Thursday, May 6, 2021

व्यंग्य: मानस में मिली छूट सेे मुदित सरकार



तुलसीदास के रामचरित मानस में ऐसी बीसियों लाईनें हैं जो जनजीवन के बारे में कई सीख देती हैं, कई खुलासेें करती है। मानस में ही एक प्रसंग में तुलसीदास ने लिखा है- "धीरज, धर्म, मित्र और नारी, आपातकाल परखियो चारि"। इस लाइन में बड़े साफतौर पर कहा गया है कि आपातकाल में जिन चार लोगों की परीक्षा होती है वो धीरज, धर्म, मित्र और नारी ही है। जब से मानस में हुये इस खुलासे की जानकारी खास कारिन्दे ने सरकार को दी है सरकार मुदित है। सरकार वैसे कभी भी, किसी भी बात पर मुदित हो सकती है। मगर पिछले दिनों देश में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के कारण बनी आपात् स्थिति को लेकर सरकार को जिम्मेदार ठहराने की बात हो रही थी तभी से सरकार चिंतित थी और इन लाइनों के हाथ लगने के बाद सरकार निश्चिंत है।


मानस के हवाले से जिम्मेदारी से मिली इस छूट को लेकर जैसे ही कारिन्दे ने जानकारी दी सरकार कारिन्दे का मुंह मोतियों से भर देना चाहती थी मगर कारिन्दे के मुंहचढ़े मास्क ने सरकार का हाथ थाम लिया। सरकार तो इस छूट पर जश्न भी मनाना चाहती थी मगर ऐन मौके पर कोरोना से बचाव के अनुशासन से जश्न अटक गया।मुदित सरकार इस छूट के लिये तुलसीदास के लिये कुछ करना चाहतीं हैं मगर  सरकार को बड़े अफसोस के साथ बताया गया कि तुलसीदास तो लगभग चार सौ  साल पहले ही निर्वाण को प्राप्त हो गये हैं। इधर सरकार के एक खासुलखास अधिकारी ने तो तुलसीदास को मरणोपरांत सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न देने की फाईल भी चलवा दी। वो अधिकारी सरकार को और मुदित करना चाहता था। हर अधिकारी के ऊपर  एक अधिकारी और होता है और इसने भारतरत्न वाली बात पर फटकार लगाते हुए कहा कि सरकार के भी कुछ नियम  होते हैं और वो फाईल रोक दी गई।

मुदित सरकार इससे आगे भी और मुदित होना चाहती है
और इसी सिलसिले मैं उसने मानस अध्ययन और शोध केन्द्र (सियासी प्रखण्ड) भी बना दिया है। इसमें उस कारिन्दे के समान ही बीसियों जुगाड़ू विद्वान भी लगा दिये हैं। वे सभी मानस की एक-एक चौपाई खँगालकर ऐसे अंश और प्रसंग छाँट रहे हैं जो सरकार को मुदित कर सकें। उम्मीद है ऐसा जल्दी ही होगा और मुदित सरकार सच्ची सरकार के नाम से जानी जायेगी

राजा दुबे


  

