Saturday, August 30, 2008

वो पाँच दिन, जब आपको ख़ुद से दूर कर दिया जाता है...

आप यदि किसी बात से डरते है तो बाज़ार आपको और डराएगा। आपको दहला देगा। डर इतना बड़ा देगा कि आप उस प्रोडक्ट की शरण में पहुंच जाएगें जो वो बेचना चाह रहा है। ऐसा ही कुछ है सैनेटरी नैप्किन्स के विज्ञापन के साथ। ये विज्ञापन दिखाते हैं कि आप ये सोचती है कि काश उन पाँच दिनों हम लड़के होते है या फिर कुत्ते के पीछे दौड़ पाते या फिर बिना किसी लड़की साथी के घूमने जा पाते या फिर चैन की नींद सो पाते। इन विज्ञापनों कि मानें तो शायद महीने उन पांच दिनों के लिए हम कमज़ोर हो जाती हैं और ये प्रोडक्ट हमें ताक़त देते हैं। हर बार इन्हें देखकर लगता है, क्या बकवास है। लड़कियों की सहन शक्ति को बाज़ार इतना कमतर आंक रहा है जिसकी कोई हद नहीं हैं। औरतें कैसे विपरित को अनुकुल बना लेती है ये उन्हें मालूम ही नहीं हैं। मैं महीने के तीस दिन बस से ऑफ़िस जाती हूँ, ऑफ़िस में काम करती हूँ, आउट डोर शूट पर भी जाती हूँ। मेरे साथ काम करनेवाली लड़कियाँ, कॉलेज जानेवाली लड़कियाँ, ऑफ़िस या फ़ील्ड में काम करनेवाली लड़कियाँ सभी पूरे महीने एक समान काम करती हैं। फिर क्यों इस तरह से एक सामान्य प्राकृतिक चीज़ को इतना भयावह बताया जाता है। मासिक चक्र से जुड़ी कई भ्रांतियों से लड़कियाँ दो-चार होती रहती हैं। चक्र शुरु होते ही आप अछूत हो, भगवान से दूर रहो, अचार से दूर रहो, नए सूती कपड़े मत पहनो, बिस्तर पर मत सोना, किचन में मत आना। चक्र खत्म होने पर दो बार नहाना और ना जाने क्या-क्या। मैंने कई बार पूछना चाहा कि ऐसा क्यों... जवाब मिला चुप रहो ऐसा होता हैं और बस उसे निभाओ। यहाँ तक कि 10वीं में जब ये बात हमें स्कूल में विज्ञान की कक्षा में बताई गई, तब भी हमारी टीचर ने कहा कि जो चलता आ रहा है वो सही हैं। घर में नैप्किन छुपाकर रखो। अपने अंडर गारमेंट छुपाकर सुखाओ, सब कुछ हिस्सा है इन सभी बातों का। और शायद हमारी इसी सोच को भुनाता है ये बाज़ार। कई साल पहले एक एड आया था कि कॉलेज के क्लास रूम में एक लड़की दूसरी को सैनेटरी नैप्किन पास करती है, लड़कों के ज़रिए और लड़के जान भी नहीं पाते हैं कि वो क्या पास कर रहे हैं। विज्ञापन तक़रीबन 7-8 साल पुराना है। आज तक ये समझ नहीं पाई कि छुपाना क्यों? घर में टीवी देखते वक़्त अगर ऐसा विज्ञापन आ जाए, माँ का झट से कहना - देखना तो ज़रा उस चैनल पर क्या आ रहा है? बात बस इतनी कि छुपाकर रखो सब कुछ। खुद को दबाकर रखो, कमतर आंको और चुप रहो। आश्चर्य ये है कि क्या लड़कियाँ भी इसे बनाने में साथ दे रही हैं। क्या वो भी खुद को कमज़ोर दिखा रही हैं। लेकिन, क्यों ये आज तक नहीं समझ आया...
आखिर में एक बात जो इससे जुड़ी है या नहीं मैं नहीं जानती फिर भी हमेशा से मेरे मन में रही है - "लड़कियों के हर व्रत को अच्छे वर की कामना और हर दर्द को मासिक धर्म से जोड़ दिया जाता है। जैसे अगर ये बातें हैं तो कोई बात ही नहीं है। जैसे उनकी ज़िंदगी में कुछ और हो ही नहीं सकता है। वो तो बनी ही है किसी लड़के के लिए और उसका वंश बढ़ाने के लिए।"

4 comments:

जितेन्द़ भगत said...

ये बातें सचमुच वि‍चारणीय हैं। प्रकृति‍ ने स्‍त्री-पुरुष को जैवि‍क वि‍शेषताओं के साथ उत्‍पन्न कि‍या है, मगर समाज उसे कमजोरी के रुप में दि‍खाता रहा है, और बाजार इस चीज़ को भुनाता रहा है।

सुजाता said...

खुद को छिपाकर रखो ,अपनी हर चीज़ छुपा कर रखो ,यही सुनते आये है न।हद है कि बाज़ार ने इसे बढावा ही दिया।
बहुत अच्छा और ज़रूरी लिखा आपने।
आभार !

प्रशांत मलिक said...

achha likha

poemsnpuja said...

हालत बहुत हद तक बेहतर हुयी है, अधिकतर घरों में अब सिर्फ एक बात की मनाही रहती है, भगवान को छूने की, इसके अलावा कोई मनाही नहीं होती. जिनकी भी माँ पढ़ी लिखी हो वो अपनी बेटी पर ऐसी पाबंदियां नहीं लगाती हैं. पर यकीन नहीं होता कि अभी भी कई घर ऐसे हैं जहाँ उन दिनों बैठने कि कुर्सी तक अलग होती है...किचन में जाना वर्जित होता है, और न जाने क्या क्या.
एक बात बार कहना चाहूंगी...विज्ञापन चाहे जैसे भी आयें...पर ये बात बिलकुल सच है कि sanitary napkins का बेहतर होने के कारण ही हम पूरे महीने एक जैसा काम कर सकते हैं. वरना बहुत परेशानियाँ आती थीं.