Friday, May 1, 2009

झोला उठाकर चले... 1

मेरे इस लेख में शामिल लोग और इसमें दर्शाई गई घटनाएं पूरी तरह से काल्पनिक हैं। किसी भी महानगरीय युवा, ख़ासकर जो यहाँ अकेले रह रहे हैं। उनसे इसका कोई ताल्लुक नहीं हैं।

महानगरों में ऐसे लोगों की भरमार हैं जो कि अपने-अपने राज्यों से नौकरी और बेहतर जीवन की तलाश में आते हैं। लेकिन, जैसा कि बचपन से पढ़ते आ रहे हैं कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं वैसे ही दूर से ये महानगर बेहद ही खु़शहाल और बेहतरीन लगते हैं। लेकिन, अपने शांत शहर की चौड़ी, कुछ ख़राब ही सही सड़कों से होते हुए जब हम महानगर की सड़क पर उतरते हैं तो सबसे पहले धक्का लगता है और फिर सुनने को मिलता है कि क्या टहलने निकलो हो... इसके बाद शुरु होती है शहर में जड़े जमाने की क़वायद। पहलो कुछ दिन बीतते है अपने शहर से आएं किसी दोस्त के रूम पर। सामान लेकर जब दोस्त के रूम की तरफ बढ़ते है तो मकान मालिक पहले ही घूर-घूरकर देख लेता है। एक माचिस के डिब्बे-सा कमरा होता है। बाथरूम के लिए लाइन लगानी पड़ती है। आखिर चार कमरों में साझा जो है वो बाथरूम। बस वही से शुरु हो जाती है ये सोच कि कहाँ आ गए... लेकिन वापसी की बात मन में तब तक इतनी भी प्रबल नहीं होती है। फिर दोस्त से बात होना शुरु होती है। हम चहककर कहते है कि बाज़ार घुमा दो, ये दिखा दो वो दिखा दो। एक बार तो दोस्त जाने को तैयार हो जाता है, लेकिन दूसरी ही बार वो काम के चलते जाने से मना कर देता है। दोस्त के साथ पहली बार में बस के धक्के और मेट्रो की चमक से मन में फिर दो ट्रैक तैयार हो जाते है। हम तय करते हैं कि जैसे ही नौकरी मिलेगी बस में की तरफ तो देखना ही नहीं होगा। धीरे-धीरे ये महानगर हमें समझ में आने लगते हैं। हम ये जानने लगते है कि आखिर क्या होते हैं ये महागर और कैसे जिया जाता है इनमें। दोस्त की ऑफ़िस की व्यस्तता के चलते अकेले ही रूम में दिन काटना और नौकरी ढ़ूढना शुरु होता जाता है। शाम को दोस्त की मकान मालिक से होती बात सुनकर मन दुखी होता है कि - कब जा रहा है तुम्हारा दोस्त... ज़्यादा रहेगा तो किराया बढ़ जाएगा... ऐसे ही कैसे बुला लेते हो लोगों को गांव से... मज़ाक समझ रखा है क्या... असलियत में वो मकान मालिक भी किसी ऐसे ही शहर से आकर बसा होता है, लेकिन मानवीय स्वभाव है ना कि हम तो आ गए लेकिन कोई और न आए... खैर कुछ दिन तो दोस्त दोस्ती दिखाता है लेकिन, इसके कुछ दिनों बाद वो भी आगे पीछे कुछ ऐसा बोल ही देता है कि लग जाएं कि बंधु सामान बांधो... यहाँ से ही आता है टर्निंग पॉइंट... अगर तो नौकरी मिल गई हम रह जाते है यहाँ नहीं तो किसी दूरसे शहर की राह पकड़ते है किसी दूसरे दोस्त के पास... नहीं तो घर की ओर वापसी....
जारी....

3 comments:

श्यामल सुमन said...

लिखा आपने ठीक ही यही नगर का हाल।
पेट की खातिर भटक रहे युवजन हैं बेहाल।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

इस बिचित्र अनुभव से हम सब को गुज़रना पड़ा है भाई.

VIJAY TIWARI " KISLAY " said...

महानगरीय संस्कृति और परेशानियों को पास से देखने के बाद सच में यही सब होता है
- विजय तिवारी "किसलय "