Saturday, May 1, 2021

चार दशक से हिन्दी कवि सम्मेलन मंच के सरताज़ रहे हैं - डॉ. कुँवर बेचैन

स्मृति शेष: डॉ. कुँवर बेचैन

लेखक- राजा दुबे




अभी कुछ महीने पहले ही तो डॉ.कुँवर बेचैन  मध्यप्रदेश सरकार द्वारा मंचीय कविताओं के लिए प्रदान किए जाने
वाले कवि प्रदीप राष्ट्रीय सम्मान गृहण करने के लिए भोपाल आये थे। राज्य के संस्कृति विभाग ने सम्मान के साथ दिये जाने वाले प्रशस्ति पत्र के लेखन का काम मुझे सौंपा था। कुँवर बेचैन सा'ब मेरे पसंदीदा लेखक हैं अतः उनके बारे में लिखने में मैं बेहद उत्साहित था मगर प्रशस्ति लिखना शुरू किया तो लगा सीमित शब्द संख्या में किसी बड़े और लोकप्रिय रचनाकार को समेटना कितना कठिन होता है। एक बार केवल एक बार दादा ( बालकवि बैरागीजी ) ने मुझे उनसे एक कवि सम्मेलन में मिलवाया था और उनकी वो स्नेहिल और ‌प्रेम से ललककर गले मिलने वाली छवि मेरे जेहन में हमेशा के लिए बस गई। मैं उनसे एक बार फिर गले लगकर उन लम्हों को फिर से जीना चाहता था मगर उनके अवसान से मेरी यह इच्छा अधूरी ही रह गई। उनके अवसान से हमने हिन्दी कविता के एक विलक्षण रचनाकार को खो दिया है।


वर्ष 2019 के लिए कवि प्रदीप राष्ट्रीय सम्मान से सम्‍मानित होने वाले कवि डॉ. कुँवर बैचेन का जन्‍म  01 जुलाई 1942 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के गाँव उमरी में हुआ था। हिन्‍दी साहित्‍य में स्‍नातकोत्‍तर एवं पीएच.डी. उपाधि प्राप्‍त डॉ. बैचेन का वास्‍तविक नाम कुँवर बहादुर सक्‍सेना था। हिन्दी के प्राध्यापक के रूप में सुदीर्घ सेवा के बाद वर्ष 2002 में सेवानिवृत्त हुए  डॉ. कुँवर बैचेन ने चार दशक से भी अधिक समय तक मंच पर कविता पाठ किया और हिन्दी कविता के मंच पर ‍निरन्तर सक्रियता एवं उत्‍कृष्‍ट रचनाधर्मिता के नए प्रतिमान स्‍थापित किये। वे चार दशक से हिन्दी कवि सम्मेलन के सरताज़ रहे और देश-विदेश में अब तक सौ से भी अधिक मान-सम्‍मान एवं पुरस्‍कार प्राप्त डॉ.कुंवर बेचैन एक प्रतिष्ठित रचनाकार थे। इन दिनों वे कवि सम्‍मेलन के इतिहास लेखन के बड़े काम में सक्रिय थे।


कम उम्र में ही माता-पिता के देहांत से कुंवर बेचैन की
परवरिश नाना,मौसा और बहनोई ने की। वह समाज को ही अपना परिवार समझते थे। बचपन में गाँव में लाईट नहीं थी। और कविताएं खिलने का शौक उन्हें बचपन से था। इसलिए स्ट्रीट लाइट की धीमी रोशनी में खड़े होकर ही वे कविताएं लिखते थे । बचपन के ये छोटे-छोटे दुख ही उनकी प्रेरणा बने और उसी से प्रादुर्भाव हुआ कुँअर बेचैन का। कुँअर बेचैन अभी तक पैंतीस किताबें लिख चुके थे । वे देश-दुनिया का व्यापक भ्रमण भी कर चुके हैं। उनके लिखे दो गीत हिन्दी फिल्म-  "कोख" और "भविष्य (द' फ्यूचर) में आ चुके हैं। दो और हिन्दी फिल्मों के लिए भी उन्होंने गीत लिखे हैं। वर्तमान मेंं वे अपनी आत्म कथा लिख रहें थे। गीत विधा के बारे में कुँवर बेचैन मानते हैं कि गीत लय की तरह है। यदि लय टूटी तो प्रलय आ जायेगा। गीत कभी खत्म नहीं हो सकते। उनका स्वरूप बदल सकता है। हिंदी के बदलते स्वरूप को लेकर उनका मानना  था कि किसी भी भाषा के विकास के लिए दूसरी भाषा के शब्दों को समाहित करना ज़रुरी होता है, हिंदी के साथ अन्य भाषाएं भी समाहित हो रहीं हैं यह अच्छा संकेत है।
आज के दौर में आपका नाम बड़े गीतकारों तथा शायरों मेंं शामिल किया जाता था। ग़ज़ल के व्याकरण पर आपकी विशेष पकड़ है। गीत, नवगीत और ग़ज़ल जैसी विधा को आपने न केवल साधा है अपितु नई पीढ़ी को इन जटिल विषयों से जोड़ने के लिए हिन्दी साहित्य में महती कार्य भी किया है। सात गीत संग्रह, बारह ग़ज़ल संग्रह, दो काव्य संग्रह, एक महाकाव्य तथा एक उपन्यास के अतिरिक्त अनेक पत्र-पत्रिकाओं, वेब पृष्ठों, संपादित ग्रंथों तथा स्मारिकाओं में आपको पढ़ा जा सकता है। व्यवहार से सहज, वाणी से मृदु, प्रतिभा से अतुल्य तथा व्यक्तित्व से अनुकरणीय; डॉ. कुंवर बेचैन की रचनाओं में जीवन दर्शन के साथ-साथ सकारात्मकता का एक सौम्य मिश्रण है। इन रचनाओं में जहाँ एक ओर आधुनिकता और बेतहाशा अंधानुकरण के कारण उत्पन्न घुटन है तो दूसरी ओर संबंधों की ऊष्मा और संवेदना की छुअन भी है। उनका लिखा उन्हें हमेशा हमारे बीच होने का अहसास। करवाया रहेगा।

