Monday, September 22, 2008

स्त्री: कामुकता में अंधी और दिमाग़ से खाली???

एक विज्ञापन में एक भारतीय वेशभूषा धारण किए महिला एक गंध से नहाए हुए लड़के से टकराती है और ख्यालों में खो जाती है। यहाँ से शुरु होती है एक नई कहानी। एक 15 साल का लड़का या लड़की जो किसी छोटे शहर या कस्बे में रहते हैं। इस विज्ञापन को देखते हैं और उसमें दिखाई गई घटना को खुद पर लागू करने लगते हैं और उनका एक ही लक्ष्य होता है वो उत्पाद खरीदना और उस अनुभव से गुज़रना।
आजकल लड़के बेहद खुश हैं। उन्हें लड़कियों की असलियत जो मालूम हो गई हैं। उन्हें पता चल गया है कि लड़कियाँ दिमाग़ से खाली और कामुकता में अंधी होती हैं। बस एक गंध (सुगंध नहीं महज़ गंध) की ज़रूरत है और आप किसी भी लड़की को अपने मोहपाश में बांध सकते हैं। लड़कों को इस ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति हुई हैं एक्स इफ़ेक्ट और ऐसे ही उत्पादों के ज़रिए। ये उत्पाद अपने विज्ञापनों के ज़रिए ये बताता है कि कैसे लड़कियों के जिस्म को अपने क़रीब लाया जा सकता हैं। इन विज्ञापनों में बेहूदगी की हद हैं।यहाँ सिर्फ़ एक गंध ही काफी होती है किसी महिला को वश में करने के लिए। मंज़र कुछ ऐसा होता है कि लड़की के पास ख़ुद का कोई दिमाग़ नहीं है। वो कुछ सोच नहीं सकती हैं। समझ नहीं सकती हैं। एक लड़के से झगड़ती है और दूसरे गंध में नहाए हुए लड़के की बांहों में आ गिरती है। या फिर एक स्कूल में टीचर है और क्लास में आए लड़के से निकलनेवाली गंध से कुछ पगला जाती है कि बोर्ड पर हार्ट बीट बना देती हैं। लेकिन, ये उत्पाद अकेला नहीं है। ऐसे और भी कई गंध बेचते उत्पाद हैं जो लड़कियों को सेक्स का सामान समझते है और अपने उत्पादों के ज़रिए उन्हें भी बेचने की कोशिश करते हैं। लड़कियों का विज्ञापनों में भौड़ा प्रदर्शन सालों से बहस का मुद्दा है। कई महिला संगठन इस पर कई बार आपत्ति दर्ज कर चुके हैं। लेकिन, बात महज महिलाओं तक सीमित नहीं दिखती हैं। एक लड़का जिसकी उम्र 14 साल है, जो देवास या आष्टा जैसे छोटे शहर में रहता है। पैसे जमा करता है, क्योंकि उसे सैट वैट झटैक चाहिए। परफ्यूम जोकि लड़कियों को अपनी ओर खिंच लेता है। जब उससे पूछा तुम क्यों चाहते हो ये खरीदना वो शरमा गया। उसने कोई जवाब नहीं दिया। विज्ञापनों की दुनिया बेहद अनोखी होती है। यहाँ 30 या 40 सेंकंड में आपको एक कहानी कह दी जाती है। आप उससे कहीं ना कहीं जुड़ भी जाते हैं। कभी कोई माँ-बेटी का रिश्ता, तो कहीं बाप-बेटे का, तो कहीं पति-पत्नि का। लेकिन, विज्ञापन जब बात करते हैं कामुकता की वो भी किन्हीं दो ऐसे लोगों के बीच जो अंजान हो बात उलझ जाती है। हम वैसे ही एक देश में रहते हैं जहाँ सेक्स या इससे जुड़े किसी भी पहलू पर बात करने की पाबंदी है। अगर बात होती भी है तो दबी-छुपी ज़बान में। यहाँ अगर टीवी पर एड्स का विज्ञापन आता है तो चैनल चेन्ज हो जाते हैं या फिर अगर सैनेटरी नैपकिन का एड आ जाए तो भी माँ कहती है ज़रा देखना तो दूसरे चैनल पर क्या चल रहा है। ऐसे में इन विज्ञापनों का धड़ल्ले से दिखाया जाना, वो भी कई बार बच्चों के कार्यक्रमों के दौरान बेहद ख़तरनाक है। ये विज्ञापन ना सिर्फ़ महिलाओं का चारित्रिक हनन कर रहे हैं। बल्कि ये बच्चों और जवान होते युवाओं की सोच को भी एक भौड़े तरीक़े से विकसित करने में लगे हैं। इसका असर शायद हमें आज न दिखाई दे। लेकिन, जब इस परिवेश में पले बच्चे बड़े होंगे तो उनकी सोच और गतिविधियाँ इन विज्ञापनों का असली चित्रण होगी।
कल्पना कीजिए कि आज से महज 10 साल या इससे भी कम वक़्त के बाद आप किसी नुक्कड़ की दुकान पर गए हैं या फिर सड़क पर चल रहे हैं और आपके चारों तरफ लड़कियाँ गंध में नहाए लड़कों से लिपटी हुई हैं...

