Wednesday, December 2, 2009

जब तक खर्चा नहीं होगा तब तक चर्चा नहीं होगा...

शादी में दिखावे दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं। मेरे ही घर में मेरी शादी मेरे बडे़ भाई के शादी के बाद होना तय हुई है। वजह ये कि भैया की शादी का खर्चा हम तय कर सकते हैं लेकिन, मेरी शादी का तो लड़केवालों के मुताबिक़ होगा। कल लापतागंज में समाज की इसी दुखती रग पर ऊंगली रखी गई। शादी के लिए यही कहा गया कि जब तक खर्चा नहीं होगा तब तक चर्चा नहीं होगा। कम से कम भारतीय समाज में शादियों में होनेवाला दिखावा सबकुछ होता है। शादी के बाद दंपत्ति का जीवन कैसा चल रहा है। वो सुखी है या दुखी इन सभी बातों से किसी को कोई लेनादेना नहीं होता हैं। बस बातों का केन्द्र शादी में होनेवाला खर्चा होता है। मेरे ही दोस्त के बड़े भाई की शादी में चार तरह के कार्ड छपे। कुछ हमारे जैसों के लिए और कुछ बड़े-बड़े अमीरों और पहुंचवालों के लिए लेकिन, अफसोस की सभी में लड़के की माँ का नाम ग़लत छपा। मेरे दादी-बाबा दोनों ही शादी में यूँ बहनेवाले पैसे के विरोधी थे और कोर्ट मैरिज के पक्षधर। लेकिन, समाज के नाम अगर कर्जा लेकर भी खर्च करना पड़े तो कम है। यूँ तो कर्जा लेनेवालों को समाज हमेशा कोसता है लेकिन, शादी के लिए कर्जा देने में कोई नहीं हिचकता। मेरे आसपास पिछले दिनों में हुई कुछ शादियों पर अगर नज़र डालूँ तो पता चलता है कि लड़का-लड़की तक अपनी कमाई से हुई बचत शादी के लिए हज़ारों के कपड़ों और गहनों के लिए बहा रहे हैं। ऐसे दौर में टीवी पर इस तरह के खर्चों पर यूँ कटाक्ष करना सार्थक पहल है। टीवी सीरियलों में ये मुद्दे गाहे-बगाहे उठते तो है लेकिन, ख़त्म भव्यता पर ही होते हैं। खैर, जो भी हो लेकिन, शादी के ये खर्चे और चर्चे तब ही बंद होंगे जब युवा पीढ़ी इसे रोके।

अंततः बात पढ़े लिखे गंवारों की। मैट्रो में आज इन्द्रप्रस्थ से दो कॉलेज में पढ़नेवाली छात्राएं चढ़ी। उनके पहनावे और बातचीत से लग रहा था कि वो उच्च मध्यमवर्गीय परिवार की होगी। दोनों पूरी मस्ती में थी और मोबाइल पर फूल साऊंड में गाने बजा रही थी। हालांकि मैट्रो में लगातार ये घोषणा होती रहती है कि गाने न बजाए लेकिन, उन्होंने शायद ये कभी सुना ही नहीं होगा क्योंकि उसके कान तो उनके बजाए गानों को ही सुनते रहते हैं।

7 comments:

अनिल कान्त : said...

एक बहुत अच्छा लेख लिखा है आपने शादी में होने वाले खामखाँ के खर्च को लेकर. बहुत से सवाल भी आपने छोड़े हैं. अच्छा लगा पढ़कर.

रंजन said...

उसकी साड़ी मेरी साड़ी से सफे़द क्यों वाली मानसिकता.. शादि के खर्चे सुन कर तो मेरा भी बुरा हाल हो जाता है.. इतने पैसों में तो कोई अच्छा सा फ्लेट खरीद ले.. देने वाला देता रहे.. लेने वाले को लगता है कुछ नहीं मिला..

खुद पर अभी बहुत फक्र होता है.. कुल ४०,००० रु खर्च किये.. कपड़ा से लेकर रिश्प्शन तक.. ५ साल पहले आज भी याद करता हूँ तो बहुत अच्छा लगता है..


दुसरी बात पर केवल इतना कि.. गंवार होने के लिये पढ़ना जरुरी नहीं..

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

शादी भारतीय जीवन का केंन्द्र है। यहाँ से केन्द्र कुछ सरके तो बात बने।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सही नब्ज पकड़ी है।
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अदभुत है हमारा शरीर।
अंधविश्वास से जूझे बिना नारीवाद कैसे सफल होगा?

Earn Staying Home said...

Good post.

SHEEL said...

nice lines..........

कुश said...

हम तो अपनी जमा पूंजी घर बनाने में लगा रहे है.. शादी सिंपल ही करने का इरादा है..