राजा दुबे 

Sunday, April 11, 2021

राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस



सुरक्षित मातृत्व का अर्थ है एक समूची पीढ़ी को सुरक्षित करना


सुरक्षित मातृत्व से तात्पर्य गर्भवती महिलाओं की सुरक्षा से होता है और इसी परिप्रेक्ष्य में गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की उचित देखभाल और प्रसव सेे जुड़ी स्वास्थ्य सम्बन्धी जागरुकता फैलाने के उद्देश्य से देश में प्रतिवर्ष 11 अप्रैल को राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस मनाया जाता है । भारत सरकार ने 11 अप्रैल, 2003 को कस्तूरबा गांधी की जयंती पर यह दिवस घोषित किया था। केंद्र सरकार ने यह घोषणा महिलाओं के कल्याण के लिए कार्यरत " व्हाइट रिबन एलायंस फॉर सेफ मदरहुड" के अनुरोध पर की थी । एक गर्भवती महिला के निधन से ना केवल बच्चों के सिर से माँ का साया छिन जाता है अपितु एक पूरे परिवार की संरचना ही ध्वस्त हो जाती है । इसी एक आशंका से बचने के लिये देश में  गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की उचित देखभाल और प्रसव से जुड़ी सुविधाओं और सावधानियों के प्रति जागरुकता फैलाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस मनाया जाता है । राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की धर्मपत्नी कस्तूरबा गांधी की जन्मतिथि 11 अप्रेल को  राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस के रूप में मनाये जाने का निर्णय भारत सरकार ने लिया था । आधिकारिक तौर पर किसी एक तिथि को राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस घोषित करने वाला भारत  दुनिया का पहला देश है। इस दिन देश भर में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है ताकि गर्भवती महिलाओं के पोषण पर सही ध्यान दिया जा  सके।
 
