Wednesday, January 20, 2010

किस्मत के धक्के...

कुत्ते की दुम को नौ साल तक नली में रखने पर भी वो टेढी की टेढ़ी रहती हैं। ऐसी ही कुछ होती है किस्मत। कम से कम मेरी तो ऐसी ही है। पहले बस में मरते हुए, गिरते हुए, लटकते, पटकते ऑफ़िस आती थी। लगभग तीन साल तक यूँ मरने के बाद जब अक्षरधाम पर मैट्रो आई तो लगा कि भगवान मेरे द्वार आ गए। लगाकि वाह! मेरी भी किस्मत सुधर गई। लेकिन, ये तो बस मेरा भ्रम था। आज सुबह की ही बात है। मैट्रो स्टेशन लोगों से खचाखच भरा हुआ था। इतंज़ार पट्टी पर कुछ पांच मिनिट बाद लिखा आया कि द्वारका सेक्टर 9 की मैट्रो 20 मिनिट बाद आएगी। मन एक दम उदास हो गया। मैट्रो स्टेशन में अंदर घुस जाने के बाद तो बाहर निकलना एक और भारी काम है बेवजह के 8 रुपए कट जाते हैं। ऐसे में वही खड़े रहना मजबूरी भी होती हैं। सामनेवाले प्लेटफ़ार्म पर नोयडा सीटी सेन्टर की मैट्रो हर तीन मिनिट में आ रही थी। यहाँ भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। लम्बे इंतज़ार के बाद मैट्रो आई। एक ठसाठस। एक धक्के से मैं अंदर घुस गई। फिर तो मेरे बाल कही, शॉस कही और बैग कही। बड़ी मुश्किल से सब कुछ समेटा और आँखें बंद करके खड़ी हो गई। एफ़एम पर नब्बे के दशक के प्रेम गीत सुन रही थी। मेरे सामने एक लड़का एक लड़की को अपनी मज़बूत बांहों के घेरे में लेकर खड़ा था। उसे भीड़ से बचाता हुआ और मैं उन्हें देखती हुई भीड़ में धक्के खाती हुई। राजीव चौक पर एक और धक्के ने मुझे बाहर कर दिया। असलियत यही है कि मैट्रो आ जाए या जम्बो जेट। अगर किस्मत में धक्के खाना और खड़े रहना लिखा है तो वो तो झेलना ही पड़ेगा।

4 comments:

Mired Mirage said...

ओह! सोचकर ही पसीना निकल आया। यह बढ़ती जनसंख्या का कमाल है। सच में साधन कम ही पड़ते जा रहे हैं। क्या आप विश्वास करेंगी कि कुछ दिन पहले ही ब्लॉग पर एक महाशय आधुनिक स्त्रियों द्वारा बच्चे न पैदा करने को लेकर दुखी थे? काश भारत की कुछ अधिक स्त्रियाँ तथाकथित आधुनिक हो जातीं। पैर रखने को तो जगह नहीं है!
वैसे आपकी समस्या का एक ही उपाय है। नेट का उपयोग एक ऐसी सूची बनाने में किया जाए जिसमें आस पास के एक छोटे इलाके से एक ही निश्चित गंतव्य पर जाने वालों व उनके आने जाने के समय की सूचना हो। नाम की जगह ई मेल आई डी दी जा सकती है। फिर वे एक चार्टर्ड बस करें, महीने या उससे भी अधिक का किराया पहले ही इकट्ठा करें और बिना रुके या कम रुके सीधे अपने गंतव्य पर पहुँच जाएँ। इस काम के लिए कोई संस्था भी बन सकती है। शायद पहले से भी हो। प्रदूषण भी कम होगा और आराम भी अधिक होगा। बिना रुके जाने वाली बस हो बात ही क्या?
घुघूती बासूती

divy karni rajpurohit said...

buhut pasan aya.

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

काम है तो दिल्ली है. दिल्ली है तो मैट्रो है. मैट्रो है तो धक्के हैं.
लेकिन पत्रकार कभी याह नहीं मानता!

क्या जापान की तरह दिल्ली में भी मेट्रो में लोगों को घुसेड़ने के लिए पीपल-पुशर तैनात किये जायेंगे? ये चित्र देखो http://candleplum.files.wordpress.com/2009/09/subway-pusher.jpg

स्वप्निल नरेन्द्र said...

आज ही सँयोग से आपके ब्लॉग पर टपक पड़ा... भई मज़ा आ गया... कसम से कई दिनों से ऐसा ब्लॉग ढूँढ रहा था... और ऊपर से एक लड़की द्वारा लिखा हुआ... मान गये मैडम जी... !!!
"कीप अप द गुड वर्क... हे हे हे!"