Tuesday, July 20, 2010

क्या आपने तैयार कर रखी हैं... टेन थीन्ग्स टू डू बिफ़ोर आइ डाय लिस्ट???

सिनेमा के दीवानों और सिनेमा के दर्शकों में ख़ास फ़र्क होता है। लेकिन, कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सिनेमा में हो रही चीज़ों को अपनी ज़िंदगी में उतारने की कोशिशें करते रहते हैं। वो फ़िल्मी हीरो की हेयर स्टाइल हो या हीरोइन के कपड़े। देश में सिनेमा ही तय करता है कपड़ों और बालों के स्टाइल। आमिर की ग़जनी हेयर स्टाइल या पुराने ज़माने में राजेश खन्ना के गुरु कुर्ते... यहाँ तक कि बोलने की नई भाषा और कई बार नई सोच तक। मुन्ना भाई एमबीबीएस, रंग दे बसंती और चक दे इंडिया इसके ताज़ा उदाहरण हो सकते हैं।
लेकिन, कुछ फ़िल्में ऐसी भी होती हैं जो आपको अपने बारे में, अपनी ज़िंदगी के बारे में सोचने पर मजबूर कर देती है। ऐसी ही एक फ़िल्म मैंने पिछले दिनों देखी दस्विदानिया
देखने की वजह केवल विनय पाठक। लेकिन, फ़िल्म को देखने के बाद विनय की अदाकारी के साथ-साथ फ़िल्म की कहानी भी दिल में घर कर गई। फ़िल्म का नायक अमर, एक ऐसा व्यक्ति जिसने जीवन में कभी कुछ ऐसा नहीं किया जो उसके मन मुताबिक़ हो। हमेशा ज़िंदगी को जीते रहने के चक्कर में समझौते करते रहता है। जैसा कि हम सभी करते हैं। नायक बालकनी वाला घर खरीदता हैं कि वहाँ ऑफ़िस से आने पर बैठेगा। लेकिन, वो वहाँ सिर्फ़ टॉवेल सुखाने जाता रहा। या फिर अपनी गिटार सीखने की इच्छा को बचपन से ही दिल में रखे रखता हैं, कभी उसे पूरा नहीं कर पाता हैं। शायद हम भी ऐसे ही हैं। ज़िंदगी बीत जाती है, ये सोचते हुए कि जब वक़्त मिलेंगा तो ये करेंगे, वो सीखेंगे। ऐसे ही एक दिन हम मर जाते हैं, उन इच्छाओं को दिल में लिए। दस्विदानिया में ज़िंदगी अमर को अपनी अधूरी ख्वाहिशों को पूरा करने का वक़्त देती है। जिसे अमर एक लिस्ट टेन थीन्ग्स टू डू के ज़रिए पूरा करता है। ऐसा नहीं है कि पहले ऐसी फ़िल्में न बनी हो जिसमें कि नायक या नायिका को पता लग जाता हो कि वो मरनेवाला या मरनेवाली है। आनंद इसी सोच पर बनी एक बेहतरीन फ़िल्म है। लेकिन, दोनों में अंतर है। आनंद अपनी ज़िंदगी को बस खुशी से बिता देना चाहता था। वो उस लड़की आवाज़ रोज़ाना सुनता था जिससे वो प्यार करता था। लेकिन, उसने कभी ये बात नायिका को नहीं बताई। लेकिन, अमर ये बात नायिका को बताकर मरता है। ये जानते हुए भी कि नायिका की शादी हो चुकी है और वो एक बच्ची की माँ है। मन की बात कह देने के बाद उसके चेहरे की खुशी आपके चेहरे पर भी मुस्कुराहट ला देती है।
फ़िल्म की कहानी, फ़िल्म को बनाने के पीछे की सोच शायद कुछ और हो सकती हैं। लेकिन, मुझे ये एक वार्निंग अलार्म लगी। अमर पर ज़िदगी मेहरबान हुई और उसे ये मौक़ा मिला कि वो अपने काम पूरे कर सके... लेकिन, सब इतने लकी नहीं होते हैं। इसलिए, अपने अधूरे सपने वक़्त रहते पूरे करते रहिए... ज़िंदगी हर किसी पर मेहरबान नहीं होती है...

1 comment:

Navyavesh Navrahi/नव्‍यवेश नवराही said...

अच्‍छी टिप्‍पणी है।