Thursday, May 14, 2020

दर्दभरा संघर्ष





ना रोज़गार रहा

ना छत रही

ना घर लौटने का ज़रिया मिला

बस एक सड़क है

जो घर की तरफ जाती है

कोई सिर पर सामान लादे

कोई गोद में बच्चा थामे

कोई चप्पल पहनें

तो कोई नंगे पांव

चले जा रहे हैं लोग

बेतहाशा

बेबस

कभी जिन सड़कों को बनाने में अपना पसीना बहाया था

आज उन हज़ारों मील लंबी सड़कों को उन्हीं मज़दूरों के पैरों ने नाप डाला है...

कभी घर-बार छोड़ कर रोजी-रोटी के लिए हज़ारों मील दूर आए थे...

महानगरों में आसमान छूती इमारतों को खड़ा किया...

ना जाने कितने लोगों का आशियाना तैयार किया...

कल-कारखानों में पसीना बहाया...

खेत-खलिहानों में फसलें उगाई...

लेकिन जब बुरा वक़्त आया तो सबने मुंह मोड़ लिया...

काम-धंधे बंद हुए तो छत भी छिन गई

दाने-दाने को मोहताज होने की नौबत आ गई

फिर एक ही आसरा दिखा...

अपनी मिट्टी

अपना घर

घर पहुंचने की इसी आस में लाखों-लाख मज़दूर चल पड़े

जिसे जो साधन मिला उससे निकल गया

और जिसे कुछ नहीं मिला वो पैदल ही निकल पड़ा

लेकिन मज़दूरों की नियति ही संघर्ष है

उनका ये पलायन भी संघर्ष है... दर्दभरा संघर्ष


भुवन वेणु

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