Thursday, May 7, 2009

औरत रोज़ाना मरती है...


आज सुबह नवभारत की वेब साइट पर एक लेख पढ़ा - औरतों को नंगा घुमाते हैं और तालिबान को गरियाते हैं... पढ़कर उतना ही गुस्सा आया जितना कि किसी भी संवेदनशील भारतीय जो कि अंधों की तरह किसी धारणा के पीछे चलता हो को आया होगा। पिछले कई दिनों से दिमाग इंसान की ऐसी ही कुछ सोचों के आगे पीछे घूम रहा हैं। एक के बारे में कल लेख भी लिखा था, कि कैसे हमने अपनी सुविधा के अनुसार अपने कामों को बांट लिया, खांचों में बांध लिया हैं। नवभारत पर छपे इस लेख को पढ़कर भी ही लगा कि हम अपनी दोगली मानसिकता को बिना किसी शर्म के रह रहकर दिखाते रहते हैं। जितनी मेरी समझ है हमारे देश के इतिहास में महिलाओं ने कई बड़े-बड़े काम किए। वो भारत की आज़ादी के लिए चलाई गई लड़ाई में शामिल होना हो या फिर चांद पर पहुंचना। हर ओर महिलाएं आगे हैं। लेकिन, यही महिला रोज़ना जलकर मरती भी है और जन्म के पहले ही उसे भ्रूण में कुचला भी जाता है। हर बार ये कहकर इन विसंगतियों किनारे कर दिया जाता हैं कि ये महिलाओं की सहनशीलता है या फिर ईश्वर की मर्ज़ी। मैं ख़ुद मध्यप्रेदश से हूँ और अपने ही प्रदेश में हुई इस घटना पर शर्मिंदा हूँ। किसी को सज़ा देने का ये तरीक़ा बेदह ही अमानवीय है। ऐसी सज़ा देनेवाले शायद ये नहीं जानते है कि शरीर पर दिए गए ये घाव सीधे मन पर लगते हैं। और, ऐसे में ही इंसान विद्रोह करता हैं और फिर इसके विद्रोह का तरीक़ा कुछ भी हो सकता है और उसे कोई ग़लत भी नहीं कह सकता हैं। वेब साइट पर लिखे लेख में लेखक ने हमारी तुल्ना तालिबान से की है कि शायद हम भी वैसे ही है। मैं तालिबान का शाब्दिक अर्थ नहीं जानती हूँ। फिर भी मुझे लगता है कि हम शायद कभई भी इतने संवेदनशील नहीं रहे है कि महिलाओं का सम्मान करें। तालिबान ये काम खुलकर करता है और उसके समर्थन में कुतर्क भी पेश करता है। हम जैसे कि हम है दोगले इंसान सो हम ये सब दब छुपकर करते हैं और एक मुखौटा ओढ़े रहते है कि हम तो बड़े सभ्य हैं। घर में बेटियों को बाहर के कामों से लेकर घर तक के सारे काम सिखाते हैं। लड़का बस ऑफ़िस से आकर बिस्तर पर लेट जाता है। बहूओं से भी आज के वक़्त में यही उम्मीद की जाती है कि वो घर बाहर दोनों संभाले। साल 2004 की बात कि मेरी एक मौसेरी बहन की नई-नई शादी हुई थी। उनकी शादी के 10 दिनों बाद ही एक मामेरी बहन की शादी थी। मौसेरी बहन और मामेरी बहन में बहुत प्यार था फिर भी मौसेरी बहन शादी में नहीं पाई। क्यों... क्योंकि उनके ससुराल में शादी थी। मैंने पापा से पूछा कि ऐसा क्यों नहीं हुआ कि दीदी यहाँ जाएं और जीजाजी वहाँ चले जाएं। पापा ने कहा - कि बेटियों को तय करने का अधिकार जब घर में नहीं हासिल तो ससुराल में क्या होगा। ऐसे मेरी एक बहन भी जलकर मरी है... अंत में बस इतना ही कि हम किसने क्रूर है, कितने निर्दयी है, महिलाओं के प्रति कितने असंवेदनशील है ये साबित करने के लिए महिलाओं को नंगा करने की ज़रूरत नहीं। रोज़ाना ही ये समाज ऐसा कुछ करता रहता है जिससे कि महिलाओं का मानसिक बलात्कार होता है....

9 comments:

मोहन वशिष्‍ठ said...

ये सब बातें ही इन देशों के अंत का सूचक हैं बहुत ही जल्‍द खत्‍म हो जाएगा इन जैसे देशों का नाम बहुत ही निंदनीय

अक्षत विचार said...

Phir bhi asha ki kirne jagmaga rahi hain aur stiriyan dhire hi sahi pur barabari par aa rahi hain

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

संकीर्ण मानसिकता है, बदलते बदलते बदलेगी।

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SBAI TSALIIM

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

हमारे भीतर भी जीता है कहीं एक तालिब
उसे मारना होगा।

RAJNISH PARIHAR said...

सही विचार लगे आपके..नारी को नंगा करके क्या होगा?उसे तो पहले ही बहुत प्रताडित किया जा चूका..अब तो सम्मान देने का समय है..!ये तालिबानी हुक्म अब नहीं चलने चाहिए..

अशोक पाण्डेय said...

सही कह रही हैं आप। औरतों के प्रति हमारा समाज बहुत ही असंवेदनशील है।
हमारे देश के इतिहास के हर कालखंड में कुछ लोगों ने इसमें सुधार की कोशिश की है, लेकिन इसमें अब तक विफलता ही हासिल हुई है।

Udan Tashtari said...

यह असंवेदनशीलता हर जगह देखने मिल जाती है..मगर स्थितियाँ सुधार की ओर ही हैं.

Brijesh Dwivedi said...

talibani yaha bhi kam nahi hai...

वजूद said...

बात लिंग के आधार पर है इसलिए कहना होगा कि ईश्वर ने मर्द में बल दिया ताकि पौरुष स्थापित हो सके, स्त्री में भावनाएं दीं ताकि ममता आकार के सके. ये दोनों श्रष्टि के विकास में आगे आये. लेकिन यदि मर्द अपने बल का दुरूपयोग करे या स्त्री ममता का उपहास करे तो उन्हें पुरुष या महिला अथवा तालिबान नहीं, बल्कि नपुंसक या हिजडा कहा जा सकता है.....