Saturday, January 10, 2009

एक ब्राह्मण लड़की की नीलीसाड़ीवालियों से पहली मुलाकात...




मैं एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुई। कन्या और देवी के रूप में मेरे पांव पूजे गए। दोस्तों में भी हमेशा ऊपर ही रही। कभी किसी तरह की रोक-टोक नहीं रही। मंदिर में आना जाना हो या कही खाना, ये बातें कभी इतनी बड़ी नहीं लगी थी। कभी ये नहीं सोचा था कि कोई ऐसा भी हो सकता हैं जो इसके लिए तरसता हो। मुझे तो मासिक चक्र के दौरान पूजा से दूर रहना या फिर किचन में न जाना या फिर मम्मी का मुझे न छुना ही अखरता था। मेरी मम्मी के वो छुआछुत के नियम ही मुझे असहनीय और दकयानूसी लगते थे। लेकिन, उस दिन जाना कि वो तीन दिन पूरी ज़िंदगी के आगे कुछ नहीं। खुद को जब उनकी जगह देखकर सोचा तो रोंगटें खड़े हो गए मेरे.....
एक मेल के ज़रिए सूचना मिली कि दिल्ली के सुलभ म्यूज़ियम में महात्मा गांधी के पोते राजमोहन गांधी, कुछ पंडितजी और एक अमेरिकी यूनिवर्सिटी के कुछ छात्र मैला ढोनेवाली महिलाओं के साथ खाना खानेवाले हैं। मुझसे कहा गया कि इसे मैं अपने कार्यक्रम के लिए शूट कर लूं। मुझे लगाकि इसमें कौन-सी बड़ी बात हुई कि खाना खाया जाने वाला हैं। स्टोरी में कुछ ख़ास दम न लगने के बावजूद मैं शूट पर गई। पहुंची तो कार्यक्रम शुरु हो चुका था। सभी हाथ जोड़े गाना गा रहे थे। जोकि सुलभ परिवार के लिए विशेष रूप से लिखा गया था। स्टेज पर राजमोहन गांधी और अमेरिकी छात्र खडे़ थे और नीचे नीली साड़ी पहने हुए कई महिलाएं हाथ जोड़े हुए थी। हमने शूटिंग शुरु की। गाने के बाद विदेशी छात्रों को सम्मानित किया गया। इसके बाद सुलभ की मुख्य महिला कार्यकर्ता को बिंन्देश्वर पाठक ने मंच पर बुलाया। वो सकुचाए हुए आई। पाठकजी ने कहा तुम राजस्थान से आई इन महिलाओं की अगुआ हो बोलो कुछ उसने माइक के आगे खड़े होकर कहा - good morning every one. I am very happy to come here. thank you.
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। नीली साड़ीवाली महिलाओं के चेहरे चमक रहे थे। इसके बाद राजमोहन गांधी और विदेशी छात्रों को म्यूज़ियम की सैर करवाई गई। नीली साड़ीवाली महिलाएं धूप में आकर बैठ गई। मैंने और मेरी कैमरापरसन ने तय किया कि इनके कुछ क्लोज़ अप लिए जाए। जैसे ही कैमरा महिला की ओर मुड़ता वो घुंघट में मुंह झुपाने लगती, तो कभी खिलखिलाकर हंस देती। इसके बाद हमने उनकी बाइट (सामान्य भाषा में उनसे बात की) ली। एक से बात शुरु हुई तो पता चला कि वो राजस्थान के अलवर से आई है। वो पहले मैला ढोती थी। लेकिन, सुलभ के चलते अब पापड़ अचार बनाती हैं। उसने बताया कि कैसे उसे पहले ये लगता था कि उसका जन्म ही लोगों का मैला उठाने के लिए हुआ है। वो बचपन से यही काम कर रही थी। लेकिन, सुलभ में आने के बाद काम करने के बाद उसे पता लगा कि वो कुछ और भी कर सकती हैं। उसने बताया कि पहले उसके हाथों का बना कोई नहीं खाता था। लेकिन, अब उसका बिज़नेस चल पड़ा हैं। वो बहुत खुश थी। उसकी बेटी भी उसके साथ आई थी। उनके चेहरे खिले हुए थे। माँ-बेटी दोनों ने पूरा मेकअप कर रखा था, बालों में रंग-बिरंगी क्लीप लगी हुई थी, रंगीन स्वेटर पहन रखा था। उसने कहा कि वो बचपन से ये सब पहना चाहती थी। लेकिन, कभी पहन नहीं पाई। अब अपनी बेटी में वो ये सारे शौक पूरे कर रही हैं। इसके बाद हमने कइयों से बात की सब की अलग-अलग कहानियाँ थी। कभी-कभी कोई अपनी कहानी बताते हुए रो देता था, तो कभी मेरी और मेरी कैमरापरसन की आँखे भर जाती थी। इसके बाद हमने वहाँ तस्वीरें के ज़रिए इन लोगों की कहानी देखी। तस्वीरें देखते हुए ही मेरे रोंगटें खड़े हो गए। इसके बाद खाने का कार्यक्रम शुरु हुआ। सभी को खुले में पंगत में बिठाया गया। पंडितों और विदेशी छात्रों के बीच नीली साड़ीवालीयाँ दबी हुई बैठी थी। खाने केपहले पंडितों ने मंत्रोंच्चार किया और फिर खाना शुरु हुआ। सभी शॉट कम्पोज़ कर रहे थे।



