Saturday, November 15, 2008

हम संवेदनशील, ख़बरों को पेलने वाले...

न्यूज़ रूम में दो पत्रकार प्राइम टाइम के स्पेशल पर बात करते हुए -
यार ये तो बढ़िया न्यूज़ पकड़ी है। कल भी दिनभर पेल सकते हो इसे तो।
हाँ यार बड़ी मुश्किल से मिले है ये विजुअल्स, साला एक तो इतना बड़ा एक्सीडेन्ट और हर जगह ख़ून ही ख़ून साला मन ख़राब हो गया था।
सही कहा। लेकिन, यार लोग इन्हें देखेंगे तो उनके तो रोंगडे खड़े हो जाऐंगे। साला ये तो एकदम मस्त रहा। ब्रेक भी हमने ही की है ना।
और क्या, वैसे भी इतने भयानक एक्सीडेन्ट डेली कहा होते है यार। जैसे ही पता चला कि बच्चों के भी मरने की ख़बर मैं दो यूनिट के साथ पहुंच गया।
अबे ये देख इस माँ की बाइट क्या इमोशन के साथ रो रही है। साला तू काम करता है तो पक्का ही करता है। इस सिचुएशन में भी निकलवा ली तूने बाइट।
यार लेकिन इन विजुअल्स को लाने में झंड हो गई थी। साला कैमरापरसन मुझे आकर कहता है - मेरी ही गाड मिली थी मारने को।
अबे इनके यूँ ही नाटक रहते हैं। चल अपना क्या विजुअल तो बढ़िया मिल गए न। खेलते रहेंगे हम...


स्पेशल के ख़त्म होते ही एकंर ने कहा - इस स्पेशल रिपोर्ट में इतना ही देखते रहिए .... चैनल। हमारी अगली प्रस्तुति हैं - कैटरिना के नए जूते...

पत्रकारिता की पढ़ाई और पत्रकारिता करने के दौरान एक चीज़ जो प्राथमिकता के नाम पर सीखाई जाती है वो है - भाषा।
भाषा कैसी होनी चाहिए... किन शब्दों का प्रयोग ऑन स्क्रीन प्रयोग होता है, किन का नहीं। सब बताया जाता है। एक गलत शब्द और सीनियर की डाँट - पता नहीं है ये शब्द नहीं चलते है...

ऑन स्क्रीन शालीन, सभ्य और संतुलित भाषा में बात करने वाले हम पढ़े लिखे, संवनेदनशील और समाज को जागरूक रखनेवाले लोगों की रोज़मर्रा की भाषा शुरु होती है पेलने से और ख़त्म होती है झंड मारने से...

1 comment:

PN Subramanian said...

यही झंड लोग तो भारत के भविष्य का निर्माण कर रहे है. बधाई हो.
http://mallar.wordpress.com