Saturday, December 20, 2008

अथ श्री जूता पुराण...

जब से ज़ैदी ने बुश पर जूते फेंके हैं तब से लगातार लग रहा था कि इस घटना पर कुछ लिखा जाए। लेकिन क्या? सब कुछ तो लगभग लिखा ही जा चुका था। इसी बीच कल बस में कुछ लोगों के बीच हो रही बातचीत कानों में पड़ी। बस भरी हुई थी सो मैं आगे ड्राइवर के पास केबिन से सटा खड़ा हुआ था। ड्राइवर, कन्डक्टर और कुछ रोज़ाना की सवारियाँ इसी मुद्दे पर बात कर रही थी। मैं चुपचाप खड़ा उन्हें सुनता रहा।

एक सवारी ने बताया कि बहरीन में रहनेवाला एक शेख, ज़ैदी को अपने 6 दरवाजों वाली गाड़ी तोहफे में देना चाहता हैं।
ड्राइवर ने कहा - क्या बात है यार... ये तो बहुत बढ़िया है, जूता मारो और इनाम पाओ।
फिर एक दूसरी सवारी बोली - अरे वो तो साले बुश को जूता पड़ा नहीं, पड़ता तो और मज़ा आता।
फिर एक बोल उठा - यार हमें भी कुछ ऐसा करना चाहिए। हमारे देश में भी तो ऐसे कितने ही हैं जिनको पब्लिक जूता मारना चाहती होगी।
सब हंस पड़े।
फिर वहां खड़े एक बुज़ुर्ग की चुटकी लेते हुए ड्राइवर ने कहा - बड़े भाई तुम भी मार दो किसी को जूता बढ़िया पैसे मिल जाएगे। बुढ़ापा सुधर जाएगा।
वो बुज़र्ग बोले - यार क्यों इस बुढ़ापे में जेल भिजवाते हो और मारू भी तो किसे...
एक ने झट से कहा - मायावती को मार आओ तुम तो...
जवाब आया - नहीं यार मुलायम को मारने का मन है...
फिर कोई बोला - मैं तो साले राज ठाकरे को मारकर आऊंगा...
फिर एक ने कहा - साले सबके सब नेताओं को पकड़कर मारना चाहिए...
और. फिर जूता खानेवालों की लिस्ट बढ़ती ही चली गई...
इन बातों को सुनकर हंसी तो आ ही रही थी, लेकिन साथ ही ये भी लग रहा था कि आज जनता में नेताओं के लिए कितना गुस्सा है। वो इराक़ का पत्रकार हो या हमारे देश की लिपस्टिक लगानेवाली महिलाएं, सभी इस वक़्त गुस्से में हैं। ज़ैदी ने जो किया वो हर कोई करना चाह रहा हैं। हर व्यक्ति के पास उन लोगों की लिस्ट मौजूद है जिन्हें वो जूतों से पीटना चाहते हैं। हालांकि ज़ैदी ने अपने किए की माफी मांग ली है। लेकिन, इसे उसकी कायरता नहीं समझना चाहिए। इस माफी को मंगवाने के लिए उस पर किस तरह का दबाव होगा ये समझना ज़रूरी है। हर व्यक्ति का विरोध दर्ज करवाने का तरीक़ा अलग होता है। कोई गांधीगीरी अपनाता है, तो कोई जूता... पसंद अपनी-अपनी...
बहरहाल, अगर आपको किसी व्यक्ति को जूता मराने का मौक़ा मिले तो वो कौन होगा... ज़रूर बताएं...

4 comments:

रंजन said...

कोई हो.. पर निशाना नहीं चुकेंगे...

संगीता पुरी said...

चारो ओर एक ही चर्चा....आखिर लाख न चाहते हुए भी आपको जुते पर लिखने का मसाला मिल ही गया न।

Anonymous said...

बहरहाल, अगर आपको किसी व्यक्ति को जूता मराने का मौक़ा मिले तो वो कौन होगा... ज़रूर बताएं...


राज ठाकरे

संजीव said...

जार्ज बुश से तमाम नफ़रतों ( ख़ासतौर पर जिस बर्बर तरीके़ से सद्दाम हुसैन को फ़ांसी दी गई) के बावजूद निजी तौर पर मुझे लगता है कि ज़ैदी ने ग़लत किया। बुश के ख़िलाफ इराक़ के लोगों के ग़ुस्से को समझा जा सकता है...लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ज़ैदी एक जुझारू पत्रकार भी हैं। उनके पास जूते से कहीं बड़ा हथियार है, जिसे वो बुश के ख़िलाफ इस्तेमाल कर सकते थे। विरोध की जूतामयी प्रस्तुति लोगों से तालियां तो बजवा सकती है... लेकिन ये तरीका है बड़ा छिछला। कम-से-कम पत्रकारों को तो ये शोभा नहीं देता। हिंदुस्तान में इमरजेंसी के दौरान अख़बारों ने अपने संपादकीय की जगह को खाली रखकर या उसे स्याह कर अपना विरोध जताया था। विरोध का ये तरीका भले ही लोगों को अब रुचिकर न भी लगे लेकिन पत्रकारों का क़ौम इसे एक ग़रिमामयी विरोध के तौर पर लंबे समय तक याद रख सकता है। दूसरे, ज़ैदी ने जूता फ़ेंककर ग़लती की..और बाद में माफी मांगकर उससे भी बड़ी ग़लती की। जब ऐसा करते हुए उन्हें झिझक नहीं थी तो बाद में उन्हें क्यों शर्मिंदगी होनी चाहिए?