Friday, February 26, 2010

और बहस पूरी हो गई


पत्रकारिता से जुड़े होने की वजह से और राजनीति में सबसे ज्यादा दखल रखनेवाले प्रदेश से होने की वजह से संसद के सत्रों में हमेशा से ही दिलचस्पी रही हैं। दिल्ली आने के बाद मुठ्ठी भर आमदनी ने मंहगाई और सरकार के इस चोली दामन के रिश्ते को और गहराई से समझा दिया है। ऐसे में लगातार कुछ दिनों से विपक्ष के काम रोको प्रस्ताव की मांग को सरकार की शक्ति से धुलते भी देखा। और, फिर शुरु हुआ कल सुबह से वही घिसा पिटा राग माने कि 193 के तहत मंहगाई पर बहस। ऐसी बहसें एक आम आदमी को कितनी समझ आती है ये बात शायद हमारे नेताजी सबसे ज्यादा बेहतर जानते हैं। यही वजह है कि नेता प्रतिपक्ष के रूप में पहली बार सदन में आई सुषमा स्वराज भी अपने प्रभाव से इस बहस को स्थगन में नहीं बदल पाई। सुषमा स्वराज ने पूरी बहस में ख़ुद को एक आम गृहणी के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की। अपने राशन के बिल को भी शरद पवार तक पहुंचाया। लेकिन, जैसे कि बहस होती है और जैसा की इनका औचित्य होता है ये सिर्फ़ एक मज़ाक ही रही। शरद पवार और सुषमा स्वराज परचून की दुकान को लेकर ही आधे समय तक उलझे रहे। सरकार ने मंहगाई जैसे किसी शब्द पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई और विपक्ष अपनी ढपली लेकर उसे पूरे समय पीटता रहा। बीच-बीच में कुछ आगे-पीछे बैठे सांसद उचके और अपने चेहरे दिखाते रहे। मंहगाई को लेकर विपक्ष ने वही सब कहा जिसकी उम्मीद थी और सरकार ने भी उम्मीदों से आगे कुछ नहीं किया। दोनों ही अपनी अपनी जगह बेहतरीन रहे। बस जो उल्लू बने वो थे हम जोकि सब कुछ जानते बूझते ये तमाशा देखते रहे कि शायद इन्हें हमारी भी याद आएगी। हम पूरे समय यही सोचते रहे कि अभी नेताजी आम जनता की बात करेंगे। लेकिन, नहीं नेताजी तो बस अपने में ही उलझे रहे। लेकिन, हम रहे वैसे कि वैसे आज भी टीवी से चिपके बैठे रहे इस उम्मीद में की आम बजट में कुछ हम आमों के लिए भी होगा। लेकिन, आम कहाँ आम रहा है वो तो अब ख़ास हो चला है....

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