प्रसव के दौरान प्रसूता की सुरक्षा से मातृ मृत्यु दर में आती है कमी 

माँ बनना प्रकृति का सबसे बड़ा वरदान माना जाता है लेकिन हमारे देश में आज भी यह जोखिम भरा और 
कुछ महिलाओं के लिए तो मृत्यु की आशंका भरा काम
हैं । भारत में हर साल जन्म देते समय तकरीबन पैंतालिस हजार महिलाएं प्रसव के दौरान अपनी जान गंवा देती हैं। देश में जन्म देते समय प्रति एक लाख महिलाओं में से 167 महिलाएं मौत के मुंह में चली जाती हैं। स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय के मुताबिक भारत में मातृ मृत्‍यु दर में तेजी से कमी आ रही है। यह कमी प्रसव के दौरान। प्रसूता को सुरक्षा प्रदान करने से आई है । वर्ष 2010-12 में मातृ मृत्यु दर 178,  वर्ष 2007-2009 में 212 जबकि वर्ष 2004-2006 में मातृ मृत्यु दर 254 रही। देश ने वर्ष 1990 से 2011-13 की अवधि में 47 प्रतिशत की वैश्विक उपलब्धि की तुलना में मातृ मृत्‍यु दर को 65 प्रतिशत से ज्‍यादा घटाने में सफलता हासिल की है जो एक उल्लेखनीय तथ्य है ।

मातृ मृत्यु की वजह पर सतत निगरानी और कारणों का विश्लेषण हो

अशिक्षा ,स्वास्थ्यकर आदतों ( हाईजेनिक हेबिट्स ) की  जानकारी की कमी, समुचित स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, कुपोषण, कच्ची उम्र में विवाह, बिना तैयारी के गर्भधारण आदि कुछ कारणों की वजह से माँ बनने का खूबसूरत अहसास कई महिलाओं के लिए जानलेवा और जोखिम भरा साबित होता है। कई मामलों में माँ या नवजात शिशु या दोनों की मौत हो जाती है। ज्यादातर मातृ मृत्यु की वजह बच्चे को जन्म देते वक्त अत्यधिक रक्तस्राव होता है। इसके अलावा इंफेक्शन, असुरक्षित गर्भपात या ब्लड प्रेशर भी अहम वजहें हैं। इन वजह पर सतत निगरानी और मातृ मृत्यु के कारणों का विश्लेषण भी बेहद जरुरी होता है । प्रसव के दौरान लगभग 30 प्रतिशत महिलाओं को आपात सहायता की आवश्यकता होती है। गर्भावस्था से जुड़ी दिक्कतों के बारे में सही जानकारी न होने तथा समय पर मेडिकल सुविधाओं के ना मिलने या फिर बिना डॉक्टर की मदद के प्रसव के कारण भी प्रसुताओं की मौत हो जाती है।  जच्चा और बच्चा की सेहत को लेकर आशा कार्यकर्ताओं का अहम् रोल होता है लेकिन इनकी कमी से कई महिलाएं प्रसव पूर्व न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रह जाती हैं। समस्त मातृ मौतों में से लगभग 10 प्रतिशत मौतें गर्भपात से संबंधित जटिलताओं के कारण होती हैं।
महिलाओं को प्रसव के दौरान बचाने की मुहिम के समक्ष कई चुनौतियाँ भी हैं। जिनमें किशोरियों को यौन शिक्षा और स्वच्छता, शारीरिक विकास के लिए सही पोषण, गर्भनिरोधक उपायों की आसानी से उपलब्धता और उनकी समुचित जानकारी प्रमुख हैं। इसके साथ ही पूरे देश में, खासकर ग्रामीण इलाकों में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों और चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराए बगैर भी इन लक्ष्य को पाना संभव नहीं है। राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस पर इन्हीं चुनोतियों पर गहन विमर्श किया जाता है ।

