Friday, July 24, 2009

खु़द पर शर्मिंदा...

अपने घर को बसाए रखने के लिए कितने ही कर्म करने पड़ते है। हालांकि मेरा कोई अपना घर अब तक नहीं है फिर भी मुझे इस बात का अहसास कुछ दिनों पहले हुआ कि कैसे ख़ुद के आराम के लिए हम दूसरों के घर को तोड़ भी सकते हैं। कल ही की बात है मेरे रूम की लाइट बार-बार जा रही थी। पहले तो लगा कि मेरी इस निचली बस्ती के दस्तूर के मुताबिक़ बत्ती गुल हुई होगी। लेकिन, कुछ देर बाद ही लाइट आने-जाने लगी। मैं उटकर बाहर तक आई तो देखा कि जिस खम्बे से मेरी बिल्डिंग तक बिजली सप्लाई होती है उस पर कौवे का एक जोड़ा बैठा हुआ था। वो दोनों ही बिजली के बक्से में अपना घोंसला बनाने की कोशिश कर रहे थे। एक तिनका दबाए आता था और दूसरा वहां निगरानी करता। जितनी बार वो तार पर बैठते वो हिलता और लाइट चली जाती। थोड़ी देर तक मैं इसे देखती रही लेकिन, इसके बाद मैंने कौवे के उस जोड़े को भगाने के लिए काम करना शुरु कर दिए। पहले थोड़ा आवाज़ से भगाने की कोशिश की लेकिन, जब वो नहीं भागे तो उनको कंकड़ से मार-मारकर भगाना शुरु किया। कौवे अचानक पड़ रहे पत्थरों से कुछ परेशान हो गए। दोनों इधर-उधर देखने लगे और भागने लगे। थोड़ी देर कही और किसी और घर की छत या फिर तार पर बैठ जाते और फिर वही आ जाते। जैसे ही बैठते मैं एक पत्थर मारती। थोड़ी देर ऐसे ही चलता रहा और फिर खूब तेज़ बारिश शुरु हो गई। मैंने देखा कि दोनों में से एक कौवा वही उस तार पर बैठा था भीग रहा था। जब बारिश बंद हुई दोनों मेरे ही रूम की मुन्डेर पर बैठे थे। दोनों पूरी तरह भीग चुके थे। दोनों ने पंख फड़फड़ाए और फिर उड़ गए। मैं भी तैयार होकर ऑफ़िस के लिए निकल गई। मुझे पूरे वक़्त ये लगता रहा कि अगर वहां घोंसला बन गया और यूं ही कौवे इस पर कूदते रहे तो मेरे रूम की लाइट का क्या होगा। मैं बहुत परेशान थी। आज सुबह रूम से निकली तो देखा कि घोंसले का ढांचा बनकर तैयार था और वो जोड़ा वहाँ आराम से बैठा हुआ था। मैं सोचती रही कि मेरे इतने भगाने के बाद भी वो वही बैठे रहे। एक बार जो सोच लिया वो उन्होंने किया भी। मैं शर्मिंदा हूँ उन पक्षियों का घर न बनने देने की कोशिशें करके। मुझे आज ये महसूस हुआ कि कैसे कोई अपने को बचाने के लिए दूसरों को नहीं बक्शता है...

6 comments:

विनीत कुमार said...

मेरे हॉस्टल के बिंग में कुत्तों और बिल्लियों का तांता लगा रहता है। ऐसा नहीं है कि हॉस्टल गंदा होने की वजह से ऐसा है। चारों तरफ चमाचम मामला है,कोज फिनाइल से पोछे लगते हैं और जमकर सफाई होती है। लेकिन मेरे बगल में एक मॉंक,बुद्धिस्ट स्टडीज का रहता है,वो इन कुत्तों-बिल्लियों को वो सब खिलाता है जिसे कि हम जैसे लोग भी नहीं खाते। नतीजा ये होता है कि मैं दिनभर उन्हें भगाने की कोशिश में लगा रहता हूं लेकिन वो टस से मस नहीं होते। मुझे अब इन जानवरों से ज्यादा मॉंक पर गुस्सा आ रहा है।
पैर में किसी कीडे ने काट लिया है जैसा कि डॉक्टर ने बताया लेकिन मैं ये सोच-सोचकर परेशान हूं कि कहीं ये जानवरों का कोई इन्फेक्शन तो नहीं। दर्द के मारे मरा जा रहा हूं। माफ कीजिएगा मुझे इस दर्द के आगे कुत्तों औऱ बिल्लियों को भगाने पर कोई शर्मिंदगी महसूस नहीं हो रही है।

कुश said...

एक विवादित रियलिटी शो एम् टी वी रोडीज की बेसिक थीम है ये तो खुद को बचने के लिए दुसरे को मुसीबत में डालना..हर इंसान ऐसे ही करता है.. कौओ ने भी यही तो किया.. खुद का घर बसाने के लिए आपके घर की बिजली की फ़िक्र किये बिना घर बसा लिया.. या तो इंसान कौआ बनता जा रहा है..या कौआ इंसान बन रहा है..

M VERMA said...

बहुत सुन्दर बयान ---
हमने तो हर ओर मौत का सामान सजा रखा है
ये पखेरू जाये तो जाये कहाँ?
बहुत सुन्दर

आदर्श राठौर said...

बहुत भावनात्मक प्रतीत होती हैं। अपने आसपास के घटनाक्रमों को इतनी गहराई से कम ही लोग महसूस करते हैं।

Anonymous said...

बधाई हो दिल्ली में कव्वे तो देखने को मिल रहे है . इन् विलुप्त होते काले पक्षियों को देख कर कभी पित्र पक्ष तो कभी कोयल के मीठे गीत याद आते होंगे . अपनी खुशकिस्मती के तार हिलाने के बजे इस द्रश्य का आनंद लीजिये. वैसे में डार्विन की थेओरी को मानती हु मगर तिनका - तिनका नीड़ न बिखरे इस पर भी ध्यान रखे. शुभकामनाये.

Anonymous said...

बधाई हो दिल्ली में कव्वे तो देखने को मिल रहे है . इन् विलुप्त होते काले पक्षियों को देख कर कभी पित्र पक्ष तो कभी कोयल के मीठे गीत याद आते होंगे . अपनी खुशकिस्मती के तार हिलाने के बजे इस द्रश्य का आनंद लीजिये. वैसे में डार्विन की थेओरी को मानती हु मगर तिनका - तिनका नीड़ न बिखरे इस पर भी ध्यान रखे. शुभकामनाये.