Friday, December 26, 2008

बहन चो....


दिल्ली आने के बाद कई नई बातें जानी है, समझी है, सीखी हैं। लेकिन, गालियों का जो जाल इस शहर में सुना है वो मेरे लिए बहुत बड़ा झटका है। हर वाक्य की शुरुआत बहन चो.... से और अंत भी बहन चो.... से। मन कचवा जाता है बहन चो.... बहन चो.... बहन चो.... सुन-सुनकर... दोस्तों के बीच जब ये बात कहती हूँ तो जवाब मिलता है कि अब इतना तो चलता ही है, तुम कुछ ज़्यादा ही सोफ़ेस्टीकेटेट हो। क्या बिना गालियों के बात करना सोफ़ेस्टीकेश होता है... या फिर महज सभ्य होना है... हम आखिर है क्या सभ्य लोग या फिर बहन चो....
बस स्टॉप पर -
बहन चो....आज सुबह-सुबह पाँच बजे उठना पड़ा... बहन चो....
बहन चो....रात को 2 बज गए थे साते हुए... बहन चो....
बहन चो....ये काम के चक्कर में ना कुत्ते बन गए हैं... बहन चो....

बस में ड्राइवर कन्डक्टर की बातें -
बहन चो....सवारी को ऊपर कर... बहन चो....
बहन चो....शीशे से दूरकर... बहन चो....
बहन चो....टिकिट काट... बहन चो....
बहन चो....आगे देख कितनी सवारियाँ चढ़ी हैं... बहन चो....

बस में बात करते लोग -
बहन चो....सोच रहा हूँ एक सेकेन्ड बस खरीदनी है... बहन चो....
बहन चो....सोच रहा हूँ गांव भिदवा दूँ... बहन चो....
बहन चो....कितने तक में आ जाएगी... बहन चो....
बहन चो....ये तो देखना पड़ेगा कि कैसी चाहिए... बहन चो....
बहन चो....किस कन्डीशन की चाहिए.... बहन चो....
बहन चो....फिर चलना शाम को दिखा दूँगा... बहन चो....

ऑफ़िस जाते हुए लोगों की बातचीत -
बहन चो....छुट्टी के दिन भी काम करना पड़ता है... बहन चो....
बहन चो....इतना काम दे दिया है न कि क्या बताए... बहन चो....
बहन चो....घरवाले बोलते हैं, छुट्टी लो तो कही घूमने जाए... बहन चो....
बहन चो....घरवालों को ऑफ़िस की कोई समझ ही नहीं हैं... बहन चो....

आप कोई भी भाषा बोलते हो, लोग तैयार है उसकी बहन चो.... के लिए...


21 comments:

अंशुमाली रस्तोगी said...

दीप्तीजी,
गालियों के प्रति यूं भावनात्मक न बनें। गालियां सभ्य समाज का द्योतक हैं। गालियों की महिमा अगर जाननी हो तो काशीनाथ सिंह को पढ़ें। मैं जिस शहर से यूं यहां तो बेधड़क गालियां दी जाती हैं। गालियों को इंज्वाए करें।

डॉ .अनुराग said...

जब पहली बार शेखर कपूर की मूवी "बेंडिट क्वीन "देखने गए थे तो पहले सीन में ही झटका खा गये थे..... हमारे साथ कुछ कॉलेज की लड़किया थी....इंटरवेल में सब गायब हो गई......विशाल भारद्वाज ने अभी कुछ दिन पहले हमारे शहर को बसे बनाकर एक ओमकारा बनाई थी ,सचाई डालने के अति उत्साह में ....उन्होंने ये शब्द भी डाल दिया ...इतनी क्लासिक मूवी को भी इसलिए उतने दर्शक नही मिले जिसकी वो हक़दार थी.......दुखद है ....पर सच है

रंजन said...

पता नहीं क्या क्या बोलते है और इनके मायने क्या है!! लेकिन ये हर तरफ गुजंते है!

Anonymous said...

भेन चो* यही मिला था लिखने को?

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

लोगों को पता ही नहीं होता वे क्या बोल रहे हैं। शायद कभी कोई भाषा क्रांति ही इस से छुटकारा दिला पाए।

विनय said...

बहुत बढ़िया, भई, क्या बात है, हम भी शुरु में इसी बात से ख़ूब परेशान थे, लखनवी जो हैं

---
चाँद, बादल, और शाम
http://prajapativinay.blogspot.com/

गुलाबी कोंपलें
http://www.vinayprajapati.co.cc

सुजाता said...

दीप्ति ,
हद यह है कि इन्हें हम रोज़ सड़कों ,बसों,सार्वजनिक स्थानों पर सुनते हैं। ये शब्द ही नही ,ऐसे वाक्य भी हैं और आपके आस पास से गुज़रते हुए बहुत आराम से या साभिप्राय ऐसी बातें कहते लोग सुनाई पड़ जाएंगे।
इन्हें कैसे इंज्वाय किया जाता है यह सीखने मे बहुत वक़्त लगेगा लेकिन यकीन मानिए कि जिस दिन आप हमें सरे आम,बस मे , मेट्रो में,कॉलेज मे या घर परिवार की बात चीत के बीच बहन चो या चो.. चू..,भैन के..माँ के... यापा वाली बातें कहते सुनेंगे आप सभी के पाँवों तले की ज़मीन खिसक जाएगी।आफ्टर आल अंग्रेज़ी के फक या से कई गुना सृजनात्मक और प्रभावी हैं ये गालियाँ।

PD said...

