Tuesday, April 7, 2009

ब्लैकमेल करते रिश्ते...


शुभ मंगल सावधान !

मैं, मेरे दोस्त और मेरे कुछ चाचा-मामा के बच्चे इस वक़्त एलिजिबल बैचलर्स की श्रेणी में शामिल हैं। यानी की हम सभी सामाजिक रूप से अब शादी का लड्डू चखने को तैयार हैं। लेकिन, ये शादी हो कैसे? लव या फिर अरेंज? इस बात पर मैं अक्सर ही बात करती रहती हूँ। हमउम्र से भी और अपने से बड़ों से भी। बातें जो निकलकर आती है वो बहुत ही घालमेल होती हैं। कुछ दोस्त ऐसे हैं जो शादी अपनी पंसद से करना चाहते हैं और उनमें से कइयों ने पसंद भी कर लिए हैं। तो कुछ का मानना हैं कि ये फैसला माता-पिता को ही करना चाहिए। ऐसे ही बड़े-बुज़ुर्गों में भी कुछ प्रेम विवाह के विरुद्ध है, तो कुछ आधुनिक हो चले इस समाज के साथ हैं और बच्चों की खुशी में अपनी खुशी देखते हैं। लेकिन, इन दो से इतर कुछ ऐसे भी हैं जो एक तीसरे ही ट्रैक पर चल रहे हैं। ये शादी अपनी पसंद से करना चाहते हैं, लेकिन अपनी जाति में। इन्होंने ख़ुद की पसंद को कुछ यूँ बांध लिया हैं कि ये ऐसे ही किसी व्यक्ति को पसंद करेंगे जो उन्हीं की जाति, उन्हीं के तरह के परिवार का हो। मेरे परिवार में ही मेरी कई कज़िन ने प्रेम विवाह किया है। किसी ने ब्राह्मण लड़के से ही तो कुछ ने किसी और जाति के लड़कों से। आज वो सभी खुश हैं। वो ब्राह्मण लड़का हो या किसी और जाति का परिवार में सब घुल मिल चुके हैं। लेकिन, विवाह से पहले परिस्थितियाँ ऐसी नहीं थी। जिनने भी ब्राह्मण जीवन साथी चुना था, उनकी शादी में कोई परेशानी खड़ी नहीं की गई और तो और कई बाहरी लोगों को ये बताया गया कि लड़का हमने ही चुना हैं। लेकिन, जहां लड़का किसी अन्य जाति का था वहां घर में लड़की की मार-कुटाई ले लेकर, बाबा ओझा तक के चक्कर काटे गए। अर्थ ये हुआ कि बड़े प्रेम विवाह को तब ही अपना रहे हैं जब वो समान जाति में हो रहा हो (कम से कम मेरे घर में)। ऐसे ही कुछ बड़ों का कहना है कि अगर लड़का या लड़की आप ढ़ूढ़े तो उसे एक्सट्रा ऑडीनरी होना ज़रूरी है। कुछ तो अलग हो जो हम आगे बता सकें। वही कुछ दुखी होते हुए भी बच्चों की खुशी में अपनी खुशी देखने लगते हैं। मेरी मम्मी को लगता है कि अगर वो हमारे साथ ऐसी शादियों में शामिल होंगी जो लड़का-लड़की अपनी पसंद से कर रहे हैं, तो उनके बच्चे यानी कि मैं और भैया बिगड़ जाएंगे। यही वजह है कि वो ऐसी शादियों में बहुत कम जाती हैं या फिर हमारे चुप रहने पर भी बार-बार हमारे सामने उसे गलत बताती हैं। मैं कई बार उलझ जाती हूँ कि आखिर हम चाहते क्या हैं? मेरी मम्मी जो टीवी सीरियल कसौटी ज़िंदगी की में... अनुराग और प्रेरणा की शादी पर खुश होती है असल जीवन में प्रेम विवाह की विरोधी क्यों हैं? ये दोहरे मापदंड केवल बड़ों के नहीं हैं बल्कि हमारी पीढ़ी भी इसमें उलझी हुई है। कई ऐसे हैं जो ऑफिस से लेकर कॉलेज तक में खूब प्यार मोहब्बत करते हैं, जान लेने देने पर आ जाते हैं। लेकिन, शादी माँ-बाप की मर्ज़ी से करते हैं। महानगरों में रहते हैं, ऐश करते हैं और अंत में छोटे शहरों में रह रहे माँ-बाप की इज्ज़त रखते हुए उनकी मर्ज़ी से शादी कर लेते हैं। लेकिन, कुछ ऐसे भी हैं जो ये तय कर लेते हैं कि अपनी पसंद का ही जीवन साथी चुनेंगे और उस वादे को अंत तक निभाते भी हैं। फिर माँ-बाप आसानी से मान लें या फिर वो कोर्ट मैरिज करके उन्हें ब्लैकमेल करें। इनके बीच कुछ ऐसे हैं जिन्हें अनमोल रत्न कहा जा सकता हैं। जो जीवन भर माँ-बाप का कहना मानते रहे। ऐसे माता-पिता सिर ऊंचा करके ये कहते दिख जाते हैं - बेटा लदंन में नौकरी करता है, लेकिन शादी हमारे कहने पर कर रहा है। समाज में और कई दोहरे मापदंड मौजूद हैं। जिनके बीच हम सभी जी रहे हैं, ख़ासकर शादी जैसे विषय को लेकर। हम सभी अपने हिसाब से अच्छा बुरा तय करने लगे हैं, बिना किसी सलाह मशवरा के। रिश्तों के साथ खेलने लगे हैं, ब्लैकमेल करना सीख गए हैं। अपने फायदें देखने लगे हैं। शायद हम सामने खड़ी परिस्थिति से निपटना नहीं बचना सीख चुके हैं !

