Wednesday, November 25, 2009

हम लोग: असहाय और शर्मिंदा

कल रात टीवी देखते हुए शर्म महसूस हुई। लापतागंज में नेता के शर्मिंदा होने पर गांववाले आश्चर्य में थे। लोगों का मानना था कि ऐसा सालों में एक बार होता है सो ऐसे नेता को देख ही लेना चाहिए। पता नहीं इसके बाद कब कोई नेता शर्मिंदा हो। बात गंभीर थी लेकिन, व्यंग में तो गंभीर बातों को ही मुद्दा बनाया जाता हैं। खैर, धारावहिक के ख़त्म होते-होते असल बात सामने आई। जनता ने नेता को तो अपनी ग़लतियों और भ्रष्ट आचरण के लिए शर्मिंदा किया ही लेकिन, साथ ही साथ अपनी ग़लतियों पर वो ख़ुद भी शर्मिंदा हुई। ये एक बहुत बड़ी सच्चाई है। ग़लत नेता को चुनने पर शर्मिंदा हमें होना चाहिए जोकि हम नहीं होते हैं। हम हमेशा अपनी हर ग़लती के लिए दूसरों को दोषी ठहराते हैं। देश में अगर कुछ ग़लत हो रहा है तो उसके लिए प्रशासन ज़िम्मेदार, नेता ज़िम्मेदार। हम कभी भी किसी बात के लिए ज़िम्मेदार नहीं होते हैं। मैं नहीं जानती कि एक आम आदमी की ज़िम्मेदारियों को कौन किस हद तक उठाता हैं। मैं कोशिश करती हूँ कि बहुत हद तक में उन्हें निभाऊ लेकिन, फिर भी ऐसे काम कर ही देती हूँ जिस पर शर्मिंदा हुआ जाए। बातें बहुत छोटी होती हैं लेकिन, ग़लत तो होती ही है। मेरी शर्मिंदगी केवल इस बात पर ख़त्म नहीं होती कि मैं कुछ ग़लत कर रही हूँ। समस्या ये है कि हमेशा मुझे इस बात की कोफ्त होती है कि मैं ग़लत काम होते देख उन्हें रोक भी नहीं पाती हूँ। मैट्रो में पूरे वक़्त ये घोषणा होती रहती है कि उतरनेवालों को पहले उतरने दे, फिर चढ़े। लेकिन, ऐसा होता सिर्फ़ तब है जब वहाँ कोई मैट्रो अधिकारी खड़ा हो। बिना अधिकारी के जनता कभी अपने विवेक से लाइन में खड़ी नहीं होती हैं। बसों में भी यही हाल होता हैं। पीछे से चढ़े आगे से उतरे। लेकिन, कोई इस नियम का पालन करते नहीं दिखाई देता हैं। यहाँ तक लो फ्लोर बसों के गेट भी लोग रेड लाइट पर खुलवाने के चक्कर में रहते हैं। लाइन लगाने के मामले तो हालत ऐसी है कि सब अमिताभ बच्चन बने रहते हैं। जहाँ वो खड़े होते हैं लाइन वही से शुरु होती हैं। मैट्रो में ज़ोर से गाने बजाना, मैट्रो के फ्लोर पर बैठ जाना सब कुछ मैं रोज़ाना देखती हूँ। लेकिन, इन ग़लत हरक़तों का विरोध नहीं कर पाती हूँ। दुकानों पर 50 पैसे से लेकर 5 रुपए तक के खुल्ले ना होने का बहाना बनाते दुकानदारों से लड़ती तो हूँ फिर भी रोज़ाना ग्राहकों की इसके प्रति उदासीनता और उनका मन बढ़ते हुए भी देखती हूँ। मुझे नहीं पता लापतागंज कितने लोग देख पाते हैं और कितने लोग व्यंग के पीछे छुपे उस कटाक्ष को समझ पाते हैं। लेकिन, कल उस व्यंग ने मुझे शर्मिंदा ज़रूर किया।

चलते-चलते
लापतागंज से शरद जोशी का नाम जुड़े होने की वजह से बिना बात कि ये उम्मीद भी जुड़ गई थी कि कम से कम इस धारावाहिक में हिन्दी शुद्ध होगी। लेकिन, अफसोस कि ऐसा नहीं हुआ। शुद्धता के लिए लड़ाई लड़ती जनता का दर्द जिस किस्त में दर्शाया गया था उस किस्त में शुद्धता की ग़लत लिखा हुआ था। वहाँ शुद्धता की जगह शुध्दता लिखा गया था।

5 comments:

श्यामल सुमन said...

बहुत सही मूल्यांकन आपका।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

कुश said...

अभी थोडी देर पहले ही इस एपिसोड का रिपीट टेलीकास्ट देखा है..

वाकई हमें शर्मिंदा होना चाहिए..

amaranand said...

विरोध के सुर को आवाज़ मिलने लगेगी, आप कोशिश तो करिए, बस लहज़ा थोड़ा प्रेम पूर्ण हो, चाहे इसमें कटाक्ष ही क्यों न हो।

RAJNISH PARIHAR said...

हिंदी लिखने के अलावा बोली भी गलत जा रही है...लाप्तागंज में!!!वैओसे ये एक अच्छा धारावाहिक है...

Suman said...

nice