Friday, February 12, 2010

समझा ना पाने का डर...


क्या बताएं, कैसे समझाएं।
क्या वो हमें समझ पाएंगे।
क्या वो ये जान पाएंगे कि हमारा ये फैसला ऐसा क्यों हैं।
ये सारे सवाल आज के ज़्यादातर युवाओं के मन में हैं। कल ही ऑफ़िस से लौटते समय मैट्रो में एक लड़की अपने दोस्त से बात कर रही थी। वो उसे बता रही थी कि वो और उस बॉयफ़्रेन्ड अलग-अलग जाति के हैं और उन्हें घर में अपने रिश्ते के बारे में बताने में उलझन हो रही है। हाल ही में मेरी एक दोस्त की शादी तय हुई हैं। लगभग पाँच साल के लंबे रिश्ते के बाद दोनों शादी कर रहे हैं। अपने-अपने माता-पिता को ये समझाने में उन्हें अच्छी खासी मशक्कत करने पड़ी हैं। मेरे इस लेख के पीछे उद्देश्य ये कतई नहीं है कि माता-पिता बच्चों की बात और उनकी मर्ज़ी को बिना काटे मानते जाएं। मेरे परेशानी है बच्चों और माता-पिता के बीच की ये खाई। हम कितने भई आधुनिक क्यों न हो जाएं आखिर हमें ऐसी बातें घर में बताने में इतना क्यों हिचकिचाते है। क्या इसकी वजह वो डर है जोकि माता-पिता ने हमारे मन में भर दिया है। मर्यादा के नाम पर अपने मन की बात न करना और अपनी पसंद नापसंद नहीं बता पाना क्या सही हैं। कुछ दिन पहले मैं अपनी टीम के साथ एक गर्ल्स कॉलेज शूट के लिए गई। मेरी साउन्ड रिकॉर्डिंस्ट ने कहा कि अच्छा कॉलेज है मेरी बेटी को यही पढ़ाऊंगी। उसकी बेटी फिलहाल पाँच साल की हैं। कॉलेज में दिखाई जानेवाली फ़िल्म सेक्स और उससे जुड़ी जानकारियों पर थी। उसे देखते ही उसका विचार बदल गया। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। मेरी ये सहकर्मी मुझे उम्र महज चार या पाँच साल बड़ी होगी। मानेकि लगभग एक सी ही। हम हमेशा ही ये बता करते हैं कि हमारे माता-पिता हमें नहीं समझते, वो हमारी बात को नहीं सुनते और अपनी मर्ज़ी चलाते हैं। इन बहसों में शामिल होनेवाली मेरी ये सहकर्मी अपनी बेटी को लेकर आज से सारे फैसले करने लगी हैं। बेटी को कॉलेज की पढ़ाई कहाँ से करना ये तक वो खुद तय कर रही हैं। अर्थ ये हुआ कि बस वंश बढ़ रहा है सोच नहीं। जो हम हमारे माता-पिता के लिए बोलते हैं वो ही हमारे बच्चे हमें भी बोलेंगे। मैं ये जानती हूँ कि ये बात इतनी भी आसान नहीं कि बच्चे हर बता सीधे माता-पिता को कह सकें या फिर माता-पिता हम बात बच्चों से। इसके साथ ही समस्या शुरु होती है भावनाओं के साथ ही मानसिक तनाव की। मेरी पहचान की एक लड़की ने कुछ साल पहले ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली थी। वजह ये कि वो किसी और से प्यार से करती थी और उसकी शादी माँ ने अपनी तबीयत का हवाला देते हुए करवा दी। माँ तो आज भी ज़िंदा है लेकिन, अपनी जवान बेटी की हत्या की दोष में। आखिर हम चाहते क्या हैं। अपने बच्चों को बाहर पढ़ने भेजते हैं। वो नौकरी दूसरे शहरों में करते हैं। हम उन पर पूरा विश्वास करते हैं कि वो जहाँ पढ़ रहा है वो सही है या फिर वो जहाँ नौकरी कर रहा है वो भी सही है। लेकिन, वही संतान जब शादी का फैसला करती हैं तो क्यों उसे बिना सुने खारिज कर दिया जाता हैं। क्यों अपने बच्चे की पसंद से मिलने से पहले ही हम उस पसंद से चिढ़ने लगते हैं। ये खाई क्यों....
हिचक ग़लत नहीं लेकिन, डर तो ग़लत है। हम आधुनिक हो गए हैं। अच्छा पढ़ रहे हैं। एक खुले माहौल में रह रहे हैं। काम कर रहे हैं। लोगों से मिल रहे हैं। पसंद भी कर रहे हैं और जीवन साथी का चुनाव भी कर रहे हैं। फिर भी इस बात को अपने ही माता-पिता जिनके साथ जीवन बिताया है उन्हें बताने से क्यों डर रहे हैं....

7 comments:

हृदय पुष्प said...

मेरा अनुभव भी कुछ ऐसा ही है शिक्षाप्रद लेख के लिए धन्यवाद्

vinay said...

सोचने पर मज़बूर करता है,यह लेख ।

यशवन्त मेहता "सन्नी" said...

आलेख एक प्रश्न पुछ रहा है

विनोद कुमार पांडेय said...

मनुष्य के मनोदशा पर निर्भर करता है..जबकि ऐसा होना नही चाहिए शायद उन्हे ऐसा आभाष होता है की वो जिसके बारे में बात करने जा रहे है वा कुछ सही नही और यही वजह होती है उनके नज़रें चुराने की....दीप्ति जी सार्थक चर्चा...धन्यवाद

Baba adom said...

Thanks for this Educational & innovative idea . That are created by your emotional & rational thinking . I believe that , You'll sure remove introvert and extroverte mentallity from new generation. Because, Both are the part of communication gap . Due to this reason, Any Family can not generate transpirancy from family / familry member .

jayprakash said...

sach me aisa hi hota hai.it leaves a good massage....
keep on dipti.
i think ab tum ko iss ke hal ke bare me likhna chahiye kyun?

jay prakash yadav said...

sahi lekh hai .mai chahta hun aap iss tarah ke lekh aur likhen ....