Tuesday, December 16, 2008

ब्लास्ट से ब्लास्ट के बीच...

लेखनी से जुड़ी किसी भी प्रतियोगिता में मैं कभी कोई इनाम नहीं पा पाई। हालांकि, हिस्सा कई बार लिया। कविता बहुत कम लिखती हूँ या सही कहे तो लिख ही नहीं पाती हूँ। यही वजह है कि अपनी ज़िंदगी में महज दूसरी बार कविता प्रतियोगिता में भाग लिया था। हिन्द युग्म की कविता प्रतियोगिता में। कविता को हिन्द युग्म के ब्लॉग पर कल पोस्टेड देखा। और, आज अपने ब्लॉग पर डाल रही हूँ।
दीप्ति।


ब्लास्ट से ब्लास्ट के बीच...
लहलहाती है बयानों की फसलें -
उफनती है संवेदना की नदियाँ -
कड़कती है आरोपों की प्रचंड बिजलियाँ -
और मुद्दों के गर्म तवे पर सिकती हैं -
छिछली राजनीति की रोटियाँ।
ब्लास्ट से ब्लास्ट के बीच
ब्लास्ट से ब्लास्ट के बीच
सबकुछ रहता है सामान्य, दिलकश और खुशनुमा -
दांवे होते हैं मुंह तोड़ जवाब के -
विफल होंगे नापाक इरादें -
और धराशाही होंगे ख़तरनाक मंसूबे -
ये संकल्प भी दोहराए जाते हैं।
ब्लास्ट से ब्लास्ट के बीच
ब्लास्ट से ब्लास्ट के बीच
खिलखिलाते है बच्चे, फुदकते हैं किशोर -
आँखों में पलते हैं सपने -
अनछुआ नहीं छूटता है कोई छोर -
घिरती है उम्मीदों की घटाएँ -
नाचते हैं निश्चय के मोर -
फिर पनपती है महत्तवकांक्षाएँ -
खिल जाते हैं पोर-पोर -
हर शहादत के बाद दोहराया जाता है, बस अब नहीं और।
ब्लास्ट से ब्लास्ट के बीच...

4 comments:

Anil Pusadkar said...

ये कविता अच्छी ही नही बल्कि सच्ची भी है.इनाम जीत पायेगी या नही ये तो नही बता सकता मगर जो इसे पढेगा उसका दिल ज़रुर जीत लेगी ये मेरा दावा है.

Dipti said...

अनिलजी, परिणाम आ चुके हैं और सांत्वना भी मिल चुकी हैं।
दीप्ति

ranjan said...

आपको बधाई!

savita verma said...

puruskar mandand to nahi hota.