Tuesday, February 17, 2009

अंजान दोस्त

कल ऑफ़िस से निकलने के बाद क़रीब 1 घंटे तक बस स्टॉप खड़ी रही। बस नहीं आई। आईटीओ पर जाम लगा हुआ था। कोई रैली निकल रही थी, जिसके चलते सारे रास्ते जाम थे। अंदाज़ा ये लगाया गया कि फिलहाल संसद का सत्र चल रहा है तो कुछ जागरूक नागरिक जनता के हित में सरकार को जगाने के काम में लगे हुए होंगे। किसी धारा में परिवर्तन या फिर किसी तरह का कोई आरक्षण, इन्हीं में से किसी मुद्दे पर निकल रही होगी ये रैली। ऐसे में इन्हें कोसा भी नहीं जा सकता हैं। आखिर हमारे लिए ही तो वो चक्का जाम कर रहे हैं। खैर जब बस नहीं आई तो मैं मैट्रो के ऑप्शन पर विचार कर रही थी।

तब ही अचानक एक लड़की मेरे पास आई। उसने मुझसे पूछा कि आपको कहाँ जाना हैं? मैंने कहा मदर डेयरी। उसने कहा मुझे भी जाना है, हम साथ चलें। मैंने कहा ठीक हैं। पहले सोचा कि ऑटो से चला जाए। लेकिन, ऑटो भी जाम में फंस जाता और वैसे भी जमुना पार जाने में तो ऑटो वाले कुछ यूँ कतराते है कि मानो लंका जाना हो। 50 की जगह 200 रुपए मांगते हैं। तय किया गया कि मैट्रो से जाएगें। मैट्रो स्टेशन लगभग 1 किलोमीटर की दूरी पर था। दोनों साथ चलने लगे। तीन साल से दिल्ली में अकेले रहते हुए अब मेरा डर कुछ कम हो गया। सो मैं आराम से ही चल रही थी। अंधेरा तो हो ही चुका था। लेकिन, वो लड़की कुछ डरी हुई थी। जैसे ही आगे बढ़े केन्द्रीय सचिवालय मैट्रो के आगे ताज़िए की भीड़ देखकर हम घबरा गए। उसकी तो रूलाई ही छूट गई। हाथ पैर तो मेरे भी फूल गए थे। लेकिन, हिम्मत के साथ हम दोनों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा और तेज़ क़दमों से मैट्रो स्टेशन पहुंच गए। मैंने टिकट खरीदा और मैट्रो बुकलेट से जाने का रूट तय किया। इस दौरान बातचीत में ये पता चला कि वो लड़की दिल्ली की है लेकिन, अकेले कम निकलती है, सो कुछ ज़्यादा जानती नहीं है। मैं पूरे रास्ते उसे रूट समझाती रही कि हम कैसे-कैसे जा रहे हैं। वो कुछ डरी हुई थी। खैर मैट्रो से उतरकर जब हम फ़ीडर में चढ़ उसके चेहरे पर एक मुस्कान गई। फिर उस डरी हुई सी लड़की ने खूब बातें की। बताया कि वो कहाँ गई थी, कहाँ रहती है। उसने मुझे अपने घर आने का न्यौता दिया और वो अपने स्टॉप पर उतर गई।
कल मैं ऑफ़िस से 6 बजे निकली थी और 9 बजे रूम पहुंची थी। लेकिन, थकान बिल्कुल नहीं थी। अंजाने में ही सही मुझे इस अजनबी शहर में एक अंजान दोस्त मिल गया। साथ ही साथ मुझे ये भी कल महसूस हुआ कि मैं बड़ी हो गई हूँ। कल लगा कि वाकई मुझमें इतनी हिम्मत गई है कि अब इस अजनबी शहर में मैं भी किसी की मदद कर सकती हूँ।

2 comments:

सौरभ शर्मा said...

अच्छा है एक अच्छी दोस्त लड़की मिली वरना दिल्ली में तो पता नहीं चलता कब तुम्हे लूट के लेजाये ।

विनय said...

चलो किसी का तो भला हो रहा है!



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चाँद, बादल और शाम