Saturday, May 1, 2021

चार दशक से हिन्दी कवि सम्मेलन मंच के सरताज़ रहे हैं - डॉ. कुँवर बेचैन

स्मृति शेष: डॉ. कुँवर बेचैन

लेखक- राजा दुबे




अभी कुछ महीने पहले ही तो डॉ.कुँवर बेचैन  मध्यप्रदेश सरकार द्वारा मंचीय कविताओं के लिए प्रदान किए जाने
वाले कवि प्रदीप राष्ट्रीय सम्मान गृहण करने के लिए भोपाल आये थे। राज्य के संस्कृति विभाग ने सम्मान के साथ दिये जाने वाले प्रशस्ति पत्र के लेखन का काम मुझे सौंपा था। कुँवर बेचैन सा'ब मेरे पसंदीदा लेखक हैं अतः उनके बारे में लिखने में मैं बेहद उत्साहित था मगर प्रशस्ति लिखना शुरू किया तो लगा सीमित शब्द संख्या में किसी बड़े और लोकप्रिय रचनाकार को समेटना कितना कठिन होता है। एक बार केवल एक बार दादा ( बालकवि बैरागीजी ) ने मुझे उनसे एक कवि सम्मेलन में मिलवाया था और उनकी वो स्नेहिल और ‌प्रेम से ललककर गले मिलने वाली छवि मेरे जेहन में हमेशा के लिए बस गई। मैं उनसे एक बार फिर गले लगकर उन लम्हों को फिर से जीना चाहता था मगर उनके अवसान से मेरी यह इच्छा अधूरी ही रह गई। उनके अवसान से हमने हिन्दी कविता के एक विलक्षण रचनाकार को खो दिया है।


वर्ष 2019 के लिए कवि प्रदीप राष्ट्रीय सम्मान से सम्‍मानित होने वाले कवि डॉ. कुँवर बैचेन का जन्‍म  01 जुलाई 1942 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के गाँव उमरी में हुआ था। हिन्‍दी साहित्‍य में स्‍नातकोत्‍तर एवं पीएच.डी. उपाधि प्राप्‍त डॉ. बैचेन का वास्‍तविक नाम कुँवर बहादुर सक्‍सेना था। हिन्दी के प्राध्यापक के रूप में सुदीर्घ सेवा के बाद वर्ष 2002 में सेवानिवृत्त हुए  डॉ. कुँवर बैचेन ने चार दशक से भी अधिक समय तक मंच पर कविता पाठ किया और हिन्दी कविता के मंच पर ‍निरन्तर सक्रियता एवं उत्‍कृष्‍ट रचनाधर्मिता के नए प्रतिमान स्‍थापित किये। वे चार दशक से हिन्दी कवि सम्मेलन के सरताज़ रहे और देश-विदेश में अब तक सौ से भी अधिक मान-सम्‍मान एवं पुरस्‍कार प्राप्त डॉ.कुंवर बेचैन एक प्रतिष्ठित रचनाकार थे। इन दिनों वे कवि सम्‍मेलन के इतिहास लेखन के बड़े काम में सक्रिय थे।


कम उम्र में ही माता-पिता के देहांत से कुंवर बेचैन की
परवरिश नाना,मौसा और बहनोई ने की। वह समाज को ही अपना परिवार समझते थे। बचपन में गाँव में लाईट नहीं थी। और कविताएं खिलने का शौक उन्हें बचपन से था। इसलिए स्ट्रीट लाइट की धीमी रोशनी में खड़े होकर ही वे कविताएं लिखते थे । बचपन के ये छोटे-छोटे दुख ही उनकी प्रेरणा बने और उसी से प्रादुर्भाव हुआ कुँअर बेचैन का। कुँअर बेचैन अभी तक पैंतीस किताबें लिख चुके थे । वे देश-दुनिया का व्यापक भ्रमण भी कर चुके हैं। उनके लिखे दो गीत हिन्दी फिल्म-  "कोख" और "भविष्य (द' फ्यूचर) में आ चुके हैं। दो और हिन्दी फिल्मों के लिए भी उन्होंने गीत लिखे हैं। वर्तमान मेंं वे अपनी आत्म कथा लिख रहें थे। गीत विधा के बारे में कुँवर बेचैन मानते हैं कि गीत लय की तरह है। यदि लय टूटी तो प्रलय आ जायेगा। गीत कभी खत्म नहीं हो सकते। उनका स्वरूप बदल सकता है। हिंदी के बदलते स्वरूप को लेकर उनका मानना  था कि किसी भी भाषा के विकास के लिए दूसरी भाषा के शब्दों को समाहित करना ज़रुरी होता है, हिंदी के साथ अन्य भाषाएं भी समाहित हो रहीं हैं यह अच्छा संकेत है।
आज के दौर में आपका नाम बड़े गीतकारों तथा शायरों मेंं शामिल किया जाता था। ग़ज़ल के व्याकरण पर आपकी विशेष पकड़ है। गीत, नवगीत और ग़ज़ल जैसी विधा को आपने न केवल साधा है अपितु नई पीढ़ी को इन जटिल विषयों से जोड़ने के लिए हिन्दी साहित्य में महती कार्य भी किया है। सात गीत संग्रह, बारह ग़ज़ल संग्रह, दो काव्य संग्रह, एक महाकाव्य तथा एक उपन्यास के अतिरिक्त अनेक पत्र-पत्रिकाओं, वेब पृष्ठों, संपादित ग्रंथों तथा स्मारिकाओं में आपको पढ़ा जा सकता है। व्यवहार से सहज, वाणी से मृदु, प्रतिभा से अतुल्य तथा व्यक्तित्व से अनुकरणीय; डॉ. कुंवर बेचैन की रचनाओं में जीवन दर्शन के साथ-साथ सकारात्मकता का एक सौम्य मिश्रण है। इन रचनाओं में जहाँ एक ओर आधुनिकता और बेतहाशा अंधानुकरण के कारण उत्पन्न घुटन है तो दूसरी ओर संबंधों की ऊष्मा और संवेदना की छुअन भी है। उनका लिखा उन्हें हमेशा हमारे बीच होने का अहसास। करवाया रहेगा।

राजा दुबे 

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