कोरोना संक्रमण काल में भी गर्भवती महिलाओं को मिला संरक्षण

कोरोना संक्रमण काल में अवाँछित गर्भधारण के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई । इस स्थिति में प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान में हर महीने की नवीं तारीख को गर्भवती महिलाओं को प्रसव पूर्व चेकअप, मुफ्त जांचें औ दवा के साथ योजनाओं की जानकारी और इलाज मुहैया करवाने से बड़ा लाभ हुआ ।इतना ही नहीं  ज‍िन मह‍िलाओं को ड‍िलीवरी से पहले कोई समस्‍या आती है उन्‍हें पहले ही च‍िन्‍ह‍ित कर ल‍िया जाएगा इसल‍िए भी इस योजना की महत्‍व कोव‍िड के दौरान बढ़ गया । कोरोना संक्रमण काल मेंआर्थि‍क तंगी के दौरान लोगों के पास इलाज करवाने की क्षमता नहीं थी ऐसे में यह योजना मुफ्त इलाज मुहैया करवाने में सक्षम सिद्ध हुआ । इस समय अस्‍पतालों में कोरोना के मरीजों के चलते भीड़ है ऐसे में इस योजना के तहत अगर गर्भवती को रेफर करना पड़े तो वो सुव‍िधा भी म‍िल जाती है। कोरोना काल के बीते एक डेढ़ साल से परिवारों की आर्थिक स्‍थ‍ित‍ि बेहद खराब हालातों में है। गरीब और मध्‍यम वर्गीय पर‍िवार से आने वाले लोगों के ल‍िए इलाज का खर्च उठा पाना भी मुश्‍क‍िल है ऐसे में अगर सरकारी योजनाओं की जानकारी हो तो जरूरतमंदों को परेशान नहीं होना पड़ेगा। ऐसी ही एक योजना है प्रधानमंत्री सुरक्ष‍ित  मातृत्व अभियान। ये योजना गर्भवती मह‍िलाओं के ल‍िए बनाई गई है। कोव‍िड 19 के दौरान इसकी महत्‍वता और भी बढ़ गई है क्‍योंक‍ि इस अभ‍ियान के तहत प्रसव पूर्व देखभाल सुनिश्‍च‍ित की जाती है। अगर कोई महि‍ला ड‍िलीवरी से पहले क‍िसी बीमारी या खतरे का श‍िकार है तो उसे समय रहता च‍िन्‍ह‍ित कर ल‍िया जाता है। ये योजना साल 2016 में शुरू की गई थी पर इन द‍िनों इस योजना की जानकारी होनी जरूरी है ताक‍ि जो लोग प्राइवेट अस्‍पतालों के महंगे इलाज करवाने में सक्षम नहीं हैं वो योजना के तहत मुफ्त इलाज ले पाएं। 

प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान से देश में मातृ मृत्यु दर में कमी होगी

मातृ मृत्यु दर में कमी के लिये भारत सरकार ने  कई प्रभावी योजनाएं आरम्भ की है और प्रसूति के दौरान मौत को कम करने के लिए गंभीर प्रयास सुनिश्चित करने के निर्देश भी स्वास्थ्य प्रशासन को दिये हैं। इन योजनाओं ने न केवल समाज में जागरुकता फैला कर महिलाओं का सशक्तिकरण किया गया है बल्कि उनकी जरुरतों को लेकर भी समाज और देश को संवेदनशील बनाया गया है।इन योजनाओं मे प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान – सबसे प्रमुख है और इस अभियान से देश में मातृ मृत्यु दर में निश्चित रूप से कभी होगी  यह अभियान देश में तीन करोड़ से अधिक गर्भवती महिलाओं को प्रसव पूर्व देखभाल की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए शुरू किया गया है। इस अभियान के तहत लाभार्थियों को हर महीने की नवीं तारीख़ को प्रसव पूर्व देखभाल सेवाओं (जांच और दवाओं सहित) का न्यूनतम पैकेज प्रदान किया जाता है । यदि किसी माह में नवीं तारीख को रविवार या राजकीय अवकाश होने की स्थिति में अगले कार्यदिवस पर यह दिवस आयोजित किया जाता है । पिछले दिनों माननीय प्रधानमंत्रीजी ने मन की बात की एक कड़ी में प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के लक्ष्य और शुरूआत के उद्देश्य पर प्रकाश डाला तथा निजी क्षेत्र के स्त्री रोग विशेषज्ञों और चिकित्सकों से उनकी स्वैच्छिक सेवाएं देने की अपील की। इस कार्यक्रम की शुरुआत इस आधार पर की गयी है, कि भारत में हर एक गर्भवती महिला का चिकित्सा अधिकारी द्वारा परीक्षण एवं पीएमएसएमए के दौरान उचित तरीके से कम से कम एक बार जांच की जाए तथा इस अभियान का उचित पालन किया जाए, तो यह अभियान हमारे देश में होने वाली मातृ मृत्यु की संख्या को कम करने में महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भूमिका निभा सकता है । प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएमएसएमए) के तहत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय का उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और कवरेज में सुधार लाना है। इस संबंध में जागरूकता बढ़ाने के लिए समस्त संचार पैकेज के साथ पीएसएमए वेब पोर्टल और मोबाइल एप की भी शुरुआत की गई है।

