Sunday, June 7, 2020

स्मृति शेष योगेश: कहाँ तक ये मन के अँधेरे चलेंगे...

इन दिनों लॉकडाउन में गीतकार योगेश के एक फिल्मी गाने को मैं बार-बार सुन रहा हूँ और मेरे एक मित्र जिन्होंने मुझे इस फिल्म का आडियो-वीडियो भेजा था उनका तो मानना था कि लॉकडाउन में जब सतत घर में रहने और कोरोना संक्रमण की डरावनी खबरों से अवसादोन्मुख होने की आशंका बलवती है हर उस व्यक्ति को जिसके पास साधन है उसे अर्थपूर्ण और दिल को छूने वाले फिल्मी  गीत लिखने वाले योगेश के इस गाने को जरुर सुनना चाहिये. फिल्म- "बातों बातों में" में पृष्ठभूमि में फिल्माया गया था यह गीत आप इस गीत के बोल पर गौर करेंगे तो लगेगा आशावादिता अपनी समूची शिद्दत के साथ जीवंत हो गई है -

कहाँ तक ये मन को अँधेरे चलेंगे, 
उदासी भरे दिल कभी तो ढलेंगे. 

योगेश, शैलेन्द्र सहित उन बीसियों शीर्षस्थ गीतकारों में शुमार किये जाते हैं जो जीवन दर्शन पर प्रभावी लेखन के लिये जाने जाते हैं. योगेश के अवसान के साथ ही  अर्थपूर्ण गीत लिखने वाली पीढ़ी का एक और सितारा अस्त हो गया. हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म "आनन्द" में सलिल चौधरी  के लिये योगेश ने जो गीत लिखे थे उनमें पहले - "ज़िन्दगी कैसी है पहेली... " गीत शामिल नहीं था. वो किसी और फिल्म के लिये लिखा गया था मगर हृषिदा और फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले राजेश खन्ना को यह गीत इतना भाया कि उन्होंने आनन्द में ही उसे रखा और वह उस फिल्म का लोकप्रिय गीत साबित हुआ.


उत्तरप्रदेश में एक मध्यवर्गीय परिवार में लखनऊ में  जन्मे योगेश को पिता के असामयिक निधन के कारण शिक्षा को स्थगित कर रोजगार की तलाश में जुट जाना पड़ा था .उन दिनों हर पढ़ा-लिखा नौजवान काम की तलाश में बम्बई जाता था. योगेश भी अपने एक मित्र सत्यप्रकाश के साथ बम्बई ही आये. असमंजस की स्थिति में योगेश ने कहानी लेखन से सफ़र का आगा़ज़ किया धीरे-धीरे पटकथाएं और संवाद लिखकर रोजी-रोटी जुटाई फिर फिर कविता और गीत-लेखन की ओर बढे . यहाँ पर बचपन मे कविता लिख कर याद करने का अभ्यास काम आया और लखनऊ के साहित्य-सांस्कृतिक परिवेश से जो प्रेरणा मिली थी उसने उन्हें कवि-गीतकार के रुप में पहचान दिलवाई.

योगेश को सगीत निर्देशक की ‘धुनों’ पर गीत लिखना पसंद नहीं था मगर फ़िल्मकार रोबिन बैनर्जी ने उन्हें फिल्म की तकनीक और परम्परा से अवगत करवाया और संगीत की कुछ धुनों पर गीत लिखने के लिये राजी किया.वर्ष 1963 में रोबिन बैनर्जी जब फ़िल्म - "मासूम" पर काम कर रहे थे तब उन्होने योगेश को इस फिल्म के लिये गीत लिखने को कहा तब तक वे संगीत धुनों पर लिखने की कला को समझ चुके थे | रोबिन बैनर्जी के साथ उन्होने सखी रोबिन ,मारवेल मैन, फ़्लाइंग सर्कस और रौबिनहुड समेत लगभग दर्जन भर फ़िल्मों में गीत लिखे.


दो फिल्मी गीतकारों योगेश और अनजान के फिल्म कैरियर की शुरुआत बड़ी झटके भरी रही योगेश की पहली फिल्म -"मासूम" और अनजान की पहली फिल्म -"गोदान" बॉक्स ऑफिस पर असफल रही इस असफलता ने दोनो को शोध एवं रचना प्रक्रिया पर पुनर्विचार करने  करने का अवसर दिया, अनजान-योगेश ने अनेक प्रोजेक्ट पर साथ काम करने का निर्णय किया.योगेश सबिता दीदी के माध्यम से सलिलजी जैसे प्रख्यात संगीतकार के सम्पर्क मे ं वे आये . सलिल दा उन दिनों  "आनंद" पर काम कर रहे थे, उन्हें इस फ़िल्म के लिए एक सुलझे हुए गीतकार की तलाश थी मशहूर शैलेन्द्र की कमी में योगेश को मौका मिला और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. सलिल दा के साथ उन्होंने अनोखादान ,अन्नदाता, रजनीगंधा’ और मीनू जैसी फ़िल्मों में साथ काम किया .
योगेश ने जिन फिल्मों में गीत लिखे उसकी फेहरिस्त काफी लम्बी है मगर कुछ चुनी हुई फिल्मों जैसे मिली, बातो-बातों में. उस पार और मंजिल उल्लेखनीय थी.
योगेश के गीत जिन्होंने दिल को छुआ उनमें - गाने लगी हर धड़कन....., बड़ी सूनी-सूनी है ज़िंदगी, यह ज़िंदगी...,  मैंने कहा फूलों से, तो वह खिलखिला के हंस दिए..., ज़िंदगी कैसी यह पहेली..., कहीं दूर जब दिन ढल जाए...., रजनीगंधा फूल तुम्हारे...,मेरे अनुरागी मन..., न जाने क्यों होता है, यह ज़िंदगी के साथ.... और कई बार यूं ही देखा है, यह जो मन की सीमारेखा .. शामिल थे.
फिल्मी गीतों में साहित्यिकता का पुट देने वाले गीतकार योगेश के बारे में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि वे शैलेन्द्र की परम्परा के सशक्त हस्ताक्षर थे और उन्हें भुला पाना आसान नहीं होगा.


राजा दुबे

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