सच कहूं तो कुछ ऐसे ही कारणों से मैं उत्तर भारत में शिफ्ट नहीं होना चाहता हूँ.. यहाँ दक्षिण में लोगों कि शिष्टता का लेवल उत्तर भारत से अच्छा है..

और ये अनाम भाई मुझे मेरी ही चीज ऑफर कर रहे हैं.. :)

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

गिडगिडाने से नही सुनता यह जहाँ
मुह भर कर गालिया दो पेट भर कर बददुआ

sidheshwer said...

ये गालियाँ नहीं गोलियाँ है भाषा की देह को चीथती हुई ...पर क्या करें ...

सुजाता said...

यहाँ कमेंट देने की बजाए आलोचक ने पोस्ट मे अलग से अपने विचार रखे हैं । मेरे पिछले कमेंट का मानो असर हो गया है। दीप्ति ,माने लड़की, अपनी पोस्ट मे ऐसा शब्द कैसे इस्तेमाल कर सकती है?तभी मनिए कहा था कि आप सभी के पाँवों तले ज़मीन खिसक जाएगी यदि स्त्रियों ने इन गालियों को इंज्वाय करना और इनके प्रति सहज होना सीख लिया।क्या भाषा और व्यवहार की सारी तमीज़ का ठेका स्त्रियों ,बेटियों ने लिया हुआ है?

आप चाह्ते है कि गालियों का धाराप्रवाह प्रयोग वातावरण मे होता रहे और बेटियाँ सहज बनी रहें। यह सम्भव नही है। इसलिए यदि इनका प्रयोग बन्द नही करेंगे तो धीरे धीरे सहज होने के लिए वे भी प्रयोग शुरु कर देंगी और तब अहसास होगा कि गालियों के प्रति सहज होना किसे कहते हैं।अंग्रेज़ी मे ऐसे प्रयोग अब लड़कियाँ आम करने लगीं है।अंग्रेज़ी की गाली की खनक शायद कम सुनाई देती है।पर जब यह अपनी भाषा मे होगा तो सोचिए!
ब्लॉग लिखने से कम से कम उसे पढने वाले आप जैसे विचारवान लोग तो अपनी शब्दावली सुधर लेंगे और अपने बेटे ,दोस्तों आदि से भी कहेंगे।

डा०आशुतोष शुक्ल said...

हाँ अब यह तो झेलना ही पड़ता है जब भी हम बाहर निकलते हैं तो इन सारी बातों से पाला होता ही है. यह बात उन लोगों को बहुत अखरती है जिन्होंने कभी इस तरह की बातें आम-तौर पर नहीं सुनी हैं. एक बहुत धक्का सा लगता है पर यदि आप उनसे पूछें तो वो पलट कर पूछ लेंगें की मैंने कब गाली दी ?

मुसाफिर जाट said...

बहन चो... दिल्ली वालो कू महसूस नहीं होता कि वे गलियां दे रहे हैं. ना तो देने वाला अकड़ दिखता है और ना ही सुनने वाला गुस्सा करता है. बहन चो... दिल्ली तो है ही दिलवालों की.
वैसे आपको यहाँ पर एक यही बात दिखाई दी. इन लोगों की सहनशीलता तो देखो.

पा.ना. सुब्रमणियन said...

शायद यही हमारे सभ्य होने का पैमाना है. क्रांति भी यही है. कोई अलग से भाषा क्रांति की उम्मीद ना रखें. अच्छा तरीका तो यही है की ऐसों को इग्नोर करें. उनसे बात ही ना किया जावे. इस ट्रेंड को प्रोत्साहित किया जाना घातक होगा.

Anonymous said...

बचपन में कई भाइयों की इकलौती बहिन होने के कारण ये गाली अन्दर तक कहीं चीर जाती थी (खासतौर पर तब जब वो आपस में ही लड़ते समय इसका प्रयोग करते थे) ऐसा लगता था मानो ज़मीं फट जाए और मैं उसमें समा जाऊं. उस समय उस बहिन को बड़ा मिस करती थी जो दरअसल कभी थी ही नहीं (आखिर मेरा दुःख कुछ तो बँटा लेती). बहरहाल, पति से कभी कभार ज़रूर बहस हो जाती थी गाली प्रयोग पर. लेकिन उनका तर्क है कि अपने आस पास कुछ भी मन मुताबिक न होने पर अपने दिल का गुबार निकालने के लिए गालियों का प्रयोग आवश्यक हो जाता है. उनकी ये आदत छुडाने की कोशिश अब छोड़ दी है. कभी कभी सोचती हूँ कि वो कौन सी शक्ति है जो स्त्रियों को इतनी मजबूती देती है कि उन्हें ऐसे कुंठित सहारों की आवश्यकता नहीं होती.