गर्भवती महिलाओं के लिये बनी गर्भावस्था सहायता योजना 

गर्भवती महिलाओं के लिए कुछ नई योजनाओं की घोषणा भी की गई, जिसमे गर्भावस्था सहायता योजना भी एक है । इस योजना की घोषणा प्रसूति मृत्यु दर में कमी लाने के प्रयास के रूप में प्रधानमंत्री द्वारा की गई थी। इस योजना के तहत 6,000 रुपये की वित्तीय सहायता गर्भवती महिलाओं को अस्पताल में प्रसव के बाद महिला के बैंक खाते में प्रदान की जाती है । इसी
प्रकार सरकार ने कामकाजी महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश को बारह सप्ताह से बढ़ाकर  छब्बीस सप्ताह कर दिया है जिससे औपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली करीब अट्ठारह लाख महिलाओं को  फायदा मिलेगा।  इस संबंध में प्रधानमंत्री ने कहा, दुनिया में शायद दो या तीन ही देश हैं, जो इस मामले में हम से आगे हैं। इस महत्वपूर्ण फैसले का मूल उद्देश्य नवजात शिशु की देखभाल इसप्रकार करना है कि वो भारत का भावी नागरिक हैं । जन्म के प्रारंभिक काल में यदि उसकी सही देखभाल हो, माँ का उसको भरपूर प्यार मिले, तब ये शिशु बड़े हो करके देश की अमानत बनेंगे।इसके अलावाा भी केंद्र सरकार ने महिला और बच्चों की सुरक्षा और विकास के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैैं और कई योजनाओं की शुरुआत भी की है । बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ , सुकन्या समृद्धि योजना,दीनदयाल अंत्योदय योजना, स्वच्छ भारत योजना के जरिए भी भारत सरकार ने महिलाओं के विकास के लिए न केवल कई प्रयास किए बल्कि समाज में भी इनसे संबंधित संवदेनशील मुद्दों के प्रति लोगों में जागरुकता लाने में भी सफल रही है । इससे समाज में महिलाओं के सम्मान के साथ-साथ उनके आत्मसम्मान में भी बढ़ोत्तरी हुई। साथ ही साथ बाल विवाह के खिलाफ मुहिम और महिला जनन स्वास्थ्य व गर्भाधान को लेकर जागरुकता का भी असर दिखना शुरू हो गया है। हाल के वर्षों में देश ने अनेक सूचकांकों के बारे में महत्वपूर्ण प्रगति की है और देश में नवजात शिशु मृत्यु दर (आईएमआर), मातृ मृत्यु दर (एमएमआर), कुल प्रजनन दर (टीएफआर) जैसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकेतकों में पर्याप्त प्रगति की है और देश में पांच मृत्यु दरों के अधीन विश्व की तुलना में तेजी से गिरावट आई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत में सरकार सुरक्षित मातृत्व के प्रति कितनी सचेष्ट हैं ।

राजा दुबे 

 

Thursday, April 1, 2021

हिन्दी रंगमंच दिवस पर याद आईं बंसी कौल की जेनुइन चिंताएं



3 अप्रैल को जब  हम हिन्दी रंगमंच दिवस मनाएंगे तब हिन्दी रंगकर्म के प्रबल पक्षधर और रंग विदूषक के प्रमुख बंसी कौल की यादें ताज़ा हो रहीं हैं ।

