Friday, November 6, 2009

प्रभाष जोशी का जाना...

आज सुबह ख़बर आई कि प्रभाष जोशी नहीं रहे। ये सुनते ही मन दुखी हो गया। पापा से बात की वो भी दुखी थे। मन ही मन ऐसा लगा रहा है कि उन्हें कैसे कुछ हो गया। कई बरा ऐसा होता है कि किसी इंसान को लेकर मन आश्वस्त होता हैं कि उसे कुछ नहीं होगा। तब से लेकर अब तक उनसे हुई मुलाक़ातें और बातें मेरे मन में घूम रही हैं...
मेरे घर पर दिन के लगभग 15 या 16 अख़बार आते हैं। कुछ राज्य स्तर के, कुछ राष्ट्र स्तर के और कुछ ऐसे कि जिनता कोई स्तर ही न हो। इतने सारे अख़बारों के बावजूद अगर नईदुनिया (वो भी इंदौर से प्रकाशित) सुबह नहीं आए तो मम्मी और पापा दोनों बैचेन रहते हैं। ये बात मुझे कभी समझ नहीं आई कि ऐसा क्यों? खैर, 2004 में जब मैंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में दाखिला लिया तो पहली बार पत्रकारिता पर होनेवाली बहसों और सेमिनारों में हिस्सा लेने का मौक़ा मिला। ऐसे ही एक सेमिनार के दौरान पहली बार प्रभाष जोशी को भी सुना। समाचार पत्रों पर हो रहे इस सेमिनार की शुरुआत जोशीजी ने इस बात से कक, कि अगर सुबह-सुबह नईदुनिया पढ़ने को न मिलें तो दिन बैचेन हो जाता हैं। जोशीजी के मुताबिक़ कोई भी मालवी या निमाड़ी ही इस तलब को समझ सकता हैं। अचनाक ही मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई। ये था वो पहला मौक़ा जब मैंने उन्हें जाना।
पत्रकारिता में आने के बाद ये भी मालूम चलाकि जनसत्ता की संपादकीय पढ़ना पत्रकारिता के छात्रों के लिए धार्मिक ग्रंथ पढ़ने सी हैं। जनसत्ता मेरे घर पर एक दिन देर से आता था। दिल्ली से आनेवाले अख़बार भोपाल ऐसे ही आते थे। मेरे पापा उस एक दिन पुराने अख़बार भी पूरी तन्मयता से पढ़ते थे। ऐसा सादा बिना किसी रंग और तस्वीर के ये अख़बार मुझे बिना पढ़े ही बोरिंग लगता था। लेकिन, प्रभाष जोशी को जानने के बाद जनसत्ता को भी जानने का मन हो गया।
दिल्ली के आने के बाद अपने एक कार्यक्रम के सिलसिलें में एक बार मुझे जोशीजी के घर जाने का मौक़ा मिला। मैं वहां हिन्दी भाषा पर उनकी राय जानने गई थी। बातचीत के दौरान जैसे ही उन्हें ये मालूम चलाकि मैं देवास की हूँ तो वैसे ऐसे खुश हुए जैसेकि पता नहीं कितनी बड़ी खुशी उन्हें मिल गई हो। उन्होंने मुझसे खूब बातें की, मालवा से मंगाई ख़ास मिठाई भी खिलाई। उनसे मिलने के बाद मुझे मालूम हुआ कि किसी अंजान शहर में, किसी अपने शहर के इंसान से मिलना कैसा होता हैं। मैं उन्हें जानती थी लेकिन, वो तो नहीं। इसके बाद भी इतनी आत्मीयता मुझे जीवनभर याद रहेगी....

2 comments:

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

यादें सदैव साथ रहती हैं, यह जोशी जी के नाम जैसे जीवंत रहे.

अविनाश वाचस्पति said...

प्रभाष जोशी जी के जोशीले विचार सदा अमल में लाये जायेंगे। विनम्र श्रद्धांजलि।