Wednesday, April 1, 2009

क्या हम सभ्य हो चुके हैं?


पिछले कुछ महीनों से दिल्ली की मुख्य सड़कों के किनारे और चौराहों पर बेवजह हार्न बजाने के लिए कई अपीलें लिखी हुई दिखाई दे जाती हैं। मैं रोज़ाना रूम से ऑफ़िस और ऑफ़िस से रूम आते-जाते इन्हें पढ़ती हूँ। इनमें से एक अपील कहती है - हार्न बजना गाली देने के बराबर है। बिना वजह हार्न बजाएं। मन में एक ही बात आती है, वो ये कि एक ऐसा समाज जहां गालियां भाषा का हिस्सा बन चुकी हैं, जहां इंसान हर छोटी-बड़ी बात पर या कभी बिना मतलब यूँ ही गाली-गलौच पर उतर आता है। उसे ये समझाने का क्या मतलब कि हार्न बजाना गाली देने के बराबर है? जब इंसान अपने मुंह से गाली निकालने में शर्मिंदा महसूस नहीं करता है, वो हार्न बजाने जैसी सांकेतिक गाली से परहेज क्यों और कैसे करेगा? इस मुहिम के लगभग सभी विज्ञापन एक सभ्य समाज को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। जैसे कि बिना वजह तो कुत्ता भी नहीं भौंकता है या फिर हार्न बजाना एक बिमारी की तरह है। इन सभी विज्ञापनों को पढ़कर मन में सवाल आता है कि क्या हम इतने सभ्य और खुद के प्रति सचेत हैं? हम तो गालियों से परहेज करते हैं, ही हम कुत्ते-बिल्लियों की तरह लड़ने और चिल्लाने से और ना ही हम हमें होनेवाली किसी भी शारीरिक या मानसिक बिमारी के बारे में सचेत हैं। इस स्थिति में मुझे रह-रहकर ये महसूस होता है कि शायद ये विज्ञापन हमें खुद में झांकने का भी एक मौक़ा देते हैं। सड़क किनारे लगे विज्ञापन में ये पढ़कर कि बिना वजह कुत्ता भी नहीं भौंकता, हमें एक बार ये ज़रूर सोचना चाहिए कि क्या बिना वजह हार्न बजाने के साथ-साथ हम बिना वजह चिल्लाते भी हैं, झगड़ते भी हैं?

3 comments:

अनिल कान्त : said...

फरीदाबाद में तो ऑटो स्टार्ट कर छोड़ देते हैं और सवारियां ढूंढते हैं ....वो इतनी आवाज़ करता है कि पूंछो मत ...पेट्रोल कि बर्बादी और ध्वनि प्रदूषण होता है सो अलग ...मना करने पर उल्टा बोलते हैं

Udan Tashtari said...

विचारणीय आलेख. आपकी लेखनी प्रभावशाली है.

संगीता पुरी said...

सही कहा ...