Monday, December 22, 2008

बेचारा आम आदमी जो ठहरा... कॉमन मेन।



एक रिक्शेवाला, बेचारा दिनभर खटता हैं, लोगों को यहाँ से वहाँ ढोता है, पुलिस का डंडा खाता हैं, तब जाकर दो पैसे कमा पाता हैं। बेचारा आम आदमी जो ठहरा... कॉमन मेन।
एक छोटी-सी परचून की दुकान चलानेवाला दिनभर दुकान पर बैठा रहता हैं, उधारीवालों से निपटता हैं, थोक विक्रेता की गालियाँ सुनता हैं, तब जाकर दुकान और घर चलाने लायक पैसे जुगाड़ पाता हैं। बेचारा आम आदमी जो ठहरा... कॉमन मेन।
एक छोटी-सी फ़र्म का मालिक, बड़े बैंक से जुड़कर काम शुरु करता हैं, पचहत्तर तरीक़े के नियम कायदें मानता हैं, बैंक के ऑफ़िसरों से डांट सुनता हैं, अपने निक्कमे इम्प्लॉयी से काम करवाने की कोशिशें करता हैं, तब जाकर अपना फ़र्म चला पाता हैं। बेचारा आम आदमी जो ठहरा... कॉमन मेन।
एक मकान मालिक, जो अपनी ज़िंदगी भर की जमा पूंजी से घर बनाता हैं, कुछ कमाई हो जाए इसलिए घर को किराए पर लगा देता हैं, किराएदार के नखरे सहता है, उसे सारी सुविधाएँ देता हैं, तब जाकर कुछ पैसे कमा पाता हैं। बेचारा आम आदमी जो ठहरा... कॉमन मेन।
एक लड़का, पढ़ाई में अच्छा, पुलिस की परीक्षा में बैठता है, अच्छे नम्बरों के बाद भी घूंस देकर पुलिस में भर्ती होता हैं, जोश से भरा हुआ गलत काम करनेवालों को पकड़ता हैं। लेकिन, फिर उन्हें अपने रसूख के दम पर छूटते देखता हैं, अपनी इमानदारी पर चांटा पड़ते देखता हैं। बेचारा आम आदमी जो ठहरा... कॉमन मेन।
एक छात्र, कॉलेज में हो रही धांधलियों को देखकर दुखी होता हैं, देश के बिगड़ते हालातों को देखकर राजनीति में जाने की सोचता हैं, इमानदारी से देश सेवा करना चाहता हैं, धरने देता हैं, प्रदर्शन करता हैं, फिर अपने ही बड़े नेता को दूसरी पार्टी और बड़े आदमियों ने आगे बिकते देखता हैं, ख़ुद को इस्तेमाल दंगा भड़काने में होते देखता हैं। बेचारा आम आदमी जो ठहरा... कॉमन मेन।


इन्हीं सब के बीच एक लड़का गांव से शहर आता हैं। नौकरी ढ़ूढने के लिए, स्टेशन से रिक्शा पकड़ता है। पहले तो चार रिक्शेवाले उस रास्ते जाने से ही मनाकर देते हैं जहाँ उसे जाना हैं। फिर एक तैयार होता हैं वो भी दोगुने पैसों पर... मकान मालिक के पास जाता है, पूछता हैं क्या कोई रूम किराए पर हैं बड़ी पूछताछ के बाद, सौ नियम कायदों पर हामी भरने के बाद, ज़्यादा पैसों पर एक सीलन भरा रूम वो पाता है जिसमें पैरों को लंबा करना भी मुश्किल है... दुकान पर किराने का सामान खरीदने जाता है, आधे से ज़्यादा सामान खराब क्वालिटी का होता हैं, ज़्यादा दाम पर मिलता है। पैसे दुकानदार को खुल्ले चाहिए और एक-दो रुपए बचें तो उसकी चॉकलेट थमा दी जाती हैं। अगर कहो कि पैसे दो तो जवाब मिलता हैं लेना हो तो लो नहीं तो सामन रखकर जाओ... सड़कों पर पैदल भटकता है, एक दिन सड़क क्रास करने में गलती कर देता है और पुलिसवाले के हत्थे चढ़ जाता है, बताता है कि नया हूँ शहर में नियम पता नहीं था छोड़ दो अगली बार ध्यान रखूंगा। लेकिन, फिर भी पुलिस के दो डंडे खाता है और पैसे देकर छूटता है... एक फ़र्म में इंटरव्यू के लिए जाता हैं। उसके पास वो सब कुछ है जो नौकरी के लिए ज़रूरी है, फिर भी फ़र्म का मालिक उसे दो महीने बिना पैसे के काम करने को कहता हैं, उसके बाद भी 4 हज़ार रुपए देने की बात करता हैं। वो नौकरी के लिए हाँ कर देता हैं। बेचारा आम आदमी जो ठहरा... कॉमन मेन।

