। किसी और के साथ दिखा तो शक करो। हम इस बात को अब तक हजम नहीं कर पाएं है।
रह रहकर मुझे उस आदमी के बारे में ख्याल आ रहा हैं कि वो शायद कई दिनों या महीनों तक यहीं सोचता रहेगा कि पक्का वो बच्ची उस आदमी की नहीं होगी। ईश्वर करें कि किसी दिन फिर वो भुवन और अस्मि से टकराए और अस्मि उसे समझा दे कि भुवन आखिर हैं कौन...


Friday, August 12, 2016

आत्मग्लानि में डूबी मां

आपको आपके काम से कितना ही प्यार क्यों न हो सुबह पांच बजे उठकर, घर के काम करके, मैट्रो में एक घंटे खड़े रहकर यात्रा करना और सुबह सात बजे ऑफिस पहुंचा भारी ही लगेगा। ऐसे में जब घर से निकलते वक्त पीछे से आपकी सालभर की बेटी मम्मा-मम्मा की आवाज़ के साथ बिलख-बिलखकर रोए तो ऑफिस तक का ये सफर तनाव और आत्मग्लानि से भरा हुआ साबित होता हैं। बच्चा भले ही अगले पांच मिनिट में चुप हो जाए लेकिन, आप पूरे दिन उसका वो आंसू भरा चेहरा याद करते रह जाते हैं। अस्मि अब इस बात को समझ जाती हैं कि मम्मी ऑफिस जा रही हैं। वो उस दौरान मुझसे ऐसी चिपकी रहती हैं जैसे बंदरिया से उसका बच्चा। उसके मन में मेरे दूर जाने का डर कुछ ऐसा घर कर गया हैं कि वो मेरे घर पर रहने पर भी मेरे पीछे-पीछे ही चलती रहती हैं। किचन से लेकर बाथरूम तक वो मेरे साथ रहती हैं। मेरी मम्मी ने कभी नौकरी नहीं की। हमेशा वो मेरे लिए उपलब्ध रही। मैंने कभी मां से दूरी के इस दर्द को महसूस ही नहीं किया। "नौकरी", "अपनी ज़िंदगी", "जीवन का हिस्सा" और "वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा" जैसे जुमलों के बीच कई बार मैं खुद को आत्मग्लानि में डूबा हुआ पाती हूं। इस सबके बीच क्रिस्टीन आर्मस्ट्रॉन्ग जैसी एथलीट और एक मां के वीडियो देखकर मैं खुद को दिलासा देती रहती हूं। ऑफिस में काम कर रही मेरी जैसी मांओं से उनके अनुभव सुन-सुनकर खुद को समझाती रहती हूं। शायद सच में ये सब वक्त की बात हैं। बच्चे परिस्थितियों से खुद जितनी जल्दी निपटना सीख ले बेहतर होता हैं। ओशो के शब्दों में- हर किसी का अपना जीवन हैं। बच्चों से मोह और उन पर अधिकार जमाना जितनी जल्दी हो खत्म कर देना चाहिए। 

Saturday, January 23, 2016

बात को बोलने की कला...


फोन पर साथी सवारी- सुनो मैं तुम्हें वॉट्सएप कर दूंगा मेल आईडी उस पर तुम रिज़्यूमे भेज देना। सोमवार को इंटरव्यू हो जाएगा और तुम्हारी जॉब पक्की। चलो बाय।
फिर दूसरे को फोन करके- हां जी अंकल। बोल दिया है उसको मैंने। सोमवार को हो जाएगा इंटरव्यू उसका। कल मिलते है अंकल। अंकल मैं कह रहा था कि फोटो लेते आइएगा ना आप कल। बात तो हो रही है। लेकिन, फोटो देख लेते सब तो और अच्छा होता। हां हां अंकल... अरे उसकी नौकरी लग जाएगी आप उसकी टेंशन ना ले। लेकिन, अंकल मैं कह रहा था कि फोटो तो देख ही लेते सब। मम्मी को दिखा देता, पापा को भी देखना ही था। मतलब आप समझ रहे हैं ना अंकल। हे हे हे अंकल... आप भी। नौकरी की चिंता ना करे आप। बस मैं कह रहा था कि हम कल मिलते साथ बैठते। सारी बातें भी हो जाती। फोटो लाना मत भूलना अंकल। हैलो.. हैलो... हैलो...

