Saturday, January 31, 2009

स्लमडॉग मिलिनेयर गुलामी मानसिकता की जीत









पंकज रामेन्दू


चार गोल्डन ग्लोब अवार्ड, 10 ऑस्कर नामिनेशन और फिल्म को मिली अनंत शोहरत। फिल्म ने भारत में रिली़ज होने से पहले ही अपने दाम कमा लिये। फिल्म की खासियत है एक स्लम यानि भारत के अथाह झुग्गी के समंदर में से निकली एक बूंद जो कि उसी झुग्गी का हिस्सा है उसकी किस्मत उसे कौन बनेगा करोड़पति के शो में पहुंचा देती है, जहां पर उसका भाग्य उसका साथ देता है और उसके सामने ऐसे सवालात आते हैं जो कहीं ना कहीं से उसकी ज़िंदगी से जुड़े रहते हैं वो एक के बाद एक हर सवाल का जवाब देता जाता है और करोड़पति बन जाता है। फिल्म की कहानी पूरी तरह नियति पर निर्धारित है, विकास स्वरूप के उपन्यास क्यू एंड ए पर बेस्ड इस फिल्म में मुंबई के स्लम्स को जिस तरह से दिखाया है वो ऐसा लगता है जैसे डायरेक्टर डैनी बोयले ने फिल्म बनाने से पहले फिल्म पर कोई खास रिसर्च नही की और जिस तरह से उपन्यास में लिखा गया उसे उसी तरह चित्रित कर दिया।

फिल्म की कहानी दो बच्चों सलीम और जमाल की जिंदगी से जुड़ी हुई है जो अपनी मां के साथ मुंबई के झुग्गी बस्ती में रहते हैं, 1992 के हिंदू मुस्लिम दंगो की वजह से उनकी मां मारी जाती है और दोनों बच निकलते हैं, कभी वो ट्रेन में चना बेचते हैं तो कभी ताजमहल के गाईड बन जाते हैं। एक सामान्य मसाला फिल्म की तरह इस फिल्म में भी दोनों भाई में से एक शरीफ है और दूसरा बिगड़ जाता है, फिल्म में एक हीरोइन है जिससे दोनों भाइयों की मुलाकात दंगो के दौरान ही होती है, जिसकी चाहत ही शरीफ वाले भाई यानि जमाल को वापस मुबई की ओर रुख करने पर मजबूर कर देती है और इत्तेफाक देखिये वो इसे मिल भी जाती है। लड़की के ही चक्कर में ही दोनों भाईयों अलग हो जाते हैं, या यूं कहिये कि जमाल बड़े भाई सलीम को छोड़ देता है, सलीम जिसने एक गैंगस्टर का मर्डर कर दिया है वो दूसरे गैंगस्टर का हाथ थाम लेता है, औऱ जमाल के प्यार यानि लतिका को अपने गॉ़डफादर जावेद के पास छोड़ देता है। इधर सलीम एक मोबाइल कंपनी में चायवाला बन जाता है जहां से उसे कौन बनेगा का करोड़पति का ऑफर मिलता है और इत्तेफाक से उसके सामने ऐसे सवाल आते हैं जो कभी ना कभी उसकी जिंदगी में हुई किसी घटना से जुड़े हुए हैं और वो जवाब देता जाता है, इसी वजह से शो के प्रजेंटर अनिल कपूर को उस पर शक हो जाता है कि वो चीटिंग कर रहा है और उसे पुलिस को सौंप दिया जाता है।

फिल्म की खामियों की बात करें तो सबसे ये समझ में नहीं आता है कि झुग्गी बस्ती का बाशिंदा ब्रिटिश एक्सेंट में अंग्रेजी कैसे बोलने लगता है, अगर पूरी फिल्म अंग्रेजी में भी बनती तो समझ में आता कभी हिंदी कभी अंग्रेजी का झोल फिल्म को उलझा देता है, दूसरा ये समझ में नहीं आता है कौन बनेगा करोड़पति जैसे शो लाइव कब से होने लगे। तीसरा और सबसे खास फिल्म में ऐसा क्या खास था जिसने फिल्म को इस कदर शोहरत दिला दी।

फिल्म में एक सीन है जिसमें विदेशी टूरिस्ट को स्लम टूरिज्म दिखाने के लिए जमाल लेकर जाता है, और पीछे से उसका भाई सलीम विदेशी टूरिस्ट की गा़ड़ी के सभी सामान चुरा लेता है, जब जमाल को टूरिस्ट का ड्राइवर मारता है तो जमाल ये कहता है कि आप ही लोग कह रहे थे कि आपको असली इंडिया देखना है ये है असली इंडिया, विदेशी महिला कहती है ठीक है अब हम तुम्हे बताते हैं कि असली अमेरिका क्या होता है और अपने पति की ओर इशारा करती है जो उस बच्चे को पैसा निकाल कर देता है, एक और सीन है जिसमें जमाल अमिताभ बच्चन से ऑटोग्राफ लेने के लिए मल से भरे हुए गड्ढे में कूद जाता है। ये दो सीन ही बता देते हैं कि आखिर फिल्म को अवार्ड क्यों मिला।

अगर भारत की झुग्गी के चित्रण की बात है और इसी को आधार मान कर विदेशी संस्था अवार्ड देती है तो क्या वजह है कि सलाम बांबे को अवार्ड नहीं मिला, क्या कारण है कि सिटी ऑफ गॉ़ड को इतनी सराहना नहीं मिली, जबकि देखा जाए तो हाल ही में रिलीज हुई फिल्म आमिर में जिस तरह से मुंबई के स्लम्स को दिखाया गया वो यहां की सच्चाई का ज्यादा बेहतर तरीके से बयान करता है।

फिल्म के डायरेक्टर का नाम अगर डेनी बोयले की जगह श्री राम राघवन या अनुराग कश्यप होता तो ये फिल्म आकर चली जाती किसी को पता तक नहीं चलता, अब चूंकि इस फिल्म को अवार्ड मिल गया है तो हम इसे इंडिया की जीत मान रहे हैं, समझ में नहीं आता कि गोल्डन ग्लोब या ऑस्कर क्या इतना वजूद रखते हैं कि उसमें मिले अवार्ड या महज नॉमिनेशन से हम बल्लियों उछलने लगते हैं।

ये भारत की गुलामी मानसिकता की जीत है, भारत वो देश है जो कॉमनवेल्थ जैसे खेल को अपने देश में करा कर ऐसा खुश होता है जैसे उसने जंग जीत ली हो क्या हम नहीं जानते हैं कि कॉमनवेल्थ वो देश है जहां कभी विदेशियों ने राज किया था और अब वो सब गुलाम देश मिलकर इस खुशी की बरसी मनाते हैं।

स्लमडॉग में ऐसा कुछ भी विशेष नहीं है जो इस फिल्म को इतनी उचांई दिलाए ये एक अच्छी फिल्म है जो भारत में कई बार बन चुकी हैं।

3 comments:

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

जनाब फिल्म को फिल्म ही रहने दो!! इतनी बेहतरीन फिल्म की इससे बदतर तरीके से समीक्षा शायद ही दोबारा हो सके...

Udan Tashtari said...

मैने इसके बारे में इस तरह नहीं सोचा. नजरिये की बात है. मुझे कोई बुराई नजर नहीं आई देखने के बाद.

वरना तो अच्छे में भी रोने की वजह तो हमेशा ही होती है. बस, आदत न बनें.

Rekha Shrivastava said...

u r right