Tuesday, December 22, 2009

केवल महान इंसानों की जीवनी पढ़ने से कुछ नहीं होगा। ज़रूरत है ये जानने की कि कैसे बनते हैं अपराधी...

माँ का ये कहना कि शाम होने से पहले घर लौट आना इस मौक़े पर ग़लत नहीं लगता। घर से बाहर निकलने पर होनेवाली रोक-टोक भी ऐसे समय पर ग़लत नहीं लगती हैं। आगे बढ़ने से जब लड़कियों को रोकते हैं तो ऐसे में समय लगता है कि ठीक ही है। इसे आप मेरी या मेरी जैसी किसी भी एक सामान्य लड़की की स्वीकारोक्ति मान सकते हैं
कल से ही रूचिका गेहरोत्रा हत्याकांड की ख़बरें सुन और देख रही हूँ। ये लगातार देख रही हूँ कि कैसे एक 14 साल की लड़की का छः महीने तक शारिरीक शोषण करनेवाले इंसान के चेहरे पर शिकन की एक लक़ीर तक नज़र नहीं आ रही हैं। ये सुन रही हूँ कि कैसे एक 14 साल की बच्ची ने न्याय ना मिलने की आस में आत्महत्या कर ली और कुछ ही साल बाद उसके भाई ने भी आत्महत्या कर ली। इस सबके बाद मैं ये भी देख रही हूँ कि हमारे देश के क़ानून ने इस लड़की को न्याय के रूप में दोषी को छः महीने की सज़ा और एक हज़ार रुपए का ज़ुर्माना किया है। आज पहली बार या फिर बहुत सालों बाद टीवी स्क्रीन पर एक पत्रकार की आवाज़ में दर्द में महसूस किया है। ऐसी ख़बरों पर चीखने चिल्लानेवाली कौम के हिस्से इस पत्रकार ने आज भर्राई हुई आवाज़ से ये कहा कि रूचिका के पिता और भाई ने सामने आने से मनाकर दिया हैं। उन्हें इन चीज़ों से अब कोई उम्मीद नहीं। अंग्रेज़ी में एक कहावत कि देर से मिला न्याय कोई न्याय नहीं। वो 14 साल की मासूम लड़की अब वापस नहीं आएगी। उस लड़की ने हमारे क़ानून में तीन साल तक आस्था रखी और उसके बाद आत्महत्या कर ली। 19 साल उस इंसान को सज़ा हुई। इसके साथ ही उसे ये सहूलीयत भी मिली कि आप आगे अपील कर सकते हैं। रूचिका के साथ शारिरीक शोषण करनेवाला उतना ही दोषी है जितना कि उसे बचानेवाला। आरोपी को बचानेवाली उसकी पत्नी भी एक महिला है ये बताना यहाँ कोई मायने नहीं रखता है। ऐसे इंसान को आप कोई भी सज़ा दे वो कम ही लगेगी। सज़ा देने से बड़ी बात ये है कि इंसान समझे कि उसने कुछ ग़लत किया। जोकि ऐसे मसलों में कही नज़र नहीं आता हैं। ज़रूरत हैं इस तरह के गुनाह करनेवालों और उनका साथ देनेवालों की ज़िंदगी को पास से देखने की। ये देखने और समझने की कि आखिर कैसी हैं इन परवरिश। कैसे ये बड़े हुए, किस माहौल में ये बड़े हुए हैं। किस तरह की सामाजिक शिक्षा इन्हें मिली हैं। इसके बारे में लिखा जाए। ऐसे लोगों कि ज़िंदगी के बारे में बड़े हो रहे युवा पढ़े। माता-पिता ज़ोर दे बच्चों पर कि वो ऐसे लोगों को जाने। केवल महान पुरुषों के बारे में पढ़कर उनके जैसा बनना ही काफी नहीं। ज़रूरत हैं कि हम ऐसे लोगों के बारे में भी जाने और पढ़े और ये तय करें कि हमें ऐसा नहीं बनना हैं। माँ पढ़े ऐसी माँओं के बारे में जिनके बेटे या बेटियाँ इस तरह के ज़ुर्म करते हैं और उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती हैं। वो जाने कि उस माँ ने ऐसे बच्चों की परवरिश में कहाँ ग़लती कर दी। रूचिका या जेसिका या फिर प्रियदर्शीनी मट्टू के बारे में जानने से ज़्यादा ज़रूरी है उनके गुनहेगारों की मनोदशा को जानना और अपनी आनेवाली पीढ़ी से ऐसे लोगों के बारे में बात करना कि वो ऐसे ना बनें।

5 comments:

www.SAMWAAD.com said...

सही कहा।
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मानवता के नाम सलीम खान का पत्र।
इतनी आसान पहेली है, इसे तो आप बूझ ही लेंगे।

सुलभ सतरंगी said...

यहाँ न्यायिक प्रक्रियाओं की जटिलता भी एक बड़ी समस्या है.

" ज़रूरत हैं इस तरह के गुनाह करनेवालों और उनका साथ देनेवालों की ज़िंदगी को पास से देखने की। ये देखने और समझने की कि आखिर कैसी हैं इन परवरिश। कैसे ये बड़े हुए, किस माहौल में ये बड़े हुए हैं। किस तरह की सामाजिक शिक्षा इन्हें मिली हैं। इसके बारे में लिखा जाए। ऐसे लोगों कि ज़िंदगी के बारे में बड़े हो रहे युवा पढ़े।.."


आपने एक अच्छे मुद्दे की और इशारा किया है. यह विचारणीय है. समाज हित में होगा.

ई-गुरु राजीव said...

आपकी सोच से सहमत.

JITENDRA KUMAR BHARTI said...

ऎसा शायद ही हो.
बुरे लोगो के बारे मे बात तो क्या, सोचना भी लोग ठीक नही समझते है.

संदीप पाण्डेय said...

दीप्ति आप से सहमति कुछ तथ्यात्मक गलतियां सुधार लें। रुचिका के साथछेड़छाड़ हुई थी एकबार आप मेरी बात को ऐसे न लें कि मैं उसे जस्टीफाई कर रहा हूं। बस तथ्य की गलती की ओर इशारा है। एक और बात रुचिका के भाई ने आत्महत्या नहीं की है। वह लड़ रहा है अपने स्तर पर अपनी बहन के सम्मान के लिए। उसके हत्यारे को सजा दिलाने के लिए। आज ही खबर आई है कि राजस्थान के एक डीजीपी 13 साल से फरार है उन्होंने अपने अधनस्थ सिपाही की पत्नी के साथ दुराचार किया था.. न्याय की उम्मीद तो बंधी है लेकिन सोचता हूं अब ये किस काम का जब एक मासूम के साथ कई जिंदगिंयां खत्म हो गईं