नीलीसाड़ीवालियों के चेहरे खिले हुए थे। वो खुश थी। मैं एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुई। कन्या और देवी के रूप में मेरे पांव पूजे गए। दोस्तों में भी हमेशा ऊपर ही रही। कभी किसी तरह की रोक-टोक नहीं रही। मंदिर में आना जाना हो या कही खाना, ये बातें कभी इतनी बड़ी नहीं लगी थी। कभी ये नहीं सोचा था कि कोई ऐसा भी हो सकता हैं जो इसके लिए तरसता हो। मुझे तो मासिक चक्र के दौरान पूजा से दूर रहना या फिर किचन में न जाना या फिर मम्मी का मुझे न छुना ही अखरता था। मेरी मम्मी के वो छुआछुत के नियम ही मुझे असहनीय और दकयानूसी लगते थे। लेकिन, उस दिन जाना कि वो तीन दिन पूरी ज़िंदगी के आगे कुछ नहीं। खुद को जब उनकी जगह देखकर सोचा तो रोंगटें खड़े हो गए मेरे.....

10 comments:

SWAPN said...

sach hai kisi ka dard wahi jaan sakta hai jiske chot lagti hai.

raja said...

article acha hai. internet par bhid me kuch naya pad ne ko mila aage bhi is prakar like. hamare vichar ja ne
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विवेक सिंह said...

इसीलिए तो कहा गया है :

शेर कहलाने बडा मज़ा आता है
दम निकल जाता है जब शेर आ जाता है

News Era said...

Vah vichaottezak aalekh ji
BADHAI HO

vinay said...

kabhi kabhi jindgi ki ghatnaye soch ko ek naya mod de deti hain.

Udan Tashtari said...

एक दिन टीवी पर सुलभ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का पूरा प्रसारण देखा था, बड़ा अच्छा लगा था.

PN Subramanian said...

उत्तर प्रदेश और बिहार में ऐसे कई दलित अब भी तरस ही रहे हैं. आज के युवा से अपेक्षा है कि वे उनके उत्थान में सार्थक भूमिका निभाए.

Mired Mirage said...

शब्द कुछ कहने को कम पड़ रहे हैं। जिन बातों को हम इतनी सहजता से ले लेते हैं, जिनका आनन्द लेते हैं, बिना यह जाने कि वे किसी अन्य के लिए अमूल्य व दुर्लभ भी हो सकती हैं। हम कहीं से आए भोज के न्योते पर नाक भौं भी सिकोड़ लेते हैं, कि ओह फिर बाहर जाना पड़ेगा।
हमारे समाज से एक बहुत बड़ा अन्याय हो गया है। आशा है हमारे जीवन काल में ही इसका प्रायश्चित भी हो जाएगा।
नीली साड़ी वालियों के लिए कामना है कि वे सतरंगी कपड़े पहनें व स्वतंत्र व आत्मनिर्भर होकर खूब लम्बी उड़ानें भरें।
घुघूती बासूती

पनिहारन said...

ek lalkh hakikat hai..................

Anonymous said...

Thanks for the information

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