बात अधूरी रह गई और मैट्रो मंडी हाउस के लिए टनल में घुस गई और नेटवर्क बाहर हवा में छूट गया। ये बातें मेरे पीछे खड़ा यात्री फोन पर कर रहा था। जब नेटवर्क गया और उसने हैलो.. हैलो.. बोलना शुरु किया तो उसकी आवाज़ में अजीब-सी मजबूरी मुझे महसूस हुई। मैंने पलटकर देखा तो वो मुझे शादी की उम्र के हिसाब से कुछ बड़ा लगा। आवाज़ की मजबूरी उसके चेहरे पर भी नज़र आने लगी। लड़की की तस्वीर देखने के लिए वो इतना अधीर था कि उसके लिए वो उन अंकल के रिश्तेदार की नौकरी तक लगवाने के लिए मान गया। नौकरी के एवज में वो बस उस लड़की की तस्वीर देखना चाह रहा था।

बात को घुमाना और असल बात को बातों-बातों में बोल जाना एक कला है। आज का मैट्रो ज्ञान।

Friday, March 13, 2015

माँ होना....

माँ बनना इस वक्त मुझे दुनिया का सबसे मुश्किल काम लग रहा है। पढ़ाई-लिखाई, बिना किसी आधार या सहारे के अचानक दिल्ली आना और नौकरी के लिए जूझना, रिक्शे के पैसे बचाने के लिए लंबी-लंबी दूरी पैदल नापना, बस में धक्के खाना, भुवन से शादी करने का फैसला अकेले लेना, मम्मी-पापा का गुस्सा झेलना, यहाँ तक की गर्भावस्था के पूरे नौ महीने मैट्रो में अधिकतर खड़े होकर ऑफिस जाना... सबकुछ, इस वक्त मुझे बच्चों का खेल मालूम हो रहा है। नौ महीने एक कोख में बंद बच्चा जब अचानक बाहर निकलता है तो उसे इस दुनिया को समझने में अच्छा खासा समय लग जाता है। लेकिन, नई-नई माँ बनी लड़की की समझ या कहे कि नासमझी भी बच्चे से कम नहीं होती। पूरे नौ महीने लगे थे ये समझने में कि गर्भवती होना क्या होता है। क्या खाना होता है, क्या पीना होता है, कैसे रहना होता है। और, जैसे ही इसे मैंने डी-कोड किया वैसे ही एक दिन अचानक दर्द हुआ और लेबर रूम के बेड पर डॉक्टरों की टीम ने अस्मि को धपाक से मेरे ऊपर पटक दिया। दर्द से भरे हुए शरीर के साथ अचानक ही माँ होने की बड़ी-सी ज़िम्मेदारी मेरी गोद में आ गई। शुरुआती तीन-चार दिन तो ये समझने में लग गए कि मेरे पास लेटी ये बच्ची मेरी ही है किसी भाभी, दीदी या मौसी कि नहीं जो अभी इसे मेरे खिला लेने और मन बहला लेने के बाद लेकर चली जाएगी। शरीर के दर्द के साथ बच्चे को पालने के दौरान वात्सल्य जैसा कोई भाव मेरे मन में नहीं आ पा रहा था। मेरे आसपास मौजूद हर व्यक्ति के चेहरे पर मुझे वो नज़र आ रहा था। लेकिन, मैं अपनी पीड़ा और इसके होने के बीच फंसी हुई थी। आज दो महीने से हम दोनों एक साथ है। दिन हो या रात हम दोनों का साथ अटूट है। हम दोनों अब एक दूसरे को समझने लगे है। वो ये जान गई है कि यही है मेरी माँ जिसके साथ मैं दो नहीं ग्यारह महीने से जुड़ी हुई हूं... और, मैं भी अब वात्सल्य का असल अर्थ समझने लगी हूँ। इसके रोने, बीमार होने पर जब आंख से आंसू बहते है तो कई बार लगता है कि मैं कुछ ज़्यादा ही भावुक हो रही हूँ। लेकिन, सच में अब धीरे-धीरे मैं माँ बन रही हूँ। 28 दिसम्बर को मैंने बस इसे जन्म दिया था। माँ तो मैं अब धीरे-धीरे रोज़ाना थोड़ी-थोड़ी बन रही हूँ।