Tuesday, April 14, 2009

चुनावी समर में नेताओं की गाली-गलौज


लोकसभा चुनावों में अब गिनती के दिन बचे हैं। चुनावी मैदान में उतरी राजनीतिक पार्टियाँ जोर शोर से प्रचार अभियान में लगी हैं। इन प्रचार अभियानों में सामनेवाली पार्टी और उनके उम्मीदवारों पर आरोप प्रत्यारोप लगाया जाना कोई नयी बात नहीं है। ये पहले हुए चुनावों में भी देखने-सुनने को मिलते रहे हैं। लेकिन चिंता की बात ये इसका स्वरुप दिन-ब-दिन बदसूरत होता जा रहा है। चुनावी लड़ाई से पहले ज़ुबानी जंग में एक दूसरे से बाज़ी मरने के चक्कर में ये नेता सारी मर्यादाएं तोड़ते जा रहे हैं। इस कीचड़ में हर दल बराबरी से धंसा हुआ है। कोई भी किसी भी बात में पीछे नहीं रहना चाहता है। चाहे बीजेपी के युवा नेता वरुण गाँधी का हंगामेदार बयान हो... या फिर बयान बहादुर नरेन्द्र मोदी का सोनिया गाँधी की हिंदी को लेकर की गयी टिप्णणियाँ हो। और, बीएसपी नेता अखिलेश दास को तो क्या कहा जाये... लखनऊ से सपा उम्मीदवार नफ़ीसा अली पर उनका बयान उनकी कमज़ोर सोच और राजनीतिक अपरिपक्वता को ही जाहिर करता है। पूरे वाकये में उन्होंने ऐश्वर्या राय पर भी भद्दी टिप्पणी कर डाली। महत्वाकांक्षाएं हर इंसान में होती हैं। हर इंसान चाहता हैं वो ज़िंदगी की हरेक प्रतियोगिता जीते लेकिन, इसका मतलब ये नहीं कि हदों को पार कर दिया जाए। किशनगंज में इकठ्ठा हुई आम जनता को अपना रौब समझाते हुए जब लालू प्रसाद यादव ने ये कहा कि वो वरूण पर रोड रोलर चलवा देते तो हर किसी के मन में यही बात आई कि अगर यही रोड रोलर वो सड़कों पर चलाते तो शायद ये बोलने की नौबत नहीं आती। लेकिन, यादवजी के घर के हालात तो कुछ अलग ही है। मियां सेर है तो बीवी सवा सेर है। बिहार की मुख्यमंत्री रह चुकीं राबड़ी देवी का वर्तमान मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और ललन सिंह पर दिया गए बयान का तो ऐसा असर हुआ कि लालूजी को आगे होकर नीतिश से मिलना पड़ गया। इस चुनावी मौसम से नेताओं के मुख से झड़ रहे ये बयान तो बस शुरुआत है। 16 मई के आने तक तो न जाने ऐसे कितने ही बयान अख़बारों की सुर्खियाँ और न्यूज़ चैनलों में बहस के मुद्दे बनेंगे। चुनाव महज़ एक दो महीने की बात है पर इस दौरान हमारे देश के तथाकथित कर्ताधर्ताओं के मुखारबिंद से निकल रहे विषवाण हमारे लोकतंत्र पर गहरे घाव कर रहे है। न तो इन नेताओं को देश के संविधान, लोकतंत्र की परवाह हैं और न ही देश की प्रतिष्ठा की। अब सवाल उठता है कि चुनाव आयोग ऐसे नेताओं पर कार्रवाई क्यों नहीं करता है। तो जवाब बहुत साफ़ है की न तो उसके पास इतने अधिकार है की वो ऐसे नेताओं को सज़ा दे सकें और न ही ये नेता उसे कभी इतने अधिकार देंगे। मेरे पापा अक्सर कहा करते है कि हमारे संविधान में ही पचहत्तर छेद है। किसी भी बात की काट पहले से ही मौजूद है और अगर कभी इन लोगों के खिलाफ़ कोई क़दम उठाया जाता है तो ये तय बात है कि अभी एक दूसरे को गरियाने वाले नेता एक होकर उसका विरोध करेंगे। उस वक़्त उनकी एकता देखने लायक होती है। हालांकि चुनाव आयोग ने हर दल को कड़े शब्दों के साथ पत्र लिखने की एक कोशिश ज़रूर की है। जिसमें वो इन महानुभावों से सयंमित भाषा का प्रयोग करने को कह रहा है। लेकिन, उसका कोई असर होगा ये कहा मुश्किल है। चुनाव आयोग भी इस बात को अच्छी तरह से जानता है। ऐसे में तो इन नेताओं की जय क्यों न हो भाई...

2 comments:

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

संविधान में छेद हैं नहीं मित्र, बनाए गए हैं. वह कहीं भी बनाए जा सकतेहै और ख़ास तौर से ऐसे देश के संविधान में छेद बनाना बहुत आसान होता है जहां जनता आला दर्जे की भोली हो. यहां तो आज़ादी की लड़ाई तक हाइजैक कर ली गई और हमने हाइजैकरों की बात को ही सही माना. आज तक मानते चले आ रहे हैं.

ramanuj said...

आभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ये खुला मजाक है........लालू, राबरी, वरुण, मोदी, अडवाणी, सोनिया, अमर सिंह और कई नेता चुनाव के मौसम में कुछ ज्यादा ही बोलते हैं........इनका एक दुसरे पर अनाप सनाप बोलना........जनता को बरगलाना है......ताकि जनता की मूलभूत आवश्यकता पर बोलना ना पड़े.......सही मुद्दे पर देश के इन समाज सेवक को बोलने में पसीना आता है........इनकी वाणी पर ध्यान न दें ...........चुनाव के बाद सभी एक साथ बैठ कर भोजन करेंगे...........तब कोई मतभेद नहीं रहेगा......हम आम आदमी को इन सभी बातों को समझाना होगा