बंसी कौल आज़ हमारे बीच नहीं हैं मगर कोरोना काल में रंगकर्म की प्रासंगिकता का पुनर्आविष्कार करने वाले बंसी कौल के बोल आज भी हमारी स्मृतियों में यथावत हैं । 

बंसी कौल नेे कोरोना काल में लगातार युवा रंगकर्मियों से, देश के बुद्धिजीवियों से और सरकार से भी बड़े तल्ख अंदाज़ में तीखे सवाल किये थे । सवाल थे उन लाखों लाचार मजदूरों की पीड़ा के जो सिर पर गठरी और बगल में दुधमुंही संतानों को दबाए पैदल ही दूर घरों की ओर निकल आते थे । दूर भी इतना की हजार डेढ़ हजार और दो हजार किलोमीटर दूर । कोई हादसे में मारा जा रहा है, कोई थककर दम तोड़ रहा है । 

कोरोना काल में ऑडिटोरियम के उपयोग की अनुमति न मिलने के सवाल पर भी बंसी कौल ने एक राह सुझाई । उन्होंनेे कहा कि मुमकिन है कि मैं सड़कों पर मेकैनिकल प्रॉप्स ( रंगकर्म के कुछ जरुरी यांत्रिक संसाधन) के साथ एक यात्रा निकालूँ, जिसे मैं प्रोसेशनल थिएटर यानी नुक्कड़ नाटक कहूँ । जिसे लोग खिड़कियों से देखें । किसी कॉलोनी या सोसाइटी में ऐसा नाटक करूं जिसे लोग बालकनी से देखे और अब समय आ गया है कि स्मारकों में और बिल्डिंग की छतों पर भी फिर से नाटक के बारे में सोचा जाए ।

देश के शीर्ष, चिंतनशील रंगकर्मियों में शामिल स्वर्गीय बंसी कौल ने कोरोना काल में हिन्दी रंगमंच से जुडा एक बुनियादी सवाल भी उठाया था कि थिएटर का क्या होगा ? आज़ सवाल यह नहीं है  अपितु सवाल यह होना चाहिए कि थिएटर या कलाएँ समाज के लिए जो कुछ कर रही थीं, उसका क्या होगा? 

बंसी कौल दिल्ली के द्वारका स्थित अपने फ्लैट से ही गंभीर रुप से बीमार होने के बावजूद फेसबुक लाइव के अलग-अलग प्लेटफॉर्मों पर रंगकर्मियों खासकर युवाओं से सीधा संवाद कर रहे थे और इस प्रकार उन्होंने कोरोना काल में हिन्दी रंगमंच के दायित्व को एक दिशा दी ।

उन्होंने भोपाल की अपनी नाट्य संस्था रंग विदूषक के नए-पुराने रंगकर्मियों से प्रवासी मजदूरों की बेहाली पर कविताएं लिखवाईं जिसकी एक रचना बनाकर संगीतबद्ध किया जाएगा । उन्हें पता है कि ये कोई महान रचनाएं नहीं हैं लेकिन एक संवेदनशील कलाकार के नाते आपको अपने आसपास की ऐसी त्रासदियों के बारे सोचना पड़ेगा, दिमाग पर जोर डालना पड़ेगा. नहीं तो आप काहे के कलाकार ?

सच तो यह है कि कुछ बिरले ही रंगकर्मी इस देश में हुए हैं अथवा हैं जो रंगकर्म को एक सामाजिक दायित्व ,एक जीवन शैली और एक नैतिक अनुष्ठान मानते हैं और स्वर्गीय बंसी कौल भी उन्हीं में से एक थे । आज़ जबकि कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर से देश फिर उन्हीं विषम स्थितियों के  कगार पर है आप बहुत याद आ रहें हैं बंसी कौलजी ।


राजा दुबे