3 comments:

संजय तिवारी ’संजू’ said...

दीप्ती जी ,
शादी एक ऎसा लड्डू है जो हर कोई खाना चाहता है,
परन्तु शादी हमेशा दोनो की मर्जी से होना चाहिये , क्यो कि वो रिश्ते जादा नही चल सके जो दोनो की मर्जी के बगैर तय हुऎ,
मेने तो प्रेम विवाह किया है , इस कारण मे प्रेम विवाह को ही प्रोत्साहित करुगा ।
हर मां बाप को ये सोचना होगा कि उनका विवाह उन पर थोपा गया या उनकी सलाह ली गयी,
जेसे तेसे रो रा के उनने तो जिंदगी गुजार ली अब बच्चो का फैसला ब्च्चो को करने दे आप पहले खुद जा कर अपने ब्च्चो की पंसद से मिल कर फैसला ले आप यह बात अपने परिवार बालो को सम्झाने का प्रयत्न करे

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

दोहरे मानदण्ड अगर अपनी बजाय मां-बाप की पसन्द की लड़की/लड़के तक हो - तो ठीक है शायद। पर जब तथाकथित आदर्श से समझौता कर दहेज की गांठ से भी बंधते हैं ये युवा, तब खोखले लगते हैं।

आपके ब्लॉग की फीड में समस्या है। गूगल रीडर अपडेट नहीं करता। फीडबर्नर ट्राई कर देखें।

विनीत कुमार said...

मेरी मां दूसरी जाति के लड़के-लड़कियों के साथ शादी के खिलाफ है। पहले वो इसका विरोध करती थी लेकिन अब लाचार होकर कहती है, औलाद ही जब बिसर जाए तो फिर मां-बाप क्या कर सकता है। पिछले दिनों मेरे एक एजिन ने एक क्रिश्चियन लड़की से शादी कर ली। मां का पैमाना बदल गया- जब दूसरी ही जाति की लड़की से शादी करनी थी तो कम से कम हिन्दू लड़की से करता।
मैंने मां को बताया,मेरा मामला मां कुछ इसी तरह से है लेकिन लड़की हिन्दू है। मां का कहना था-ये तो उसके लिए कह रहे थे न,तुम्हारे लिए तो नहीं। मतलब मेरे लिए वही विधान कायम है।