Tuesday, June 30, 2009

आज भी खरे है तालाब...

कुछ दिनों पहले एनडीटीवी पर एक रिपोर्ट देखी थी देश में चल रही पानी की समस्या पर। इस रिपोर्ट में अनुपम मिश्र की किताब आज भी खरे है तालाब से संदर्भ सामग्री ली गई थी। अगले दिन ऐसे ही ऑफ़िस में अपनी सहकर्मी से बातचीत में मालूम हुआ कि किताब बहुत ही बेहतरीन है और उसकी लेखन शैली तो बहुत ही ज़ोरदार है। ऐसे में मन हुआ कि उसे पढ़ा जाए, सो सहकर्मी से ही मैंने वो किताब तीन दिन के लिए उधार मांगी। किसी से भी जब भी किताब पढ़ने को मांगती हूँ तो ये बात हमेशा दिमाग में घूमती रहती है कि उसे जल्द से जल्द लौटा दिया जाए। सो मैंने उसे पढ़ना शुरु किया। सच में क्या बेहतरीन किताब लिखी है। पढ़ते हुए लग रहा था मानो मैं किसी तालाब के आगौर पर खड़ी हूँ, उन लोगों के बीच जो इसे इतने प्रेम से बनाते थे। बातों को इतने साफ़ सुथरे तरीक़े से और इतनी सरल भाषा में लिखा है। कई बार ऐसा हुआ कि एक लाईन पढ़ी और फिर उसे दोबारा पढ़ा। किताब को पढ़कर मालूम चला कि पानी के मामले में हमारा प्रबंधन और इंजीनियरिंग बेहतरीन थी, वो भी बिना किसी आईआईएम या आईआईटी में पढ़े। पूरा समाज जुटा रहता था इन्हें बनाने में, इन्हें साफ सुथरा रखने में, इन्हें बचाए रखने में। राजा क्या प्रजा क्या हर कोई तालाब और पानी को अपना मानती थी और उसकी देखभाल करती थी। पूरे देश में उस वक़्त जो प्रबंधन किया जाता था वो अगर आज तक चलता रहता था तो पानी के लिए आज मची ये हाहाकार ना होती। किताब में बहुत सी उपयोगी जानकारी थी। साथ ही साथ वो कारण भी थे जिनके चलते पानी के मामले में हम इतने दयनीय हो गए हैं। किताब में बताया गया है कि भोपाल का ताल इतना बड़ा थी कि जब उसे तोड़ा गया तो तीन साल तक लगे थे उसे खाली होने में। आज भोपाल में दो दिन में एक दिन पानी आता है और ऊपर के घरों में तो उसमें भी दिक्कत। ऐसे ही देवास के बारे में लिखा है कि कैसे एक एक करके उस शहर के हर तालाब को पाटकर शहर बना दिया गया। हालात आज इतने खराब है कि इंदौर से पानी खरीदा जा रहा है। जिसमें पचास हज़ार रुपए मात्र रेल्वे भाड़ा है रोज़ाना का। और, उसमें भी देवास के तात्कालिन कलेक्टर ने गर्व से इस उधार का स्वागत किया था। हमें कैसे होते जा रहे हैं। आज देवास में आठ दिन पर पानी आता है और अगर ना आए तो 16 दिन पर। क्या ऐसे में ये गर्व की बात हो सकती है कि आपने शहर के तालाब पाट दिए। ये सब पढ़कर दुख हुआ। लेकिन, दुखी होने से ज़्यादा ज़रूरी है फिर अपनी जड़ों की तरफ मुड़ना। मुझे लगता है कि हर उस इंसान को ये किताब पढ़नी चाहिए जो पानी पीता भी है।

4 comments:

Admin said...

वाह क्या बात है.. बेहतरीन जानकारी

सर्वत एम० said...

किताब पढने से क्या फायदा ,मेरा तो कहना है की अब हर गावं में तालाब खोदने के लिए कारसेवा शुरू होनी चाहिए

कुश said...

पुराने समय की बावडिया आज भी जल संग्रह की उचित मिसाल है..

sangita puri said...

पढाई लिखाई करने के बाद हमलोग पुरानी सारी बातों को अंधविश्‍वास मान लेते हैं .. पर मनुष्‍य की मूलभूत जरूरतों के बारे में हमारे पूर्वजों की सोंच अधिक परिपक्‍व थी।