Monday, June 14, 2010

कुत्ते की दुम से बड़ी इंसानी मक्कारी...

कुत्ते बेचारे अपनी टेढ़ी दुम को लेकर अफसोस मनाते होगे। प्रकृति की बनाई इस दुम को इंसान ने अपनी अलाली के लिए मुहावरे में जो प्रयोग में ले लिया हैं। मुझे नहीं मालूम कि किसी ने कुत्ते की दुम को कभी नली में रखा या नहीं और उसके बाद क्या हुआ क्या नहीं मुझे कुछ नहीं मालूम। हां लेकिन, ये ज़रूर मालूम है कि इंसान अगर मक्कारी करने पर उतर आए तो किसी भी तरह से उसे सुधारा नहीं जा सकता हैं। मैं बात कर रही हूँ पिछले दिनों दिल्ली मैट्रो में हुई धड़-पकड़ की। जहां ट्रेन ख़त्म होती हैं वहां ये होना आम बात है कि लोग पिछले स्टेशन से ही उसमें चढ़ जाए। ऐसा करने से फायदा होता सीट का। ख़ासकर केन्द्रीय सचिवालय पर ये बात आम है। यहां लोग सीट के चक्कर में जहांगीर पुरी जाने के लिए पहले राजीव चौक से केन्द्रीय सचिवालय जाते हैं और फिर ट्रेन के ख़त्म हो जाने पर भी उसमें बैठे रहते हैं और उल्टा लौटकर आते हैं। ऐसे में उन इमानदार यात्रियों की सीट मारी जाती हैं जोकि राजीव चौक की भीड़ में लाइन में लगे रहते हैं। ऐसे में मैट्रो ने ऐसे आरामखोरों से निपटने के लिए चैकिंग की शुरुआत की। लोगों को पकड़ा और जुर्माना भी किया। आंकड़ों से मालूम चला कि जहां-जहां भी ऐसी हरकतें हो रही हैं, वहां मिडिल क्लास माने कि नौकरीपेशा लोगों की संख्या ज़्यादा हैं। ये तबका ज़रूरतमंदों को सीट देने में तो पिछे है ही लेकिन, साथ ही ये इस तरह की चालकी में भी पीछे नहीं हैं। खैर, मुद्दा ये नहीं है कि लोग ऐसा करते हैं या फिर मैट्रो उनका सबक सिखाना चाहता हैं। बात बस इतनी है कि पिछले कुछ दिनों से ये धड़-पकड़ बंद हो गई है। जोकि होना ही थी। और, अब फिर से लोग आराम राजीव चौक से जॉय राइड करते हुए नज़र आने लगे हैं। अब मालूम नहीं कि मेरा ये लेख किसी कुत्ते के कानों में पड़ेगा या नहीं या फिर वो समझ पाएगा या नहीं लेकिन, मैं इतना ज़रूर मानती हूं कि कुत्ते की दुम से भी टेढ़ी होती हैं- इंसानी मक्कारी।

3 comments:

माधव said...

agreed

PD said...

आपकी बात शर्तिया उनके कानो में नहीं पड़ा होगा..

स्वप्निल नरेन्द्र said...

इस पोस्ट में हम केवल कुत्तों के बारे में बात कर रहे हैं या फ़िर उन कुतियाओं के बारे में भी जिन्होंने सीट लेना अपना अधिकार तो जाना है पर ज़रूरतमँद को सीट देना उनका कर्तव्य होता है इस बात से अपना पल्ला-दामन-घूँघट सब झाड़ रखा है?

और दीप्ती यार इसमें 'ईमानदार' यात्री कहाँसे आ गये? यात्री कबसे ईमानदार और बेईमान होने लगे? सवाल रहा मैट्रो के घर पकड़ और जुर्माने का, तो मेरे पास कार्ड है ... बताइये मैं ईमानदार हुआ या बेईमान अगर मैं भीड़ से बचने के लिये राजीव चौक की बजाये पटेल चौक से चढ़ने लगा? मैट्रो मेरे ऊपर कोई जुर्माना नहीं लगा सकती।

हर बात पर अपनी राय रखने में कोई खराबी नहीं है, लेकिन हर बात में अपनी उस राय से क्या सही है और क्या गलत है इस बात का फैसला करना ये गलत है।