Abhijit said...

What the 'F'.... अनुराग की बात से वाकिफ नहीं रखता हूं...फिल्‍म मे ऐसे संवाद फिल्‍म के प्रभाव को बढ़ाने के लिए डालना पड़ता है... मुझे इसमें बुरा नहीं दिखता...मैंने अपनी एक अंग्रेंजी दां दोस्‍त से कहा कि जब यह गालियां हिंदी में दी जाती है तो तुम उसे लो क्‍ला बता देते हो लेकिन वहीं गाली तु अंग्रेंजी में देते हो तूम्‍हें कुछ नहीं लगता...F**K Off

गजेन्द्र बिष्ट said...

अंशुमाली जी ने कहा कि "गालियां सभ्य समाज का द्योतक हैं, गालियों को इंज्वाए करें" मैं उनसे पूछता हूँ कि क्या वे इन गालियों को अपने घर में भी इंज्वाए करते हैं? यदि नही तो उनको दुबारा सोचना होगा अपनी बात पर ।

मैं सुजाता जी के views का स्वागत करता हूँ ।
गालियां सभ्य समाज का पतन कर रहे हैं ।

Amit said...

बहुत सही...जब मैं भी पहली बार दिल्ली गया था .और मुझे जब पहली बार ये सुनने को मिला ..तो मस्त मार हो गई थी मेरी...बाद में पता चला वो तो यहाँ साधारण है..सभी बोलते हैं...और यहाँ तक की बाप अपने बेटे से बोलता है ..
बहन चो...रोटी खा ले...
वैसे मैं सुजाता जी के बात से सत प्रतिशत सहमत हूँ...उन्होंने बिल्कुल सही कहा है...

प्रदीप मिश्र said...

aapne kuchh hi jagah ki baat likhi hai. aiasa kaee gharon mein bhi hota hai. police walon ke alava. dard jayaj hai, gali dene walon ko is par sochana chahiye, tab hi fark pad sakta hai.

HARI SHARMA said...

गालीबाजी की इस बहस मे ना चाहते हुए कूद रहा हूँ. कुछ बातो से सहमती और कुछ से असहमति.
मैं इस बात से सहमत हूँ कि गाली अपने से कमज़ोर साबित करने को दी जाती है. या कि ये किसी कुंठा का परिणाम होती है. लेकिन अधिकतर इसका असर हमेशा अपने उपर होता है. जिस गाली का यहाँ ज्यादा प्रयोग हुआ है (भे.चो.) पिछडे लोग उसे जीजा के विकल्प के तौर पर करते हैं. साला इसका प्रतिउत्तर है. माँ.चो. का भी इसी तरह पिता या माँ के किसी प्रेमी के लिए प्रयोग होता है. ऐसे ही सारी गालिया रिश्तो के लिए प्रयोग होती हैं.
मुश्किल ये है कि पढ़े लिखे प्रगतिशील लोग क्यों अपने व्यबहार की भाषा बना लेते हैं. और मुझे लगता है ये हमारी शाब्दिक कंगाली की निशानी है. मैं पुरुष द्वारा गालियों के किसी भी तरह के प्रयोग के खिलाफ हूँ. यह निंदनीय है और रहेगा.
प्रतिक्रिया मे जो महिलाए कहती हैं कि अगर माँ बहिन बेटी यही शब्द काम मे ले तो उनका और समाज का जिसमे उनके बच्चे माँ भाई बहिन बाप सब हैं क्या भला होगा और नारी की प्रगति का कौनसा झंडा फहराया जायेगा मेरी समझ से परे हैं. आत्मनिर्भरता, निर्णय का अधिकार, दहेज़ से मुक्ति, शिक्षा के अवसर, सुरक्षा, स्वास्थ्य बहुत से ऐसे विषय हैं जिन पर काम करके नारी को आगे बढाया जा सकता है. गाली का जवाब गाली से दो मुझे इससे इनकार नहीं है. लेकिन इसे क्यों कर अपने रोजमर्रा के वार्तालाप का हिस्सा बनाया जाए यह मेरी समझ से परे है. एक और बात है कि स्त्री विमर्श पुरुष की आलोचना से शुरू होकर पुरुष की आलोचना पर ख़तम होता है. ऐसे मे पुरुष विमर्श अगर स्त्री की आलोचना तक सीमित रहे तो कोई बड़ी बात नहीं होगी. लेकिन क्या समाज का सकारात्मक विकास दोनों की जिम्मेदारी नहीं है. मुझे लगता है इन बैचारिक अड्डो ( ब्लोग्स ) को नव विचार का मंच बनाया जाए. लेंगिक युध्ध का मैदान नहीं.
http://hariprasadsharma.blogspot.com/

BRIJESH SINGH said...

BAHUT HI SAHI OBSERVATION HAI MAM.............GAALION KI JIS TARIKE SE APNEE SOCIETY MEIN MOOK SAHMATI MIL GAYI HAI ..WO VAAKAYI DOOKHAD HAI