10 comments:

देवदत्त said...

इस या इस जैसे विज्ञापनों पर यूं उत्तेजित न होएं। ये सारे विज्ञापन बाजार से निकले हैं और उसी की बात को कहते हैं।
दरअसल, यह पूछा जाना चाहिए उस लड़की से जो इस कामुक विज्ञापन की सूत्रधार है। उसे जब इस विज्ञापन को करने को कहा गया था तब उसने अपनी आपत्ति दर्ज क्यों नहीं करवाई थी?
आप बाजार के साथ चलें। और इसकी होशियारी को समझें।
वैसे इसी से जुड़े मुद्दे पर आज मेरी एक पोस्ट भी है जरा देख लें।

Anonymous said...

YAHI TO MUSHKIL HAI DAVDUTT BHAI....HAMARA BANAYA BAZAR AAJ HAME APNE SATH CHALE KO MAJBOOR KAR RAHA HAI...AUR AAP BHI SATH CHALNE KO TAIYAAR KHADE HAI.....

VERMA

ranjan said...

दिमाग का खेल है.. पता नही सच क्या है..
जो दिखेगा वो बिकेगा
या
जो बिकेगा वो दिखेगा.

रंजना said...

आपके एक एक शब्द से सहमत और वर्तमान शोचनीय स्थिति से उतनी ही आहत भी हूँ.पर क्या किया जाए,न प्रोडक्ट निर्माताओं को प्रोडक्ट प्रोमोसन के आगे इस बात की चिंता है,न इस तरह के विज्ञापन निर्माताओं को ,न इसमे एक्ट करने वालियों को और न ही सेंसर नाम की कोई चीज रह गई है अब इस देश में.यह नग्नताऔर भौंडापन किस सीमा तक जायेगी और संस्कार संस्कृति को कितना तहस नहस करेगी ,क्या कहा जा सकता है.

दीपक राजा said...

bahut achchhi bat kahai aapne

दिनेशराय द्विवेदी said...

बाजार धीरे धीरे सभ्यता और मानवता का शत्रु बन कर सामने आ रहा है।

Udan Tashtari said...

बाजार और बाजार का चलन-जो न कर जाये सो कम!!

abhishek said...

maine kai parfume kharide aur lagaye par kuch nahi hota,, koi ladki god main nahi girti,,, aapko koi kaargar perfume pata ho batana ,,, nahi to soch raha hooo, consumer court may hi daava thok dooon... aapka kya khyaal hai....

Anil Pusadkar said...

बहुत सही कहा आपने। सिर्फ़ पर्फ़्यूम ही नही,बहुत से विग्यापन आपतिजनक है। एक शहरी माड धोबन से ले देकर मुक्ति मिली है।बाज़ार बाज़ार तक सीमित रहे तभी तक ठीक है,उसका घर तक पहुन्चना घातक है। अच्छ लिखा आपने,बधाई

Suresh Gupta said...

बाकई इन विज्ञापनों में बेहूदगी की हद हैं।
बना दिया बाज़ार राष्ट्र को, भूल गए अपना इतिहास.