Tuesday, September 23, 2008

साला... माँ की याद...

ठूंसी हुई बस में लटके हुए लोग...

अपने असंतुलन से संतुलन बनाते लोग अपनी-अपनी बातों में व्यस्त थे...

तभी ड्राइवर ने ज़ोर का ब्रेक मारा और बस में भूंकप आ गया...


लटके हुए लोग एक दूसरे पर गिरने लगे...

तभी एक लड़का चिल्लाया - "मम्मी... मेरा पैर..."

एक आवाज़ आई - "साला, कितने भी बड़े हो जाओ, जब फटती है तो माँ ही याद आती है..."

ठूंसी हुई बस के लटके हुए लोग अचानक हंसने लगे...

8 comments:

रंजन said...

मां की ही याद आनी चाहिये...

नितिन भारद्वाज said...

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vijay gaur/विजय गौड़ said...

अच्छी कविता है। आखिरी पंक्ति "ठूंसी हुई बस के लटके हुए लोग अचानक हंसने लगे!" न भी हो तो भी पूरी थी।

लोकेश said...

सही चित्रण

Suresh Gupta said...

बात तो सही है.

Rohit Tripathi said...

kam shabdo mein hi bahut badi baat kahi aapne.. bahut acha

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I don’t want to love you… but I do....

अनूप शुक्ल said...

सही तो है।

Anonymous said...

हमेशा... और जब माँ दूर हो तो और ज्यादा