Friday, May 29, 2009

ये पोस्ट मैंने एक हाथ से लिखी है...


बुधवार की रात को लाइट चली गई थी, जैसा की होता ही रहता है। अचानक से नींद खुली और मैं उठकर बैठ गई। घबराहट हो रही थी सो मैं उठकर बाथरूम तक गई। आते वक़्त अंदाज़ा न होने के चलते मैं दीवार से भीड़ गई और इसका नतीज़ा ये हुआ कि सीधे हाथ में फ़्रैक्चर हो गया। रात को कुछ मालूम नहीं चला सुबह दर्द हुआ तो यूँ ही कपड़े से हाथ को बांध लिया था। ऑफ़िस पहुंचकर मेरे एक सहकर्मी के बहुत ज़ोर देने पर मैं ऑफ़िस के पास ही आर.एम.एल(राम मनोहर लोहिया) अस्पताल तक गई। अस्पताल की अव्यवस्थाओं के चलते पूरे वक़्त इधर से उधर भागती रही। पहले ओपीडी में पहुंचे तो डॉक्टर ने कहा कि यहाँ से अगर पर्ची बनवाओगे तो कल एक्स रे का नंबर आएगा। ओपीडी जिस जगह था वहाँ शायद मरीज़ के रिश्तेदार नहा रहे थे। इतनी गंदगी, वही नहा रहे थे, वही बर्तन धुल रहे थे और वही कुल्ला भी हो रहा था। लोग यूँ ही अपने मरीज़ रिश्तेदारों के साथ इधर उधर पड़े हुए थे। इन्हीं सब के बीच मुझे एक बच्चा दिखा मुंह पूरा ख़ून में था उसके साथ उसके परिवार के कई लोग थे। बच्चा एकदम चुप था लेकिन जैसे ही उसके हाथ को कोई छूता वो बिलख-बिलखकर रो देता। खैर मैं अपने ही तनाव मे थी सो फिर खोजते हुए वहां से आपातकाल में पहुंचे। दो बार ऊपर नीचे करने के बाद पता चला कि किसी और बिल्डिंग से पहले पर्ची बनेगी और फिर बहुत देर की भाग दौड़ और डॉक्टर के इंतज़ार के बाद मुझे एक्स रे रूम में भेजा गया। वो केवल आपातकाल में आनेवाले मरीज़ो के लिए था। और, सबसे मज़ेदार बात ये कि एक एक्स रे होने में 30 मिनिट लग रहे थे और रिपोर्ट पूरे एक घंटे बाद। सच में आपातकाल भी कितना आराम करने लगा है... इस सब झोल के बाद मुझे फ़्रैक्चर रूम भेजा गया। वहाँ वो छोटा सा बच्चा कंधे पर बंधाएं बैठा था। उसकी हड्डी सेट नहीं हुई थी सो वो कट कर नया बंधना था। वहाँ इतंज़ार कते हुए ऐसे ऐसे लोगों को देखा उनके दर्द को देखा कि मेरा दर्द बहुत कम लगा। लेकिन, बात जो सीखी वो थी कि गरीबों के लिए आपातकाल सेवा का अर्थ है - दस से बारह घंटे के इंतज़ार के बाद डॉक्टर के रहमो करम पर कुछ देर की राहत।

8 comments:

अंशुमाली रस्तोगी said...

आपका आंखों देखा हाल, अस्पतालों के सच को बयां करने के लिए काफी है। भारत की अदालतों और अस्पतालों में कहीं कोई फर्क नहीं है। दोनों ही जगह बेतरतीब मरीज और अव्यवस्थाएं हैं।
खैर, आपके हाथ की तकलीफ पर दुख है, लेकिन एक हाथ से लिखने पर प्रसन्नता।
आप जल्द ही ठीक हों।

Ganesh Prasad said...

एक बात सच सच बताये. उस लडके के लिए आपने क्या किया, अपना गम भूल कर उसे एकबार प्यारा या दुलारा भी या उसके माता पिता जो उसके साथ आये थे उनको हेल्प क्या ! अगर आपका जवाब हा है तो ठीक अन्यथा आप कोरी दया रखती है. ! वैसे , अपना अनुभव बताने के लिए धनयबाद ! बुरा न मने !

निर्झर'नीर said...

chalo aapne kuch to sikhaa..
kuch log to dekhkar bhi kuch nahi siikhte

Dipti said...

गणेश मैंने केवल उस बच्चे के पिता से बात की थी कि उस बच्चे को ये चोट कैसे लगी। इससे ज़्यादा कुछ नहीं। उस वक़्त मैं दर्द में थी और उस बच्चे का परिवार भी अपने में उलझा हुआ था।

Nirmla Kapila said...

bahut maarmik drishya hai apki sehat ke liye shubhkamnayen

Vivek Rastogi said...

अस्पताल जाकर तो ऐसा लगता है कि डाक्टर भगवान है और हम पैसा देकर भी उसके रहमो करम पर जिंदा हैं, अगर हम वी.आई.पी. नहीं हैं तो।

वैसे आपने सच कहा है कि जब किसी का ज्यादा दर्द देख लो तो अपना दर्द कम नजर आता है।

अनिल कान्त : said...

zindgi dheere dheere bahut kuchh sikhati hai

श्यामल सुमन said...

आपातकाल और बारह घण्टे का इन्तजार - अपने आप में व्यंग्य है। शुभकामना है कि आप जल्द ठीक हो जायें।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.