Friday, November 13, 2009

फैलती चादर के साथ लंबी होती टांगें...

आखिरकार मैट्रो आ गई, वो भी बढ़े किराए के साथ। मेरे द्वार आ गई ये कहना ग़लत होगा क्योंकि मेरा कमरा किराए का है और अगर मेरे मकान मालिक ने ये सुन भी लिया कि मैं उसे अपना समझने लगी हूँ तो वो मुझे बाहर का रास्ता दिखा देंगे। खैर, मैट्रो अक्षरधाम आ गई। आज सुबह मैं भी इसी मैट्रो से ऑफ़िस तक आई। मैं भी खुश हूँ। स्टेशन से मम्मी को फ़ोन किया। मम्मी भी खुश बोली कि- अब तो बेटा तो इसी से आया जाया कर। आराम हो जाएगा तुझे। मैंने कहा कि जब भी जल्दी होगी इसे आऊंगी। वैसे तो बस है ही। मम्मी ने कहा क्यों परेशान होगी बेटा इसी से जाया कर। मैंने कहा कि- मम्मी मैट्रो का किराया 13.50 रुपए है, डीटीसी 15 लेती है और ब्लू लाइन 10 रुपए। ऐसे ब्लू लाइन से आने में 3.50 रुपए बचते है। मम्मी ने कुछ नहीं कहा। फ़ोन रखने के बाद मैं पूरे समय ये सोचती रही कि बड़े होना कितना बड़ा सर दर्द है। 3.50 रुपए के लिए बस के धक्के खाओ। ज़माना बीत गया दिल्ली में फ़ुल क्रीम दूध पिए। ये सब कुछ इसलिए नहीं कि सैलेरी कम है। ये सब इसलिए कि मंहगाई के अनुपात में वो बढ़ नहीं रही हैं। अगर बढ़ भी गई तो क्या। मंहगाई और बढ़ जाएगी। जब 4500 रुपए महीने पर काम करती थी तब 10 रुपए बचाने के लिए पैदल चलती थी। सोचती थी जब पैसे बढ़ेगे रिक्शा में चलूंगी। आज मेरी तनख्वाह दोगुनी हो गई है लेकिन, फिर भी मैं रिक्शे पर नहीं चलती हूँ...
एक कहावत है कि जितनी चादर हो उतने ही पैर फैलाने चाहिए। यहाँ तो जैसे-जैसे मेहनत कर-करके चादर को पैरों के हिसाब से फैला रहे हैं पैर वैसे-वैसे लंबे होते जा रहे हैं।

4 comments:

अंशुमाली रस्तोगी said...

बात में दम है।
पर महंगाई कहां हुई कम है।

कुश said...

अपनी सहूलियत के लिए ही तो कम रहे है.. अच्छा जिया जाये इसके लिए मेहनत करे और पैसे बचा कर अच्छे से जिए भी नहीं.. तो फिर काम कैसे चलेगा.. खैर आपका कहना कुछ अलग है.. महंगाई तो बढ़ी ही है.. तनख्वाह बढती है तो खर्चे भी बढ़ जाते है..

पर मेट्रो में जाने से आप बसों पे पोस्ट नहीं लिख पाएगी.. आपकी अधिकतर पोस्ट्स में दिल्ली की बसे तो मिल ही जाती है.. :) तो अब मेट्रो आने के बाद क्या मेट्रो मिलेगी ?

विनीत कुमार said...

मैंने अब ज्यादा से ज्यादा पैदल चलना शुरु कर दिया है। पैसे तो अक्सर होते हैं पास में लेकिन पता नहीं भीतर से अजीब से फील करता हूं, क्यों बीस रुपये खर्च करुं। हॉस्टल में मंहगाई का कोई खास असर समझ नहीं आ रहा। बस अखबारों और चैनलों में इसके बारे में देखता-पढ़ता हूं लेकिन पता नहीं किस विधान के तहत खर्च के मामले में पहले से बहुत अधिक संयमित हो गया हूं।.

amar anand said...

ज़िंदगी में रोज़मर्रे की अड़चनों को लेखन का ज़रिया बनाया है आपने। दीप्ति आप बहुत अच्छा और बारीक लिखते हो। आधार मजबूत है थोड़ा और धार दीजिए। लगता नहीं है कि आप जर्नलिज्म में नई हैं। आपका भविष्य दीप्त है।

अमर आनंद