Tuesday, April 27, 2010

आत्मीयता के रिश्ते

इसी महीने मेरे बड़े भाई की वर-इच्छा हुई। यानी कि शादी तय होना। इसे कुछ लोगों के लिए मैंने बदलकर सगाई कर दिया क्योंकि वो ज़्यादा लोगों को मालूम रहनेवाली रस्म है। खैर, भैया की शादी एक बात है जिसका पूरा परिवार बहुत दिनों से इंतज़ार कर रहा था। हम सभी खुश हैं। उत्साहित हैं और शादी की तैयारियों में जुटे हुए हैं। रिश्ते-तानेवाले और दोस्त-यार हरेक मदद के लिए तैयार है। लेकिन, फिलहाल बात शादी की नहीं उन दो इंसानों की जो भैया की शादी को लेकर कुछ ऐसे खुश हैं कि मानो उन्हें कुछ मिल गया हो। बात मेरी दो पड़ोसनों की। दोनों बहनें हैं एक सात साल की और एक तीन साल की। दोनों हमारे पड़ोस में रहती हैं। दोनों के लिए हमारा घर दूसरा घर है। चाचा की शादी दोनों की ज़िंदगी में इस वक़्त सबसे बड़ा उत्सव है। मेरा भैया उनके लिए उनके चाचा से भी बढ़कर है। मैं उनके लिए उनकी असल बुआ से बढ़कर हूँ। वो जितनी ज़िद्द मुझसे करती उसे देखकर ऐसा लगता है कि मैं उनकी जागीर हूँ। उन्हें क्या चाहिए, कैसे चाहिए, कितना चाहिए वो लिस्ट बनाकर मुझे बताती है। जब भैया का रिश्ता हम तय करके आए तो छोटी को तो नहीं लेकिन, बड़ीवाली को बहुत दुख हुआ। उसे लगाकि अब क्या चाचा की शादी मेरे बिना ही हो जाएगी। उसने बहुत दुख जताया। यही वजह थी कि वो हमारे साथ भैया की वर-इच्छा में इंदौर भी गई। पूरे मेकअप के सामान और दो जोड़ी कपड़ों के साथ। पूरे दिन वो हमारे साथ रही एक भी बार उसे मम्मी की याद नहीं आई। मेरी मम्मी यानि की उसकी दादी और मैं उसके लिए सब कुछ थी। इसके बाद जब हम वापस आए तो छोटीवाली बहन ने खूब लड़ाई की। मुझे क्यों नहीं लेकर गए। उसे प्यार से फिर मनाया गया। दोनों के बीच फिलहाल घोड़ी पर बैठने के लिए दोनों में लड़ाई है। कौन-सी ड्रेस कब के लिए चाहिए उसकी लिस्ट भी मम्मी को दे दी गई है। उन दोनों बच्चों को देखकर लगता है कि खून के और बंधे-बंधाए रिश्तों से बढ़कर होते है ये आत्मीयता से भरे रिश्ते...

2 comments:

डॉ .अनुराग said...

yakinan!!

हरि शर्मा said...

ye rishte yoo hee pyaare bane rahe.