कौन है ये कॉमन मेन... कैसा होता है ये कॉमन मेन... आखिर कहाँ रहता है ये कॉमन मेन और क्या करता हैं ये कॉमन मेन। क्या रिक्शा चलानेवाला कॉमन मेन है या फिर सब्जी बेचनेवाला कॉमन मेन है या फिर चायवाला या फिर धोबी या नाई या सरकारी स्कूल का मास्टर या किसान या मैं या आप... कौन है ये...
शायद हम सभी कॉमन मेन हैं और हम सभी अनकॉमन मेन भी हैं। जब हम दबे हुए रहते हैं, हमारा कोई शोषण करता हैं तो हम बेचारे आम आदमी हो जाते हैं और जब हम किसी और का शोषण करते हैं तब... मुझे इसकी मूल या कहे कि मुख्य परिभाषा तो मुझे मालूम नहीं लेकिन इतना जानती हूँ कि जो सबसे ज़्यादा दबा हुआ हो, सबसे ज़्यादा कुचला हुआ हो, हर बार जिसके साथ अन्याय होता हो वही कॉमन मेन है। लेकिन, क्या अन्याय क्या सिर्फ़ एक के ही साथ होता है या फिर क्या कोई एक ही तबका ऐसा है जो ये अन्याय करता हैं। अगर रिक्शवाला कॉमन मेन है तो उसके साथ अन्याय होता है कि उसे पुलिस से बचने के लिए घूंस देनी होती है, लोगों की गालियाँ खानी पड़ती हैं, बिना किसी आराम के काम करना पड़ता है तब वो कुछ रुपए कमा पाता हैं। लेकिन, वो पुलिस को घूंस क्यों देता हैं क्योंकि वो बिना परमिट के रिक्शा चलाता है। वो सवारी की गाली क्यों खाता है क्योंकि वो ज़रूरत से ज़्यादा पैसे मांगता हैं। ये हाल ऑटोवालों, बसवालों और टेक्सीवालों के भी हैं। पुलिस का दबाव, सवारियाँ नहीं मिलना, मालिक की गालियाँ सब वो खाते हैं। तब वो कॉमन मेन कहलाते हैं। लेकिन, अगर सवारी के नज़रिए से देखें तो वो भी बेचारी ही तो हैं। बसों में लटकती हैं, ऑटोवालों की मनमानी सहती हैं। सफर करना है इसलिए चुपचाप ज़्यादा पैसे से लेकर लटकने तक को राज़ी हो जाती हैं। तो वो कॉमन मेन है। ऐसे ही अगर मैं एक उपभोक्ता के रूप में कॉमन हूँ तो वो दुकानदार भी उस थोक विक्रेता के आगे कॉमन है जिससे वो सामान खरीदता हैं। पुलिस, नेता और रसूखवालों के आगे लाचार(कॉमन) हैं। आखिर वो भी जब किसी अपराधी को सही तरीक़े से पकड़ती है और सज़ा दिलवाना चाहती हैं तो कोई नेता उसे बचा ले जाता हैं। उस मौक़े पर तो पुलिस भी बेचारी (कॉमन) हो गई। मुंबई में बम ब्लास्ट होते हैं, आंतकी महीनों तक नरीमन हाऊस में किराए से रहते हैं, नाव का अपहरण करते हैं, सिम कार्ड खरीदते हैं, साइकिलें खरीदते हैं। लेकिन, किस्से हम आम आदमियों से ही न... किसी भी व्यक्ति को मकान किराए पर देने से पहले पुलिस वेरिफ़िकेश क्यों नहीं करवाया जाता हैं, रिक्शे और ऑटो क्यों बिना परमिट के चलाए जाते हैं, क्यों किसी संदिग्ध वस्तु को देखकर एक कॉमन मेन वहाँ से कट लेता है चुपचाप, क्यों एक आम आदमी चुनाव की छुट्टी घर में आराम करके या फिर फ़िल्म देखकर बिताता हैं, न की वोट देकर। क्यों ये कॉमन मेन अपने फ़ायदें के लिए घूंस दे देता हैं। अपना काम निकलवा लेता हैं और दूसरों के लिए मुश्किलें पैदाकर देता हैं। क्यों वो उस वक़्त दूसरों की नहीं सोचता। क्यों गैरक़ानूनी रूप से चल रहे हैं रिक्शों में बैठता हैं, क्यों सब स्टैन्डर्ड वस्तुएं खरीदता हैं। यही सारी अनदेखियों के चलते ही एक कॉमन मेन हर बार पिटता हैं और फिर रोता हैं कि
बेचारा आम आदमी जो ठहरा... कॉमन मेन।

3 comments:

संगीता पुरी said...

क्यों ये कॉमन मेन अपने फ़ायदें के लिए घूंस दे देता हैं। अपना काम निकलवा लेता हैं और दूसरों के लिए मुश्किलें पैदाकर देता हैं। क्यों वो उस वक़्त दूसरों की नहीं सोचता। क्यों गैरक़ानूनी रूप से चल रहे हैं रिक्शों में बैठता हैं, क्यों सब स्टैन्डर्ड वस्तुएं खरीदता हैं। यही सारी अनदेखियों के चलते ही एक कॉमन मेन हर बार पिटता हैं और फिर रोता हैं कि बेचारा आम आदमी जो ठहरा... कॉमन मेन।
बहुत अच्‍छा लिखा है।

cmpershad said...

यदि वह यह सब नहीं करता तो वह अनकामन हो जाता - कामन मैन कैसे रहता?:)

Mired Mirage said...

सही कह रही हैं आप ! परन्तु बहुत बार कुछ गलत करवाने के लिए ही घूस नहीं दी जाती। अपना सही, कानूनी काम भी करने करवाने के लिए भी घूस दी जाती है।
घुघूती बासूती